श्री भैरव अष्टमी पारंपरिक व्रत कथा
१. नैमिषारण्य में ऋषियों का शौनक आदि से प्रश्न एवं सुमेरु पर्वत पर देव-सभा
कैलास शिखर पर विराजमान देवाधिदेव महादेव, त्रिलोकीनाथ भगवान सदाशिव तथा उनके पूर्णावतार, कालों के काल श्री कालभैरव के श्रीचरणों का परम श्रद्धा के साथ ध्यान करते हुए, इस परम पावन, महापाप-नाशिनी और मोक्षदायिनी कथा का आरंभ होता है। श्री शिव महापुराण की शतरुद्र संहिता तथा स्कन्द पुराण के काशीखण्ड में वर्णित यह अक्षुण्ण और सनातन कथा मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, जिसे लोक में कालभैरव जयंती अथवा भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है, के पावन अवसर पर पूर्ण श्रद्धा, नियम और भक्ति-भाव के साथ श्रवण तथा पठन की जाती है । यह वह परम मंगलकारी आख्यान है जिसके मात्र श्रवण से प्राणी जन्म-जन्मांतर के संचित पापों, भयंकर व्याधियों और अकाल मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त हो जाता है。
एक समय की बात है, परम पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि अठासी हजार तपोधन ऋषि-मुनि एकत्रित हुए थे। उस महान यज्ञीय सभा में पुराणों के मर्मज्ञ और परम ज्ञानी श्री सूतजी महाराज पधारे। सूतजी को देखकर सभी ऋषियों ने उठकर उन्हें दंडवत प्रणाम किया और उन्हें उच्च आसन पर विराजमान कराया। तदनंतर, मुनिश्रेष्ठ शौनक जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनयपूर्वक प्रश्न किया, "हे सूतजी! आप संपूर्ण वेदों, पुराणों और शास्त्रों के अद्वितीय ज्ञाता हैं। कृपा कर हमारे संशयों का निवारण करें। इस अनंत चराचर जगत का आदि कारण कौन है? वह अविनाशी परम तत्त्व क्या है, जो सर्वोपरि है और जिसकी उपासना से जीव इस दुस्तर भवसागर से और जन्म-मृत्यु के चक्र से सर्वथा मुक्त हो जाता है? हम उस परम सत्ता के विषय में यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।"
ऋषियों के इस गंभीर, लोकमंगलकारी और पारमार्थिक प्रश्न को सुनकर श्री सूतजी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान सदाशिव का स्मरण किया और गदगद स्वर में बोले, "हे शौनक आदि ऋषियों! आपने संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। यही प्रश्न एक बार अत्यंत प्राचीन काल में, सुमेरु पर्वत के अत्यंत सुरम्य और पवित्र शिखर पर एकत्रित हुए समस्त ऋषि-मुनियों, सिद्धों, गंधर्वों और देवताओं ने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी से किया था । मैं आप सभी को वही परम रहस्यमयी और सत्य कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, आप सभी एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें।"
सूतजी कहने लगे— "हे मुनीश्वरों! सुमेरु पर्वत की उस महान और भव्य सभा में, जहां चारों ओर दिव्य सुगंध फैल रही थी और गंधर्वों का गान हो रहा था, वहां सृष्टि के रचयिता, चार मुख वाले परमपिता ब्रह्मा जी अपने सर्वोच्च आसन पर विराजमान थे। सभी ऋषिगण उस परम तत्त्व की जिज्ञासा को लेकर ब्रह्मा जी के समक्ष उपस्थित हुए और अत्यंत विनम्र भाव से हाथ जोड़कर वही प्रश्न करने लगे जो आज आपने मुझसे किया है कि हे लोकपितामह! संपूर्ण वेदों और शास्त्रों के अनुसार इस अनंत चराचर ब्रह्मांड का आदि कारण कौन है? वह अविनाशी परम तत्त्व क्या है?" ।
ऋषियों के इस गंभीर प्रश्न को सुनकर ब्रह्मा जी क्षण भर के लिए मौन हुए। परंतु, सृष्टि की रचना के कारण उनके भीतर जो रजोगुण का अत्यधिक प्रभाव और 'मैं ही कर्ता हूँ' यह अहंकार उत्पन्न हो गया था, उसने उनके विवेक को पूर्ण रूप से आच्छादित कर लिया । ब्रह्मा जी भूल गए कि वे स्वयं भी किसी परम सत्ता के अधीन हैं। अहंकार के मद में अंधे होकर वे सत्य का यथार्थ ज्ञान न कर सके。
२. ब्रह्मा और विष्णु के मध्य परम तत्त्व पर महाविवाद
अहंकार और रजोगुण से वशीभूत होकर भगवान ब्रह्मा ने ऋषियों की उस विशाल सभा में अत्यंत गर्व और ऊंचे स्वर के साथ उद्घोष किया, "हे उपस्थित ऋषियों, देवगणों और सिद्धों! आप सभी को यह भली-भांति ज्ञात होना चाहिए कि मैं ही इस संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड का एकमात्र रचयिता हूँ। मैं ही स्वयंभू हूँ। यह संपूर्ण सृष्टि, यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र, देवता, दानव और मनुष्य—यह सब कुछ मेरे ही अमोघ संकल्प से उत्पन्न हुआ है और मेरे ही भीतर समाहित है। मैं ही प्रजापति हूँ और संपूर्ण विश्व का नियंता हूँ। अतः मैं ही वह एकमात्र अविनाशी परम तत्त्व और सर्वोच्च देवता हूँ। मुझसे श्रेष्ठ और मुझसे महान इस ब्रह्मांड में और कोई नहीं है; सर्वत्र और सर्वदा मेरी ही उपासना होनी चाहिए, क्योंकि मैं ही परब्रह्म हूँ" ।
ब्रह्मा जी के इन अहंकारपूर्ण और आत्म-प्रशंसा से युक्त वचनों को सुनकर सुमेरु पर्वत की सभा में सन्नाटा छा गया। उसी क्षण, वहां का वातावरण परिवर्तित हुआ। आकाश से पुष्प-वृष्टि होने लगी और शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले, गरुड़ पर सवार, जगत्पालक भगवान श्री हरि विष्णु वहां साक्षात प्रकट हुए । भगवान विष्णु का स्वरूप करोड़ों कामदेवों के समान सुंदर और तेजमय था। पीताम्बर धारण किए हुए नारायण ने ब्रह्मा जी की वाणी का तत्काल खंडन करते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, "हे ब्रह्मन! आपका यह कथन सर्वथा अनुचित, मिथ्या और अज्ञान से परिपूर्ण है। आप स्वयं को इस संपूर्ण चराचर जगत का सर्वोच्च और परम तत्त्व कैसे कह सकते हैं? क्या रजोगुण के प्रभाव में आकर आप यह सत्य विस्मृत कर बैठे हैं कि आपकी उत्पत्ति मेरे ही नाभि-कमल से हुई है? मैं ही इस संपूर्ण चराचर जगत का आदि कारण, पालनहार और परमेश्वर हूँ। यह संपूर्ण ब्रह्मांड मेरी ही योगमाया से उत्पन्न और संचालित है। मैं ही नारायण हूँ, मैं ही वासुदेव हूँ। जब प्रलय काल में सब कुछ जलमग्न हो जाता है, तब केवल मैं ही शेष रहता हूँ। अतः परम तत्त्व और सर्वश्रेष्ठ देवता केवल मैं ही हूँ, आप नहीं।" ।
भगवान श्री हरि विष्णु के इन वचनों को सुनकर ब्रह्मा जी का अहंकार और भी अधिक भड़क उठा। उन्होंने क्रोधित होकर कहा, "हे विष्णु! तुम मेरे सम्मुख इस प्रकार का दुस्साहस कैसे कर सकते हो? मैं सृष्टि का रचयिता हूँ और तुम केवल मेरे द्वारा रची गई सृष्टि के पालक हो। मेरे बिना तुम्हारी कोई सत्ता नहीं है।"
विष्णु जी ने पुनः मुस्कुराते हुए परंतु दृढ़ता से उत्तर दिया, "हे चतुर्ानन! तुम्हारा यह गर्व निराधार है। तुम मेरे ही अंग से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम मेरे पुत्र के समान हो। एक पुत्र अपने पिता से श्रेष्ठ कैसे हो सकता है? मेरी ही कृपा से तुम्हें सृष्टि रचने का सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। अतः तुम्हें मेरी शरण में आना चाहिए और मुझे ही परमेश्वर मानना चाहिए।"
इस प्रकार सुमेरु पर्वत की उस पावन और भव्य सभा में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और पालक श्री हरि विष्णु के मध्य श्रेष्ठता और परम तत्त्व होने को लेकर एक अत्यंत भयंकर, दीर्घकालिक और गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया । दोनों देव अपने-अपने पक्ष को सत्य सिद्ध करने हेतु विभिन्न वैदिक और शास्त्रीय तर्क प्रस्तुत करने लगे। यह विवाद धीरे-धीरे इतना गहरा गया कि ऐसा प्रतीत होने लगा मानो दोनों के मध्य कोई भयंकर युद्ध छिड़ जाएगा। दोनों के तेज और क्रोध से संपूर्ण ब्रह्मांड में उथल-पुथल मचने लगी, दिशाएं जलने लगीं और उपस्थित देवगण, यक्ष, गंधर्व तथा ऋषिगण अत्यंत चिंतित और भयभीत हो उठे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस विवाद का अंत कैसे होगा और सत्य क्या है。
३. सत्य के निर्णय हेतु चारों वेदों एवं ओंकार का साक्ष्य
सूतजी कहते हैं— "हे शौनक! जब ब्रह्मा और विष्णु के मध्य यह विवाद किसी भी प्रकार शांत न हुआ और दोनों ही स्वयं को परमेश्वर सिद्ध करने पर अड़े रहे, तब उपस्थित ऋषियों और देवताओं ने हाथ जोड़कर दोनों देवों से प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि हे प्रभु! आप दोनों ही हमारे लिए पूजनीय हैं। आपके इस विवाद से संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच रहा है। अतः यह उचित होगा कि इस सत्य का अन्वेषण उन चारों वेदों से किया जाए, जो साक्षात ईश्वर की वाणी हैं और जो सर्वदा सत्य का ही उद्घोष करते हैं। वेद ही सत्य के एकमात्र शाश्वत और अकाट्य प्रमाण हैं।"
ऋषियों के इस प्रस्ताव पर ब्रह्मा और विष्णु दोनों सहमत हो गए। तब दोनों देवों और ऋषियों ने मिलकर सत्य का निर्णय करने हेतु चारों वेदों का आवाहन किया ।
आवाहन करते ही, अंतरिक्ष में एक महान तेज उत्पन्न हुआ और चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) अपने दिव्य, मूर्तिमंत और साक्षात स्वरूप धारण करके उस सभा में उपस्थित हुए। वेदों का स्वरूप अत्यंत तेजोमय और ज्ञान से परिपूर्ण था। ब्रह्मा जी ने वेदों को संबोधित करते हुए कहा, "हे श्रुतियों! हे वेदों! आप सभी ज्ञान के भंडार और परम सत्य के प्रमाण हैं। आज मेरे और विष्णु के मध्य इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया है कि इस चराचर ब्रह्मांड का परम तत्त्व, आदि कारण और सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन है। आप अपने ज्ञान और सत्य के आधार पर स्पष्ट रूप से उद्घोष करें कि हम दोनों में से परब्रह्म कौन है।"
सबसे पहले ऋग्वेद ने आगे आकर सभा के मध्य अपना स्थान ग्रहण किया और अत्यंत स्पष्ट, निर्भीक और गंभीर स्वर में अपना साक्ष्य प्रस्तुत किया। ऋग्वेद ने कहा— "जिसके भीतर यह संपूर्ण ब्रह्मांड निवास करता है, जिससे यह संपूर्ण चराचर जगत उत्पन्न होता है, जो सत्य स्वरूप है, जो त्रिगुणातीत है और जिसे योगी जन अपने अंतःकरण में खोजते हैं, वे देवों के देव भगवान रुद्र (शिव) ही एकमात्र परम तत्त्व और सर्वश्रेष्ठ हैं। उनके अतिरिक्त कोई अन्य परब्रह्म नहीं है" ।
ऋग्वेद का यह अकाट्य वचन सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया। तत्पश्चात यजुर्वेद ने आगे आकर अपना साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए कहा— "जिसकी उपासना सभी महान यज्ञों, योगों, तपस्याओं और कर्मकांडों के द्वारा की जाती है, जो सबका आदि कारण और अंतर्यामी है, जिसके बिना कोई भी यज्ञ पूर्ण नहीं होता और जो संपूर्ण श्रुतियों का सार है, वे भगवान शंकर ही परब्रह्म और सर्वोच्च सत्ता हैं। वही एकमात्र निर्गुण और सगुण परमेश्वर हैं" ।
इसके पश्चात् सामवेद ने अपने संगीतमय और मधुर किंतु दृढ़ स्वर में अपना प्रमाण देते हुए कहा— "जिसका ध्यान महान योगी, यती और सिद्ध पुरुष अपने हृदय-कमल में निरंतर करते हैं, जो इस जगत के प्रकाशक हैं, जिनका गान मैं अपनी ऋचाओं में करता हूँ और जो संपूर्ण आनंद के मूल स्रोत हैं, वे भगवान त्र्यम्बक (शिव) ही परमेश्वर और सर्वश्रेष्ठ हैं। वे ही सबका गंतव्य हैं" ।
अंत में अथर्ववेद ने आगे आकर अपना साक्ष्य प्रस्तुत किया और अत्यंत ओजस्वी वाणी में कहा— "जो समस्त प्राणियों के भय का नाश करने वाले हैं, जो परम कल्याणकारी हैं, जिनकी कृपा से जीव अज्ञान के अंधकार से मुक्त होकर इस दुस्तर भवसागर को पार कर लेता है और जो कैवल्य मोक्ष के एकमात्र दाता हैं, वे भगवान शंकर ही अविनाशी परम तत्त्व और सर्वोच्च हैं। वे ही ब्रह्म हैं" ।
चारों वेदों ने एक स्वर में, बिना किसी संशय के, भगवान शिव (रुद्र) को ही परब्रह्म, परम तत्त्व और सर्वोच्च सत्ता घोषित किया। तदुपरांत, समस्त वेदों और मंत्रों के मूल, स्वयं साक्षात ओंकार (प्रणव) ने भी वहां मूर्तिमंत होकर प्रकट रूप में वेदों के साक्ष्य का पूर्ण समर्थन किया। ओंकार ने नाद करते हुए कहा, "वेदों ने जो कुछ भी कहा है, वह परम सत्य है। भगवान शिव ही आदि, मध्य और अंत हैं। वही सनातन परब्रह्म हैं। हे ब्रह्मा और विष्णु! आप दोनों उनके ही अंश से उत्पन्न हुए हैं और उनके ही अधीन हैं।"
४. ब्रह्मा का अहंकार, वेदों का उपहास एवं भगवान सदाशिव का महाज्योतिर्लिंग रूप में प्राकट्य
सूतजी कहते हैं— "हे मुनियों! चारों वेदों और स्वयं ओंकार के इतने स्पष्ट, अकाट्य और सत्य साक्ष्य के उपरांत भी ब्रह्मा जी और विष्णु जी, विशेषकर ब्रह्मा जी की आंखें नहीं खुलीं। रजोगुण और कर्तापन का अहंकार इतना प्रबल था कि उसने ब्रह्मा जी की बुद्धि को पूरी तरह से भ्रांत कर दिया था। सत्य को स्वीकार करने के स्थान पर, ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोधित हो उठे और अट्टहास करते हुए वेदों का घोर उपहास करने लगे।"
ब्रह्मा जी ने अत्यंत तिरस्कारपूर्ण स्वर में कहा— "अरे वेदों! तुम्हारा यह कथन सर्वथा असत्य, अज्ञानपूर्ण और हास्यास्पद है। तुम सब भ्रमित हो गए हो। वह शिव, जो श्मशान जैसी अपवित्र जगह में निवास करता है, जो अपने शरीर पर चिता की भस्म मलता है, जो गले में भयंकर सर्पों और मुंडों (नरकपालों) की माला धारण करता है, जो भूत-प्रेतों, पिशाचों और डाकिनियों के साथ विचरण करता है, जिसका वेश अत्यंत अमंगलकारी, उग्र और दिगंबर है, जिसके पास न कोई धन है न ऐश्वर्य, वह भला परब्रह्म और सर्वोच्च कैसे हो सकता है? तुम सब अज्ञानवश उस रुद्र को परम तत्त्व बता रहे हो। वह तो एक अवधूत है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी कैसे हो सकता है?" ।
ब्रह्मा जी के इन अत्यंत अपमानजनक, निंदापूर्ण और अहंकारयुक्त वचनों को सुनकर वेद और ओंकार अत्यंत दुखी और क्षुब्ध हुए । उन्होंने ब्रह्मा जी को समझाने का प्रयास किया, परंतु अहंकार में डूबे ब्रह्मा जी ने उनकी एक न सुनी。
उसी क्षण, ब्रह्मा जी के इस महा-अहंकार को नष्ट करने, सत्य का यथार्थ ज्ञान कराने और अपने परब्रह्म स्वरूप को सिद्ध करने हेतु, सुमेरु पर्वत की उस देव-सभा में एक अद्भुत और प्रलयंकारी घटना घटी। ब्रह्मा और विष्णु के ठीक मध्य में, अचानक एक अत्यंत विशाल, आदि-अंत रहित, कोटि-कोटि प्रलयकालीन सूर्यों और कालाग्नि के समान दीप्तिमान एक महातेजस्वी अग्नि-स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हो गया ।
उस ज्योतिर्लिंग का तेज इतना प्रलयंकारी, भयंकर और अनंत था कि उसकी ज्वालाओं से संपूर्ण ब्रह्मांड कांप उठा। उसकी न तो कोई शुरुआत दिखाई दे रही थी और न ही कोई अंत। उस महा-अग्नि-स्तंभ के प्रचंड ताप और प्रकाश से ब्रह्मा, विष्णु सहित उपस्थित समस्त देवगण और ऋषिगण भयभीत होकर थर-थर कांपने लगे। उनकी आंखें चुंधिया गईं और वे उस महान तेज के समक्ष नतमस्तक हो गए। तभी उस अनंत महा-ज्योतिर्लिंग के मध्य से साक्षात भगवान देवाधिदेव महादेव अपने अत्यंत रौद्र, शांत और दिव्य महा-ईश्वर स्वरूप में प्रकट हुए । उनका स्वरूप अत्यंत मनमोहक और साथ ही ऐश्वर्यवान था। उनका कंठ नीला था, भाल पर अर्धचंद्र सुशोभित था, तीन नेत्र प्रज्वलित हो रहे थे, उन्होंने बाघाम्बर धारण किया हुआ था और वे अपने हाथों में पिनाक धनुष तथा त्रिशूल धारण किए हुए थे । भगवान शिव को इस प्रकार ज्योतिर्लिंग के मध्य से साक्षात परब्रह्म के रूप में प्रकट होते देखकर भगवान विष्णु को सत्य का पूर्ण बोध हो गया और उन्होंने तत्काल हाथ जोड़कर भगवान शिव की स्तुति आरंभ कर दी。
परंतु, भगवान शिव को अपने सम्मुख साक्षात देखकर भी ब्रह्मा जी का अहंकार पूरी तरह शांत नहीं हुआ। उनकी बुद्धि अभी भी अज्ञान के आवरण से ढकी हुई थी। उल्टे, ब्रह्मा जी ने अपने उसी पांचवें मुख (जो ऊर्ध्व दिशा की ओर था) से भगवान शिव की ओर देखते हुए अत्यंत गर्व और मूर्खतापूर्ण स्वर में कहा, "हे रुद्र! तुम व्यर्थ ही यह माया रचकर मुझे डराने का प्रयास कर रहे float हो। तुम मेरे ही ललाट (भृकुटी) से उत्पन्न हुए हो। क्या तुम्हें स्मरण नहीं कि जन्म के समय तुम अत्यंत रुदन कर रहे थे? तुम्हारे उस निरंतर रोने के कारण ही मैंने तुम्हारा नाम 'रुद्र' (रुदन करने वाला) रखा था। तुम तो मेरे पुत्र के समान हो। अब यह आडंबर त्यागकर तुम मेरी शरण में आओ और मेरी सेवा स्वीकार करो। मैं ही तुम्हारा पिता और परमेश्वर हूँ।" ।
५. कालभैरव का प्राकट्य एवं ब्रह्मा के पंचम मुख का छेदन
सूतजी महाराज कहते हैं— "हे शौनक! ब्रह्मा जी के इस दुस्साहस, अत्यंत अमर्यादित आचरण, शिव-निंदा और अपनी उत्पत्ति के विषय में मिथ्या अहंकार को देखकर देवाधिदेव महादेव को अत्यंत भयंकर क्रोध आ गया । भगवान शिव जो सदा शांत और आशुतोष रहते हैं, उनका वह प्रलयंकारी क्रोध संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने के लिए तत्पर हो गया।"
शिव के उस परम क्रोध से संपूर्ण दिशाएं जलने लगीं, समुद्रों में उफान आ गया और सुमेरु पर्वत कांपने लगा। उसी समय, भगवान शिव के भृकुटी-मध्य (त्रिनेत्र) से एक अत्यंत भयंकर, विकराल, रोंगटे खड़े कर देने वाला और प्रलयंकारी स्वरूप उत्पन्न हुआ। यही स्वरूप साक्षात भगवान 'कालभैरव' थे ।
सूतजी कालभैरव के उस अत्यंत उग्र रूप का वर्णन करते हुए कहते हैं, "हे मुनियों! कालभैरव का स्वरूप करोड़ों प्रलयकालीन सूर्यों और कालाग्नि के समान भयंकर था। उनका वर्ण काजल और अमावस्या की रात्रि के समान गहरा काला था। उनके अट्टहास मात्र से संपूर्ण ब्रह्मांड के अंडकोश कांप रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो ब्रह्मांड विदीर्ण हो जाएगा। उनके तीन नेत्रों से प्रचंड अग्नि की ज्वालाएं निकल रही थीं। उन्होंने सर्पों का यज्ञोपवीत (जनेऊ) और आभूषण धारण किया हुआ था। उनके केश प्रज्वलित अग्नि के समान ऊपर की ओर उठे हुए थे। उनके दांत अत्यंत विकराल और भयानक थे। उन्होंने अपने एक हाथ में भयंकर त्रिशूल, दूसरे में खड्ग और अन्य हाथों में पाश तथा डमरू धारण किया हुआ था। उनके गले में मुंडों (कपालों) की भयंकर माला लटक रही थी। उनका वाहन एक अत्यंत भयंकर काला कुत्ता (श्वान) था, जो उनके साथ ही प्रकट हुआ था" ।
कालभैरव ने प्रकट होते ही हाथ जोड़कर भगवान शिव को साष्टांग प्रणाम किया और मेघ-गर्जना के समान गंभीर और भयानक स्वर में पूछा, "हे परमपिता! हे देवाधिदेव! मेरे लिए क्या आज्ञा है? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आप मुझे आदेश दें, मैं क्षण भर में ही संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म कर सकता हूँ" ।
तब भगवान शिव ने अपने उस महाभयंकर और तेजोमय पूर्णावतार कालभैरव को संबोधित करते हुए कहा, "हे भैरव! तुम मेरे ही साक्षात पूर्णांश हो। तुम्हारे इस भयंकर और विशाल रूप को देखकर स्वयं 'काल' (मृत्यु) भी भयभीत होगा, इसलिए आज से तीनों लोकों में तुम्हारा नाम 'कालभैरव' विख्यात होगा । तुम काल के समान शोभायमान हो, इसलिए तुम्हें 'कालराज' भी कहा जाएगा। तुम जगत के संपूर्ण पापियों का भक्षण करोगे और दुष्टों का संहार करोगे, इसलिए तुम्हारी 'आमर्दक' के रूप में भी वंदना होगी । तुम मेरी प्रिय काशी पुरी (अविमुक्त क्षेत्र) के अधिपति और रक्षक बनोगे। हे भैरव! यह ब्रह्मा अहंकार में अंधा होकर मर्यादा भूल गया है। इसने अपने जिस पांचवें मुख से मेरी घोर निंदा की है, वेदों का अपमान किया है और जो अहंकार से पूरी तरह दूषित हो गया है, तुम उस पर शासन करो। इसके उस निंदक मुख को तत्काल काट कर इसके अहंकार को सदा के लिए नष्ट कर दो" ।
भगवान शिव का यह अत्यंत कठोर आदेश प्राप्त होते ही, महातेजस्वी और दिव्य शक्ति संपन्न कालभैरव ने एक भयंकर सिंहनाद किया और अत्यंत वेग से ब्रह्मा जी की ओर प्रस्थान किया। ब्रह्मा जी भय से जड़वत हो गए। कालभैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली के नख (नाखून) से, शिव-निंदा करने वाले ब्रह्मा जी के उस ऊर्ध्वगामी पांचवें मस्तक को पकड़ा और एक ही झटके में उसे धड़ से अलग कर दिया । जैसे ही ब्रह्मा जी का पांचवां सिर धड़ से अलग हुआ, सुमेरु पर्वत पर त्राहि-त्राहि और हाहाकार मच गया। रक्त की धारा बह निकली। समस्त देवता, यक्ष, गंधर्व और ऋषिगण कालभैरव के इस अत्यंत उग्र, त्वरित और रौद्र रूप को देखकर भय से कांपने लगे। उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिए 0। ब्रह्मा जी का सारा अहंकार, जो युगों से उनके भीतर पनप रहा था, पांचवें सिर के कटते ही उसी क्षण चूर-चूर हो गया। उनका अज्ञान का आवरण हट गया। उन्होंने शिव के वास्तविक परब्रह्म स्वरूप को पहचान लिया और अत्यंत भयभीत, लज्जित तथा कांपते हुए, भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव और साक्षात कालभैरव के चरणों में गिरकर क्षमा-याचना करने लगे 0। ब्रह्मा जी ने रुदन करते हुए शिव की अनेक प्रकार से स्तुति की और अपने अपराध की क्षमा मांगी। भगवान शिव तो आशुतोष हैं, वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिवजी तत्काल शांत हो गए और उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु को अपने वास्तविक परम तत्त्व का बोध कराया, उन्हें ज्ञान का उपदेश दिया और उन्हें मृत्यु के भय से अभय प्रदान करते हुए कहा कि भविष्य में वे अहंकार से दूर रहें。
६. ब्रह्महत्या का प्राकट्य, कापालिक व्रत का उपदेश एवं कालभैरव का भिक्षाटन
सूतजी आगे कहते हैं— "हे शौनक! यद्यपि कालभैरव ने स्वयं साक्षात भगवान शिव की आज्ञा से ही ब्रह्मा का शिरच्छेदन किया था और वह धर्म की स्थापना तथा अहंकार के नाश के लिए आवश्यक था, परंतु ब्रह्मा एक जन्मजात ब्राह्मण थे। सनातन शास्त्रों के विधान के अनुसार, किसी भी परिस्थिति में ब्राह्मण का वध करने या उसका अंग भंग करने से 'ब्रह्महत्या' का महाघोर पाप लगता है। कर्मफल का सिद्धांत सभी के लिए समान है। अतः जैसे ही ब्रह्मा जी का पांचवां मस्तक कटा, उस कटे हुए सिर के रक्त से 'ब्रह्महत्या' एक अत्यंत भयंकर, विकराल, दुर्गंधयुक्त और रक्तपिपासु चांडालिनी स्त्री के रूप में साक्षात उत्पन्न हो गई । उस ब्रह्महत्या के बाल बिखरे हुए थे, आंखें लाल थीं, और वह भयंकर चीत्कार करती हुई तत्काल कालभैरव को डसने और उन्हें ग्रसने के लिए उनके पीछे लग गई。
इतना ही नहीं, ब्रह्मा जी का वह कटा हुआ सिर (कपाल) कालभैरव के बाएं हाथ से चिपक गया। कालभैरव ने उस कपाल को झटकने का प्रयास किया, परंतु वह किसी भी प्रकार उनके हाथ से अलग नहीं हुआ। तब कालभैरव ने मुड़कर भगवान शिव की ओर देखा और हाथ जोड़कर प्रार्थना की, 'हे प्रभु! हे परमेश्वर! यद्यपि मैंने केवल आपकी आज्ञा का ही पालन किया है और लोक-कल्याण हेतु इस ब्रह्मा का अहंकार तोड़ा है, किंतु यह भयंकर ब्रह्महत्या मेरा पीछा कर रही है और यह कपाल मेरे हाथ से चिपक गया है। कृपया मुझे बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए और मेरे इस ब्रह्महत्या के दोष से उद्धार का मार्ग क्या है?' ।
भगवान शिव सब कुछ जानने वाले और कर्म गति के नियंता हैं। वे चाहते तो एक क्षण में भैरव को दोषमुक्त कर सकते थे, परंतु लोक-कल्याण की भावना से और संसार के समक्ष प्रायश्चित (पाप-मुक्ति) का एक कठोर आदर्श प्रस्तुत करने के लिए शिवजी ने कालभैरव से कहा, 'हे भैरव! यद्यपि तुम मेरे ही साक्षात स्वरूप हो, तुम काल के भी काल हो और सभी पापों से सर्वथा मुक्त हो, तुम पर किसी पाप का प्रभाव नहीं पड़ सकता। परंतु, संसार को कर्मफल का सिद्धांत समझाने और यह प्रदर्शित करने हेतु कि ब्रह्महत्या का पाप कितना जघन्य होता है, तुम्हें लोक-रीति के अनुसार 'कापालिक व्रत' धारण करना होगा ।
तुम ब्रह्मा के इसी कटे हुए कपाल को अपना भिक्षा-पात्र बनाकर अपने हाथ में धारण करो और एक दिगंबर भिक्षुक (भिक्षाटन करने वाले) के रूप में तीनों लोकों का भ्रमण करो। यह भयंकर ब्रह्महत्या इसी प्रकार तुम्हारे पीछे-पीछे चलेगी। तुम सभी लोकों और पवित्र तीर्थों में स्नान और विचरण करते हुए जिस दिन मेरी परम प्रिय 'अविमुक्त क्षेत्र' (काशी) नगरी की पावन सीमा में प्रवेश करोगे, उसी क्षण यह ब्रह्महत्या तुम्हारा साथ छोड़ देगी, यह कपाल तुम्हारा हाथ से गिर जाएगा और तुम इस ब्रह्महत्या के पाप से सर्वथा मुक्त हो जाओगे' ।
७. कालभैरव का तीनों लोकों में भिक्षाटन एवं वैकुंठ में नारायण द्वारा स्तुति
भगवान शिव के इस परम आदेश को शिरोधार्य कर, कालभैरव ने तत्काल दिगंबर कापालिक का रूप धारण कर लिया। उनके एक हाथ में भयंकर त्रिशूल और दूसरे हाथ में ब्रह्मा का वह रक्त-रंजित कपाल था जो भिक्षा-पात्र का कार्य कर रहा था। उनके साथ उनका वाहन वह भयंकर काला कुत्ता (श्वान) भी हो लिया ।
कालभैरव भगवान शिव की आज्ञा से तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल) में भिक्षाटन करते हुए विचरण करने लगे। वे जहां-जहां जाते, वह भयंकर रूप वाली ब्रह्महत्या हाहाकार और चीत्कार करती हुई, उन्हें त्रस्त करने का प्रयास करती हुई उनके पीछे-पीछे चलती। कालभैरव ने स्वर्ग लोक, मृत्युलोक के अनेक पवित्र तीर्थों, देव-नदियों, सरोवरों और देव-स्थानों का भ्रमण किया, वहां स्नान किया, किंतु वह ब्रह्महत्या उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी और न ही वह ब्रह्मा का कपाल उनके हाथ से अलग हो रहा था । कालभैरव ने अपने इस कापालिक व्रत से संपूर्ण ब्रह्मांड को यह संदेश दिया कि किए गए कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है。
भ्रमण करते-करते और अपनी इच्छा से विचरण करते हुए कालभैरव क्षीरसागर स्थित भगवान श्री हरि विष्णु के निवास स्थान, परम पावन वैकुंठ लोक में जा पहुंचे । वैकुंठ में चारो ओर दिव्य प्रकाश फैला हुआ था। भगवान शिव के अंश से उत्पन्न, सर्प का कुंडल धारण किए हुए, त्रिनेत्र, महाकाल तथा पूर्ण कापालिक आकार वाले उन भयंकर कालभैरव को अपने लोक में आता देखकर, गरुड़ध्वज भगवान श्री हरि विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने आसन से उठकर आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। भगवान विष्णु, भगवती देवी लक्ष्मी, वैकुंठ के समस्त देवों, मुनियों और देव-स्त्रियों ने कालभैरव को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया ।
भगवान विष्णु ने कालभैरव के उस साक्षात रुद्र और परमेश्वर स्वरूप को तत्त्वतः पहचान लिया और वे अत्यंत विनय और भक्ति-भाव से, हाथ जोड़कर वैदिक स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति करने लगे । विष्णु जी ने कहा, 'हे महाकाल! हे भैरव! आप साक्षात शिव के पूर्ण स्वरूप हैं। आपके इस दर्शन से मेरा वैकुंठ लोक आज पवित्र हो गया।' स्तुति करने के पश्चात भगवान विष्णु ने कालभैरव के पीछे खड़ी उस भयंकर ब्रह्महत्या को देखा। विष्णु जी ने उस ब्रह्महत्या से कहा, 'हे ब्रह्महत्या! तुम शिव के अंश, साक्षात परमेश्वर कालभैरव को कष्ट क्यों दे रही हो? तुम इनका पीछा छोड़ दो, क्योंकि ये तो जन्म-मृत्यु और पाप-पुण्य से परे हैं।'
तब ब्रह्महत्या ने हाथ जोड़कर विष्णु जी से निवेदन किया, 'हे कमलनयन! मैं जानती हूँ कि कालभैरव साक्षात परमेश्वर हैं और मैं इन्हें कोई कष्ट नहीं पहुंचा सकती। परंतु मैं भगवान शिव की आज्ञा और उनके विधान से ही बंधी हुई हूँ। शिव की आज्ञा है कि जब तक कालभैरव काशी की सीमा में प्रवेश नहीं करेंगे, तब तक मैं इनका पीछा नहीं छोड़ सकती। यह केवल लोक-कल्याण की एक लीला है।' भगवान विष्णु द्वारा सत्कृत, पूजित और वंदित होकर कालभैरव वहां से पुनः अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए。
८. मोक्षदायिनी काशी (अविमुक्त क्षेत्र) आगमन, ब्रह्महत्या से मुक्ति एवं कपालमोचन तीर्थ की महिमा
सूतजी शौनक आदि ऋषियों से कहते हैं— "हे ऋषियों! इस प्रकार समस्त ब्रह्मांड, लोकों और तीर्थों का भ्रमण करने के पश्चात, शिव की आज्ञा का स्मरण करते हुए, कापालिक रूप धारी भगवान कालभैरव ने भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिकी हुई, संसार की सबसे पवित्र और मोक्षदायिनी नगरी 'काशी' (अविमुक्त क्षेत्र) की ओर प्रस्थान किया । काशी वह नगरी है जिसका त्याग भगवान शिव प्रलय काल में भी नहीं करते।"
कालभैरव अपने श्वान के साथ जैसे ही काशी की पावन सीमा के समीप पहुंचे, एक अत्यंत अद्भुत और अलौकिक घटना घटी। काशी क्षेत्र के महात्म्य, वहां के कण-कण में बसे शिव के प्रताप और उस भूमि की परम पवित्रता के कारण, कालभैरव के पीछे-पीछे आ रही वह भयंकर 'ब्रह्महत्या' काशी की सीमा के भीतर प्रवेश करने का साहस न कर सकी। कालभैरव ने जैसे ही काशी की सीमा के भीतर अपना पहला चरण रखा, काशी के उस पावन क्षेत्र में प्रवेश करते ही ब्रह्महत्या भयंकर पीड़ा से हाहाकार कर उठी। वह काशी के तेज को सहन न कर सकी और भयंकर क्रंदन करती हुई काशी की सीमा के बाहर से ही तत्काल पाताल लोक में प्रविष्ट हो गई । इस प्रकार, काशी की पावन भूमि पर चरण रखते ही भगवान कालभैरव ब्रह्महत्या के उस भयंकर दोष और उस चांडालिनी के पीछे चलने के श्राप से सर्वथा मुक्त हो गए。
ब्रह्महत्या के पाताल में समा जाने के उपरांत, उसी क्षण भगवान कालभैरव के बाएं हाथ से युगों से चिपका हुआ ब्रह्मा जी का वह रक्त-रंजित कपाल (पांचवां सिर) तत्काल टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ।
जिस परम पावन स्थान पर ब्रह्मा जी का वह कपाल कालभैरव के हाथ से छूटकर पृथ्वी पर गिरा, वह स्थान काशी में तीनों लोकों में अत्यंत पवित्र और महान तीर्थ बन गया। संसार में यह पावन स्थान 'कपालमोचन तीर्थ' के नाम से विख्यात हुआ । भगवान शिव के परम प्रभाव से कालभैरव वहां पूर्ण रूप से दोषमुक्त, निर्मल और परम शांत हो गए। स्कन्द पुराण के काशी खण्ड और शिव पुराण में स्पष्ट रूप से इस तीर्थ की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जो भी प्राणी इस कपालमोचन तीर्थ (सरोवर) में आकर विधिपूर्वक स्नान करता है, अपने पितरों एवं देवताओं का तर्पण करता है, पिण्डदान करता है और वहां स्थित कालभैरव का दर्शन-पूजन करता है, वह जन्म-जन्मांतर के बड़े से बड़े पापों और ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी सर्वथा मुक्त हो जाता है। इस तीर्थ के स्मरण मात्र से इस जन्म और पूर्व जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
९. भगवान शिव द्वारा कालभैरव को काशी के क्षेत्राधिकार का वरदान एवं काशी के कोतवाल के रूप में स्थापना
सूतजी कहते हैं— "हे मुनियों! कालभैरव के ब्रह्महत्या दोष से मुक्त होते ही और कपाल के पृथ्वी पर गिरते ही, वहां परम प्रकाश छा गया और साक्षात भगवान देवाधिदेव महादेव वहां प्रकट हुए । भगवान शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने अंश, दोषमुक्त कालभैरव को हृदय से लगा लिया।"
भगवान शिव ने कालभैरव को आशीर्वाद देते हुए गंभीर और प्रेमपूर्ण स्वर में कहा— "हे कालराज! हे महाभैरव! आज से तुम ब्रह्महत्या के इस दोष से सर्वथा मुक्त हो गए हो। तुमने मेरे आदेश का पूर्णतः पालन किया है। अब तुम्हें भिक्षाटन करते हुए कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है। मेरी यह प्रिय अविमुक्त नगरी (काशी) मोक्ष प्रदान करने वाली है। तुम अब इसी काशी पुरी में युगों-युगों तक स्थायी रूप से निवास करोगे । हे भैरव! आज से तुम इस मोक्षदायिनी काशी नगरी के अधिपति, क्षेत्रपाल और 'नगर-रक्षक' (काशी के कोतवाल) कहलाओगे । काशी में निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी, देवता, यक्ष, गंधर्व और मुनि के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा तुम्हारे ही अधिकार में रहेगा। मृत्यु के पश्चात जो भी जीव इस काशी में मोक्ष की कामना करेगा, उसके संचित पापों का भक्षण करके उसे पूर्ण रूप से शुद्ध करने का कार्य तुम ही करोगे। तुम्हारे द्वारा दी गई 'भैरवी यातना' को भोगने के पश्चात् ही जीव मेरे मोक्ष का अधिकारी बनेगा। तुम्हारी आज्ञा और अनुमति के बिना कोई भी प्राणी इस काशी में न तो निवास कर सकेगा और न ही बाबा विश्वनाथ (शिव) के दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त कर सकेगा" ।
भगवान शिव से यह परम प्रेरणा, महान अधिकार और आशीर्वाद प्राप्त कर भगवान कालभैरव वहीं काशी में आनंदपूर्वक स्थापित हो गए। काशी की अष्ट दिशाओं की रक्षा और सुरक्षा हेतु उन्होंने अपने ही स्वरूप से आठ भैरवों (रुरुभैरव, चण्डभैरव, असितांगभैरव, कपालभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, संहारभैरव तथा भीषणभैरव) को प्रकट किया और उन्हें आठ दिशाओं में स्थापित किया ।
आज भी काशी में दर्शनार्थियों और तीर्थयात्रियों के लिए यह परम अनिवार्य नियम है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पूर्व या पश्चात भगवान कालभैरव (काशी के कोतवाल) का दर्शन अवश्य करना चाहिए, अन्यथा शिव-दर्शन और संपूर्ण काशी-यात्रा अपूर्ण मानी जाती है । मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के मध्याह्न काल (दोपहर) में ही भगवान शिव के भृकुटी-मध्य से इन महातेजस्वी, पाप-भक्षक, अहंकार-नाशक और कालों के काल श्री कालभैरव का यह प्राकट्य हुआ था । इसीलिए इसी पावन तिथि को 'भैरव अष्टमी' अथवा 'कालभैरव जयंती' के महान व्रत एवं उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा । यह अष्टमी तिथि भगवान कालभैरव को अत्यंत प्रिय है。
१०. श्री भैरव अष्टमी व्रत कथा की पारंपरिक फल-श्रुति (फल-वचन)
सूतजी अंत में ऋषियों से इस व्रत और कथा का माहात्म्य बताते हुए कहते हैं—
(जो फल-वचन पारंपरिक रूप से पुराणों में और भैरव अष्टमी के व्रत में कथा के अंत में पढ़ा जाता है, वह इस प्रकार है)
जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, अटल विश्वास और भक्ति-भाव के साथ मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की इस पावन 'भैरव अष्टमी' के दिन व्रत धारण करता है, उपवास रखता है और भगवान शंकर के पूर्णावतार श्री कालभैरव की इस उत्पत्ति, ब्रह्मा-गर्व-हरण, ब्रह्महत्या-मुक्ति और कपालमोचन तीर्थ की पावन कथा का नियमपूर्वक पाठ करता है अथवा ब्राह्मण के मुख से एकाग्रचित्त होकर श्रवण करता है, वह प्राणी संसार के समस्त महापापों, उपपापों और ब्रह्महत्या जैसे दोषों से सर्वथा मुक्त हो जाता है ।
जो श्रद्धा से भगवान कालभैरव की इस कथा को सुनता है, उसके जीवन से अकाल मृत्यु का भय, प्रेत-बाधा, जादू-टोना, भूत-पिशाच, डाकिनी-शाकिनी और भयंकर शत्रुओं का समस्त भय तत्काल नष्ट हो जाता है । साक्षात भगवान कालभैरव उस प्राणी की दसों दिशाओं से एक रक्षक की भांति रक्षा करते हैं। इस कथा के श्रवण से मनुष्य के सभी संकट और शारीरिक रोग दूर हो जाते हैं, उसे न्यायालय, मुकदमों और विवादों में निश्चित रूप से विजय प्राप्त होती है । दरिद्र को धन की प्राप्ति होती है, रोगी को उत्तम आरोग्य मिलता है और भयभीत को अभय की प्राप्ति होती है。
जो प्राणी इस भैरव अष्टमी के पवित्र दिन पर उपवास रखकर रात्रि में जागरण करता है, कालभैरव के स्तोत्रों का गान करता है और इस कथा का मनन करता है, उसे इस लोक में स्थिर संपत्ति, राज-सम्मान, उत्तम आरोग्य, यश और सर्व-कार्य-सिद्धि की प्राप्ति होती है। अंत काल में वह सभी मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर भगवान शिव के परम धाम (कैलास) को प्राप्त करता है और शिव-सायुज्य मोक्ष का अधिकारी बनता है ।
॥ इति श्री शिव महापुराण (शतरुद्र संहिता) एवं स्कन्द पुराण (काशी खण्ड) के आधार पर मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी भैरव प्राकट्य व्रत-कथा सम्पूर्णा ॥