विस्तृत उत्तर
अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण अष्टमी (करवा चौथ के 4 दिन बाद) को संतान की रक्षा और दीर्घायु हेतु माताओं द्वारा रखा जाने वाला व्रत है।
अहोई अष्टमी व्रत विधि
1. व्रत नियम: प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लें। निर्जला या फलाहार व्रत। तारे दिखने तक (कुछ परम्पराओं में चन्द्रोदय तक) व्रत रखें।
2. अहोई माता का चित्र: दीवार पर गेरू या हल्दी से अहोई माता (सेही/साही — कांटेदार जानवर) का चित्र बनाएँ। उसके आसपास सेही के बच्चों का चित्र (संतान प्रतीक)।
1संध्या पूजन
- ▸अहोई माता के चित्र के सामने जल का लोटा रखें।
- ▸रोली, अक्षत, पुष्प, दूर्वा से पूजन।
- ▸'अहोई माता तेरी सेवा में...' कथा सुनें।
4. अहोई अष्टमी कथा: एक स्त्री ने मिट्टी खोदते समय अनजाने में सेही के बच्चों को हानि पहुँचाई जिससे उसकी सात संतानों की मृत्यु हुई। बाद में सेही (अहोई माता) की पूजा और क्षमा से संतान पुनः प्राप्त हुई।
5. तारे देखकर/चन्द्र देखकर व्रत खोलना: संध्या को तारे या चन्द्रमा दिखने पर अहोई माता को अर्घ्य देकर व्रत खोलें। पहले जल पिएँ, फिर भोजन।
6. चाँदी की अहोई: कुछ परम्पराओं में चाँदी की अहोई (सेही) माला सुहागिन पहनती हैं।
विशेष: यह व्रत विशेषतः उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब) में प्रचलित है। संतान प्राप्ति की इच्छुक महिलाएँ भी यह व्रत रखती हैं।





