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श्री सूर्य चालीसा: तांबे से अर्घ्य, नेत्र ज्योति और रविवार व्रत का रहस्य !
सूर्य

श्री सूर्य चालीसा: तांबे से अर्घ्य

📿 पौराणिक•5 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 8 जनवरी 2026
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श्री सूर्य चालीसा: संपूर्ण मूल पाठ | तांबे के लोटे से अर्घ्य देने की सिद्ध विधि, रविवार व्रत के नियम और सूर्य-दोष शांति के शक्तिशाली उपाय !

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श्री सूर्य चालीसा: संपूर्ण पाठ, अर्घ्य विधि एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान | Shri Surya Chalisa

श्री सूर्य चालीसा: एक विस्तृत धार्मिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक मीमांसा

1. श्री सूर्य चालीसा: मूल पाठ

दोहा
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥
चौपाई
जय सविता जय जयति दिवाकर। सहस्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर। सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन। मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते। वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
सहस्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि। मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर। हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी। तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते। देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर। सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै। हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं। मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै। दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
नमस्कार को चमत्कार यह। विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई। अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारहे नाम उच्चारन करते। सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन। रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है। प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते। रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत। कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित। भास्कर करत सदा मुखको हित॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे। रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा। तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर। त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन। भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर। कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा। गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी। बाहर बसते नित तम हारी॥
सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै। रक्षा कवच विचित्र विचारे॥
अस जोजन अपने मन माहीं। भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं॥
दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै। जोजन याको मन मंह जापै॥
अंधकार जग का जो हरता। नव प्रकाश से आनन्द भरता॥
ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही। कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥
मंद सदृश सुत जग में जाके। धर्मराज सम अद्भुत बांके॥
धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा। किया करत सुरमुनि नर सेवा॥
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों। दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥
परम धन्य सों नर तनधारी। हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन। मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥
भानु उदय बैसाख गिनावै। ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥
यम भादों आश्विन हिमरेता। कातिक होत दिवाकर नेता॥
अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं। पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥
दोहा
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

2. विस्तृत पाठ विधि एवं अनुष्ठान

सूर्य चालीसा का पाठ केवल एक साहित्यिक वाचन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसका पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इसे शास्त्रोक्त विधि-विधान और पवित्रता के साथ किया जाए। अनुसंधान स्रोतों और धर्मग्रंथों के समन्वय से निम्नलिखित विस्तृत विधि प्राप्त होती है:

2.1. काल और मुहूर्त
  • सर्वश्रेष्ठ समय: ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्योदय के एक घंटे के भीतर का समय। जब सूर्य क्षितिज पर लालिमा लिए हुए हो (बाल सूर्य), तब की गई उपासना सर्वाधिक फलदायी होती है।
  • विशेष दिन: रविवार सूर्य का वार है। इसके अतिरिक्त, सप्तमी तिथि (विशेषकर रथ सप्तमी या अचला सप्तमी), मकर संक्रांति, और छठ पर्व के अवसर पर पाठ करना विशेष पुण्यदायी है।
2.2. पूजन सामग्री

सूर्य उपासना में सात्विक और तेजस्वी पदार्थों का प्रयोग होता है:

  • पात्र: तांबे का लोटा। तांबा सूर्य की धातु मानी जाती है और इसमें जल के शुद्धिकरण की क्षमता होती है।
  • नैवेद्य और अर्घ्य सामग्री: जल में लाल चंदन (रक्त चंदन), लाल पुष्प (गुड़हल/कनेर), अक्षत (साबुत चावल), और थोड़ा गुड़। सूर्य को "रक्त वर्ण" प्रिय है।
  • दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक।
  • माला: यदि मंत्र जाप करना हो तो माणिक्य या लाल चंदन की माला, अथवा रुद्राक्ष की माला उत्तम है।
2.2. चरण-दर-चरण विधि
  • शुद्धि और आसन: प्रातः नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या केसरिया) धारण करें। पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। यदि अर्घ्य देना है, तो खड़े रहें।
  • सूर्य अर्घ्य (महत्वपूर्ण चरण): चालीसा पाठ से पूर्व भगवान भास्कर को जल अर्पित करना अनिवार्य है। तांबे के लोटे में तैयार जल को दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाएं और धीरे-धीरे जल की धारा गिराएं। दृष्टि जलधारा के बीच से सूर्य देव पर रखें।
  • अर्घ्य मंत्र: जल गिराते समय "ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः" या "ॐ घृणि सूर्याय नमः" या गायत्री मंत्र का उच्चारण करें।
  • मानस पूजा: अर्घ्य के बाद आसन पर बैठकर नेत्र बंद करें और सूर्य के स्वरूप (स्वर्ण देह, चार भुजाएं, कमल पर विराजमान) का ध्यान करें।
  • विनियोग और संकल्प: हाथ में जल लेकर संकल्प करें—"मैं (अपना नाम और गोत्र) अपनी (मनोकामना) पूर्ति हेतु श्री सूर्य चालीसा का पाठ कर रहा हूँ।" जल भूमि पर छोड़ दें।
  • चालीसा पाठ: अब पूर्ण लय और भक्ति भाव से चालीसा का पाठ आरंभ करें। उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। "नमो-नमो" या "जय-जय" शब्दों पर विशेष बल दें।
  • आरती और क्षमा प्रार्थना: पाठ पूर्ण होने पर सूर्य देव की आरती (ॐ जय सूर्य भगवान...) गाएं और अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगें।

इस चालीसा के मर्म को समझकर, विधि-विधान से इसका पाठ करता है, वह निश्चित रूप से भौतिक सुख और आध्यात्मिक शांति—दोनों को प्राप्त करता है।

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

अस्त्र शस्त्र

कर्ण का कवच किसने दिया था?

कर्ण का कवच-कुंडल उनके पिता सूर्यदेव का दिव्य वरदान था। माता अदिति के दिव्य कुंडलों सहित यह जन्म के साथ ही शरीर पर था। इसे देने वाले सूर्यदेव स्वयं थे।

महाभारत

कुंती ने कर्ण को नदी में क्यों छोड़ा?

कुंती ने अविवाहित अवस्था में सूर्यदेव के वरदान से कर्ण को जन्म दिया था। उस युग में अविवाहित माँ का होना घोर सामाजिक अपमान था। लोक-लाज और परिवार की मर्यादा के भय से उन्होंने उस नवजात को नदी में बहा दिया।

पूजा विधि एवं कर्मकांड

श्वेत चंदन और रक्त चंदन में कौन सा कब लगाएं

श्वेत चंदन शिव, विष्णु और शांति की साधना के लिए है — सोमवार और शुक्रवार को उचित। रक्त चंदन सूर्यदेव और लक्ष्मीजी को लगाएँ — रविवार को विशेष शुभ। सफेद = शांति, लाल = ऊर्जा।

अस्त्र शस्त्र

कर्ण का कवच-कुंडल क्या था?

कर्ण का कवच-कुंडल जन्म से ही शरीर पर था — सूर्यदेव का दिव्य वरदान। यह शरीर का अभिन्न अंग था, अभेद्य था, और कोई भी अस्त्र इसे नहीं भेद सकता था। जब तक था — कर्ण अजेय थे।

महाभारत

कर्ण की असली माँ कौन थी?

कर्ण की असली माँ कुंती थीं। कुंती ने दुर्वासा ऋषि से प्राप्त मंत्र की परीक्षा करते हुए सूर्यदेव का आह्वान किया जिससे कर्ण जन्मे। किशोरावस्था में अविवाहित होने के कारण लोक-लाज से उन्होंने कर्ण को नदी में बहा दिया। सारथी अधिरथ की पत्नी राधा ने उनका पालन-पोषण किया।

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