1. श्री गंगा चालीसा: सम्पूर्ण मूल पाठ
| श्री गंगा चालीसा ||
|| दोहा ||
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥
|| चौपाई ||
जय जय जननी हरण अघ खानी, आनन्द करनि गंग महरानी।
जय भागीरथि सुरसरि माता, कलिमल मूल दलनि विखयाता॥
जय जय जह्रु सुता अघ हननी, भीष्म की माता जग जननी।
धवल कमल दल मम तनु साजे, लखि शत शरद चन्द्र छवि लजाई॥
वाहन मकर विमल शुचि सोहैं, अमिय कलश कर लखि मन मोहैं।
जडित रत्न कंचन आभूषण, हिय मणि हार, हरणितम दूषण॥
जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तंग मन भावनि।
जो गणपति अति पूज्य प्रधाना, तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना॥
ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी, श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी।
साठि सहस्र सगर सुत तारयो, गंगा सागर तीरथ धारयो॥
अगम तरंग उठ्यो मन भावन, लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन।
तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट, धरयौ मातु पुनि काशी करवट॥
धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पीढ़ी।
भागीरथ तप कियो अपारा, दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा॥
जब जग जननी चल्यो लहराई, शंभु जटा महं रह्यो समाई।
वर्ष पर्यन्त गंग महरानी, रहीं शंभु के जटा भुलानी॥
पुनि भागीरथि शम्भुहिं ध्यायो, तब इक बूंद जटा से पायो।
ताते मातु भई सगरा, नाम मंदाकिनी जान्यो नगरा॥
तब महँ विलिव पत्र फहरायो, विमल तरंग देखि मन भायो।
पूरब जन्म पुण्य जब जागत, तबहिं ध्यान गंगा महं लागत॥
जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं, तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं।
महा पतित जिन काहु न तारे, तिन तारे इक नाम तिहारे॥
शत योजनहू से जो ध्यावहिं, निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं।
नाम भजत अगणित अघ नाशै, विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥
जिमि धन मूल धर्म अरु दाना, धर्म मूल गंगाजल पाना।
तव गुण गुणन करत सुख भाजत, गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत॥
गंगहिं नेम सहित निज ध्यावत, दुर्जनहूं सज्जन पद पावत।
बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥
गंगा गंगा जो नर कहहीं, भूखे नंगे कबहूं न रहहीं।
निकसत ही मुख गंगा माई, श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥
महँ अघिन अधमन कहं तारे, भए नर्क के बन्द किवारे।
जो नर जपै गंग शत नामा, सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥
सब सुख भोग परम पद पावहिं, आवागमन रहित ह्वै जावहिं।
धनि मइया सुरसरि सुखदैनी, धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥
ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा।
जो यह पढ़ै गंगा चालीसा, मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥
|| दोहा ||
नित नव सुख सम्पत्ति लहैं, धरैं, गंग का ध्यान।
अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान॥
सम्वत् भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र।
पूर्ण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र॥
2. पाठ विधि, अनुष्ठान और ज्योतिषीय महत्त्व
श्री गंगा चालीसा का पाठ केवल पढ़ने की क्रिया नहीं, अपितु एक तांत्रिक और मानसिक अनुष्ठान है।
शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, इसकी विधि निम्नलिखित है।
2.1 पाठ के नियम और पूर्व-तैयारी
समय: सर्वोत्तम समय 'ब्रह्म मुहूर्त' (सूर्योदय से पूर्व, 5:00 - 6:00 बजे) है।
यदि यह संभव न हो, तो संध्या काल (गोधूलि बेला) में पाठ करना चाहिए।
स्थान: यदि संभव हो तो गंगा तट पर पाठ करें। यदि घर पर कर रहे हैं,
तो पूजा वेदी पर एक तांबे के कलश में शुद्ध जल भरकर उसमें कुछ बूँदें गंगाजल की मिला लें और उसे साक्षात गंगा मानकर स्थापित करें।
आसन: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
2.2 विस्तृत पूजन विधि
नीचे दी गई सारणी में पाठ की चरणबद्ध विधि समझाई गई है:
| चरण |
क्रिया |
मंत्र/विधि |
| 1. पवित्रीकरण |
शरीर और आसन की शुद्धि |
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा... मंत्र से अपने ऊपर जल छिड़कें। |
| 2. आचमन |
आंतरिक शुद्धि |
ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः कहकर तीन बार जल पिएं। |
| 3. संकल्प |
उद्देश्य की घोषणा |
हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर कहें: "मैं (अपना नाम), (गोत्र), आज (तिथि) को समस्त
पापों के नाश और (मनोकामना) की पूर्ति हेतु श्री गंगा चालीसा का पाठ करने का संकल्प लेता हूँ।" जल छोड़ दें। |
| 4. आवाहन |
देवी का ध्यान |
कलश में गंगा जी का आवाहन करें। मन में विचारें कि वे शिव की जटाओं से आपके कलश में उतर रही हैं। |
| 5. पाठ |
चालीसा का वाचन |
श्री गंगा चालीसा का पाठ (दोहा से दोहा तक) स्पष्ट उच्चारण के साथ करें। कम से कम 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करें। |
| 6. आरती |
अग्नि समर्पण |
पाठ के बाद कपूर या घी के दीपक से 'ॐ जय गंगे माता' आरती गाएं। |
| 7. क्षमा प्रार्थना |
त्रुटि सुधार |
अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें। |