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श्री हनुमान चालीसा: तुलसीदास कृत पाठ !
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श्री हनुमान चालीसा: तुलसीदास कृत पाठ !

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अंतिम अपडेट: 3 जनवरी 2026
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श्री हनुमान चालीसा: पाठ, अर्थ, इतिहास और 108 पाठ अनुष्ठान की सिद्ध विधि श्री हनुमान चालीसा: संपूर्ण पाठ, ऐतिहासिक उद्गम एवं अनुष्ठान विधि | Shri Hanuman Chalisa Research Report श्री हनुमान चालीसा: ऐतिहासिक उद्गम, साहित्यिक विश्लेषण एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान पर विस्तृत शोध रिपोर्ट 2. संपूर्ण श्री हनुमान चालीसा (मूल पाठ) भक्तों के नित्य पाठ एवं...

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श्री हनुमान चालीसा: संपूर्ण पाठ, ऐतिहासिक उद्गम एवं अनुष्ठान विधि | Shri Hanuman Chalisa Research Report

श्री हनुमान चालीसा: ऐतिहासिक उद्गम, साहित्यिक विश्लेषण एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान पर विस्तृत शोध रिपोर्ट

2. संपूर्ण श्री हनुमान चालीसा (मूल पाठ)

भक्तों के नित्य पाठ एवं साधना हेतु, गीताप्रेस गोरखपुर और पारंपरिक पांडुलिपियों पर आधारित शुद्ध और सम्पूर्ण हनुमान चालीसा का पाठ यहाँ प्रस्तुत है ।

।। दोहा ।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
।। चौपाई ।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।
।। दोहा ।।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

2. रचनाकार और ऐतिहासिक उद्गम: एक विश्लेषणात्मक दृष्टि

हनुमान चालीसा की ऐतिहासिकता और इसके रचयिता के विषय में भारतीय साहित्य के इतिहासकार और भक्त समुदाय एकमत हैं। इसका उद्गम १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भक्ति आंदोलन के चरम काल में माना जाता है।

2. पाठ विधि, संकल्प और अनुष्ठान के नियम

हनुमान चालीसा का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पढ़ना आवश्यक है। शास्त्रों में इसके पाठ के लिए विशिष्ट नियम और अनुष्ठान बताए गए हैं।

2.1 दैनिक पाठ की विधि

साधारण भक्त के लिए नित्य पाठ की विधि सरल और सात्विक है :

  • समय: प्रातः काल या संध्या वंदन के समय।
  • पवित्रता: स्नान के बाद स्वच्छ (अधिमानतः लाल या पीले) वस्त्र धारण करें।
  • दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के लाल आसन का प्रयोग करें।
  • पूजन: हनुमान जी के चित्र के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाएं। पहले गणेश जी और सीताराम जी का स्मरण करें, फिर हनुमान जी का आह्वान करें।
  • उच्चारण: पाठ 'वाचिक' (बोलकर) करें। के अनुसार, जोर से पाठ करने से उत्पन्न ध्वनि तरंगें वातावरण की नकारात्मकता को नष्ट करती हैं।

2.2 विशेष कामना पूर्ति हेतु 'संकल्प' और 'अनुष्ठान'

जब भक्त किसी विशेष संकट (रोग, शत्रु भय, कोर्ट-कचहरी) से मुक्ति या विशेष मनोकामना (नौकरी, संतान) के लिए पाठ करता है, तो उसे 'संकल्प' लेकर अनुष्ठान करना चाहिए।

108 पाठ का अनुष्ठान

चालीसा में वर्णित "जो सत बार पाठ कर कोई" का अर्थ कई विद्वान 108 बार मानते हैं।

  • विधि: यह अनुष्ठान एक बैठक में (लगभग 4-5 घंटे) या संकल्प लेकर कई दिनों में पूरा किया जा सकता है।
  • संकल्प प्रक्रिया: हाथ में जल, अक्षत, फूल और १ सिक्का लें। कहें: "मैं (अमुक नाम/गोत्र) अपनी (अमुक कामना) हेतु हनुमान चालीसा के 108 पाठ का संकल्प लेता हूँ।" जल छोड़ दें।
  • भोग: पाठ संपन्न होने पर हनुमान जी को लड्डू, बूंदी या चूरमे का भोग लगाएं और तुलसी दल अर्पित करें।

11 या 21 दिन का संकल्प

यह विधि अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली मानी जाती है।

  • अवधि: लगातार 11 या 21 दिन।
  • नियम:
    • मंगलवार या शनिवार से शुरू करें।
    • प्रतिदिन एक निश्चित समय और स्थान पर बैठें।
    • प्रतिदिन 11 या 21 बार चालीसा का पाठ करें।
  • ब्रह्मचर्य: अनुष्ठान की अवधि में शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।
  • आहार: तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज) का पूर्ण त्याग करें। भक्त को सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
  • विसर्जन: अंतिम दिन हवन या भंडारा (प्रसाद वितरण) करके अनुष्ठान का समापन करें।

3. निष्कर्ष

हनुमान चालीसा, भारतीय संस्कृति के मर्म और भक्ति के उत्कर्ष का प्रतीक है। 16 वीं शताब्दी के संघर्षपूर्ण वातावरण में रची गई यह कृति आज 21 वीं सदी के तनावपूर्ण जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसके माध्यम से न केवल एक देवता की स्तुति की, बल्कि मानव मन को भय, निराशा और संशय से उबारने का एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग भी प्रशस्त किया।

© 2025 शोध रिपोर्ट - श्री हनुमान चालीसा

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

भक्ति साहित्य

तुलसीदास की चौपाई में क्या शक्ति है

तुलसीदास की चौपाइयों में मंत्र-शक्ति, लयात्मक छंद, जीवन-दर्शन और राम-नाम का तेज एकसाथ है। सुंदरकाण्ड का नित्य पाठ संकट-नाशक और मन को शांत करने वाला माना जाता है।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने रामचरितमानस की रचना कब शुरू की — कौन सा संवत?

संवत् 1631 (1574 ईस्वी) में। तुलसीदासजी ने लिखा — 'संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।' अर्थात् संवत् 1631 में श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर कथा आरम्भ करता हूँ।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदासजी ने — 'रामचरितमानस कबि तुलसी।' संवत् 1631-1633 (1574-1576 ई.) में रचना। अयोध्या में शुरू, काशी में समर्पित। हिन्दी साहित्य के महानतम कवि।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है?

तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।

गौरी वंदना मंत्र

गौरी वंदना मंत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

गौरी वंदना मंत्र गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बालकाण्ड में सीता के गौरी वंदना प्रसंग से लिया गया है।

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