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श्री बजरंग बाण: तुलसीदास कृत उग्र पाठ और सिद्धि विधि !
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श्री बजरंग बाण: तुलसीदास कृत उग्र पाठ और सिद्धि विधि !

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श्री बजरंग बाण: संपूर्ण मूल पाठ, ऐतिहासिक संदर्भ एवं अनुष्ठान विधि

श्री बजरंग बाण

1. श्री बजरंग बाण: संपूर्ण मूल पाठ

॥ दोहा ॥ निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरजामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होत दुसह दुःख नासा॥
चरन पकरि, कर जोर मनालौं। यहि औसर अब केहि गोहरालौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥
॥ दोहा ॥ उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

2. ऐतिहासिक संदर्भ, रचयिता एवं परंपरा

बजरंग बाण की उत्पत्ति और इसके रचयिता को लेकर विद्वानों और संतों में विभिन्न मत प्रचलित हैं। इसका विश्लेषण हम निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत करेंगे:
2.1 गोस्वामी तुलसीदास और रचयिता का प्रश्न
लोक परंपरा और अधिकांश प्रकाशित गुटकों (धार्मिक पुस्तिकाओं) में बजरंग बाण का रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी को माना जाता है। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'हनुमान अंक' और अन्य संग्रहों में इसे तुलसीदास कृत बताया गया है।
तर्क:
भाषा शैली: इसकी भाषा में अवधी और ब्रज का मिश्रण है, जो तुलसीदास जी की अन्य रचनाओं (जैसे विनयपत्रिका, दोहावली) में भी देखने को मिलता है।
समकालीन संदर्भ: जनश्रुति है कि जब तुलसीदास जी काशी में अस्वस्थ थे और उन पर तांत्रिक अभिचार किया गया था, या जब उन्हें वात रोग की तीव्र पीड़ा थी, तब उन्होंने हनुमान जी की उग्र शक्ति का आवाहन करने के लिए 'हनुमान बाहुक' और 'बजरंग बाण' की रचना की। हनुमान बाहुक में जहाँ शारीरिक पीड़ा का वर्णन है, वहीं बजरंग बाण में बाहरी बाधाओं और शत्रुओं के नाश की प्रार्थना है।
अस्थिरता के कारण अपनी रक्षा के लिए 'सशस्त्र भक्ति' की आवश्यकता थी। इसमें हनुमान जी को केवल भक्त नहीं, बल्कि एक 'महायोद्धा' के रूप में पुकारा गया है ।

2. तात्विक विवेचन: बजरंग बाण 'उग्र' क्यों है?

सामान्यत: प्रश्न उठता है कि भक्ति संगीत में 'उग्रता' का क्या स्थान है? बजरंग बाण को उग्र स्तोत्र मानने के पीछे ठोस धार्मिक और ध्वन्यात्मक कारण हैं।
2.1 बीज मंत्रों का विन्यास
बजरंग बाण की संरचना सामान्य कविता जैसी नहीं है। इसके मध्य भाग में शक्तिशाली बीज मंत्रों का प्रयोग हुआ है जो इसे 'मंत्र' की श्रेणी में ला खड़ा करता है।
"ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंत हठीले": यहाँ 'हनु' शब्द की लगातार आवृत्ति एक विशेष ध्वनि-कंपन पैदा करती है। 'ह' वर्ण आकाश तत्व का प्रतीक है और यह कंठ चक्र को प्रभावित करता है। 'हठीले' शब्द का अर्थ यहाँ 'जिद्दी' नहीं, बल्कि अपने संकल्प पर अडिग रहने वाले से है।
"ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा": 'ह्रीं' शक्ति का बीज मंत्र है। यह भुवनेश्वरी विद्या का बीज है जो माया और शक्ति का संचालन करता है। हनुमान उपासना में इसका प्रयोग उनकी शक्ति को जागृत करने के लिए किया जाता है।
"ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा": 'हुं' क्रोध और संहार का बीज मंत्र है। इसे 'वर्म बीज' भी कहते हैं जो रक्षा कवच बनाता है। इसका प्रयोग शत्रु के हृदय (उर) और सिर (सीसा) को लक्ष्य बनाने के लिए किया गया है।
"ॐ चं चं चं चं चपल चलंता": 'चं' बीज गतिशीलता का द्योतक है। यह हनुमान जी के वायु पुत्र स्वरूप और उनकी तीव्र गति को दर्शाता है।
"ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल": 'सं' बीज का प्रयोग शत्रु सेना (खल-दल) में भय और संशय उत्पन्न करने के लिए किया गया है।
ये बीज मंत्र शांत चित्त से केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं; इनका उच्चारण शरीर के ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) में तीव्र गर्मी और ऊर्जा उत्पन्न करता है। इसीलिए कमजोर दिल वाले या अशुद्ध अवस्था में रहने वाले व्यक्तियों को इसके पाठ से बचने की सलाह दी जाती है।

3. अनुष्ठान विधि: श्रद्धा और सावधानी

बजरंग बाण का पाठ 'सिद्धि' और 'कामना पूर्ति' के लिए किया जाता है, अतः इसकी विधि सामान्य पूजा से अधिक कठोर है।
3.1 पाठ का समय और मुहूर्त
सर्वोत्तम दिन: मंगलवार और शनिवार।
विशेष तिथियां: हनुमान जयंती, राम नवमी, होली, दीपावली, या ग्रहण काल।
समय: मध्यरात्रि (निशीथ काल) को शत्रु नाश और तंत्र काट के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सामान्य कष्ट निवारण के लिए सूर्योदय के समय या सूर्यास्त (गोधूलि बेला) के बाद पाठ किया जा सकता है।
3.2 अनुष्ठान की तैयारी
शुद्धि: साधक को पूर्णतः शुद्ध होकर, स्नान करके लाल रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। लाल रंग मंगल ग्रह और ऊर्जा का प्रतीक है।
आसन: कुशा का आसन या लाल ऊनी कंबल का प्रयोग करें। बैठने की दिशा समस्या के अनुसार तय होती है:
पूर्व : भक्ति, ज्ञान और सामान्य कामना पूर्ति के लिए।
दक्षिण : शत्रु नाश, कोर्ट-कचहरी में विजय और तंत्र बाधा निवारण के लिए (क्योंकि हनुमान जी दक्षिण दिशा की ओर लंका गए थे और दक्षिण यम की दिशा है)।
ब्रह्मचर्य: अनुष्ठान की अवधि (चाहे वह 1 दिन हो, 11 दिन या 21 दिन) में पूर्ण ब्रह्मचर्य (शारीरिक और मानसिक) का पालन अनिवार्य है ।
आहार: सात्विक आहार लें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा का पूर्ण त्याग करें। विशेष अनुष्ठानों में नमक का त्याग करने से मंत्र की शक्ति बढ़ जाती है ।
3.3 पूजन विधि
चित्र स्थापना: हनुमान जी के उस चित्र की स्थापना करें जिसमें वे पर्वत उठाए हुए हों या राम-दरबार के रक्षक के रूप में हों। यदि शत्रु नाश उद्देश्य है, तो गदाधारी वीर हनुमान का चित्र रखें।
दीपक: चमेली के तेल का दीपक (सबसे प्रिय) या शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं। दीपक में लौंग का एक जोड़ा डालने से रक्षा होती है।
धूप: बजरंग बाण में स्पष्ट लिखा है—"धूप देय जो जपै हमेसा", और "दै गूगल की धूप हमेशा"। अतः 'गूगल' की धूप देना अनिवार्य अंग है। यह वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेती है।
संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प लें: "मैं (अमुक नाम/गोत्र) अपनी (अमुक समस्या) के निवारण हेतु श्री बजरंग बाण का (11/21/100) पाठ करने का संकल्प लेता हूँ।" जल छोड़ दें।
पाठ का क्रम:
सर्वप्रथम गणेश वंदना।
श्री राम वंदना ("श्री राम जय राम जय जय राम" का 108 बार जाप)।
हनुमान चालीसा का एक पाठ (रक्षा कवच के रूप में)।
बजरंग बाण का मूल पाठ।
अंत में पुनः हनुमान चालीसा या हनुमान आरती।
3.4 क्या स्त्रियां पाठ कर सकती हैं?
यह एक भ्रांति है कि स्त्रियां बजरंग बाण नहीं पढ़ सकतीं। भक्ति मार्ग में लिंग भेद नहीं है। हालाँकि, मासिक धर्म के दौरान और गर्भावस्था में उग्र मंत्रों के उच्चारण से बचने की सलाह दी जाती है क्योंकि इससे उत्पन्न तीव्र ऊर्जा भ्रूण या शारीरिक चक्रों के लिए भारी हो सकती है। सामान्य दिनों में पूर्ण पवित्रता के साथ स्त्रियां इसका पाठ कर सकती हैं ।

4. आधुनिक प्रासंगिकता एवं लाभ

आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी युग में बजरंग बाण की प्रासंगिकता और बढ़ गई है।
मानसिक सबलता : इसके बीज मंत्रों का उच्च स्वर में पाठ करने से शरीर में डोपामाइन और सेरोटोनिन का स्राव संतुलित होता है। यह अवसाद और घबराहट को दूर कर निर्भीकता प्रदान करता है।
सुरक्षा कवच: जो लोग पुलिस, सेना, या जोखिम भरे कार्यों में हैं, उनके लिए यह एक अदृश्य कवच का काम करता है।
वास्तु और तंत्र दोष: यदि घर में अकारण कलह हो रही हो या बीमारी जा न रही हो, तो बजरंग बाण का अनुष्ठान (21 दिन तक गूगल की धूप के साथ) घर की 'नेगेटिव एनर्जी' को समाप्त कर देता है।

5. निष्कर्ष

श्री बजरंग बाण भारतीय अध्यात्म की 'शक्ति परंपरा' का एक अद्वितीय दस्तावेज है। यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक 'जागृत मंत्र' है। गोस्वामी तुलसीदास जी (या उनकी परंपरा के संतों) ने इसे उस समय रचा जब समाज को भय से मुक्त होने की आवश्यकता थी।
मुख्य निष्कर्ष:
यह एक उग्र स्तोत्र है, अतः इसका पाठ श्रद्धा के साथ-साथ अत्यंत सावधानी से करना चाहिए।
इसमें दी गई शपथ हनुमान जी के प्रति अविश्वास नहीं, बल्कि उन पर भक्त के अधिकार और विश्वास की पराकाष्ठा है।
इसका पाठ नियम, संयम और सात्विकता के बिना फलदायी नहीं होता, अपितु हानिकारक भी हो सकता है।
जब सभी मानवीय प्रयास विफल हो जाएं, तब बजरंग बाण का आश्रय लेना चाहिए; यह निश्चित रूप से कार्य सिद्ध करता है।
अतः, साधकों को परामर्श दिया जाता है कि वे 'हनुमान चालीसा' को अपनी दिनचर्या बनाएं और 'बजरंग बाण' को अपने जीवन के संकटकालीन रक्षक के रूप में सुरक्षित रखें।
॥ ॐ हनुमते नमः ॥

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