माघ शुक्ल पक्ष जया एकादशी की संपूर्ण पारंपरिक व्रत-कथा
पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का संवाद
नैमिषारण्य के परम पवित्र और शांत वातावरण में जब महर्षियों ने सूत जी से एकादशी माहात्म्य श्रवण करने की इच्छा प्रकट की, तब सूत जी ने उस परम पावन संवाद का वर्णन किया जो द्वापर युग में धर्मराज युधिष्ठिर और त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुआ था।
पांडुकुल भूषण, धर्म और सत्य के साक्षात स्वरूप, महाराज युधिष्ठिर ने अपने दोनों हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर और अत्यंत विनयपूर्ण वाणी में कमलनयन, सर्वेश्वर, अच्युत भगवान श्रीकृष्ण से पूछा— "हे त्रिलोकीनाथ! हे मधुसूदन! हे भक्तवत्सल! मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार वंदन करता हूँ। हे प्रभो! आपने अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे माघ मास के कृष्ण पक्ष की 'षट्तिला एकादशी' के अत्यंत सुंदर, गुह्य और पापनाशक माहात्म्य का विस्तारपूर्वक वर्णन श्रवण कराया है । आपके श्रीमुख से उस परम पवित्र कथा को सुनकर मेरे हृदय को असीम शांति प्राप्त हुई है।
हे जनार्दन! आप ही इस चराचर जगत के एकमात्र नियंता हैं। आप ही स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाले), अंडज (अंडे से उत्पन्न होने वाले), उद्भिज (पृथ्वी फाड़कर उत्पन्न होने वाले) और जरायुज (गर्भ से उत्पन्न होने वाले)—इन चारों प्रकार के जीवों को उत्पन्न करने वाले, उनका पालन-पोषण करने वाले तथा समय आने पर उनका संहार करने वाले परमेश्वर हैं । यह संपूर्ण सृष्टि आपके ही संकल्प से संचालित होती है। हे केशव! अब आप मुझ पर पुनः अपनी कृपा-दृष्टि करें और माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली परम पावन एकादशी का विस्तृत वर्णन मुझे श्रवण कराएं ।
हे नाथ! उस माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उस शुभ तिथि पर किस विशिष्ट देवता का पूजन किया जाता है? उसके व्रत की विधि और महिमा क्या है? हे माधव! उस दिन उपवास करने से मनुष्य को किस दुर्लभ फल की प्राप्ति होती है? हे सर्वज्ञ! कृपा करके यह संपूर्ण वृत्तांत मुझे आदि से अंत तक सविस्तार और क्रमबद्ध रूप से सुनाएं, जिससे मेरे चित्त की जिज्ञासा शांत हो और संसार के सभी मनुष्यों का कल्याण हो ।"
धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे अत्यंत विनीत, धर्मयुक्त और लोक-कल्याणकारी वचनों को सुनकर, शरणागत-वत्सल, देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। उन्होंने अपनी मेघ के समान गंभीर और मधुर वाणी में उत्तर देना आरंभ किया।
भगवान श्रीकृष्ण बोले— "हे कुन्तीपुत्र! हे राजन्! तुमने संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण की कामना से अत्यंत ही उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। एकादशी का व्रत मुझे अत्यंत प्रिय है, परंतु माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का स्थान मेरे हृदय में अत्यंत विशिष्ट है। हे धर्मराज! एकाग्र चित्त होकर श्रवण करो। माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस परम कल्याणकारी और पवित्र तिथि को 'जया एकादशी' के नाम से जाना जाता है ।
हे नृपश्रेष्ठ! जैसा कि इसके नाम 'जया' से ही प्रतीत होता है, यह एकादशी मनुष्य को संसार के सभी दुखों, पापों और कुयोनियों पर विजय प्रदान करने वाली है। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी, पवित्र और सभी प्रकार के अघ-ओघ (पाप-समूह) का समूल नाश करने वाला है। जो भी भाग्यशाली और श्रद्धालु मनुष्य इस दिन विधि-विधान पूर्वक मेरा स्मरण करते हुए उपवास करता है, वह ब्रह्म-हत्या जैसे महापाप से भी सर्वथा मुक्त हो जाता है और अंततः परम मोक्ष को प्राप्त होता है ।
हे राजन्! इस 'जया एकादशी' के व्रत के प्रभाव से जीवात्मा को भूत, प्रेत और पिशाच आदि की नीच, अधम और अत्यंत कष्टदायक योनियों में कभी नहीं भटकना पड़ता । इस महाव्रत के प्रभाव से जीव जन्म-मरण के कठोर बंधन से मुक्त होकर मेरे परम धाम वैकुंठ को प्राप्त कर लेता है । हे पांडव! इस व्रत को पूर्ण निष्ठा और विधिपूर्वक संपन्न करना चाहिए। इस एकादशी की महिमा को प्रकट करने वाली एक अत्यंत प्राचीन, अद्भुत और पुण्यदायी कथा पद्म पुराण में वर्णित है। यह कथा भूत-पिशाच योनि से मुक्ति का साक्षात प्रमाण है। अब मैं तुम्हें वही कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, तुम इसे पूर्ण श्रद्धा और ध्यानपूर्वक श्रवण करो ।
मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण)
स्वर्गलोक का वर्णन एवं देवराज इन्द्र की सभा
भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा— "हे धर्मराज युधिष्ठिर! प्राचीन काल की बात है, स्वर्गलोक के अधिपति, देवराज इन्द्र अपनी परम रमणीक और अलौकिक राजधानी 'अमरावती' में अत्यंत सुख, वैभव और ऐश्वर्य के साथ शासन कर रहे थे । स्वर्गलोक की वह आभा अवर्णनीय थी। वहां किसी भी प्राणी को न तो कोई रोग था, न शोक, न वृद्धावस्था और न ही मृत्यु का कोई भय। सभी देवगण, वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत, साध्यगण, सिद्ध, चारण, विद्याधर, गंधर्व और अप्सराएं अत्यंत आनंद और उल्लास के साथ वहां निवास करते थे ।
एक समय की बात है, देवराज इन्द्र अपनी इच्छानुसार स्वर्ग के सबसे अत्यंत रमणीक, विशाल और सुगंधित 'नंदन वन' में विहार कर रहे थे । वह नंदन वन पारिजात के कल्पवृक्षों, मंदार और कल्पतरु के सुगंधित पुष्पों से सुशोभित था। वहां की वायु सदैव शीतल, मंद और सुगंधित बहती थी, जो देवताओं के मनों को भी आह्लादित कर देती थी। उस नंदन वन में एक भव्य और विशाल उत्सव का आयोजन किया गया था, जिसमें स्वर्ग के सभी देवता, महान ऋषि-मुनि, किन्नर और गंधर्व उपस्थित थे ।
देवराज इन्द्र एक विशाल और अत्यंत भव्य स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान थे, जो बहुमूल्य मणियों, रत्नों और हीरों से जड़ित था। उनकी उस अलौकिक 'सुधर्मा सभा' में देवताओं के मनोरंजन और उत्सव की शोभा बढ़ाने के लिए गंधर्वों का अत्यंत मधुर गायन चल रहा था और स्वर्ग की अनुपम रूपवती अप्सराएं तथा गंधर्व-कन्याएं अपने मनमोहक नृत्यों की प्रस्तुति दे रही थीं । वीणा, मृदंग, बांसुरी और मंजीरों की दिव्य ध्वनि से संपूर्ण नंदन वन गुंजायमान हो रहा था।
गंधर्व माल्यवान एवं अप्सरा पुष्पवती का परिचय
उस अत्यंत विशाल और शोभायमान गंधर्व-सभा में देवराज इन्द्र के अनेक श्रेष्ठ और प्रसिद्ध गायक गंधर्व उपस्थित थे। उन्हीं गंधर्वों में एक अत्यंत प्रसिद्ध और गुणी गंधर्व थे, जिनका नाम पुष्पदंत था । पुष्पदंत की गायन कला स्वर्गलोक में अत्यंत विख्यात थी। उस सभा में पुष्पदंत के साथ उनकी अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी और सुंदरी कन्या भी उपस्थित थी, जिसका नाम 'पुष्पवती' था । पुष्पवती का रूप इतना अलौकिक और कमनीय था कि उसके मुख की कांति पूर्णमासी के चंद्रमा को भी लज्जित कर रही थी। उसके अंग-अंग से लावण्य छलक रहा था और वह नृत्य-कला में अत्यंत निपुण थी ।
उसी देव-सभा में देवराज इन्द्र के मुख्य और परम प्रिय संगीतकार चित्रसेन भी अपने परिवार के साथ उपस्थित थे । चित्रसेन के साथ उनकी धर्मपत्नी मालिनी, चित्रसेन और मालिनी के अत्यंत गुणी पुत्र पुष्पवान और पुष्पवान के सुपुत्र 'माल्यवान' भी वहां विराजमान थे । माल्यवान स्वर्गलोक का एक अत्यंत प्रतिभावान, सुरीला गायक और अद्वितीय रूपवान गंधर्व कुमार था । उसके नेत्र अत्यंत विशाल थे, उसकी देह कांतिमान थी और उसका यौवन पूर्णतः खिला हुआ था। स्वर्गलोक में गायन-विद्या में उसकी बराबरी करने वाला उस समय कोई अन्य गंधर्व नहीं था। वह जब गाता था, तो देवगण भी मंत्रमुग्ध होकर अपनी सुध-बुध खो बैठते थे ।
सभा में परस्पर आकर्षण एवं सुर-ताल का भंग होना
उत्सव अपने चरम पर था। देवराज इन्द्र के समक्ष गायन और नृत्य का भव्य कार्यक्रम आरंभ हुआ। इसी बीच गंधर्व-कन्या पुष्पवती की दृष्टि सभा में बैठे उस अत्यंत रूपवान और तेजस्वी गंधर्व कुमार माल्यवान पर पड़ी। माल्यवान के उस अद्वितीय रूप, आकर्षक व्यक्तित्व और प्रस्फुटित यौवन को देखकर पुष्पवती उस पर पूरी तरह से मोहित हो गई ।
कामदेव के तीक्ष्ण और अदृश्य बाणों ने पुष्पवती के हृदय को भेद दिया। वह अपने चित्त पर नियंत्रण न रख सकी और उसका संपूर्ण हृदय माल्यवान के प्रति तीव्र आसक्ति से भर गया । देव-सभा की गरिमा, देवराज इन्द्र की उपस्थिति और देवलोक की मर्यादाओं को विस्मृत कर, काम-वासना के वशीभूत होकर पुष्पवती अपने मनमोहक रूप, लावण्य, कटाक्षों और कामुक हाव-भावों से माल्यवान को अपनी ओर आकर्षित करने और उसे पूरी तरह से अपने वश में करने की चेष्टा करने लगी । वह बार-बार माल्यवान की ओर अत्यंत कामुक दृष्टि से देखने लगी और अपनी भाव-भंगिमाओं से उसे प्रेम का आमंत्रण देने लगी।
पुष्पवती के उन अत्यंत कामुक, मनमोहक और मादक हाव-भावों को देखकर गंधर्व माल्यवान का मन भी डोल गया। वह भी स्वयं की इंद्रियों पर नियंत्रण न रख सका और देखते ही देखते वह भी पुष्पवती के उस अलौकिक रूप-सौंदर्य के प्रति पूर्ण रूप से आसक्त हो गया । दोनों के हृदयों में काम की अग्नि धधक उठी। परस्पर इस घोर आकर्षण, मोह और वासना के कारण उन दोनों का चित्त पूरी तरह से भ्रमित हो गया । उनका विवेक नष्ट हो गया और उनकी एकाग्रता जो संगीत के प्रति होनी चाहिए थी, वह पूर्णतः भंग हो गई।
कुछ ही क्षणों में उन दोनों को देवराज इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए एक साथ गायन और नृत्य प्रस्तुत करने की आज्ञा प्राप्त हुई। वे दोनों सभा के मध्य भाग में आकर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगे । परंतु, उनका मन तो एक-दूसरे के प्रति कामुकता में अत्यंत विचलित और मग्न था। उनका ध्यान अपने गायन और नृत्य से हटकर केवल एक-दूसरे के शरीर और हाव-भाव पर केंद्रित था। इस अमर्यादित आकर्षण के कारण, माल्यवान के कंठ से निकलने वाले स्वर बार-बार लड़खड़ाने लगे। संगीत की जो प्राकृतिक लय, सुर और ताल थी, वह पूरी तरह से टूट गई । उनके गायन और नृत्य का सामंजस्य समाप्त हो गया और वे अत्यंत अशुद्ध, बेसुरे और तालहीन गायन करने लगे ।
इन्द्र का भयंकर क्रोध और पिशाच योनि का शाप
देवराज इन्द्र उस सुधर्मा सभा के मध्य अपने सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान थे। वे कला के अत्यंत पारखी और संगीत के महान मर्मज्ञ थे। माल्यवान और पुष्पवती के उस अशुद्ध गायन, स्वर-भंग, ताल-भंग और उनके बीच चल रही उन स्पष्ट कामुक चेष्टाओं और दृष्टि-विनिमय को देखकर देवराज इन्द्र उनके मन की दूषित स्थिति को भली-भांति समझ गए ।
संगीत जैसी परम पवित्र और ईश्वरीय साधना का ऐसा पतन, और वह भी स्वर्गलोक की सबसे महान देव-सभा में, देवराज इन्द्र के लिए असहनीय था। उन्होंने इसे न केवल कला का घोर अनादर माना, बल्कि इसे अपना, देव-सभा का और वहां उपस्थित सभी महान ऋषि-मुनियों, देवगणों और गुरुजनों का अत्यंत घोर और अक्षम्य अपमान माना ।
क्रोध की भयंकर अग्नि से देवराज इन्द्र के नेत्र लाल हो गए। उनके होंठ फड़कने लगे। उन्होंने तत्काल अपने हाथ के संकेत से उस संगीत समारोह को रुकवा दिया। संपूर्ण नंदन वन में एक भयानक सन्नाटा छा गया। तब देवराज इन्द्र ने अपने सिंहासन से उठकर, अत्यंत कठोर और वज्र के समान गर्जना करते हुए भरे दरबार में उन दोनों को भयंकर शाप दिया।
इन्द्र ने कहा— "हे मूर्खों! हे कामुक गंधर्वों! तुमने काम-वासना के घोर वशीभूत होकर मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। तुमने इस परम पवित्र देव-सभा, इन गुरुजनों और संगीत जैसी दिव्य साधना का घोर अपमान किया है । तुम्हारा यह कृत्य अक्षम्य है। स्वर्गलोक जैसे पवित्र स्थान पर तुम्हारी इस कामुकता और अमर्यादित आचरण के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें यह कठोर शाप देता हूँ कि तुम दोनों तत्काल स्वर्ग के इस दिव्य अधिकार और इन दिव्य देहों से वंचित हो जाओ । तुम इसी क्षण स्वर्ग से पतित होकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर गिरो! वहां जाकर तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में अत्यंत नीच, भयंकर और दुःखदायी 'पिशाच' का रूप धारण करो और पृथ्वी पर भटकते हुए अपने इन घोर पाप-कर्मों का कठोर फल भोगो!" ।
पृथ्वी पर हिमालय पर्वत में दुःखपूर्ण पिशाच जीवन
देवराज इन्द्र के मुख से निकले उस भयंकर और अमोघ शाप के तत्काल प्रभाव से माल्यवान और पुष्पवती दोनों स्वर्गलोक से नीचे मृत्युलोक (पृथ्वी) की ओर धकेल दिए गए । पृथ्वी पर गिरते ही उनके वे अलौकिक, तेजस्वी और दिव्य गंधर्व शरीर नष्ट हो गए और उन्होंने अत्यंत वीभत्स, भयानक, कुरूप और दुःखदायी 'पिशाच' योनि प्राप्त कर ली ।
वे दोनों पृथ्वी पर हिमालय पर्वत के अत्यंत दुर्गम, घने और बर्फीले जंगलों में जा गिरे। पिशाच योनि प्राप्त होते ही उनका जीवन नरक से भी अधिक दारुण और कष्टदायक हो गया। उस नीच और तामसिक पिशाच योनि में पहुंचने के कारण उन्हें गंध, रस और स्पर्श का कोई भी ज्ञान नहीं रह गया था । उनके शरीर से अत्यंत दुर्गंध आती थी, उनके बाल बिखरे हुए थे, और उनकी देह कंकाल के समान हो गई थी।
हिमालय पर्वत के उस अत्यंत बर्फीले और निर्जन क्षेत्र में, जहां सदैव हाड़-कंपा देने वाली हवाएं चलती थीं, वे दोनों भयानक शीत (ठंड) से ठिठुरने लगे। उन्हें न तो पहनने के लिए कोई वस्त्र प्राप्त था और न ही रहने के लिए कोई आश्रय। पिशाच होने के कारण उनके भीतर एक भयानक और कभी न बुझने वाली अग्नि प्रज्वलित रहती थी, जिसके कारण वे अत्यंत असहनीय भूख और प्यास से निरंतर तड़पते रहते थे । महान दुःख और शारीरिक कष्ट के कारण न तो उन्हें दिन में कभी शांति मिलती थी और न ही उन्हें रात में एक क्षण के लिए निद्रा का सुख प्राप्त होता था ।
घने अंधकार, भयानक बर्फ और कष्ट के बीच वे हिमालय के उस निर्जन वन में भटकते रहते और निरंतर आर्तनाद और विलाप करते रहते थे। वे दोनों पिशाच रूप में एक-दूसरे की वह वीभत्स और भयानक दशा देखकर अत्यंत आत्मग्लानि और गहरे शोक में डूब जाते थे।
विलाप करते हुए माल्यवान पुष्पवती से कहता— "हे विधाता! न जाने हमने अपने पिछले जन्मों में ऐसा कौन सा घोर पाप किया था, जिसके फलस्वरूप आज हमें स्वर्ग से पतित होकर यह भयंकर और दुःखदायी पिशाच जीवन प्राप्त हुआ है । सुना है कि नरक की यातनाएं अत्यंत भयंकर होती हैं, परंतु हे प्रिये! इस पिशाच योनि का यह कष्ट, यह भूख-प्यास और यह ठंड तो नरकों की यातना से भी अधिक दारुण और असहनीय है। हमने क्षणिक मोह के कारण अपना वह अलौकिक स्वर्गलोक गंवा दिया।" इस प्रकार वे दोनों निरंतर घोर पश्चाताप करते हुए, भूख-प्यास और हिमालय की उस प्राणघाती ठंड में तड़पते हुए अपने दिन व्यतीत करने लगे ।
माघ शुक्ल एकादशी का आगमन, अनजाने में उपवास एवं रात्रि-जागरण
इस प्रकार अत्यंत कष्ट और पीड़ा में भयंकर समय व्यतीत होता गया। वे दोनों पिशाच हिमालय के शिखरों पर भटकते हुए निरंतर अपने कर्मों पर घोर पश्चाताप कर रहे थे। इसी बीच दैवयोग (परम सौभाग्य) से परम पावन माघ मास के शुक्ल पक्ष की 'जया' नामक महान एकादशी तिथि का शुभ आगमन हुआ ।
जया एकादशी के उस परम पुनीत दिन, पिशाच रूपी माल्यवान और पुष्पवती को हिमालय के उस निर्जन वन में खाने के लिए कोई भी आहार या मांस-रुधिर प्राप्त नहीं हुआ। भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल होने पर भी, विवशतावश उन्होंने उस दिन कुछ भी भोजन ग्रहण नहीं किया। उन्होंने केवल कुछ वृक्षों के सूखे पत्ते और फल-फूल खाकर ही अपना वह दिन व्यतीत किया ।
अपने दारुण दुःख और पीड़ा की अधिकता के कारण, उस एकादशी के पावन दिन उनके मन में कोई बुरी भावना नहीं आई। उन्होंने उस दिन किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचाया, न ही अनजाने में किसी जीव की हत्या की, और न ही कोई अन्य पाप कर्म किया ।
इस प्रकार निराहार रहते हुए संध्या का समय हो गया और सूर्य अस्ताचल को चला गया। हिमालय पर रात्रि का घोर अंधकार छा गया। वे दोनों पिशाच अपनी दुर्दशा पर रोते हुए और शीत से कांपते हुए एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए । उस रात्रि हिमालय पर्वत पर अत्यंत भयानक और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बर्फीली हवाएं उनके पिशाच शरीरों को चीर रही थीं। शीत के भयंकर प्रकोप, भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा और अपने कृत्य के घोर पश्चाताप के कारण वे दोनों एक-दूसरे से सटकर बैठे रहे, परंतु ठंड की अधिकता के कारण उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आई । वे पूरी रात कांपते रहे, विलाप करते रहे और जागते हुए ही उन्होंने वह भयंकर और लंबी रात्रि व्यतीत कर दी।
इस प्रकार, यद्यपि उनका उद्देश्य व्रत करना नहीं था, और वे अपने घोर दुःख और कष्ट के बीच ही घिरे हुए थे, परंतु अनजाने में ही सही, उन दोनों के द्वारा माघ शुक्ल जया एकादशी का पूर्ण रूप से उत्तम उपवास (निराहार व्रत) और भगवान श्री हरि को अत्यंत प्रिय 'रात्रि-जागरण' विधिवत रूप से संपन्न हो गया ।
व्रत-फल से पिशाच-योनि से मुक्ति और पुनः दिव्य गंधर्व रूप की प्राप्ति
जया एकादशी के उस महान व्रत और अनजाने में किए गए रात्रि-जागरण के अकल्पनीय पुण्य-प्रभाव से तथा सर्वव्यापी, कृपानिधान भगवान श्री विष्णु (वासुदेव) की असीम अनुकंपा से, अगले दिन (द्वादशी तिथि को) प्रातःकाल सूर्योदय होते ही हिमालय पर्वत पर एक महान और अलौकिक चमत्कार हुआ ।
भगवान श्री हरि के प्रताप और एकादशी व्रत के अमोघ फल से उनकी वह भयंकर और दुःखदायी पिशाच योनि तत्काल नष्ट हो गई । माल्यवान और पुष्पवती दोनों पिशाच रूप के उस भयानक आवरण और इन्द्र के कठोर शाप से सर्वथा मुक्त हो गए। उसी क्षण उन्होंने पुनः अपने अत्यंत सुंदर, मनोरम, और दिव्य गंधर्व तथा अप्सरा का देह धारण कर लिया ।
उनका शरीर पुनः कांतिमान हो गया। उनके अंगों पर पुनः पहले के समान ही दिव्य और बहुमूल्य वस्त्र, सुंदर सुगंधित पुष्पों की मालाएं और चमचमाते हुए स्वर्णिम अलंकार (आभूषण) सुशोभित होने लगे । पिशाच योनि की दुर्गंध और कष्ट के स्थान पर उनके शरीरों से दिव्य सुगंध प्रवाहित होने लगी। उनके हृदयों में वही पुराना स्नेह था, परंतु अब उसमें वासना के स्थान पर सर्वेश्वर भगवान श्री हरि के प्रति परम और अनन्य भक्ति उमड़ रही थी ।
उसी समय आकाशमंडल से देवताओं का एक अत्यंत भव्य और दिव्य विमान वहां हिमालय पर उतरा। माल्यवान और पुष्पवती उस दिव्य विमान में आरोहित हुए और अत्यंत प्रसन्नता तथा भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए पुनः स्वर्गलोक (देवलोक) की ओर प्रस्थान कर गए ।
इन्द्र द्वारा सम्मान और आश्चर्य
स्वर्गलोक पहुंचकर उन दोनों ने सीधे अमरावती में देवराज इन्द्र की सुधर्मा सभा में प्रवेश किया। वहां पहुंचकर उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक और भक्तिभाव से देवराज इन्द्र के सम्मुख जाकर उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया ।
जब देवराज इन्द्र ने माल्यवान और पुष्पवती को पुनः उनके पहले वाले दिव्य, अत्यंत सुंदर और अलंकृत रूप में देखा, तो वे अपने सिंहासन पर बैठे-बैठे अत्यंत आश्चर्यचकित रह गए । इन्द्र ने परम विस्मयपूर्वक उनसे पूछा— "हे माल्यवान! मुझे अत्यंत आश्चर्य हो रहा है! तुम दोनों को तो मेरे अत्यंत कठोर और अमोघ शाप के कारण भयंकर पिशाचत्व प्राप्त हुआ था। फिर ऐसा कौन सा महान पुण्य कर्म तुमने पृथ्वी पर किया है? या किस परम शक्तिमान देवता ने तुम्हें मेरे उस शाप और उस दारुण पिशाच योनि से इतनी शीघ्रता से मुक्त कर दिया है? कृपया मुझे यह सारा वृत्तांत सत्य-सत्य बताओ।" ।
देवराज इन्द्र के इन वचनों को सुनकर गंधर्व माल्यवान ने हाथ जोड़कर अत्यंत भक्तिभाव और नम्रता से उत्तर दिया— "हे स्वामी! हे देवराज! यह सब किसी अन्य देवता की कृपा नहीं है, अपितु सर्वेश्वर, जगदीश्वर भगवान वासुदेव (श्री विष्णु) की परम अहैतुकी कृपा और उनकी अत्यंत प्रिय 'जया एकादशी' के परम पावन व्रत के महान प्रभाव का ही परिणाम है ।
हे इन्द्रदेव! जब हम हिमालय पर पिशाच योनि का भयानक कष्ट भोग रहे थे, तब माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन हमने घोर कष्ट, भूख और ठंड के कारण अनजाने में ही निराहार रहकर उपवास किया। हमने केवल फल-फूल खाए और पीपल के वृक्ष के नीचे कड़ाके की ठंड के कारण रात भर जागते रहे, जिससे हमारा अनजाने में ही रात्रि-जागरण भी हो गया । उसी हरिवासर (एकादशी) के पुण्य-प्रताप और भगवान श्री हरि की भक्ति के महान प्रभाव से ही हमारी यह नीच पिशाच देह छूटी है और हमें यह दिव्य गंधर्व रूप पुनः प्राप्त हुआ है।" ।
माल्यवान के मुख से भगवान श्री हरि की महिमा और जया एकादशी के व्रत का यह अद्भुत और प्रत्यक्ष माहात्म्य सुनकर देवराज इन्द्र अत्यंत प्रसन्न हुए। उनका हृदय गदगद हो गया।
इन्द्र ने माल्यवान को ससम्मान उठाते हुए कहा— "हे माल्यवान! हे पुष्पवती! तुमने भगवान श्री विष्णु की परम प्रिय एकादशी का उत्तम व्रत किया है और तुम पर साक्षात भगवान वासुदेव की असीम कृपा हुई है । यह सत्य है कि जो लोग हरिवासर (एकादशी) का व्रत करते हैं और जो सर्वेश्वर भगवान श्री विष्णु तथा भगवान शिव के अनन्य भक्त हैं, वे मनुष्य अथवा गंधर्व होते हुए भी हम देवताओं के लिए परम पूजनीय और वंदनीय हैं, इसमें रंचमात्र भी संशय नहीं है ।
हे माल्यवान! अब तुम भगवान की कृपा से पूर्ण रूप से पवित्र और पावन हो गए हो। तुम दोनों धन्य हो। अब तुम इस स्वर्गलोक में अपनी पत्नी पुष्पवती के साथ सुखपूर्वक निवास करो और देवलोक के दिव्य आनंद का विहार करो।" । इस प्रकार देवराज इन्द्र ने उन्हें पूर्ण सम्मान के साथ स्वर्ग में पुनः स्थापित किया।
पारंपरिक फल-वचन एवं माहात्म्य
भगवान श्रीकृष्ण ने यह अद्भुत और कल्याणकारी कथा पूर्ण करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर से कहा—
"हे राजन! हे राजशार्दूल युधिष्ठिर! इसी महान कारण और प्रत्यक्ष प्रमाण को देखते हुए प्रत्येक मनुष्य को हरिवासर अर्थात् 'जया एकादशी' का व्रत अत्यंत श्रद्धा, निष्ठा और भक्तिपूर्वक अवश्य ही करना चाहिए ।
हे नृपश्रेष्ठ! यह जया एकादशी इतनी अधिक परम कल्याणकारी और पुण्य-प्रदायिनी है कि यह केवल भूत-पिशाच योनि से ही नहीं बचाती, अपितु यह ब्रह्म-हत्या जैसे जघन्य और महापापों को भी समूल नष्ट करने की महान सामर्थ्य रखती है । जिस भी पुण्यात्मा ने माघ मास के शुक्ल पक्ष की इस जया एकादशी का विधिपूर्वक व्रत कर लिया, उसने मानो संसार के सभी प्रकार के महादान दे दिए और सभी प्रकार के महान यज्ञों का पूर्ण अनुष्ठान कर लिया ।
जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से जया एकादशी का यह पावन व्रत करता है, वह जीवन के सभी दुखों, बाधाओं और संकटों से सर्वथा मुक्त हो जाता है। मृत्यु के उपरांत वह कभी भी यमलोक नहीं जाता, अपितु अंत समय में वह भगवान श्री हरि के परम धाम (बैकुंठ लोक) में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करता है। वह जीवात्मा करोड़ों कल्पों तक वहां वैकुंठ में अलौकिक और दिव्य आनंद का उपभोग करते हुए अंततः परम मोक्ष को प्राप्त होती है ।
हे धर्मराज! जो भी श्रद्धालु मनुष्य इस जया एकादशी की पावन व्रत-कथा को स्वयं पढ़ता है अथवा पूर्ण श्रद्धा-भाव से इसका श्रवण करता है, उसे निश्चित रूप से 'अग्निष्टोम यज्ञ' के करने के समान महान पुण्य-फल की प्राप्ति होती है । भगवान वासुदेव की असीम कृपा से उसे कभी भी प्रेत या पिशाच योनि में नहीं भटकना पड़ता और उसका सर्वत्र कल्याण ही कल्याण होता है ।"