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विजया एकादशी व्रत कथा: फाल्गुन कृष्ण पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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फाल्गुन कृष्ण पक्ष विजया एकादशी व्रत कथा: स्कन्द एवं पद्म पुराण पर आधारित संपूर्ण पारंपरिक आख्यान

१. पारंपरिक प्रारंभ: युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥

सकल चराचर जगत के पालनहार, कमलनयन, भक्तवत्सल, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और कुरुवंश के शिरोमणि, धर्मराज युधिष्ठिर के मध्य यह परम पावन संवाद स्कन्द पुराण और पद्म पुराण के पवित्र पृष्ठों में वर्णित है । एक समय की बात है, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने तीनों लोकों के स्वामी, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी, पीताम्बर सुशोभित भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। अत्यंत विनीत भाव, श्रद्धा और अगाध भक्ति से परिपूर्ण होकर, हाथ जोड़कर युधिष्ठिर ने भगवान से अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा प्रकट की。

धर्मराज युधिष्ठिर की जिज्ञासा

धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्र स्वर में कहा— "हे वासुदेव! हे जगन्नाथ! हे माधव! हे त्रिलोकीनाथ! आप सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रक्षक, शरणागतों के आश्रय और समस्त धर्मों के ज्ञाता हैं। हे कृपानिधान! कृपा करके मेरे मन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण संशय का निवारण करें। हे प्रभो! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस परम पावन एकादशी की शास्त्रोक्त विधि क्या है? उस दिन किस देवता का पूजन किया जाता है, और उस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करने से मनुष्य को किस पुण्य फल की प्राप्ति होती है? हे कमलनयन, मैं इस व्रत की सम्पूर्ण कथा, विधान और माहात्म्य आपके श्रीमुख से श्रवण करने की अभिलाषा रखता हूँ, अतः मुझ पर कृपा कर विस्तारपूर्वक इसका वर्णन करें । मैं यह कथा इसलिए सुनना चाहता हूँ ताकि भूलोक के समस्त प्राणियों का कल्याण हो सके।"

भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा माहात्म्य का आरंभिक वर्णन

धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे धर्मयुक्त, लोक-कल्याणकारी और विनीत वचनों को सुनकर, मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "हे कुन्तीपुत्र! हे राजेन्द्र! तुमने सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार और कल्याण हेतु अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। एकादशी का व्रत मुझे अत्यंत प्रिय है, परंतु फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का माहात्म्य अत्यंत गूढ़, चमत्कारिक और गोपनीय है। हे अर्जुन के अग्रज, तुम्हारे प्रति मेरे हृदय में जो अथाह स्नेह है, उसके कारण मैं यह रहस्यमयी कथा तुम्हें सुनाता हूँ। एकाग्र चित्त होकर इसका श्रवण करो ।

हे युधिष्ठिर! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की इस पुण्यदायिनी एकादशी का नाम 'विजया एकादशी' है। अपने नाम के ही अनुरूप यह एकादशी व्रत करने वाले साधक को सम्पूर्ण विश्व में, प्रत्येक कार्य में और प्रत्येक संघर्ष में निश्चित रूप से 'विजय' (Jaya) प्रदान करने वाली है । यह विजया एकादशी भयंकर शत्रुओं से घिरे होने पर और पराजय सामने खड़ी होने की विकट स्थिति में भी मनुष्य को विजय दिलाने की अमोघ क्षमता रखती है। इस व्रत का प्रभाव इतना तीव्र है कि यह जन्म-जन्मांतर के संचित भयंकर पापों का समूल नाश कर देती है, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखे वन को भस्म कर देती है ।

हे राजन! प्राचीन काल में कई बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने इस व्रत के प्रभाव से अपनी निश्चित हार को जीत में परिवर्तित किया है। आज तक इस व्रत की सम्पूर्ण कथा और रहस्य मैंने किसी को नहीं सुनाया है। तुमसे पूर्व केवल देवर्षि नारद ही इस कथा को परमपिता ब्रह्मा जी के श्रीमुख से सुन पाए हैं। तुम मेरे अत्यंत प्रिय सखा और परम भक्त हो, इसलिए मैं उस परम पावन संवाद को तुम्हारे समक्ष यथावत् प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसे देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से श्रवण किया था ।"


२. देवर्षि नारद और परमपिता ब्रह्मा का संवाद

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा— "हे धर्मराज! एक बार देवताओं में श्रेष्ठ और मेरे परम भक्त देवर्षि नारद ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने चतुर्मुख ब्रह्मा जी को कमल के पुष्प पर विराजमान देखा। देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी के श्रीचरणों में वंदना करते हुए विनयपूर्वक पूछा— 'हे कमल पर विराजमान होने वाले परमपिता! हे चतुरानन! मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार साष्टांग प्रणाम करता हूँ। कृपा करके मुझे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में बताएँ। इस एकादशी का क्या नाम है, इसके व्रत का क्या विधान है और इसके पालन से किस अलौकिक पुण्य की प्राप्ति होती है?'

ब्रह्मा जी द्वारा विजया एकादशी का रहस्योद्घाटन

अपने प्रिय पुत्र देवर्षि नारद के ऐसे जिज्ञासापूर्ण और भक्तिभाव से युक्त वचनों को सुनकर परमपिता ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले— 'हे पुत्र नारद! सुनो, मैं तुम्हें उस श्रेष्ठतम व्रत की कथा सुनाता हूँ जो सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने वाली है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'विजया एकादशी' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात है। हे पुत्र! यह सबसे प्राचीन और परम पवित्र व्रत है। मैंने आज तक इस व्रत का रहस्य किसी के समक्ष उद्घाटित नहीं किया है, परंतु तुम्हारी अविचल भक्ति देखकर मैं यह कथा तुम्हें सुना रहा हूँ । तुम निस्संदेह यह जान लो कि विजया एकादशी अपने नाम के अनुसार व्रत करने वाले साधक को सम्पूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक विजय प्रदान करती है। अब मैं तुम्हें वह अत्यंत प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जब स्वयं भगवान के अवतार ने इस व्रत का पालन किया था।' "


३. मुख्य कथा: त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का प्रसंग

ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को उस युग की कथा सुनानी आरंभ की, जब पृथ्वी पर धर्म की स्थापना हेतु भगवान नारायण ने अंशावतार ग्रहण किया था। ब्रह्मा जी ने कहा— "हे मुनिश्रेष्ठ! यह त्रेतायुग का परम पावन प्रसंग है। जब पृथ्वी पर राक्षसों का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया, तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र के रूप में अवतार लिया ।

वनवास, पञ्चवटी निवास एवं माता सीता का हरण

जब भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने अपने पिता राजा दशरथ के वचनों और आज्ञा का पालन करते हुए चौदह वर्षों के कठिन वनवास को स्वीकार किया, तब वे अपनी अर्धांगिनी, जगत्-जननी माता सीता और परम आज्ञाकारी भ्राता लक्ष्मण जी के साथ दंडकारण्य वन में स्थित पञ्चवटी नामक स्थान पर निवास करने लगे। वे वहाँ वल्कल वस्त्र धारण कर, तपस्वियों की भाँति सादा जीवन व्यतीत कर रहे थे। उसी पञ्चवटी में रहते हुए, लंका के अत्यंत बलशाली, मायावी और दुराचारी राक्षसराज रावण ने छलपूर्वक जगन्माता सीता का हरण कर लिया ।

अपनी प्राणप्रिय अर्धांगिनी को कुटिया में न पाकर, भगवान श्रीरामचन्द्र जी अत्यंत व्याकुल हो गए। यद्यपि वे स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं, परंतु इस अवतार में वे मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में दुनिया के समक्ष एक साधारण मानव की भाँति आचरण कर रहे थे, अतः वे अत्यंत दुखी और शोकग्रस्त प्रतीत हुए। वे भ्राता लक्ष्मण के साथ माता सीता की खोज में सघन वनों में भटकने लगे ।

जटायु मोक्ष, वानर-सेना का साथ एवं लंका की ओर प्रस्थान

वन में सीता जी को खोजते हुए उनकी भेंट भगवान के परम भक्त, वल्कल रूपी गिद्धराज जटायु से हुई। जटायु रावण से भयंकर युद्ध करते हुए मरणासन्न अवस्था में पड़े थे। जटायु ने ही श्रीराम को यह दुःखद समाचार दिया कि माता सीता का हरण लंकापति रावण ने किया है। भगवान श्रीराम ने अपने हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार किया और उस परम भक्त पक्षीराज को सीधे बैकुंठ धाम की प्राप्ति कराई ।

आगे बढ़ते हुए श्रीराम ने अपने शत्रु कबंध नामक भयंकर राक्षस का वध किया। तत्पश्चात, ऋष्यमूक पर्वत पर उनकी भेंट वानरराज सुग्रीव से हुई। श्रीराम और सुग्रीव में मित्रता स्थापित हुई। भगवान श्रीराम ने बालि का वध करके सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य सौंपा। इसके बाद, सुग्रीव की सहायता से वानरों और भालुओं की एक अत्यंत विशाल सेना एकत्रित की गई। भगवान के परम सेवक श्री हनुमान जी ने विशाल समुद्र को लांघकर लंका में प्रवेश किया, वहाँ अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन किए, उन्हें श्रीराम की मुद्रिका (अँगूठी) दी और लंका दहन कर वापस लौट आए। हनुमान जी ने श्रीरामचन्द्र जी के पास आकर माता सीता का सारा वृत्तांत और अशोक वाटिका का समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया ।

भगवान श्रीराम का विशाल समुद्र तट पर पहुँचना और चिंता

सब हाल भली-भांति जानने के पश्चात्, भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों और भालुओं की अपनी विशाल सेना के साथ लंका पर आक्रमण करने हेतु प्रस्थान किया। वह विशाल सेना मार्ग पार करती हुई विशाल समुद्र के तट पर आ पहुँची ।

तट पर पहुँचकर भगवान श्रीराम ने उस अगाध, अथाह और भयंकर जल-जंतुओं से भरे हुए महासागर को देखा। वह समुद्र अत्यंत गहरा था और उसमें भयंकर मगरमच्छ, घड़ियाल, तिमिंगल और अनेक प्रकार के हिंसक जीव निवास करते थे। सागर के उन जल जीवों से भरे दुर्गम मार्ग से होकर लंका तक पहुँचना एक अत्यंत विकट और असंभव सा प्रश्न बनकर खड़ा हो गया था ।

भगवान श्रीराम यद्यपि स्वयं सर्वशक्तिमान और ब्रह्मांड के स्वामी हैं, परंतु अपनी मानवीय लीला और मर्यादा को स्थापित करने के उद्देश्य से वे एक साधारण मनुष्य की भाँति चिंतित प्रतीत होने लगे। उस विशाल और अपार समुद्र को देखकर श्रीरामचन्द्र जी ने अपने अनुज लक्ष्मण से संवाद किया ।

अनुज लक्ष्मण से संवाद

श्रीरामचन्द्र जी ने लक्ष्मण से कहा— 'हे लक्ष्मण! तुम इस अपार और भयंकर जीवों से भरे हुए विशाल समुद्र को देख रहे हो। मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि हम इस अगाध सागर को पार कैसे करेंगे? हमारी यह विशाल वानर और भालुओं की सेना इस मगरमच्छों और भयंकर जंतुओं से भरे दुर्गम महासागर को किस प्रकार पार कर लंका पहुँचेगी? मुझे इसे पार करने का कोई उपाय सूझ नहीं रहा है। यदि तुम्हारे पास इस विकट समस्या का कोई समाधान या उपाय है, तो मुझे बताओ।'

श्रीरामचन्द्र जी के इन चिंताग्रस्त वचनों को सुनकर सुमित्रानंदन लक्ष्मण जी ने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया— 'हे प्रभो! हे रघुनन्दन! आप तो स्वयं आदि पुरुष, परमेश्वर और सर्वसमर्थ हैं। आपसे इस ब्रह्मांड की कोई भी बात छिपी हुई नहीं है। आप सर्वज्ञ हैं। फिर भी, यदि आप मानवीय मर्यादा का पालन करते हुए मुझसे पूछ रहे हैं, तो मैं अपना विचार प्रस्तुत करता हूँ ।

हे नाथ! यहाँ से आधा योजन की दूरी पर एक अत्यंत पवित्र और रमणीक द्वीप है। उस द्वीप पर प्राचीन काल से ही परम ज्ञानी और तपस्वी मुनि बकदाल्भ्य (वकदाल्भ्य) का आश्रम स्थित है। वे मुनिश्रेष्ठ अत्यंत तपस्वी हैं और उन्होंने कई 'ब्रह्माओं' का जीवन-काल आते-जाते देखा है। वे त्रिकालदर्शी महामुनि हैं। हे प्रभु! हमें उनके ही आश्रम में चलना चाहिए और उन्हीं से इस अगाध समुद्र को पार करने और विजय प्राप्त करने का उपाय पूछना चाहिए।'

लक्ष्मण जी की इस अत्यंत युक्तिसंगत और बुद्धिमत्तापूर्ण बात को सुनकर भगवान श्रीरामचन्द्र जी सहमत हो गए। तत्पश्चात, भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी उसी समय परम तपस्वी महामुनि बकदाल्भ्य के आश्रम की ओर चल पड़े。

मुनि बकदाल्भ्य के आश्रम में प्रवेश एवं भेंट

जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी उस पवित्र आश्रम में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि महर्षि बकदाल्भ्य शांत भाव से बैठे हुए हैं। श्रीराम और लक्ष्मण जी ने मुनि के श्रीचरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। महामुनि बकदाल्भ्य त्रिकालदर्शी थे, उन्होंने अपने तपोबल से तुरंत ही जान लिया कि उनके समक्ष साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम उपस्थित हैं, जो दुष्टों के संहार के लिए अवतरित हुए हैं ।

महामुनि बकदाल्भ्य ने अत्यंत आदर और सत्कार के साथ भगवान श्रीराम का स्वागत किया और पूछा— 'हे श्रीराम! हे मनुष्यों में श्रेष्ठ! मेरे इस कुटिया रुपी साधारण आश्रम में आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है?'

मुनि के इस विनीत प्रश्न को सुनकर भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने उत्तर दिया— 'हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हे महामुनि! आपकी कृपा से मैं अपनी वानर और भालुओं की विशाल सेना के साथ इस समुद्र के तट पर आया हूँ। मेरा उद्देश्य इस अगाध समुद्र को पार करके लंका पर आक्रमण करना और दुराचारी राक्षसराज रावण तथा उसकी सेना को परास्त करना है। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं आपसे यही पूछने के लिए आपके इस पावन आश्रम में उपस्थित हुआ हूँ कि मैं इस भयंकर और विशाल महासागर को किस प्रकार पार कर सकता हूँ? कृपा करके मुझ पर दया करें और कोई ऐसा अचूक उपाय या व्रत बताएँ जिससे यह महासागर सफलतापूर्वक पार किया जा सके और हमें विजय प्राप्त हो।'


४. मुनि बकदाल्भ्य द्वारा विजया एकादशी व्रत का उपदेश

भगवान श्रीरामचन्द्र जी की बात सुनकर और उनकी विनम्रता देखकर महामुनि बकदाल्भ्य ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा— 'हे श्रीराम! आप यद्यपि स्वयं सर्वशक्तिमान हैं, तथापि लोक-कल्याण की भावना से आपने जो प्रश्न किया है, उसका मैं उत्तर देता हूँ। मैं आपको सभी व्रतों और उपवासों में सबसे श्रेष्ठ, सबसे उत्तम और परम पावन व्रत का विधान बताता हूँ।

हे राम! आप अपनी सम्पूर्ण सेना और सेनापतियों सहित फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली 'विजया एकादशी' का विधिपूर्वक व्रत करें। इस विजया एकादशी के व्रत के प्रभाव से आप निश्चित ही इस अगाध समुद्र को पार कर लेंगे, लंकाधिपति रावण को पराजित कर देंगे और तीनों लोकों में आपकी कीर्ति सदा-सदा के लिए स्थापित हो जाएगी।'

भगवान श्रीराम ने पूछा— 'हे मुनिश्रेष्ठ! इस विजया एकादशी व्रत की सम्पूर्ण विधि क्या है? कृपा कर मुझे इसका विस्तृत विधान समझाएं।'

तब महामुनि बकदाल्भ्य ने विजया एकादशी की अत्यंत कठोर और पवित्र पूजा-विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। मुनि ने बताया कि इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है और द्वादशी को इसका पारण होता है ।

व्रत-विधान एवं आवश्यक सामग्री

मुनि बकदाल्भ्य ने श्रीराम को व्रत में प्रयुक्त होने वाली सामग्री और सप्तधान्य का विवरण इस प्रकार दिया:

क्रम संख्या व्रत सामग्री का प्रकार सामग्री का विवरण एवं शास्त्रीय निर्देश
पवित्र कलश सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, रजत (चाँदी), ताम्र (तांबा) अथवा शुद्ध मिट्टी का बना हुआ घड़ा।
सप्तधान्य (सात अनाज) जौ, गेहूँ, चावल, मक्का, चना, कुकनी और दाल (मटर)। इन सात अनाजों का ढेर वेदी पर लगाना अनिवार्य है।
पञ्चपल्लव कलश को सजाने के लिए आम के पत्ते।
कलश का ढक्कन (पात्र) कलश के ऊपर रखने वाले पात्र में जौ, अनार और नारियल रखा जाना चाहिए।
स्वर्ण मूर्ति भगवान श्री नारायण (विष्णु) की स्वर्ण निर्मित मूर्ति, जिसे कलश के ढक्कन पर स्थापित करना है।
पूजन सामग्री शुद्ध चंदन, सुगन्धित पुष्पों की मालाएँ, उत्तम कोटि की धूप, प्रज्वलित दीप (घी का दीपक), और अनेक प्रकार के नैवेद्य।

दशमी, एकादशी एवं द्वादशी के कठोर नियम

महामुनि बकदाल्भ्य ने व्रत की पूर्ण विधि समझाते हुए कहा—

दशमी के दिन का नियम: 'हे राम! दशमी के दिन एक पवित्र स्थान पर वेदी (altar) का निर्माण करें। उस वेदी पर उपर्युक्त सात प्रकार के अनाजों (सप्तधान्य) का एक ढेर लगाएँ। उस सप्तधान्य के ढेर के ऊपर अपनी सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, चाँदी, तांबे या मिट्टी का कलश स्थापित करें। उस कलश को शुद्ध जल से भर लें और उसे पञ्चपल्लव (आम के पत्तों) से सजाएँ।'

एकादशी के दिन का नियम: 'जब एकादशी का शुभ दिन उदय हो, तब प्रातः काल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। उस स्थापित कलश को सुगंधित पुष्पों की मालाओं और शुद्ध चंदन के लेप से अत्यंत प्रेमपूर्वक सजाएँ। उस कलश के ऊपर एक पात्र (ढक्कन) रखें और उस पात्र में जौ, अनार और नारियल रखें। तत्पश्चात, उस कलश के ऊपर भगवान श्री नारायण की एक स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें। इस 'कलश रूपी देवता' की पूरे विधि-विधान और अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजा करें। भगवान श्री नारायण की उस मूर्ति को धूप, दीप, चंदन, सुगन्धित पुष्प और अनेक प्रकार के सुस्वादु नैवेद्य अर्पित करें। सम्पूर्ण दिन निराहार रहकर भगवान के समक्ष व्यतीत करें।'

रात्रिकालीन जागरण: 'हे राम! एकादशी की सम्पूर्ण रात्रि उसी कलश के समक्ष बैठकर व्यतीत करनी चाहिए। रात भर भगवान के नाम का स्मरण, संकीर्तन और गुणगान करते हुए 'रात्रि-जागरण' करना इस व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। कलश के समक्ष अखंड घी का दीपक जलता रहना चाहिए।'

द्वादशी के दिन का नियम (पारण एवं दान): 'जब अगले दिन द्वादशी तिथि का सूर्योदय हो जाए, तब प्रातःकाल पुनः स्नानादि से निवृत्त हों। उस पवित्र कलश को उठाकर किसी नदी, झरने या पवित्र जलाशय के तट पर ले जाएँ। वहाँ जाकर उस कलश की एक बार पुनः विधिपूर्वक पूजा करें। पूजा के पश्चात, उस कलश को उसके ऊपर रखी भगवान नारायण की स्वर्ण मूर्ति, सप्तधान्य और सम्पूर्ण चढ़ाई गई सामग्री सहित किसी वेद-शास्त्रों के ज्ञाता, शुद्ध हृदय वाले और सदाचारी ब्राह्मण को दान कर दें।'

महामुनि ने अंत में कहा— 'हे रघुनन्दन! यह विजया एकादशी व्रत का अक्षुण्ण और अचूक विधान है। यदि आप अपने भ्राता लक्ष्मण और सुग्रीव, हनुमान, नल, नील आदि सभी सेनापतियों सहित इस विजया एकादशी के व्रत का इसी विधि से पालन करेंगे, तो आपकी विजय सर्वथा निश्चित है। इस व्रत के प्रभाव से यह अगाध समुद्र भी आपको लंका जाने का मार्ग प्रदान कर देगा।'


५. विधिवत् व्रत-पालन, मार्ग की सिद्धि एवं लंका-विजय

मुनि बकदाल्भ्य के इन अमृतमय वचनों और उपदेशों को सुनकर भगवान श्रीरामचन्द्र जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने मुनि के श्रीचरणों में पुनः साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा प्राप्त कर अपनी सेना के पास लौट आए。

श्रीराम एवं वानर सेना द्वारा व्रत का पालन

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी के पावन आगमन पर, भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने महामुनि बकदाल्भ्य द्वारा बताए गए सम्पूर्ण विधान का अक्षरशः पालन किया। भगवान श्रीराम, सुमित्रानंदन लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, श्री हनुमान, नल, नील और सम्पूर्ण वानर-भालू सेनापतियों ने अत्यंत निष्ठा, श्रद्धा और अगाध भक्ति-भाव से विजया एकादशी का निराहार व्रत किया ।

उन्होंने दशमी को सप्तधान्य की वेदी पर कलश की स्थापना की, एकादशी को भगवान श्री नारायण की स्वर्ण मूर्ति का षोडशोपचार पूजन किया, संपूर्ण रात्रि कलश के समक्ष बैठकर भगवन्नाम संकीर्तन करते हुए जागरण किया और द्वादशी के दिन योग्य वेदपाठी ब्राह्मण को पूर्ण सामग्री सहित कलश का दान देकर पारण किया。

समुद्र पर सेतु-निर्माण एवं रावण-वध

इस महाव्रत के अद्भुत प्रभाव और भगवान विष्णु की असीम कृपा से एक महान चमत्कार हुआ। विजया एकादशी व्रत के अमोघ पुण्य फल से उस अगाध, अथाह और भयंकर जीवों वाले समुद्र ने भगवान श्रीरामचन्द्र जी को मार्ग प्रदान किया। वानर सेना के सेनापति नल और नील द्वारा उस विशाल सागर के ऊपर एक अद्भुत सेतु (राम-सेतु) का निर्माण किया गया। भगवान की कृपा से वे भारी-भारी शिलाएँ और पत्थर पानी पर तैरने लगे और एक सुदृढ़ मार्ग का निर्माण हो गया ।

भगवान श्रीराम अपनी विशाल सेना के साथ उस सेतु के माध्यम से बिना किसी विघ्न के समुद्र के पार उतर गए और लंका नगरी में प्रवेश किया। तदनंतर, श्रीरामचन्द्र जी और महापराक्रमी राक्षसराज रावण के मध्य एक अत्यंत भयंकर और प्रलयंकारी युद्ध हुआ। विजया एकादशी व्रत के अमोघ प्रभाव और भगवान नारायण की कृपा से इस भीषण युद्ध में भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने अपने भयंकर शत्रु रावण का वध किया और सम्पूर्ण लंका पर विजय प्राप्त की। इस प्रकार श्रीरामचन्द्र जी ने माता सीता को मुक्त कराया, अधर्म का नाश किया और सत्य व धर्म की पुनर्स्थापना की ।


६. पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)

ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद से कहा— "हे पुत्र नारद! तुमने देखा कि विजया एकादशी का व्रत कितना महान और अमोघ है। जिस व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने अगाध समुद्र को लांघकर रावण जैसे दुर्धर्ष राक्षस पर विजय प्राप्त की, उस व्रत का माहात्म्य शब्दों में कैसे पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है!

अतः हे नारद! जो कोई भी मनुष्य विधिपूर्वक, पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस विजया एकादशी का व्रत करेगा, उसे इस भौतिक लोक में, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और संघर्ष में अवश्य ही विजय प्राप्त होगी। उसके सभी संकट दूर होंगे और उसका परलोक भी अक्षय और मंगलमय बना रहेगा।"

यह पूरी कथा सुनाने के पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए कहा— "हे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! परमपिता ब्रह्मा और देवर्षि नारद के इस परम पावन संवाद से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि विजया एकादशी का व्रत परम कल्याणकारी और विजय दिलाने वाला है। इसी कारण से हे राजन, प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन की बाधाओं, भयंकर शत्रुओं और संकटों पर विजय प्राप्त करने के लिए इस व्रत का शास्त्रोक्त विधिपूर्वक पालन करना चाहिए。

हे धर्मराज! जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ इस विजया एकादशी के व्रत का पालन करता है, अथवा जो व्यक्ति केवल इस परम पावन विजया एकादशी की कथा का पठन करता है या श्रवण मात्र भी करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के सभी संचित पाप भस्म हो जाते हैं। इस पावन कथा के श्रवण और पठन मात्र से ही मनुष्य को राजसूय और 'वाजपेय यज्ञ' करने के समान महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है और अंत में वह इस संसार सागर को पार कर भगवान के परम धाम को प्राप्त करता है।"

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

इति स्कन्द एवं पद्म पुराण अंतर्गत फाल्गुन कृष्ण पक्ष विजया एकादशी व्रत कथा सम्पूर्णा।

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