श्री यम द्वितीया (भैया दूज) की संपूर्ण, पारंपरिक एवं अक्षुण्ण व्रत कथा
१. पारंपरिक प्रारंभ: नैमिषारण्य में ऋषियों का संवाद एवं सूर्यनारायण का प्रसंग
नैमिषारण्य के पवित्र और पावन तीर्थ में, जहाँ अठासी हजार ऋषि-मुनि सदैव तपस्या और ज्ञान-चर्चा में लीन रहते हैं, एक बार शौनकादि ऋषियों ने परम ज्ञानी और पौराणिक कथाओं के मर्मज्ञ श्री सूत जी महाराज से करबद्ध होकर निवेदन किया। ऋषियों ने पूछा, "हे महाभाग सूत जी! कृपा करके हमें कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के महात्म्य और उस दिन सुनी जाने वाली उस परम पवित्र और कल्याणकारी व्रत कथा का श्रवण कराइये, जिसके प्रताप से प्राणियों को यमराज के भय से मुक्ति प्राप्त होती है और भाई-बहन का संबंध अजर-अमर होता है।"
ऋषियों की इस धर्मयुक्त जिज्ञासा को सुनकर श्री सूत जी महाराज ने भगवान श्रीहरि विष्णु, भगवान सूर्यनारायण, धर्मराज यम और माता यमुना का स्मरण करते हुए कहा, "हे मुनिश्रेष्ठों! आप सभी ने संपूर्ण विश्व के कल्याण की कामना से अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। मैं आपको स्कन्द पुराण और अन्य पवित्र धर्मग्रंथों में वर्णित कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जिसे यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है, की वह संपूर्ण, आदि और अक्षुण्ण कथा सुनाता हूँ, जो तीनों लोकों में विख्यात है। आप सभी पूर्ण श्रद्धा और एकाग्र चित्त होकर इस पावन कथा का श्रवण करें।
सृष्टि के पालनहार और संपूर्ण जगत को प्रकाश और जीवन प्रदान करने वाले भगवान सूर्यनारायण, जिन्हें विवस्वान भी कहा जाता है, अपने दिव्य तेज के साथ सूर्यलोक में निवास करते हैं। उन भगवान सूर्य की पत्नी का नाम संज्ञा था, जो देवशिल्पी विश्वकर्मा की अत्यंत रूपवती और गुणवान पुत्री थीं। भगवान सूर्य और देवी संज्ञा के गर्भ से दो अत्यंत तेजस्वी और दिव्य संतानों का जन्म हुआ। इनमें से पुत्र का नाम 'यम' रखा गया और पुत्री का नाम 'यमी' (यमुना) रखा गया। चूँकि यम और यमुना दोनों का जन्म एक ही साथ हुआ था, इसलिए वे जुड़वाँ भाई-बहन थे और जन्म से ही उन दोनों के मध्य असीम, निश्छल और अत्यंत प्रगाढ़ प्रेम था।
कालान्तर में, देवी संज्ञा भगवान सूर्य के अत्यंत प्रखर और असहनीय तेज को सहन न कर पाने के कारण, अपनी ही प्रतिछाया, जिसका नाम 'छाया' (सुवर्णा) था, को सूर्यदेव की सेवा में छोड़कर अपने पिता के घर चली गईं। माता संज्ञा के जाने के पश्चात और छाया के प्राकट्य के उपरांत भी यम और यमुना के मध्य का भ्रातृ-भगिनी (भाई-बहन) का प्रेम अक्षुण्ण और पवित्र बना रहा।
२. मुख्य कथा: यमराज का दायित्व और यमुना का निमंत्रण
जैसे-जैसे समय व्यतीत हुआ, भगवान सूर्य के पुत्र यमराज अपने कठोर सत्य, न्यायप्रियता और धर्म के प्रति निष्ठा के कारण तीनों लोकों में 'धर्मराज' के नाम से विख्यात हुए। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी और भगवान सूर्यनारायण ने यमराज की धर्म-परायणता को देखकर उन्हें दक्षिण दिशा का दिक्पाल नियुक्त किया और संसार के सभी प्राणियों के प्राण हरण करने तथा उनके पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखकर उन्हें उचित न्याय और दंड देने का अत्यंत कठोर उत्तरदायित्व सौंप दिया। इस प्रकार यमराज मृत्युलोक और यमलोक के अधिपति बन गए। यमराज का स्वरूप अत्यंत भयंकर था, उनके हाथ में कालपाश और दंड था, और उनके भय से देवता, दानव और मनुष्य सभी कांपते थे।
दूसरी ओर, सूर्य-पुत्री यमी, जो स्वभाव से अत्यंत करुण, दयालु और पवित्र थीं, उन्होंने संसार के प्राणियों के पापों को धोने और उन्हें शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से पृथ्वी लोक पर एक पवित्र नदी के रूप में अवतार लिया। वे ही पृथ्वी पर पतितपावनी 'यमुना' के नाम से प्रवाहित होने लगीं।
यमराज और यमुना अपने-अपने लौकिक और अलौकिक दायित्वों के निर्वहन में अत्यंत व्यस्त हो गए। यमराज यमलोक (संयमनी पुरी) में बैठकर नित्य-प्रतिदिन प्राणियों के कर्मों का न्याय करते और पापी जीवों को नरक की यातनाएं देते थे, जबकि माता यमुना पृथ्वी पर अपने जल से जीवों का कल्याण कर रही थीं। अपने-अपने लोकों में और अपने-अपने कार्यों में निवास करने के कारण इन दोनों भाई-बहन का मिलन अत्यंत दुर्लभ हो गया था।
तथापि, देवी यमुना के हृदय में अपने बड़े भाई यमराज के लिए अगाध और निश्छल प्रेम सदैव उफनता रहता था। वे नित्य अपने भाई का स्मरण करती थीं। माता यमुना बार-बार अपने दूतों के माध्यम से और स्वयं भी मन ही मन अपने भाई यमराज से यह सविनय और अत्यंत आत्मीय आग्रह करती रहती थीं कि वे एक बार अपने इष्ट-मित्रों, गणों और सेवकों के साथ उनके घर (यमुना के तट पर) पधारें, उनका आतिथ्य स्वीकार करें और उनके हाथों से बना हुआ भोजन ग्रहण करें।
परंतु धर्मराज यमराज अत्यंत व्यस्त रहते थे। दिन-रात प्राणियों के प्राणों का हरण करने और उन्हें न्याय देने के कार्य से उन्हें क्षण भर की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। अपनी इस घोर कर्म-व्यस्तता के कारण यमराज अपनी बहन यमुना के इस स्नेहपूर्ण निमंत्रण को बार-बार टालते रहते थे और सोच लेते थे कि 'मैं फिर किसी दिन चला जाऊंगा'。
कार्तिक शुक्ल द्वितीया का पावन दिन और यमराज की मनोदशा
इसी प्रकार प्रतीक्षा करते-करते अनेक वर्ष व्यतीत हो गए। अंततः एक बार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि का अत्यंत पावन और शुभ दिन आया। इस दिन माता यमुना ने अपने हृदय के संपूर्ण प्रेम और वात्सल्य को एकत्रित कर अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन के लिए आने हेतु अत्यंत दृढ़तापूर्वक आमंत्रित किया। यमुना जी ने इस बार अपने निमंत्रण में इतनी आत्मीयता और आग्रह भर दिया कि उन्होंने अपने भाई को आने के लिए वचनबद्ध ही कर दिया।
अपनी बहन के इस अटूट और निश्छल प्रेम तथा उनकी कठोर वचनबद्धता को देखकर धर्मराज यमराज अत्यंत सोच-विचार में पड़ गए। यमराज ने अपने मन में विचार किया, "मैं तो संपूर्ण जगत के प्राणियों के प्राणों का हरण करने वाला भयंकर मृत्यु का देवता हूँ। संसार का कोई भी प्राणी मुझे स्वेच्छा से अपने घर नहीं बुलाना चाहता। मेरे नाम से ही त्रिलोकी में भय व्याप्त हो जाता है और जीव मुझसे दूर भागते हैं। ऐसे में मेरी परम प्रिय बहन यमुना, जिस अत्यंत पवित्र सद्भावना और निश्छल प्रेम के साथ मुझे अपने घर आमंत्रित कर रही है, उसके उस निमंत्रण का मान रखना, उसके प्रेम का सम्मान करना और उसके घर जाना मेरा परम धर्म और कर्तव्य है। बहन के इस विशुद्ध प्रेम को अब और नहीं टाला जा सकता। बहन के प्रेम से बड़ा इस संसार में और कोई विधान नहीं है।"
यह दृढ़ निश्चय कर यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर जाने के लिए प्रस्थान करने की तैयारी की। अपनी परम प्रिय बहन से इतने दीर्घकाल के पश्चात मिलने जाने की अपार प्रसन्नता और इस शुभ अवसर के उल्लास में यमराज का हृदय करुणा और दया से भर गया। वे भूल गए कि वे एक कठोर दंडनायक हैं। बहन के घर जाने के इस महान आनंद के क्षण में, यमराज ने यमलोक (नरक) में निवास करने वाले और भयानक यातनाएं भोगने वाले असंख्य पापी जीवों को उनके दंड से मुक्त कर दिया और उन्हें क्षमादान दे दिया। यमराज की इस कृपा से यमलोक में हाहाकार की जगह जय-जयकार होने लगी और जीवों को उनके कष्टों से मुक्ति मिल गई।
नरक के जीवों को मुक्त करने के पश्चात, धर्मराज यमराज ने अपने भयंकर स्वरूप को त्याग कर एक अत्यंत सौम्य, दिव्य और सुंदर रूप धारण किया और अपने गणों के साथ पृथ्वी पर देवी यमुना के घर की ओर प्रस्थान किया।
यमुना द्वारा आदरपूर्वक स्वागत, तिलक और भोजन
जब देवी यमुना ने दूर से ही अपने परम प्रिय भाई यमराज को अपने घर की ओर आते हुए देखा, तो उनके हृदय की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई थी। यमुना जी का रोम-रोम हर्षित हो उठा और उनके नेत्रों से प्रेम के अश्रु छलक पड़े।
जैसे ही यमराज यमुना के घर (तट) पर पहुँचे, देवी यमुना ने आगे बढ़कर अत्यंत आदर, सत्कार और श्रद्धा के साथ अपने भाई का स्वागत किया। यमुना जी ने सबसे पहले एक सुंदर और दिव्य आसन बिछाकर यमराज को उस पर विराजमान किया। तत्पश्चात, उन्होंने स्वर्ण के कलश में पवित्र जल लेकर अपने हाथों से अपने भाई यमराज के चरणों को धोया (पाद-प्रक्षालन किया) और उन्हें अर्घ्य प्रदान किया।
स्नान और विधिवत पूजन संपन्न होने के पश्चात, माता यमुना ने अपने भाई के उज्ज्वल भविष्य, अजर-अमरता और कल्याण की कामना करते हुए अत्यंत प्रेमपूर्वक उनके चौड़े मस्तक पर मंगल कुमकुम और चंदन का तिलक (टीका) लगाया।
तिलक करने के उपरांत, देवी यमुना ने अपने हाथों से अत्यंत प्रेम और पवित्रता के साथ बनाए गए छप्पन भोग और विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन— जिनमें मुख्य रूप से दाल, भात, पूरी, कढ़ी, हलवा, लड्डू और अन्य मिष्ठान्न सम्मिलित थे— स्वर्ण के थाल में परोसकर अपने भाई के समक्ष प्रस्तुत किए। यमुना जी ने अत्यंत आग्रह और मनुहार करते हुए अपने हाथों से यमराज को वह अमृततुल्य भोजन कराया।
अपनी बहन के हाथों से बने इस अत्यंत स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करके और उनके इस अभूतपूर्व, स्नेहपूर्ण एवं निश्छल आतिथ्य सत्कार को देखकर धर्मराज यमराज का हृदय गदगद हो गया। उनकी सारी थकान और मृत्युलोक का सारा तनाव समाप्त हो गया। वे अपनी बहन के इस वात्सल्य और प्रेम से पूर्णतः तृप्त और अत्यंत प्रसन्न हुए।
यमराज का प्रसन्न होना और वरदान देना
भोजन और सत्कार के उपरांत, जब यमराज अपनी बहन से विदा लेने के लिए प्रस्तुत हुए, तो उनका हृदय कृतज्ञता और प्रेम से ओत-प्रोत था। उन्होंने अत्यंत स्नेहपूर्वक अपनी बहन यमुना को संबोधित करते हुए कहा, "हे भद्रे! हे मेरी परम प्रिय भगिनी! मैं तुम्हारे इस अद्भुत और अद्वितीय आतिथ्य सत्कार से अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हूँ। तुम्हारी जिस कामना ने मुझे आज यहाँ खींच लिया है, उसने मुझे अपार आनंद दिया है। तुम अपने मन की इच्छानुसार मुझसे कोई भी दुर्लभ से दुर्लभ वर मांग लो, मैं तुम्हें वह अवश्य प्रदान करूँगा। आज मेरे लिए तुम्हें देने हेतु कुछ भी अदेय नहीं है।"
यमराज के ये अमृतमयी वचन सुनकर देवी यमुना ने हाथ जोड़कर अपने भाई से कहा, "हे भ्राता! हे धर्मराज! यदि आप वास्तव में मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मैं आपसे केवल यही मांगती हूँ कि आप प्रतिवर्ष इसी तिथि को, अर्थात् कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन, मेरे घर इसी प्रकार मुझसे मिलने आया करें और मेरे हाथों से भोजन ग्रहण किया करें। यह मेरा पहला वरदान है।"
यमुना जी ने आगे कहा, "हे भ्राता! मेरा दूसरा वर यह है कि संसार में जिस प्रकार आज मैंने पूरे विधि-विधान और आदर-सत्कार के साथ आपका स्वागत किया है और आपके मस्तक पर तिलक लगाकर आपकी दीर्घायु की कामना की है, उसी प्रकार आज के दिन (कार्तिक शुक्ल द्वितीया को) पृथ्वी लोक पर जो भी बहन अपने भाई का पूर्ण आदर-सत्कार करके उसे तिलक लगाए और अपने हाथों से उसे भोजन कराए, उस बहन के भाई को कभी आपका (यमराज का) भय न रहे। अर्थात्, उस भाई की कभी अकाल मृत्यु न हो और उसे यमलोक की यातनाएं न सहनी पड़ें। हे भाई! संसार की कोई भी बहन अपने भाई के प्रेम से वंचित न रहे और भाई-बहन का यह पावन संबंध सदैव सुरक्षित रहे। इसके अतिरिक्त, जो भी प्राणी आज के दिन मेरे जल (यमुना नदी) में स्नान करे, उसे यमलोक न जाना पड़े।"
अपनी परम दयालु बहन यमुना के मुख से संसार की सभी बहनों और भाइयों के परम कल्याण का यह निःस्वार्थ और पवित्र वरदान सुनकर यमराज अत्यंत विस्मित और परम प्रसन्न हुए। उन्होंने बिना किसी विलंब के अपनी बहन की मांग को स्वीकार करते हुए "तथास्तु" (ऐसा ही हो) कहा।
यमराज ने कहा, "हे यमुना! तुमने जो कुछ भी मांगा है, वह सब अक्षरशः सत्य होगा। आज से यह कार्तिक शुक्ल द्वितीया का दिन 'यम द्वितीया' या 'भैया दूज' के नाम से तीनों लोकों में विख्यात होगा। जो बहन आज के दिन तुम्हारा स्मरण कर अपने भाई को तिलक करेगी, उसके भाई की रक्षा स्वयं मैं करूँगा।"
यह वरदान देने के पश्चात, धर्मराज यमराज ने अपनी बहन यमुना को अत्यंत दुर्लभ, अमूल्य वस्त्राभूषण, रत्न और अनेक दिव्य उपहार भेंट स्वरूप प्रदान किए। माता यमुना ने उन उपहारों को अत्यंत हर्ष और सम्मान के साथ स्वीकार किया। तदनंतर, अपनी बहन से स्नेहपूर्ण विदा लेकर और भाई-बहन के इस शाश्वत प्रेम को अमरत्व प्रदान कर यमराज ने पुनः अपने लोक (यमलोक) के लिए प्रस्थान किया।
उसी पावन दिन से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भैया दूज (यम द्वितीया) के इस महान पर्व को मनाने की परंपरा का शुभारंभ हुआ, जो आज तक अनवरत रूप से चला आ रहा है।
भगवान श्रीकृष्ण और सुभद्रा का प्रसंग (अन्य पारंपरिक प्रसंग)
सूत जी आगे कहते हैं— "हे मुनियों! इसी कार्तिक शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर भाई-बहन के प्रेम की एक और अत्यंत पावन कथा भी शास्त्रों में वर्णित है, जिसका स्मरण इस दिन अनिवार्य रूप से किया जाता है।
द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने भूमि के पुत्र, अत्यंत दुराचारी और क्रूर राक्षस नरकासुर (भौमासुर) का वध किया और पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया, तो वे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन ही अपनी नगरी द्वारका वापस लौटे थे।
जब भगवान श्रीकृष्ण नरकासुर का वध करके विजयश्री प्राप्त कर द्वारका पहुँचे, तो उनकी परम प्रिय बहन सुभद्रा ने अपने भाई के सुरक्षित और विजयी होकर लौटने के अपार हर्ष में उनका अत्यंत भव्य और आत्मीय स्वागत किया था। बहन सुभद्रा ने भगवान श्रीकृष्ण को एक सुंदर आसन पर बैठाकर फल, फूल, मिष्ठान्न और मंगल दीपों से उनकी आरती उतारी।
तत्पश्चात, बहन सुभद्रा ने अत्यंत श्रद्धा और वात्सल्य के साथ भगवान श्रीकृष्ण के चौड़े मस्तक पर मंगल तिलक लगाया और अपने भाई की दीर्घायु, रक्षा और परम कल्याण की कामना की। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बहन के इस सत्कार को अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया।
अतः हे शौनकादि ऋषियों! भगवान श्रीकृष्ण और सुभद्रा का यह मिलन भी इसी यम द्वितीया (भैया दूज) के दिन हुआ था। इसलिए यमराज-यमुना के साथ-साथ श्रीकृष्ण और सुभद्रा के इस पावन प्रसंग का स्मरण भी इस कथा को पूर्णता प्रदान करता है और भाई-बहन के प्रेम तथा सुरक्षा के इस प्रतीक पर्व की महत्ता को अनंत गुना बढ़ा देता है।
३. पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)
श्री सूत जी महाराज शौनकादि ऋषियों से इस व्रत कथा का फल बताते हुए कहते हैं—
"हे ऋषियों! जो भी पुरुष अथवा स्त्री पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ कार्तिक शुक्ल द्वितीया के इस पावन दिन यमराज और माता यमुना की इस अत्यंत पवित्र 'भैया दूज' की व्रत कथा का श्रवण करता है, अथवा इसका पठन करता है, उसके जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे कभी भी यमराज का भय नहीं सताता।
ऐसी मान्यता और शास्त्रों का अटल विधान है कि जो भी भाई इस यम द्वितीया के दिन अपनी बहन के घर जाता है, उसके हाथों से आदरपूर्वक तिलक (टीका) करवाता है और अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार कर उसके घर में भोजन ग्रहण करता है, उसकी आयु में निरंतर वृद्धि होती है, उसे कभी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ता और उसके जीवन में सदैव सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
जो बहन इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार अपने भाई का सत्कार करती है और यमराज तथा यमुना जी का स्मरण कर यह कथा सुनती है, उसका अखंड सौभाग्य बना रहता है और उसके परिवार में भाई-बहन का प्रेम सदैव अक्षुण्ण रहता है। जो भी प्राणी इस दिन पवित्र यमुना नदी में स्नान करते हैं, वे यमराज के प्रकोप से मुक्त होकर अंतकाल में परम गति को प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार जो श्रद्धा से भैया दूज का व्रत और कथा सुनता है, उसके सभी संकट दूर हो जाते हैं, उसके कार्य सफल सिद्ध होते हैं और अंत में वह भगवान की कृपा का परम पात्र बनकर मोक्ष को प्राप्त करता है।
॥ श्री यमराज और माता यमुना की जय ॥
॥ श्री कृष्ण और माता सुभद्रा की जय ॥
॥ श्री यम द्वितीया व्रत कथा संपूर्ण ॥