विस्तृत उत्तर
रत्नपुर नगर के राजा पुण्डरीक की सभा में 'ललित' नामक गंधर्व गा रहा था। गाते समय उसे अपनी पत्नी 'ललिता' की याद आ गई, जिससे उसका सुर और ताल बिगड़ गया। कर्कोटक नाग ने राजा को यह बात बता दी। क्रोधित होकर राजा ने ललित को 'नरभक्षी राक्षस' बनने का शाप दे दिया। पति को राक्षस रूप में देख ललिता विंध्याचल पर्वत पर 'शृंगी ऋषि' के पास गई। ऋषि ने उन्हें चैत्र शुक्ल की 'कामदा एकादशी' का व्रत करने को कहा। ललिता के व्रत के पुण्य से ललित का राक्षस रूप समाप्त हो गया और वह वापस गंधर्व बन गया।