करवा चौथ व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
1. कथा का प्रारंभिक संदर्भ एवं धर्मशास्त्रीय पृष्ठभूमि
हिंदू धर्म में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'करक चतुर्थी' अथवा 'करवा चौथ' के नाम से जाना जाता है। यह पावन पर्व भारतीय लोक-परंपरा, धर्मशास्त्रों और पुराणों में सुहागिन स्त्रियों के अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन की मंगल-कामना के लिए किए जाने वाले व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है 1। करवा चौथ का यह परम पुनीत व्रत पूर्णतः निर्जला (जल ग्रहण किए बिना) और निराहार रहकर सूर्योदय से पूर्व प्रारंभ होकर रात्रि में चंद्र-दर्शन के पश्चात पूर्ण होता है । इस व्रत के अनुष्ठान में व्रत-कथा के श्रवण का सर्वाधिक महत्व है। मान्यता है कि बिना व्रत-कथा सुने और फल-श्रुति का वाचन किए यह व्रत न तो पूर्ण होता है और न ही इसका वांक्षित फल प्राप्त होता है ।
इस व्रत की महिमा और कथाओं का मूल संदर्भ 'स्कंद पुराण', 'वामन पुराण' और 'महाभारत' जैसे प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होता है । कालान्तर में, ये कथाएं लोक-परंपराओं और वाचिक परंपरा (मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होने वाली परंपरा) के माध्यम से अत्यंत विस्तार और भावपूर्ण रूप में विकसित हुईं। आज करवा चौथ के दिन मुख्य रूप से जो कथाएं पढ़ी और सुनी जाती हैं, वे विशुद्ध रूप से लोक-प्रचलित प्रामाणिक पाठों और पारंपरिक व्रत-ग्रंथों पर आधारित हैं ।
कथा-श्रवण का पारंपरिक संदर्भ एवं परिवेश
कथा-श्रवण का विधान अत्यंत पवित्र और भक्तिपूर्ण होता है। दिन भर के कठोर निर्जला उपवास के पश्चात, संध्या के समय (गोधूलि बेला में), परिवार, कुल अथवा पड़ोस की सभी सौभाग्यवती स्त्रियां एक स्वच्छ और पवित्र स्थान पर एकत्रित होती हैं । कथा-स्थल पर माता पार्वती, भगवान शिव, श्री गणेश, कार्तिकेय और करवा माता का चित्र अथवा विग्रह स्थापित किया जाता है। साथ ही, पूजा के लिए मिट्टी का 'करवा' (जल से भरा हुआ मिट्टी का पात्र, जो पंचतत्वों का प्रतीक है) रखा जाता है ।
कथा श्रवण से पूर्व सभी व्रती स्त्रियां अपने दाहिने हाथ में गेहूं, बाजरा या अक्षत (चावल) के कुछ दाने (सामान्यतः १३ या ७ दाने) मुट्ठी में बंद करके रखती हैं । कथा के मध्य में पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा रखी जाती है तथा श्रोता स्त्रियां कथा के प्रत्येक प्रसंग पर अपनी सहमति और ध्यान प्रदर्शित करने के लिए 'हुंकारा' (हां में स्वर मिलाना) भरती हैं。
पारंपरिक आरंभिक वाक्य (सूत-शौनक संवाद)
सनातन धर्म की अधिकांश पौराणिक कथाओं की भांति, इस कथा का शास्त्रीय आरंभ भी नैमिषारण्य तीर्थ में सूत जी और शौनक आदि ऋषियों के पावन संवाद से होता है। पारंपरिक कथा-वाचक कथा का आरंभ इस प्रकार करते हैं:
"सूत जी महाराज शौनक आदि ऋषियों से बोले— हे ऋषियों! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करक चतुर्थी या करवा चौथ कहा जाता है। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए इस संसार में इससे बढ़कर कोई अन्य सौभाग्यवर्धक और संकट-विनाशक व्रत नहीं है। एक बार स्वयं जगत जननी माता पार्वती ने कैलास पर्वत पर भगवान देवाधिदेव महादेव से इस व्रत के माहात्म्य और इसके उत्पत्ति-प्रसंग के विषय में पूछा था, तब भगवान शंकर ने उन्हें इस करक चतुर्थी व्रत की अपार महिमा और इससे जुड़ी हुई उन परम पावन कथाओं का श्रवण कराया था, जिनके प्रताप से असंभव भी संभव हो जाता है और मृत्यु के मुख से भी पति के प्राण लौट आते हैं।"
करवा चौथ व्रत की प्रमुख कथाओं का विवरण
करवा चौथ के पावन अवसर पर मुख्य रूप से चार-पांच कथाओं का वाचन किया जाता है। प्रत्येक कथा का अपना विशिष्ट महत्व है और किसी भी एक कथा को छोड़ना व्रत की पूर्णता में बाधक माना जाता है। इन कथाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:
| कथा का शीर्षक | मुख्य पात्र | शास्त्रीय/लोक मूल | कथा का केंद्रीय विषय |
|---|---|---|---|
| साहूकार की पुत्री की कथा | वीरवती, सात भाई, छह भाभियां | लोक-परंपरा एवं व्रत-ग्रंथ | भाइयों का छल, व्रत भंग होना, पति की मृत्यु, 'यम सूई' और तपस्या द्वारा पति का पुनर्जीवन। |
| रानी वीरवती और दासी की कथा | रानी वीरवती, राजा, दासी | लोक-परंपरा (गीत आधारित) | अचेत राजा, शरीर में चुभी 365 सूइयां, दासी का छल, "रोली की गोली" गीत द्वारा सत्य का ज्ञान। |
| करवा और मगरमच्छ की कथा | करवा, पति, यमराज, मगरमच्छ | पौराणिक/लोक-सम्मिश्रण | सतीत्व की शक्ति, कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांधना, यमराज से संवाद और वरदान प्राप्ति। |
| श्री गणेश और अंधी बुढ़िया की कथा | अंधी बुढ़िया, पुत्र, पुत्रवधू, गणेश जी | पारंपरिक लोक-कथा | निश्छल भक्ति, गणेश जी का साक्षात् दर्शन, एक ही वरदान में नौ करोड़ की माया, नेत्र और पोते की प्राप्ति। |
| महाभारत कालीन कथा | द्रौपदी, भगवान श्रीकृष्ण, पांडव | महाभारत/पुराण संदर्भ | पांडवों पर संकट, श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी को करवा चौथ व्रत का उपदेश, संकट निवारण। |
2. मुख्य कथा: प्रथम संस्करण — साहूकार की पुत्री वीरवती और 'सात भाइयों' वाली कथा
यह करवा चौथ की सर्वाधिक लोक-प्रचलित, विस्तृत और प्रामाणिक कथा है। प्रायः प्रत्येक घर में इसी कथा को मुख्य रूप से पढ़ा और सुना जाता है। इस कथा में एक पतिव्रता स्त्री की तपस्या, अज्ञानवश हुई त्रुटि के परिणाम और उसकी अटल निष्ठा का अत्यंत मार्मिक वर्णन है ।
पात्रों का परिचय एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
अति प्राचीन काल की बात है, किसी समृद्ध नगर में एक अत्यंत धनवान और प्रतिष्ठित साहूकार निवास करता था। उस साहूकार के परिवार में उसके सात सुयोग्य पुत्र और केवल एक ही पुत्री थी। उस कन्या का नाम वीरवती था। सात भाइयों की इकलौती बहन होने के कारण वीरवती संपूर्ण घर की आंखों का तारा थी। माता-पिता से भी अधिक उसके सातों भाई अपनी बहन से अथाह प्रेम करते थे। उनका भ्रातृ-स्नेह इतना प्रगाढ़ था कि वे पहले अपनी लाडली बहन को भोजन कराते थे और उसके पश्चात ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे। लाड़-प्यार और अत्यधिक दुलार में पली वीरवती का विवाह नगर के ही एक अत्यंत सुयोग्य, संपन्न और कुलीन परिवार में बड़े ही धूमधाम के साथ संपन्न हुआ ।
व्रत-पालन की स्थिति एवं संकट का उदय
विवाह के पश्चात जब कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आई, तो वह वीरवती का प्रथम करवा चौथ था। उस समय वीरवती अपने मायके (साहूकार के घर) आई हुई थी। अपने पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना से वीरवती ने अपनी सातों भाभियों के साथ मिलकर करवा चौथ का निर्जला व्रत धारण किया। प्रातः काल से ही सभी स्त्रियों ने अन्न और जल का त्याग कर दिया था ।
दिन का समय तो पूजा-पाठ और तैयारियों में किसी प्रकार व्यतीत हो गया, परंतु संध्या होते-होते लाड-प्यार में पली, कोमल शरीर वाली वीरवती भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल हो उठी। जल की एक बूंद के बिना उसका कंठ सूखने लगा और उसका शरीर शिथिल पड़ने लगा। वह चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा में बार-बार अचेत (मूर्छित) होने लगी ।
भाइयों का अनुचित मोह एवं छल का प्रसंग
शाम के समय जब सातों भाई अपना व्यापार बंद करके घर लौटे, तो उन्होंने अपनी प्राणों से प्यारी बहन की यह दारुण दशा देखी। भूख-प्यास से तड़पती अपनी बहन को देखकर भाइयों का हृदय विदीर्ण हो गया। सभी भाई भोजन करने बैठे और उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन ग्रहण करने का अत्यंत आग्रह किया ।
वीरवती ने क्षीण और कांपते स्वर में उत्तर दिया— "हे मेरे प्यारे भ्राताओं! आज मेरा करवा चौथ का परम पवित्र निर्जल व्रत है। मैं केवल चंद्रदेव के उदय होने पर, उनके दर्शन करके और उन्हें विधि-विधान से अर्घ्य देकर ही अन्न और जल ग्रहण कर सकती हूँ। अभी आकाश में चंद्रमा उदित नहीं हुआ है, अतः मैं भोजन नहीं कर सकती।"
वीरवती की यह पीड़ा सातों भाइयों से देखी नहीं गई। वे यह सहन नहीं कर पा रहे थे कि उनकी उपस्थिति में उनकी बहन भूखी-प्यासी कष्ट भोगे। अपनी बहन की इस पीड़ा को तत्काल समाप्त करने के लिए सबसे छोटे भाई ने एक युक्ति सोची और भाइयों ने अपने अनुचित मोह के वशीभूत होकर छल का सहारा लिया ।
नगर के बाहर जाकर, एक ऊंचे और सघन पीपल के वृक्ष के पास भाइयों ने सूखी लकड़ियों और घास-फूस का ढेर लगाकर एक विशाल अग्नि प्रज्वलित कर दी। तत्पश्चात, एक भाई ने अपने हाथों में एक छलनी ली और उस प्रज्वलित अग्नि के प्रकाश को उस छलनी की ओट से इस प्रकार प्रदर्शित किया, मानो साक्षात पूर्ण चंद्रमा अपनी रश्मियों के साथ गगनमंडल में उदित हो गया हो ।
सबसे छोटे भाई ने घर आकर वीरवती से बड़े ही स्नेह से कहा— "हे मेरी प्यारी बहन! उठो, तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। देखो, आकाश में करवा चौथ का चांद निकल आया है। अब तुम उसे अर्घ्य देकर अपना व्रत पूर्ण कर लो और हमारे साथ भोजन कर लो।"
वीरवती ने प्रसन्नतापूर्वक सीढ़ियों पर चढ़कर देखा, तो दूर पीपल के वृक्ष के पास उसे छलनी की ओट में रखा वह दीपक सचमुच चंद्रमा ही प्रतीत हुआ। अज्ञानवश उसने उसे ही सत्य मान लिया。
वीरवती ने अपनी भाभियों को भी पुकारा और कहा— "आओ भाभियों! चंद्रमा उदित हो गया है, तुम भी अर्घ्य दे लो।" परंतु सातों भाभियां इस छल-प्रपंच को भली-भांति जानती थीं। उन्होंने वीरवती को सचेत करते हुए कहा— "बहन जी! अभी वास्तविक चंद्रमा आकाश में उदित नहीं हुआ है। तुम्हारे भाई तुम्हारे प्रति अपने अंधे मोह के कारण तुम्हारे साथ धोखा कर रहे हैं। तुम्हारी भूख उनसे देखी नहीं गई, इसलिए उन्होंने पीपल के पेड़ पर दीप जलाकर तुम्हें छलनी से प्रकाश दिखाया है। तुम इस कृत्रिम प्रकाश को अर्घ्य मत देना।"
परंतु भूख और प्यास से व्याकुल वीरवती ने अपनी भाभियों की इस सत्य चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने अपने भाइयों के स्नेह पर पूर्ण विश्वास किया और उसी कृत्रिम प्रकाश (नकली चांद) को अर्घ्य देकर अपना निर्जला व्रत खोल लिया ।
अशुभ शकुन और घटना का दारुण क्रम
जैसे ही वीरवती ने बिना वास्तविक चंद्र-दर्शन के अपना व्रत भंग किया, उसके भयंकर परिणाम तुरंत प्रकट होने लगे। भगवान गणेश और करवा माता (चौथ माता) इस अशुद्ध और खंडित आचरण से अत्यंत रुष्ट हो गए ।
जब वीरवती अपने भाइयों के साथ भोजन करने बैठी, तो अमंगल शकुनों का क्रम आरंभ हो गया:
- जैसे ही वीरवती ने भोजन का पहला ग्रास (टुकड़ा) अपने मुख में डाला, उसे जोर की छींक आ गई।
- जब उसने किसी प्रकार दूसरा ग्रास मुख में डाला, तो उस ग्रास में से एक बाल निकल आया, जो अत्यंत अशुभ माना जाता है।
- और जैसे ही उसने तीसरा ग्रास मुख में डालने का प्रयास किया, तभी उसी क्षण उसे अपने ससुराल से एक अत्यंत शोकग्रस्त समाचार प्राप्त हुआ कि उसके पति की आकस्मिक मृत्यु हो गई है ।
यह हृदय विदारक समाचार सुनते ही वीरवती के हाथों से भोजन छूट गया और उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह भोजन छोड़कर हाहाकार करती हुई विलाप करने लगी। उसे अपनी भयंकर भूल का बोध हुआ और अपनी भाभियों की कही हुई सत्य बात स्मरण हो आई। वह रुदन करती हुई, पागलों की भांति दौड़कर अपने ससुराल पहुंची और वहां शय्या पर पड़े अपने पति के मृत शरीर को देखकर चीत्कार कर उठी ।
वीरवती अपने पति के शव से लिपटकर स्वयं को कोसने लगी और करवा चौथ के व्रत के दौरान अपनी भूल के लिए देवों से क्षमा मांगने लगी ।
देव-दर्शन, परिणाम और घोर तपस्या
वीरवती का यह करुण क्रंदन और विलाप सुनकर देवलोक से माता पार्वती (लोक-कथा के कुछ पाठों में देवराज इंद्र की पत्नी देवी इंद्राणी का भी उल्लेख आता है) साक्षात् वहां प्रकट हुईं ।
वीरवती ने माता के चरण पकड़ लिए और आंसुओं से उनके चरण पखारते हुए अपने पति की असमय मृत्यु का कारण पूछा और पति के प्राणों की भिक्षा मांगने लगी。
माता पार्वती ने उसे सांत्वना देते हुए कहा— "हे वीरवती! तुमने अपने भाइयों के छल में आकर, बिना वास्तविक चंद्रमा के दर्शन किए ही जल्दबाजी में अपना पवित्र व्रत तोड़ दिया था। इसी खंडित व्रत के कारण चौथ माता तुमसे रुष्ट हो गईं और तुम्हारे पति की यह असमयिक मृत्यु हो गई। परंतु हे पुत्री! निराश मत हो। यदि तुम अपने सतीत्व के बल पर और पूर्ण निष्ठा से पूरे वर्ष के प्रत्येक माह की कृष्ण चतुर्थी (संकष्टी चतुर्थी) का व्रत करो और अगले वर्ष कार्तिक मास के करवा चौथ का व्रत पूर्ण विधि-विधान से, बिना किसी छल के संपन्न करो, तो तुम्हारे उन सभी व्रतों के पुण्य-प्रताप से तुम्हारा पति पुनः जीवित हो जाएगा।"
माता की आज्ञा को शिरोधार्य कर वीरवती ने एक महान संकल्प लिया। उसने अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। वह अपने पति के मृत शरीर को सुरक्षित रखकर उसके पास पूरे एक वर्ष तक अनवरत बैठी रही और उसकी अखंड सेवा करती रही। शव के समीप उगने वाली सूईनुमा दूब (घास) को वह प्रतिदिन एकत्रित करती जाती थी ।
'यम सूई' का प्रसंग और पति की पुनर्स्थापना
एक वर्ष की घोर तपस्या के पश्चात जब पुनः कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी (करवा चौथ) का पावन दिन आया, तो वीरवती ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ निर्जला व्रत रखा। उस दिन शाम के समय उसकी सातों भाभियां करवा चौथ की पूजा करने और अपनी ननद से मिलने तथा उसे आशीर्वाद देने के लिए उसके पास आईं ।
वीरवती ने अपनी सबसे बड़ी भाभी को देखा, तो वह उसके चरणों में गिर पड़ी और लोक-प्रचलित अत्यंत करुण स्वर में आग्रह किया: "यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो।" (अर्थात, हे भाभी! यह यम की सूइयां (कष्ट) मुझसे ले लो और मेरे प्रियतम (पति) रूपी सूई मुझे लौटा दो, मुझे भी अपने समान सौभाग्यवती बना दो) ।
बड़ी भाभी ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि— "हे बहन! मेरे पास यह शक्ति नहीं है, मैं तुम्हारे पति को जीवित नहीं कर सकती। तुम अपनी अगली भाभी से मांगो।"
वीरवती ने दूसरी भाभी के चरण पकड़े और वही अनुनय किया— "यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो।" दूसरी ने तीसरी के पास भेजा, तीसरी ने चौथी के पास, चौथी ने पांचवी के पास। इस प्रकार एक-एक करके पांच भाभियों ने टाल-मटोल कर दी ।
जब छठे नंबर की भाभी आई, तो उसने वीरवती की व्यथा सुनकर उससे कहा— "हे बहन! सबसे छोटे भाई के कृत्य के कारण ही तुम्हारा व्रत टूटा था, अतः सुहाग लौटाने की सिद्धि और शक्ति उसी की पत्नी (सबसे छोटी भाभी) में है। जब वह आए तो तुम उसके चरण कसकर पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जीवित न कर दे, उसे किसी भी मूल्य पर छोड़ना मत।"
सबसे अंत में जब वीरवती की सबसे छोटी भाभी वहां आई, तो वीरवती ने तुरंत झपटकर उसके चरण पकड़ लिए और वही करुण पुकार की— "यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो।"
छोटी भाभी आनाकानी करने लगी और वीरवती से स्वयं को छुड़ाने के लिए उसे नोचने-खसोटने लगी, परंतु वीरवती ने अपने सतीत्व और दृढ़ निश्चय के बल पर उसे नहीं छोड़ा। वीरवती की अटूट तपस्या, सतीत्व की अग्नि और करुण पुकार को देखकर अंततः छोटी भाभी का मन पसीज गया ।
उसने अपनी सबसे छोटी उंगली को चीरकर उसमें से निकले रक्त (जिसे कथा में अमृत के समान माना गया है) की कुछ बूंदें वीरवती के मृत पति के अचेत मुख में डाल दीं ।
छोटी भाभी के इस कृत्य और अमृत की बूंदें मुख में जाते ही, चौथ माता और भगवान गणेश की असीम कृपा से एक चमत्कार हुआ। वीरवती का पति तुरंत अपने शरीर में चेतना प्राप्त कर "श्री गणेश, श्री गणेश" का निरंतर उच्चारण करता हुआ जीवित होकर उठ बैठा ।
इस प्रकार वीरवती को उसका खोया हुआ अखंड सौभाग्य और प्राणप्रिय पति पुनः प्राप्त हो गया। संपूर्ण परिवार आनंदित हो गया। भाइयों को भी अपनी भूल का भयंकर पश्चाताप हुआ। वीरवती ने उस रात्रि पूर्ण विधि-विधान से वास्तविक चंद्रमा के दर्शन किए, उन्हें अर्घ्य दिया और अपना करवा चौथ का व्रत पूर्ण किया 。
3. मुख्य कथा: द्वितीय संस्करण — रानी वीरवती, 365 सूइयां और 'रोली की गोली' का प्रसंग
करवा चौथ व्रत कथा का एक अन्य अत्यंत प्रामाणिक और पारंपरिक संस्करण भी व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-कथाओं में विस्तार से सुनाया जाता है। यद्यपि इसका आरंभ प्रथम कथा के समान ही होता है, परंतु संकट का स्वरूप और सुहाग की पुनर्प्राप्ति की विधि पूर्णतः भिन्न है। यह कथा सूइयों (कांटों) को निकालने और एक दासी द्वारा किए गए छल पर केंद्रित है। इस कथा का पारंपरिक स्वरूप इस प्रकार है:
संकट का आरंभ एवं अचेत राजा
प्राचीन काल में वीरवती नामक एक अत्यंत रूपवान राजकुमारी थी, जिसका विवाह एक प्रतापी और वीर राजा से हुआ था। विवाह के पश्चात अपने प्रथम करवा चौथ के अवसर पर रानी वीरवती अपने मायके आई हुई थी। उसने निर्जला व्रत रखा, परंतु अपनी सुकुमारता के कारण वह भूख-प्यास सहन न कर सकी और दिन ढलते ही मूर्छित हो गई। उसके सातों भाइयों से अपनी बहन का यह कष्ट देखा नहीं गया और उन्होंने अग्नि जलाकर छलनी से नकली चांद दिखाया। रानी ने उसे अर्घ्य देकर भोजन कर लिया ।
जैसे ही रानी वीरवती ने अन्न ग्रहण किया, उसे यह हृदय-विदारक समाचार प्राप्त हुआ कि उसके पति (राजा) की मृत्यु हो गई है。
रानी वीरवती रोती-बिलखती तुरंत अपने मायके से ससुराल की ओर दौड़ी। मार्ग में उसे साक्षात् भगवान शिव और माता पार्वती के दर्शन हुए। माता पार्वती ने उसे रोककर बताया कि नकली चांद को देखकर व्रत तोड़ने के घोर अपराध के कारण ही उसके पति की यह दशा हुई है। वीरवती के बहुत अनुनय-विनय और क्षमा-याचना करने पर पार्वती जी ने रानी को आशीर्वाद देते हुए कहा— "हे पुत्री! तुम्हारा पति तुम्हें जीवित तो मिलेगा, परंतु वह घोर अचेत अवस्था में होगा और उसका संपूर्ण शरीर अनगिनत सूइयों (कांटों) से बिंधा हुआ होगा। तुम्हें अपने पातिव्रत धर्म से उसकी सेवा करनी होगी।"
सूइयों वाला शरीर और एक वर्ष की तपस्या
जब रानी वीरवती अपने महल में पहुंची, तो उसने देखा कि राजा एक भव्य शय्या पर अचेत लेटे हैं, परंतु उनके संपूर्ण शरीर में सैकड़ों सूइयां चुभी हुई हैं। रानी वीरवती ने अपना संपूर्ण राजसी ठाठ-बाट और सुख-सुविधाएं त्याग कर केवल अपने पति की सेवा का कठोर प्रण लिया。
वह दिन-रात महल में राजा की शय्या के पास बैठी रहती और अत्यंत सावधानी एवं प्रेम से प्रतिदिन नियमपूर्वक एक सूई अपने पति के शरीर से निकालती थी। इस प्रकार उसने 365 दिन तक अनवरत, बिना थके अपने पति की सेवा की और उसके शरीर से सूइयां निकालती रही ।
दासी का छल एवं भूमिका परिवर्तन
एक वर्ष व्यतीत होने के पश्चात जब पुनः कार्तिक मास का करवा चौथ का दिन आया, तो राजा के शरीर में 364 सूइयां निकाली जा चुकी थीं और केवल एक अंतिम सूई शेष रह गई थी। रानी वीरवती ने उस दिन भी अपने पति की पूर्ण चेतना के लिए निर्जला व्रत रखा हुआ था। संध्या के समय वह व्रत के पूजन की सामग्री और नया मिट्टी का 'करवा' खरीदने के लिए बाजार गई ।
बाजार जाने से पूर्व, रानी ने अपनी एक अत्यंत विश्वासपात्र दासी (गोली) को राजा के पास छोड़ दिया और उसे कड़ा निर्देश दिया कि वह राजा का ध्यान रखे。
परंतु रानी के जाते ही, उस दासी के मन में पाप और लालच आ गया। उसने देखा कि राजा के शरीर में केवल एक सूई शेष है। दासी ने तुरंत आगे बढ़कर राजा के शरीर में चुभी हुई वह अंतिम सूई भी निकाल दी। जैसे ही वह अंतिम सूई निकली, राजा की एक वर्ष लंबी अचेतनावस्था समाप्त हो गई और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर उठ बैठे ।
राजा ने आंखें खोलते ही अपने समक्ष उस दासी को देखा। एक वर्ष तक अचेत रहने के कारण राजा की स्मृति भ्रमित हो गई थी, अतः उन्होंने भ्रमवश उसी दासी को अपनी रानी मान लिया ।
जब असली रानी वीरवती बाजार से करवा और पूजन सामग्री लेकर वापस लौटी, तो उसने महल का दृश्य ही बदला हुआ पाया। उसने देखा कि राजा उस दासी को रानी मानकर उसे संपूर्ण राजसी सम्मान दे रहे हैं। उस धूर्त दासी ने राजा को भ्रमित कर दिया और असली रानी वीरवती को ही दासी (गोली) घोषित करवा दिया। वीरवती का भाग्य उलट गया; असली रानी दासी बन गई और दासी रानी बन गई ।
'रोली की गोली' का प्रसंग और सत्य का प्रकटीकरण
सती वीरवती ने इसे अपने पूर्व जन्मों का कर्मफल मानकर धैर्यपूर्वक स्वीकार कर लिया, परंतु उसने चौथ माता पर अपना अटल विश्वास नहीं छोड़ा। एक 'गोली' (दासी) के रूप में महल में झाड़ू-पोंछा करते हुए भी उसने पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ करवा चौथ का व्रत किया ।
कुछ समय पश्चात राजा किसी अन्य राज्य की यात्रा (या व्यापार) पर जाने लगे। उन्होंने अपनी 'रानी' (जो वास्तव में दासी थी) से पूछा कि वह उसके लिए क्या उपहार लाएं। दासी ने अपने स्वभाव के अनुरूप अनेक महंगे आभूषण, वस्त्र और शृंगार की वस्तुएं मांगीं। फिर राजा ने चलते-चलते अपनी उस 'दासी' (जो वास्तव में रानी वीरवती थी) से भी पूछा कि वह उसके लिए क्या लाएं。
वीरवती ने अत्यंत सहजता से कहा— "महाराज! मेरे लिए किसी धन-संपत्ति की आवश्यकता नहीं है, बस लौटते समय मेरे लिए काठ (लकड़ी) की एक जैसी दो गुड़ियां लेते आना।"
राजा जब वापस लौटे तो दासी के लिए आभूषण और वीरवती के लिए काठ की दो गुड़ियां ले आए। वीरवती अपने कक्ष में बैठकर उन काठ की गुड़ियों को आपस में टकराती और अपनी व्यथा को एक लोक-गीत के रूप में गुनगुनाती थी:
"रोली की गोली हो गई... गोली की रोली हो गई..."
(अर्थात: भाग्य का कैसा खेल है कि रोली (रानी) आज गोली (दासी) बन गई... और गोली (दासी) आज रोली (रानी) बन गई...)
वह दिन-रात यही मार्मिक गीत गाती और काठ की गुड़ियों से अपने मन की बातें करती। एक दिन राजा उस कक्ष के समीप से गुजरे और उन्होंने दासी (वीरवती) को यह विचित्र गीत गाते हुए सुना। राजा के मन में अत्यंत शंका और जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने कक्ष में प्रवेश किया और वीरवती से इस गीत का वास्तविक अर्थ पूछा ।
राजा ने क्रोधित होकर कहा— "हे गोली! तुम रोजाना यह क्या प्रलाप करती रहती हो? यदि तुम मुझे सत्य नहीं बताओगी कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, तो मेरी तलवार की धार तुम्हारा शीश धड़ से अलग कर देगी।"
वीरवती ने हाथ जोड़कर और अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा— "महाराज! क्रोधित न हों। मैं आपको संपूर्ण सत्य बताती हूँ।"
तब वीरवती ने राजा को अपनी पूरी कहानी विस्तार से सुनाई— किस प्रकार उसके भाइयों ने छल किया था, किस प्रकार पार्वती माता के श्राप से राजा के शरीर में 365 सूइयां चुभी थीं, कैसे उसने एक वर्ष तक बिना थके प्रतिदिन एक सूई निकाली, और कैसे करवा चौथ के दिन उसके बाजार जाने पर उस धूर्त दासी ने अंतिम सूई निकालकर राजा को भ्रमित कर दिया और स्वयं रानी बन बैठी ।
संपूर्ण सत्य जानकर राजा के नेत्र खुल गए। उन्हें अपनी भयंकर भूल का बोध हुआ और अत्यंत पश्चाताप हुआ। उन्होंने तुरंत उस धोखेबाज और कपटी दासी को महल से बाहर निकाल दिया और वीरवती को गले लगाकर ससम्मान उसका रानी का पद वापस लौटा दिया ।
इस प्रकार रानी वीरवती को अपने अटूट प्रेम, धैर्य, सतीत्व और करवा चौथ के व्रत के प्रताप से अपना खोया हुआ पति और राजसी सम्मान दोनों पुनः प्राप्त हो गए ।
4. मुख्य कथा: तृतीय संस्करण — पतिव्रता 'करवा' और मगरमच्छ की कथा
करवा चौथ व्रत के नामकरण का मूल आधार माता 'करवा' की कथा को ही माना जाता है। इस कथा को व्रत-पूजन के समय अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक पढ़ा जाता है। यह कथा एक स्त्री के सतीत्व और उसके पतिव्रत धर्म की असीम और अलौकिक शक्ति का प्रामाणिक आख्यान है, जिसके समक्ष मृत्यु के देवता भी विवश हो गए थे ।
पात्रों का परिचय और भयंकर संकट
प्राचीन काल में किसी गांव में भद्रावती नदी के किनारे 'करवा' नाम की एक अत्यंत पतिव्रता, धर्मपरायण और सती स्त्री अपने पति के साथ निवास करती थी। करवा के पतिव्रत धर्म का तेज इतना प्रचंड था कि संपूर्ण त्रिलोक के देवता भी उससे भयातुर रहते थे और उसके मुख से निकले वचन ब्रह्मा की लकीर बन जाते थे ।
एक दिन करवा का पति भद्रावती नदी के निर्मल जल में स्नान करने के लिए गया। जैसे ही वह नदी के गहरे जल में उतरा, वहां जल के भीतर घात लगाए बैठे एक अति विशाल और भयानक मगरमच्छ (ग्राह) ने उसके पैर अपने मजबूत जबड़ों में जकड़ लिए और उसे धीरे-धीरे नदी के गहरे और अथाह पानी की ओर खींचने लगा ।
करवा की त्वरित रक्षा और कच्चे धागे की शक्ति
अपनी मृत्यु को अत्यंत निकट देखकर और स्वयं को उस विशाल मगरमच्छ के जबड़े से छुड़ाने में सर्वथा असमर्थ पाकर, पति ने अपनी रक्षा के लिए उच्च स्वर में अपनी पत्नी को पुकारा— "हे करवा! हे मेरी पतिव्रता पत्नी! मेरी रक्षा करो! यह ग्राह मेरे प्राण हरने वाला है, मुझे बचाओ!"
अपने पति की यह करुण और मृत्यु-भय से ग्रस्त पुकार सुनकर करवा अपना सभी गृह-कार्य छोड़कर तुरंत वायु के वेग से नदी के तट पर दौड़ कर पहुंची। उसने देखा कि एक विशालकाय मगरमच्छ उसके पति के प्राण लेने के लिए उद्यत है। ऐसी विपत्ति में भी सती करवा रत्ती भर भी विचलित नहीं हुई。
उस समय पूजा का कुछ कार्य करने के कारण करवा के हाथ में सूत का एक 'कच्चा धागा' था। करवा ने अपने सतीत्व के बल, दृढ़ विश्वास और अपनी ईश्वरीय शक्ति का स्मरण करते हुए उस कच्चे धागे को मगरमच्छ के चारों ओर फेंककर उसे 'आन' (संकल्प की शपथ) देकर एक पेड़ से बांध दिया। सती के तप और पातिव्रत्य के अलौकिक तेज से वह सूत का कच्चा धागा उसी क्षण लोहे की अभेद्य जंजीर के समान दृढ़ हो गया और वह विशाल मगरमच्छ अपनी जगह से रत्ती भर भी हिलने में असमर्थ हो गया ।
यमराज से प्रत्यक्ष संवाद और श्राप का भय
अपने पति को मगरमच्छ के चंगुल से पूर्णतः सुरक्षित कर, सती करवा अपने तपोबल से सशरीर सीधे यमलोक (मृत्युलोक) पहुंची और मृत्यु के देवता धर्मराज यमराज के समक्ष जाकर खड़ी हो गई。
करवा ने यमराज से अत्यंत ओजस्वी और क्रोधित स्वर में कहा— "हे धर्मराज! मेरे पति भद्रावती नदी में स्नान कर रहे थे, तब एक मगरमच्छ ने अनुचित रूप से उनके प्राण हरने का दुस्साहस किया। मैंने उसे अपने सतीत्व के धागे से वहीं बांध दिया है। मेरे पति का पैर पकड़ने के घोर अपराध में आप उस मगरमच्छ को अपने बल से तुरंत मृत्युदंड देकर नरक (यमपुरी) में भेज दें और मेरे पति को जीवनदान दें।"
यमराज ने करवा की बात सुनकर नियम और कर्मफल का हवाला देते हुए उत्तर दिया— "हे देवी! तुम एक पतिव्रता स्त्री हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान करता हूँ, परंतु उस मगरमच्छ की आयु अभी शेष है। विधि के विधान के अनुसार, जब तक किसी प्राणी की आयु पूर्ण नहीं होती, मैं उसे बलपूर्वक यमलोक नहीं भेज सकता। यह सृष्टि के नियमों के विरुद्ध है।"
यमराज का यह नीतिगत उत्तर सुनकर पतिव्रता करवा का नेत्र क्रोध से लाल हो गया। उसने अत्यंत आत्मविश्वास और निर्भीकता के साथ गर्जना करते हुए कहा— "हे यमराज! यदि आपने मेरे पति की रक्षा नहीं की और उस दुष्ट मगरमच्छ को अपने पाश से तुरंत यमलोक नहीं भेजा, तो मैं अपने पतिव्रत धर्म और सतीत्व के तेज से आपको इसी क्षण भस्म कर दूंगी और आपके इस संपूर्ण यमलोक को नष्ट-भ्रष्ट कर दूंगी।"
परिणाम और करवा माता का चिरस्थायी आशीर्वाद
करवा के मुख से निकले इन प्रचंड और भस्म कर देने वाले वचनों को सुनकर यमराज सोच में पड़ गए और भीतर तक भयभीत हो उठे। यमराज भली-भांति जानते थे कि एक सत्यनिष्ठ पतिव्रता स्त्री के सतीत्व में संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने की अमोघ शक्ति होती है। वे बिना एक क्षण का विलंब किए करवा के साथ पृथ्वी लोक पर उस नदी तट पर पहुंचे。
यमराज ने अपने यमपाश से तुरंत उस मगरमच्छ के प्राण हर लिए और उसे यमपुरी (नरक) भेज दिया। तदुपरांत, करवा की निडरता, उसके प्रचंड तप और पति के प्रति उसकी अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उसके पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया और उसे सकुशल नदी से बाहर निकाल दिया ।
कहा जाता है कि तभी से महान सती 'करवा' माता के नाम पर 'करवा चौथ' के व्रत की पावन परंपरा प्रारंभ हुई। स्त्रियां इस दिन विशेष रूप से मिट्टी के करवे (बर्तन) की पूजा करती हैं जो पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक है ।
कथा के अंत में प्रत्येक व्रती स्त्री हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करती है: "हे करवा माता! जैसे आपने अपने अतुलनीय पातिव्रत्य से अपने पति की रक्षा मगरमच्छ से की और यमराज से भी उनके प्राण वापस ले आईं, वैसे ही मेरे पति की और संसार की समस्त सुहागिनों के पतियों की रक्षा करना।"
5. मुख्य कथा: चतुर्थ संस्करण — श्री गणेश और अंधी बुढ़िया की कथा
करवा चौथ व्रत की पूर्णता और निर्विघ्नता हेतु भगवान विघ्नहर्ता गणेश जी की इस अत्यंत लोक-प्रचलित कथा का श्रवण अनिवार्य माना गया है। करवा माता की कथा के उपरांत इसे पढ़ने से ही व्रत पूर्ण और अमोघ फलदायी होता है ।
बुढ़िया की घोर निर्धनता और निश्छल भक्ति
प्राचीन काल में किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन और नेत्रहीन बुढ़िया रहा करती थी। वह अपने एकमात्र पुत्र और पुत्रवधू (बहू) के साथ एक टूटी-फूटी छोटी सी झोपड़ी में जीवन यापन करती थी। बुढ़िया के पास न तो भौतिक धन था, न शारीरिक बल और न ही आंखों की ज्योति। परंतु उसके हृदय में भगवान विघ्नहर्ता श्री गणेश के प्रति अगाध और निश्छल श्रद्धा थी। वह नित्य प्रति पूर्ण भक्ति भाव से भगवान गणेश जी की पूजा-अर्चना किया करती थी। गणेश जी ही उसका एकमात्र सहारा थे ।
श्री गणेश जी का साक्षात् दर्शन और असमंजस
उसकी अनवरत और निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान गणेश साक्षात् उसके समक्ष प्रकट हुए। गणेश जी ने अपने दिव्य स्वरूप में बुढ़िया से कहा— "हे बुढ़िया माई! तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तू जो चाहे सो आज मुझसे मांग ले। मैं तेरी हर इच्छा पूर्ण करूंगा।"
बुढ़िया माई अत्यंत भोली और सरल स्वभाव की थी। उसने हाथ जोड़कर कहा— "हे गणेश जी महाराज! मैं तो एक अनपढ़ और नेत्रहीन बुढ़िया हूँ। मैंने तो जीवन में कभी कुछ मांगा ही नहीं, मुझे तो मांगना भी नहीं आता। मैं आपसे क्या मांगू और कैसे मांगू?"
गणेश जी मुस्कुराए और उसकी सरलता पर मुग्ध होकर बोले— "हे माई! यदि तुझे मांगना नहीं आता, तो तू आज अपने पुत्र और बहू से पूछ ले कि उन्हें क्या चाहिए। कल मैं इसी समय पुनः आऊंगा, तब सोच-समझकर मांग लेना।"
परामर्श और बुढ़िया की बुद्धिमत्ता
जब भगवान गणेश अंतर्ध्यान हो गए, तो बुढ़िया ने अपने पुत्र को बुलाकर कहा कि— "बेटा! साक्षात भगवान गणेश ने दर्शन दिए हैं और वरदान मांगने को कहा है, बता मैं हमारे लिए क्या मांगू?" पुत्र ने अपनी अवस्था देखकर तुरंत उत्तर दिया— "मां, हम अत्यंत निर्धन हैं, दाने-दाने को मोहताज हैं, इसलिए तू गणेश जी से अथाह 'धन' मांग ले।"
जब बुढ़िया ने यही प्रश्न अपनी बहू से पूछा, तो बहू ने अपने मन की इच्छा बताते हुए कहा— "मां जी! धन का हम क्या करेंगे यदि घर में कोई खेलने वाला और वंश आगे बढ़ाने वाला ही न हो। आप गणेश जी से एक सुंदर 'पोता' (पुत्र का पुत्र) मांग लीजिए।"
बुढ़िया ने सोचा कि पुत्र और बहू तो केवल अपने-अपने स्वार्थ की बातें कर रहे हैं। उसने घर से बाहर जाकर अपने पड़ोसियों से भी इस विषय में राय ली। एक बुजुर्ग पड़ोसन ने कहा— "अरी बुढ़िया माई! तेरी उम्र अब बची ही कितनी है? तू धन या पोता लेकर क्या करेगी? तू तो अपने लिए अपनी आंखों की रोशनी (नेत्र) मांग ले, ताकि तेरा बचा हुआ जीवन सुख और सुकून से, इस संसार को देखते हुए व्यतीत हो सके।"
बुढ़िया माई घर आकर विचार करने लगी कि ऐसी कौन सी वस्तु मांगू जिससे पुत्र, बहू और मेरा, सभी का भला हो जाए और किसी को निराशा न हो। रात भर वह इसी युक्ति पर विचार करती रही ।
वरदान की अद्भुत याचना और गणेश जी की प्रसन्नता
अगले दिन प्रातः काल जब बुढ़िया माई भगवान गणेश की पूजा करने बैठी, तो श्री गणेश अपने वचनानुसार पुनः साक्षात् प्रकट हुए। गणेश जी ने कहा— "बोल बुढ़िया माई! सब से पूछ लिया? अब बता क्या मांगती है?"
बुढ़िया माई ने अत्यंत चतुराई और भक्तिभाव से गदगद होकर कहा— "हे गणराज! हे दया के सागर! यदि आप मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मेरी यह इच्छा पूर्ण करें— मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, मेरी आंखों में प्रकाश दें, नाती-पोता दें, मैं सोने के कटोरे में अपने पोते को दूध पीता देखूं, समस्त परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष प्रदान करें।"
वरदान की पूर्ति
बुढ़िया माई की इस अद्भुत, विलक्षण और चतुराई पूर्ण मांग को सुनकर भगवान गणेश खिलखिलाकर मुस्कुराए। गणेश जी ने प्रसन्न होकर कहा— "हे बुढ़िया मां! तूने तो मुझे ठग लिया है! तूने तो एक ही वरदान में सब कुछ मांग लिया। परंतु जो भी हो, मैंने तुझे वचन दिया है। तूने जो कुछ भी मांगा है, वह सब तुझे अवश्य प्राप्त होगा।"
इतना कहकर और "तथास्तु" बोलकर भगवान गणेश अंतर्ध्यान हो गए ।
गणेश जी के अमोघ वरदान स्वरूप उस चमत्कारिक क्षण में बुढ़िया माई की आंखों की दिव्य रोशनी लौट आई, उसका दरिद्र घर अपार अन्न और धन से भर गया, उसकी बहू को एक अत्यंत सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई और संपूर्ण परिवार सुख-समृद्धि से संपन्न हो गया。
(उपसंहार): हे गणेश जी महाराज! जैसे आपने उस अंधी बुढ़िया मां की पुकार सुनी और उसे चतुराई से मांगे अनुसार सब कुछ प्रदान किया, वैसे ही इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी भक्तों की मनोकामना पूर्ण करना और सभी सुहागिनों को अखंड सुहाग देना ।
6. मुख्य कथा: पंचम संस्करण — महाभारत कालीन संदर्भ (द्रौपदी और श्रीकृष्ण)
करवा चौथ व्रत की प्रामाणिकता और अति प्राचीनता को सिद्ध करने वाला एक पौराणिक संदर्भ महाभारत काल से भी जुड़ता है, जिसे व्रती स्त्रियां व्रत के माहात्म्य के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पढ़ती हैं ।
जब कौरवों के षड्यंत्र स्वरूप पांडव द्यूत क्रीड़ा (चौसर) में अपना सब कुछ हार गए और उन्हें बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष का अज्ञातवास भोगने के लिए नीलगिरि के घने वनों में जाना पड़ा, तब वहां उन्हें अनेक प्रकार के दारुण कष्टों और विपत्तियों का सामना करना पड़ा। एक बार धनंजय अर्जुन घोर तपस्या करने और दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए नीलगिरि पर्वत की ओर चले गए। अर्जुन की अनुपस्थिति में शेष पांडव किसी बड़े और प्राणघातक संकट में घिर गए ।
अपने पतियों (पांडवों) को इस प्रकार घोर संकट और विपत्ति में फंसा देखकर महारानी द्रौपदी अत्यंत व्याकुल हो उठीं। उनका हृदय कांप उठा। तब उन्होंने अपने परम सखा और रक्षक, भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण तुरंत वहां प्रकट हुए ।
द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के चरण पकड़कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रार्थना की— "हे वासुदेव! हे दीनानाथ! मेरे पतियों पर आई इस घोर विपत्ति को दूर करने का कोई अचूक उपाय बताइए। मैं उनके प्राणों की रक्षा के लिए कुछ भी तप और व्रत करने को तत्पर हूँ।"
तब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को सांत्वना देते हुए कहा— "हे पांचाली! प्राचीन काल में एक बार भगवान देवाधिदेव शिव की तपस्या के समय उन पर भी बड़ा संकट आ गया था और देवता भयभीत हो गए थे। तब माता पार्वती ने उनके कल्याण के लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'करक चतुर्थी' (करवा चौथ) का अत्यंत कठिन निर्जला व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से शिव जी के सभी संकट दूर हो गए थे। हे द्रौपदी! तुम भी अपने पतियों की रक्षा, उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए पूर्ण विधि-विधान से करवा चौथ का यह पावन व्रत करो।"
श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का निर्जला व्रत रखा। उन्होंने रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दिया और माता करवा तथा शिव-पार्वती की विधिवत पूजा की। इस व्रत के महापुण्य और प्रभाव से पांडवों के सभी कष्ट दूर हो गए, उनका संकट टल गया और अंततः महाभारत के उस महाविनाशकारी युद्ध में उन्हें महाविजय प्राप्त हुई ।
(सत्यवान और सावित्री का लोक-उल्लेख): इसी पौराणिक प्रसंग के अंतर्गत सती सावित्री द्वारा अपने सतीत्व के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाने की कथा का भी स्मरण किया जाता है, जो नारी के पातिव्रत्य की असीम शक्ति को रेखांकित करता है ।
7. पारंपरिक उपसंहार एवं फल-श्रुति
करवा चौथ व्रत की इन समस्त कथाओं का समापन अत्यंत पवित्र और विशिष्ट 'फल-श्रुति' वचनों के साथ किया जाता है। कथा पूर्ण होने के पश्चात, हाथ में लिए गए गेहूं, बाजरे या चावल के १३ दानों (जो कथा के आरंभ में मुट्ठी में लिए गए थे) का विधान किया जाता है। इनमें से कुछ दाने करवा माता (मिट्टी के कलश) पर अर्पित किए जाते हैं, कुछ दाने जल के लोटे (पात्र) में डाले जाते हैं, और शेष दानों को अपने पल्लू (आंचल) में बांधकर रख लिया जाता है, जिनका प्रयोग रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देते समय किया जाता है ।
पारंपरिक फल-वचन और प्रार्थना (अक्षुण्ण पाठ)
सभी कथाएं समाप्त होने के बाद, उपस्थित सुहागिन स्त्रियां हाथ जोड़कर निम्नलिखित पारंपरिक वचनों का उच्चारण करती हैं, जो पीढ़ियों से इसी स्वरूप में गाए जाते हैं:
"हे चौथ माता! हे करवा मैया! जैसे आपने साहूकार की बेटी वीरवती को उसका सुहाग लौटाया, जैसे आपने माता करवा के पति के प्राणों की रक्षा मगरमच्छ और यमराज से की, जैसे आपने द्रौपदी के पतियों के संकट हरे, और जैसे श्री गणेश जी ने बुढ़िया माई को नौ करोड़ की माया और अमर सुहाग दिया— वैसे ही इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी के पतियों की रक्षा करना और उन्हें दीर्घायु प्रदान करना।"
"हे माता! जैसे साहूकार की बेटी वीरवती के साथ पहले किया (पति का वियोग), वैसा इस संसार में किसी सुहागिन के साथ मत करना, और जैसा बाद में किया (सुहाग का वापस मिलना), वैसा सबके साथ करना। सबका सुहाग अटल रखना। कहानी अधूरी हो तो पूरी हो, पूरी हो तो परवान चढ़े, भूले-बिसरे नाम तेरे भंडार में भरे। हे चौथ माता, हम सब पर अपनी कृपा दृष्टि सदा बनाए रखना।"
करवा चौथ माता की पूर्ण आरती
कथा और फल-श्रुति के पश्चात शिव-पार्वती और करवा माता की आरती पूर्ण स्वर में गाई जाती है। आरती का पारंपरिक और अक्षुण्ण पाठ इस प्रकार है :
ॐ जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।
ॐ जय करवा मैया…
सब जग की हो माता, तुम हो रुद्राणी।
यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी।।
ॐ जय करवा मैया…
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, जो नारी व्रत करती।
दीर्घायु पति होवे, दुख सारे हरती।।
ॐ जय करवा मैया…
होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पावे।
गणपति जी बड़े दयालु, विघ्न सभी नाशे।।
ॐ जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।
ॐ जय करवा मैया…
चंद्र-दर्शन एवं व्रत पारण की पूर्णता
रात्रि में जब आकाश में चंद्रोदय होता है, तो सुहागिन स्त्रियां एक थाली में जल का कलश (जिसमें कथा के दाने डाले गए थे) और दीपक युक्त छलनी लेकर छत या प्रांगण में जाती हैं। सर्वप्रथम वे छलनी की ओट से चंद्रदेव के दर्शन करती हैं, तदुपरांत उसी छलनी से अपने पति का मुख देखती हैं। चंद्रदेव को जल का अर्घ्य देकर, पति के हाथों से जल ग्रहण कर और मिष्ठान खाकर यह पावन निर्जला व्रत पूर्ण किया जाता है। अंत में स्त्रियां अपने पति और घर के सभी बड़े-बुजुर्गों (सास-ससुर) का चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं ।
॥ बोलो चौथ माता की जय ॥
॥ बोलो करवा मैया की जय ॥
॥ बोलो भगवान शिव-पार्वती की जय ॥
॥ बोलो श्री गणेश जी महाराज की जय ॥