शास्त्रसम्मत करक चतुर्थी (करवा चौथ) व्रत-विधान एवं अनुष्ठानिक मीमांसा
प्रस्तावना एवं व्रत का तात्त्विक एवं व्युत्पत्तिपरक अर्थ
सनातन धर्म की सुदीर्घ और अत्यंत समृद्ध व्रत-परंपरा में 'करक चतुर्थी' (जिसे लोक-व्यवहार में 'करवा चौथ' के नाम से जाना जाता है) का स्थान अत्यंत विशिष्ट, पावन एवं महत्वपूर्ण है। यह अनुष्ठान विशुद्ध रूप से सुहागिन (सधवा) महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, अखण्ड सौभाग्य, दाम्पत्य जीवन की स्थिरता तथा सम्पूर्ण पारिवारिक सुख-समृद्धि की महती कामना से किया जाने वाला एक अत्यंत कठोर एवं निर्जला व्रत है । धर्मशास्त्रों की मान्यता के अनुसार, व्रत केवल उपवास अथवा निराहार रहने की शारीरिक क्रिया मात्र नहीं है, अपितु यह दैहिक, वाचिक एवं मानसिक प्रवृत्तियों के परिमार्जन का एक आध्यात्मिक साधन है। व्रत के दिन साधक अपनी समस्त इन्द्रियों को बाह्य विषयों से समेटकर अंतर्मुखी होता है और इष्ट-चिन्तन में लीन रहता है।
शब्दावली और व्युत्पत्ति के दृष्टिकोण से 'करक' विशुद्ध संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ जलपात्र अथवा मिट्टी का कुल्हड़ (करवा) होता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को इस मिट्टी के विशिष्ट पात्र (करवे) के माध्यम से देव-पूजन तथा रात्रि के समय उदित होने वाले चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान किए जाने के कारण ही इस व्रत का नामकरण 'करक चतुर्थी' हुआ है, जो कालान्तर में अपभ्रंशित एवं सरलीकृत होकर लोकभाषा में 'करवा चौथ' के रूप में रूढ़ हो गया । 'करवा' मिट्टी का वह पात्र है जो जल और अन्न (विशेषकर गेहूँ) को धारण करता है। कृषि-प्रधान भारतीय संस्कृति में रबी की फसल (गेहूँ की बुवाई) के समय इस पर्व का आना इसे धन-धान्य और उर्वरता के प्रतीकात्मक उत्सव से भी जोड़ता है । जल और मृत्तिका (मिट्टी) पंचमहाभूतों के आधारभूत तत्त्व हैं, अतः करवे की पूजा प्रकृति के सृजनात्मक स्वरूप की ही वन्दना है。
शास्त्रों में करक चतुर्थी का ऐतिहासिक एवं ग्रन्थीय प्रमाण
इस व्रत की शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं महत्ता का उल्लेख अनेक पौराणिक ग्रन्थों एवं धर्मशास्त्रीय निबन्धों में प्राप्त होता है। 'वामन पुराण', 'नारद पुराण', 'निर्णयसिन्धु', 'धर्मसिन्धु' तथा 'व्रतराज' जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में इस व्रत के काल-निर्णय, अनुष्ठान-पद्धति तथा फलश्रुति का अत्यंत विस्तृत एवं सूक्ष्म विवरण उपलब्ध है ।
काल-निर्णय के विषय में आचार्य कमलाकर भट्ट द्वारा विरचित 'निर्णयसिन्धु' में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है: "कार्तिककृष्णचतुर्थी करकचतुर्थी। सा चन्द्रोदय व्यापिनी ग्राह्या। दिनद्वये तदव्याप्त्यादौ संकष्टचतुर्थीवनिर्णय:" । अर्थात् कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि, जो चन्द्रोदय के समय व्याप्त (विद्यमान) हो, उसी दिन यह करक चतुर्थी का व्रत किया जाना शास्त्रसम्मत है। यदि पंचांग के गणितीय भेदों के कारण चतुर्थी तिथि दो दिन चन्द्रोदय के समय व्याप्त हो, अथवा दोनों ही दिन चन्द्रोदय के समय उपस्थित न हो, तो ऐसी दुविधा की स्थिति में 'संकष्ट चतुर्थी' (संकष्टी चतुर्थी) के निर्धारित नियमों के आधार पर तिथि का निर्णय किया जाना चाहिए । 'धर्मसिन्धु' में भी इसी तथ्य की पुष्टि की गई है तथा यह भी स्पष्ट किया गया है कि त्रिमुहूर्त व्यापिनी तिथि (अर्थात् सूर्योदय के पश्चात् कम से कम छह घटी या दो घंटा चौबीस मिनट तक रहने वाली तिथि) का धर्मशास्त्रीय महत्व अत्यधिक होता है । ज्ञातव्य है कि चान्द्रमास की गणना के दो प्रमुख भेद हैं—अमान्त (अमावस्यान्त) तथा पूर्णिमान्त। उत्तर भारत में पूर्णिमान्त मास-गणना प्रचलित होने के कारण यह व्रत 'कार्तिक कृष्ण चतुर्थी' को पड़ता है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ पंचांगों (अमान्त गणना) के अनुसार इसे 'आश्विन मास के कृष्ण पक्ष' में परिगणित किया जाता है। तथापि, ऋतुकाल और वास्तविक दिन दोनों ही पद्धतियों में सर्वथा समान रहता है ।
'नारद पुराण' के पूर्व भाग के 113वें (113) अध्याय में विभिन्न तिथियों पर किए जाने वाले व्रतों का विशद वर्णन है। इसी अध्याय के श्लोक 43 से 51 तक 'करक व्रत' का प्रामाणिक विधान प्रस्तुत किया गया है। महर्षि कहते हैं: "चतुर्थ्यां कार्तिके कृष्णे करकाख्यं व्रतं स्मृतम्। स्त्रीणामेवाधिकारोऽत्र तद्विधानमुदीर्यते।।" अर्थात् कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करक नामक व्रत कहा गया है, जिसमें विशेष रूप से केवल स्त्रियों का ही अधिकार है और उसी व्रत का विधान आगे कहा जा रहा है। 'वामन पुराण' में भी इस व्रत की महिमा का गुणगान किया गया है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण, इन्द्रप्रस्थ में महारानी द्रौपदी को इस व्रत का माहात्म्य सुनाते हैं。
नीचे दी गई तालिका में करक चतुर्थी व्रत के सन्दर्भ में विभिन्न प्रामाणिक ग्रन्थों और उनके निर्देशों का संक्षिप्तीकरण किया गया है:
| ग्रन्थ का नाम | सन्दर्भ / अध्याय | मुख्य निर्देश एवं शास्त्रीय मान्यता |
|---|---|---|
| नारद पुराण | पूर्व भाग, अध्याय 11, श्लोक 43-51 | कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को 'करक व्रत' का विधान; सुवासिनियों को दान तथा चन्द्रोदय पर अर्घ्य का निर्देश। |
| वामन पुराण | व्रत-कथा खण्ड | माता पार्वती और द्रौपदी के व्रत का आख्यान; वीरवती की कथा का मूल आधार; शिव-पार्वती पूजन का निर्देश। |
| निर्णयसिन्धु | व्रत-निर्णय | चन्द्रोदय व्यापिनी कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को व्रत ग्राह्य माना गया है। |
| धर्मसिन्धु | काल-निर्णय खण्ड | संकष्ट चतुर्थी के समान तिथि-निर्णय; अमान्त पंचांग के अनुसार आश्विन मास में उल्लेख । |
| व्रतराज | करक चतुर्थी प्रयोग | संकल्प मन्त्र, दान मन्त्र, करक स्थापन एवं वेदी निर्माण की विस्तृत अनुष्ठानिक प्रक्रिया का वर्णन । |
व्रत-पात्रता एवं अनुष्ठान का अधिकार
भारतीय धर्मशास्त्रों में प्रत्येक अनुष्ठान के लिए एक विशिष्ट 'अधिकार' (पात्रता) का निर्धारण किया गया है। नारद पुराण के उपर्युक्त श्लोक "स्त्रीणामेवाधिकारोऽत्र" के अनुसार इस अनुष्ठान में पूर्ण रूप से स्त्रियों का ही अधिकार है, और उनमें भी मुख्य रूप से 'सुवासिनी' (सधवा अथवा सौभाग्यवती महिलाओं) का । इस व्रत का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य दाम्पत्य जीवन की स्थिरता, पति की अकाल मृत्यु से रक्षा तथा 'सौभाग्य' (लम्बे एवं सुखी वैवाहिक जीवन) की अक्षुण्ण प्राप्ति है ।
नारद पुराण स्पष्ट करता है कि स्त्रियों के लिए सौभाग्य प्रदान करने वाला इसके समान कोई अन्य व्रत त्रिलोकी में उपलब्ध नहीं है, अतः इसे एक सुहागिन स्त्री द्वारा अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में निरन्तर किया जाना चाहिए । यद्यपि कुछ नवीन लोक-मान्यताओं में अविवाहित कन्याओं द्वारा भी उत्तम और सुयोग्य वर की प्राप्ति हेतु यह व्रत रखने की परिपाटी दृष्टिगोचर होती है, किन्तु मूल शास्त्रीय प्रमाण और पुराण इसे मुख्य रूप से 'सुवासिनी' स्त्रियों के निमित्त ही निर्दिष्ट करते हैं। अविवाहित कन्याओं के सन्दर्भ में चन्द्रमा को अर्घ्य देने के स्थान पर तारों को अर्घ्य देने का लोकाचार है, परन्तु शास्त्रीय ग्रन्थ इस पर मौन हैं。
व्रत-पूर्व की मनःस्थिति एवं 'सरगी' का शास्त्रीय तथा व्यावहारिक विश्लेषण
करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से पूर्व ही प्रारम्भ हो जाता है और रात्रि में चन्द्र-दर्शन तक निर्जला रहता है । इतने दीर्घकाल तक शरीर को ऊर्जावान और मन को संयमित रखने के लिए इस व्रत की पृष्ठभूमि में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मनोहारी लोक-परंपरा 'सरगी' के रूप में विख्यात है। यद्यपि विशुद्ध पौराणिक संस्कृत ग्रन्थों में 'सरगी' शब्द का इस विशिष्ट संज्ञा के साथ सीधा उल्लेख नहीं मिलता, तथापि धर्मशास्त्रों में किसी भी कठोर उपवास के पूर्व 'उषःकाल' (ब्रह्म मुहूर्त) में सात्विक आहार ग्रहण करने का विधान देशधर्म, लोकाचार तथा आयुर्वेद के अंतर्गत पूर्णतः मान्य है ।
सरगी ग्रहण करने का सर्वोत्तम समय सूर्योदय से पूर्व, मुख्य रूप से ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 5:30 बजे के मध्य) का होता है । पौराणिक आख्यानों में यह मधुर सन्दर्भ आता है कि जब माता पार्वती ने भगवान शिव की प्राप्ति एवं उनकी दीर्घायु के लिए प्रथम बार यह करक चतुर्थी का व्रत किया था, तब उनकी माता मैना देवी ने (चूँकि उनकी कोई सास नहीं थी) उन्हें व्रत-पूर्व सात्विक आहार और शृंगार की सामग्री प्रदान की थी । इसी प्रकार महाभारत-कालीन लोक-कथाओं में उल्लेख है कि महारानी द्रौपदी ने जब अपने पति अर्जुन के प्राणों की रक्षा के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास माता कुन्ती ने उन्हें सरगी दी थी ।
सरगी मात्र एक भोजन नहीं है, अपितु यह एक श्वश्रू (सास) द्वारा अपनी पुत्रवधू को दिया गया अखण्ड सौभाग्य का मूर्त आशीर्वाद है । सरगी की थाली में मुख्य रूप से सात्विक मिष्ठान्न (जैसे लड्डू, बर्फी, पेड़े), दुग्ध-पदार्थ, शुष्क फल (सूखे मेवे), और ताजे फल सम्मिलित होते हैं । इन पदार्थों का चयन विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक और आयुर्विज्ञानीय दृष्टिकोण से किया गया है। चूँकि दिनभर निर्जला उपवास करना है, अतः ये पदार्थ शरीर में आवश्यक ऊर्जा (कार्बोहाइड्रेट) और जल-स्तर बनाए रखने का तार्किक कार्य करते हैं। इसके अतिरिक्त, सरगी में सास द्वारा बहू को सोलह शृंगार की सामग्री (चूड़ियाँ, बिंदी, महावर, सिन्दूर, मेंहदी आदि) तथा सौभाग्य के वस्त्र भी दिए जाते हैं । उषःकाल में उठकर स्नान-ध्यान के पश्चात् इस सरगी को ग्रहण कर महिलाएँ अपने व्रत का मानसिक और शारीरिक श्रीगणेश करती हैं। सरगी खाने और सूर्योदय होने के पश्चात् व्रत का कठोर नियम लागू हो जाता है ।
प्रातःकालीन कृत्य, स्नान एवं शास्त्रसम्मत संकल्प-विधान
व्रत के दिन प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात् स्वच्छ और सौभाग्य-सूचक वस्त्र धारण करने का विधान है । इस पावन दिन पर लाल, पीला, नारंगी अथवा गुलाबी रंग के वस्त्रों को विशेष रूप से शुभ और मंगलकारी माना गया है, क्योंकि ये रंग भारतीय संस्कृति में सुहाग, ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक हैं। इसके विपरीत श्वेत, नीले या काले रंग के वस्त्रों का धारण करना इस दिन सर्वथा निषिद्ध और अशुभ माना गया है । पूर्ण शृंगार करने के पश्चात् व्रती महिला को अपने घर के पूजा-गृह (मन्दिर) में जाकर, पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करना चाहिए。
भारतीय कर्मकाण्ड और धर्मशास्त्रों में किसी भी प्रकार के शास्त्रीय अनुष्ठान, दान, जप अथवा व्रत की पूर्णता और सिद्धि 'संकल्प' के बिना सम्भव नहीं है। संकल्प वह मानसिक एवं वाचिक दृढ़ता है जो व्रत को एक दिशा प्रदान करती है और ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को साधक की कामना के साथ एकाकार करती है। हाथ में पवित्र जल, अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, दूर्वा और कुछ द्रव्य (सिक्का) लेकर इष्टदेव का स्मरण करते हुए निम्नलिखित शास्त्रसम्मत मन्त्र से व्रत का संकल्प लेना चाहिए। 'व्रतराज' ग्रन्थ में संकल्प का यह अमोघ मन्त्र इस प्रकार वर्णित है:
शास्त्रसम्मत संकल्प मन्त्र:
"मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।"
मन्त्रार्थ एवं तात्विक व्याख्या: "मैं (अपना नाम और गोत्र मन में उच्चारित करते हुए) अपने वैवाहिक सुख, अखण्ड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, पुत्र एवं पौत्रादि संततियों की वृद्धि, तथा सुस्थिर श्री (अचल लक्ष्मी और समृद्धि) की निरंतर प्राप्ति के लिए इस पवित्र करक चतुर्थी (करवा चौथ) व्रत का पूर्ण निष्ठा के साथ अनुष्ठान करूँगी।"
संकल्प लेते समय व्रती के मन में यह दृढ़ भाव होना चाहिए कि यह व्रत सूर्योदय से लेकर रात्रि में चन्द्रोदय होने तक पूर्णतः निराहार एवं निर्जला (जल की एक बूँद के बिना) रहेगा तथा चन्द्रमा के दर्शन एवं उन्हें अर्घ्य-दान करने के पश्चात् ही व्रत का पारण (अन्न-जल ग्रहण) किया जाएगा । संकल्प पढ़ने के पश्चात् हाथ में रखे हुए जल और अक्षत को भगवान गणेश तथा शिव-पार्वती के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक छोड़ देना चाहिए ।
निर्जला व्रत के कठोर यम-नियम, आचरण एवं शास्त्रीय निषेध
संकल्प का जल भूमि पर छोड़ते ही निर्जला व्रत का काल विधिवत् आरम्भ हो जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार व्रत केवल भोजन का त्याग कर देना नहीं है, अपितु यह शारीरिक, मानसिक और वाचिक संयम की एक सर्वांगीण तपस्या है। 'धर्मसिन्धु', 'निर्णयसिन्धु' तथा 'व्रतराज' में व्रत के दौरान पालन किए जाने वाले सामान्य और विशिष्ट नियमों का अत्यंत सूक्ष्मता से उल्लेख किया गया है。
| आचरण का प्रकार | अनुकरणीय यम-नियम (क्या करें) | वर्जित कर्म / निषेध (क्या न करें) |
|---|---|---|
| शारीरिक आचरण | पूर्ण निर्जला उपवास का पालन; पूरे दिन सोलह शृंगार धारण करना; शारीरिक पवित्रता बनाए रखना । | दिन में शयन (दिवास्वाप) करना; जल अथवा अन्न का एक कण भी ग्रहण करना; अशुद्ध स्थानों पर जाना । |
| मानसिक आचरण | भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश का मन ही मन अनवरत स्मरण; क्षमा, दया और शान्ति का भाव। | क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार तथा कामुक विचारों का सर्वथा परित्याग करना । |
| वाचिक आचरण | सत्यभाषण; देव-स्तुति; सायं काल व्रत कथा का श्रवण एवं वाचन । | असत्य बोलना; किसी की निन्दा (परनिन्दा) करना; कटु वचनों का प्रयोग; विवाद या कलह करना। |
| भौतिक कार्य | पूजन की सामग्री एकत्रित करना; सात्विक भोजन (शाम के पारण हेतु) का निर्माण करना। | कैंची, सुई, चाकू जैसी तीक्ष्ण वस्तुओं का प्रयोग (सिलाई-कढ़ाई आदि); तामसिक वस्तुओं का स्पर्श । |
वर्जित कर्मों (निषेधों) का तार्किक एवं शास्त्रीय आधार
धर्मशास्त्रों के 'कलिवर्ज्य' तथा व्रत-सम्बन्धी सार्वभौमिक नियमों के अंतर्गत कुछ कृत्य उपवास के दिन सर्वथा निषिद्ध माने गए हैं:
- दिवास्वाप (दिन में शयन): शास्त्रों में स्पष्ट रूप से यह प्रमाण उपलब्ध है—"उपवास: प्रणश्येत दिवास्वापाच्च मैथुनात्" । अर्थात् उपवास के दिन दिन में सोने से (दिवास्वाप) तथा मैथुन (ब्रह्मचर्य के खण्डन) से व्रत का सम्पूर्ण पुण्य तत्काल नष्ट हो जाता है । व्रत जागरण और चेतना का उत्सव है। अतः अत्यंत रोगी, गर्भिणी या वृद्ध होने की विवशतापूर्ण स्थिति को छोड़कर स्वस्थ महिला को दिन में कदापि सोना नहीं चाहिए।
- सिलाई, कढ़ाई एवं तीक्ष्ण वस्तुओं का प्रयोग: यद्यपि यह नियम मूल रूप से सदियों पुराने लोकाचार (लोक-परंपरा) से आया है, किन्तु इसका पालन करवा चौथ में अत्यंत कड़ाई और व्यापक रूप से किया जाता है। व्रत के दिन सुई, धागा, कैंची, चाकू आदि तीक्ष्ण और धारदार वस्तुओं का प्रयोग पूर्णतः निषिद्ध माना गया है । इसका शास्त्रीय और दार्शनिक तर्क यह है कि व्रत के दिन 'अहिंसा' का पालन सूक्ष्म रूप में भी होना चाहिए। किसी भी प्रकार की कटाई, बुनाई या चुभने वाले कार्य से जहाँ एक ओर मन की एकाग्रता भंग होती है, वहीं दूसरी ओर असावधानी से सूक्ष्म जीवों की हिंसा अथवा स्वयं को रक्तस्राव होने का भय रहता है, जो व्रत की पवित्रता को खण्डित करता है ।
- तामसिक आहार एवं संग-दोष: घर में व्रत के दिन किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, माँस, मदिरा, बासी भोजन) का निर्माण, सेवन अथवा स्पर्श सर्वथा वर्जित है । शास्त्रों में वर्णन है "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्... भोजनं तामसप्रियम्", अर्थात् तीन प्रहर से अधिक पुराना, दुर्गन्धयुक्त और लहसुन-प्याज जैसी तामसिक प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाली वस्तुओं का परित्याग करना व्रत के दिन अनिवार्य है ।
- श्वेत वस्तुओं का दान: करवा चौथ के दिन चन्द्रमा से सम्बन्धित श्वेत वस्तुओं (जैसे चावल, श्वेत वस्त्र, दही, दूध आदि) का दान किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं करना चाहिए । यद्यपि करवे में दूध या चावल भरकर अपनी सास या सुवासिनी को देने का जो विशिष्ट अनुष्ठानिक विधान है, वह इसका अपवाद है ।
सायं-कालीन वेदी-निर्माण एवं करक-स्थापन विधि
दिनभर निर्जला उपवास रखने के पश्चात्, सायंकाल में सूर्यास्त से कुछ पूर्व मुख्य पूजन की तैयारी प्रारम्भ की जाती है। 'व्रतराज' तथा 'धर्मसिन्धु' में देव-पूजन के लिए एक पवित्र वेदी (मण्डल) बनाने का विस्तृत विधान वर्णित है ।
वेदी निर्माण (बालू या मिट्टी का वेदी-करण)
घर के किसी शुद्ध और पवित्र स्थान (सामान्यतः ईशान कोण या उत्तर दिशा) में गोमय (गाय के गोबर) से लीपकर अथवा शुद्ध जल से मार्जन कर एक वर्गाकार स्थान को पवित्र किया जाता है । उस स्थान पर रंगोली, अष्टदल कमल या स्वास्तिक का निर्माण किया जाता है। परम्परानुसार, दीवार पर गेरू (लाल रंग) अथवा पिसे हुए चावलों के घोल (अल्पना) से 'करवा चौथ माता' (जो मूलतः अखण्ड सौभाग्यवती माता पार्वती का ही स्वरूप हैं), चन्द्रमा, सूर्य तथा सम्पूर्ण शिव-परिवार का चित्रांकन किया जाता है। वर्तमान समय में इस चित्रांकन के स्थान पर करवा चौथ के मुद्रित चित्र (कैलेंडर) का प्रयोग भी व्यापक रूप से होने लगा है。
करक (करवा) स्थापन
वेदी के ठीक मध्य भाग में मिट्टी अथवा ताँबे (या पीतल) के दो करवे (टोंटीदार घड़े) स्थापित किए जाते हैं ।
- पहला करवा माता पार्वती (करवा माता) के प्रतीक रूप में पूजन के लिए होता है।
- दूसरा करवा पूजन के उपरांत उस सुवासिनी (सास, जेठानी या ननद) को दान देने (बायना) के लिए स्थापित किया जाता है ।
इन करवों के भीतर शुद्ध जल, दुग्ध अथवा गुलाब जल भरा जाता है, तथा कुछ क्षेत्रीय परम्पराओं में इसमें गेहूँ, खील (लाजा) या चावल भरे जाते हैं । करवे के मुख पर एक मिट्टी का ढक्कन (शकोरा या दीपक) रखा जाता है, जिसमें शक्कर का बूरा, मिष्ठान्न अथवा गेहूँ और एक सिक्का (स्वर्ण, रजत या ताम्र) रखा जाता है । करवे के चारों ओर पवित्र मौली (कलावा या रक्षा-सूत्र) बाँधी जाती है और उस पर रोली (कुमकुम) से तेरह (13) बिंदियाँ लगाई जाती हैं या स्वास्तिक का शुभ चिह्न अंकित किया जाता है । यह 13 की संख्या चन्द्रमा की कलाओं और चान्द्र-मास के दिनों की गणना से प्रतीकात्मक रूप से जुड़ी हुई है。
कलश स्थापन (वैकल्पिक परंतु उत्तम)
यदि अत्यंत विस्तृत और पूर्ण कर्मकाण्डीय पूजन हो रहा हो, तो करवे के समीप ही एक जल से पूरित कलश भी स्थापित किया जाता है। कलश के मुख पर आम्र-पल्लव (आम के पत्ते) और एक पूर्ण नारियल रखा जाता है। कलश के भीतर सिक्का, सुपारी, दूर्वा और हल्दी की गाँठ डाली जाती है । "ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः..." मन्त्र से कलश में सभी तीर्थों, सागरों और देवों का आवाहन किया जाता है, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक बन जाता है ।
शिव-पार्वती एवं गणेश पूजन: षोडशोपचार प्रक्रिया
नारद पुराण और वामन पुराण के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार करक चतुर्थी के दिन भगवान शिव, माता पार्वती (गौरी), श्री गणेश और कार्तिकेय (षडानन) का सपरिवार पूजन अनिवार्य है । पूजन सामान्यतः अपनी सामर्थ्य के अनुसार पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) या षोडशोपचार (सोलह उपचारों) से किया जाता है ।
चूँकि माता पार्वती ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में 'अखण्ड सौभाग्यवती' मानी गई हैं, अतः इस व्रत में मुख्य पूजन उन्हीं का होता है । अनुष्ठानिक क्रम इस प्रकार है:
1. ध्यानावाहन एवं पञ्चदेव पूजन:
सर्वप्रथम हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान गणेश और शिव-परिवार का ध्यान और आवाहन किया जाता है。
- श्री गणेश का ध्यान: विघ्नों के विनाश हेतु "ॐ गं गणपतये नमः" या "ॐ एकदंताय नमः" का उच्चारण कर विघ्नहर्ता का सर्वप्रथम पूजन किया जाता है । नारद पुराण में गणेश पूजन को अत्यंत विशिष्ट महत्व दिया गया है और उन्हें स्वर्ण प्रतिमा में पूजने तक का विधान है ।
- शिव-परिवार का ध्यान: भगवान शिव के लिए "ॐ नमः शिवाय" अथवा "ॐ तत्पुरुषाय नमः" तथा भगवान कार्तिकेय के लिए "ॐ षण्मुखाय नमः" का उच्चारण करते हुए उन्हें वेदी पर आसीन होने का भाव किया जाता है ।
2. मुख्य देवी (गौरी/पार्वती) का षोडशोपचार पूजन:
माता पार्वती को जल से स्नान कराया जाता है। तदुपरान्त उन्हें वस्त्र, चन्दन, रोली, कुमकुम, सिन्दूर, अक्षत अर्पित किए जाते हैं। इस दिन माता को विशेष रूप से सोलह शृंगार की सामग्री (चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, महावर, मेंहदी आदि) अर्पित की जाती है ।
माता पार्वती का विशेष करक-पूजन मन्त्र: पूजन करते समय 'व्रतराज' और 'धर्मसिन्धु' में उल्लिखित इस अमोघ और अत्यंत शक्तिशाली मन्त्र का पाठ करना चाहिए:
"नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥"
मन्त्रार्थ एवं तात्विक व्याख्या: "हे भगवान शिव की प्राणप्रिया पत्नी, हे शर्वाणी (सम्पूर्ण जगत का भरण-पोषण करने वाली माता)! आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है। हे हर-वल्लभे! मुझ जैसी भक्ति-युक्त और श्रद्धावनत नारी को आप अखण्ड सौभाग्य, श्रेष्ठ एवं चिरायु संतति तथा सभी प्रकार के शुभ फलों (सुख-समृद्धि) का वरदान प्रदान करें।"
इसके अतिरिक्त श्रद्धा के अनुसार "ॐ ह्रीं गौर्यै नमः", "ॐ पार्वत्यै नमः", "ॐ उमायै नमः", "ॐ शङ्करप्रियायै नमः", "ॐ अम्बिकायै नमः" आदि नाम-मन्त्रों का जप भी किया जा सकता है ।
3. नैवेद्य, आरती एवं क्षमा-प्रार्थना:
षोडशोपचार पूजन के अंतिम चरण में देवताओं को ऋतुफल, मिष्ठान्न, तथा करवे के ढक्कन में रखे हुए पवित्र पदार्थ का भोग (नैवेद्य) लगाया जाता है । तदुपरान्त सुगन्धित धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर भगवान गणेश, शिव जी और माता करवा की सस्वर आरती की जाती है । अंत में, पूजन में हुई किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए "मन्त्रहीनं क्रियाहीनं..." स्तोत्र से क्षमा-प्रार्थना की जाती है。
कथा-श्रवण का अनुष्ठानिक, तार्किक एवं पौराणिक महत्व
पूजन के मध्य अथवा ठीक पश्चात् व्रत-कथा के श्रवण का अत्यंत विशेष विधान है। व्रत कथा कोई साधारण कहानी नहीं है, अपितु यह व्रत के उद्देश्य, उसके परिणाम और पूर्व-काल में इसे सिद्ध करने वाली महान सती स्त्रियों के तप का स्मरण है। कथा सुनते समय व्रती महिला को अपने दाहिने हाथ में गेहूँ अथवा चावल के तेरह (13) दाने मुट्ठी में बन्द करके रखने चाहिए ।
शास्त्रों और लोक-परम्पराओं में मुख्य रूप से दो कथाओं का ऐतिहासिक सन्दर्भ मिलता है:
- वामन पुराण का सन्दर्भ (द्रौपदी की कथा): वामन पुराण के अनुसार, महाभारत काल में जब पाण्डव वनवास में थे और अर्जुन दिव्यास्त्रों की प्राप्ति एवं तपस्या के लिए नीलगिरि (इन्द्रकील) पर्वत पर गए हुए थे, तब उनके प्राणों पर आए संकटों से भयभीत होकर महारानी द्रौपदी अत्यंत व्याकुल हो उठी थीं। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सान्त्वना देते हुए उसी करक चतुर्थी व्रत का उपदेश दिया था, जिसका वर्णन पूर्वकाल में भगवान शिव ने माता पार्वती से किया था। द्रौपदी ने विधि-विधान से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से अर्जुन सभी संकटों से मुक्त होकर सकुशल लौट आए।
- वीरवती की कथा (लोक-पुराण): यह करवा चौथ की सर्वाधिक प्रचलित कथा है। इसके अनुसार, सात भाइयों की इकलौती और अत्यंत लाडली बहन वीरवती ने विवाह के पश्चात् जब प्रथम बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो वह भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल हो गई और मूर्च्छित होने लगी। उसकी यह पीड़ा उसके भाइयों से सहन नहीं हुई। अतः उन्होंने छल से एक पेड़ की ओट में छलनी (छिद्रयुक्त पात्र) के पीछे दीपक जलाकर अपनी बहन को नकली चन्द्रमा दिखा दिया । वीरवती ने उसे ही वास्तविक चन्द्रमा समझकर अर्घ्य दे दिया और भोजन कर लिया। इस खण्डित व्रत के परिणामस्वरूप तत्काल उसके पति की मृत्यु हो गई। जब उसे इस छल का भान हुआ, तो उसने विलाप करते हुए अपने पति के शव को सुरक्षित रखा। अगले वर्ष जब पुनः कार्तिक कृष्ण चतुर्थी आई, तो उसने माता इन्द्राणी (कुछ कथाओं में करवा माता) के निर्देशानुसार पूर्ण निष्ठा और शास्त्रीय विधि-विधान से करक चतुर्थी का व्रत किया, जिसके महान पुण्य-प्रभाव से उसका मृत पति पुनर्जीवित हो उठा ।
यह कथा इस व्रत में 'छलनी' के प्रयोग का वैचारिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक आधार निर्मित करती है। कथा श्रवण पूर्ण होने के पश्चात् हाथ में रखे हुए तेरह (13) दाने करवे के ढक्कन में या माता पार्वती के श्रीचरणों में अर्पित कर दिए जाते हैं。
चन्द्रोदय, अर्घ्य-दान विधि एवं चन्द्र-दर्शन की मीमांसा
रात्रि के समय जब आकाश में चन्द्रमा उदित होता है, तब इस कठोर व्रत का सबसे महत्वपूर्ण, प्रतीक्षित और अंतिम चरण प्रारम्भ होता है。
अर्घ्य-दान की अनुष्ठानिक विधि
चन्द्रोदय होने की पुष्टि होने पर एक स्वच्छ थाली में ताँबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल, कुमकुम, अक्षत, श्वेत पुष्प और प्रज्वलित दीपक सजाकर किसी खुले स्थान, प्रांगण या छत पर जाया जाता है। चन्द्रमा के उदय की दिशा (मुख्यतः उत्तर-पश्चिम) की ओर मुख करके भगवान चन्द्रदेव (सोम) का पंचोपचार पूजन किया जाता है。
चन्द्रमा को अर्घ्य (जल की अनवरत धार) अर्पित करते समय निम्नलिखित शास्त्रसम्मत मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए:
"ॐ सोमाय नमः" (हे सोमदेव, आपको नमस्कार है)
"ॐ चन्द्रमसे नमः" (हे चन्द्रदेव, आपको नमस्कार है)
"ॐ रोहिणी कान्ताय नमः" (हे रोहिणी के प्रिय पति, आपको नमस्कार है)
चन्द्रमा ही क्यों? (तात्विक मीमांसा):
वैदिक वांग्मय में चन्द्रमा (सोम) को वनस्पतियों का राजा (औषधीश), मन का अधिपति और शीतलता का अक्षय स्रोत माना गया है। अर्घ्य देते समय व्रती महिला के मन में यह उत्कृष्ट भावना होती है कि जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी अमृतमयी शीतलता और ज्योत्स्ना से सम्पूर्ण चराचर जगत के तापों को हरकर शान्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार हमारे दाम्पत्य जीवन में भी प्रेम, शीतलता, और शान्ति सर्वदा बनी रहे, तथा पति का स्वास्थ्य वनस्पतियों के समान प्रफुल्लित रहे。
छलनी से दर्शन एवं पति-दर्शन का दार्शनिक तथा मनोवैज्ञानिक आधार
करवा चौथ के अनुष्ठान में छलनी (छिद्रयुक्त पात्र) से चन्द्रमा और तत्पश्चात् अपने पति को देखने की अत्यंत प्रबल और अनिवार्य परम्परा बन चुकी है। यद्यपि इसका विशुद्ध श्लोकबद्ध उल्लेख प्राचीनतम श्रुतियों में नहीं मिलता, तथापि यह 'देशाचार' और सदियों पुरानी परम्परा का एक ऐसा अभिन्न अंग बन चुका है जिसके पीछे अत्यंत सूक्ष्म तार्किक और पौराणिक कारण विद्यमान हैं。
तार्किक एवं पौराणिक आधार:
- छल से बचाव की मनोवैज्ञानिक दृष्टि: वीरवती की कथा के अनुसार, उसके भाइयों ने पेड़ के पीछे छलनी में दीपक रखकर उसे नकली चन्द्रमा दिखाकर उसके साथ छल किया था, जिससे उसका व्रत भंग हो गया था । इसी दुखांत घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसलिए सुहागिन स्त्रियाँ अपने हाथ में स्वयं छलनी लेकर, उसमें प्रज्वलित दीपक रखकर प्रत्यक्ष चन्द्रमा के दर्शन करती हैं। वे स्वयं को और प्रकृति को आश्वस्त करती हैं कि उनके साथ कोई 'छल' नहीं हो रहा है और जो वे देख रही हैं, वह वास्तविक चन्द्रदेव ही हैं ।
- दोष-निवारण (शाप-मुक्ति का विधान): एक अन्य पौराणिक सन्दर्भ के अनुसार, चन्द्रमा को अपने रूप का अत्यंत अहंकार था, जिसके कारण उन्होंने भगवान गणेश (कुछ ग्रन्थों में राजा दक्ष) का उपहास किया था। फलतः उन्हें शाप मिला था। गणेश जी के शाप के कारण चतुर्थी के चन्द्रमा का सीधा दर्शन 'कलंक' (मिथ्या दोष) लगाने वाला माना जाता है (जैसे भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी अर्थात् गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन वर्जित है) । इस दोष के निवारण हेतु चन्द्रमा को सीधे न देखकर छलनी की ओट (सहस्र छिद्रों) से देखने का विधान उत्पन्न हुआ, जिससे चन्द्र-दर्शन का दोष भी न लगे और व्रत का शुभ फल भी पूर्णतः प्राप्त हो ।
- पति-दर्शन (मंगल दृष्टि का सिद्धांत): चन्द्रमा को छलनी से देखने के तुरंत पश्चात् उसी छलनी से अपने पति का मुख देखा जाता है । इसका दार्शनिक भाव यह है कि पत्नी अपने पति के मुख-मण्डल में ही चन्द्रमा के समान कांति, शीतलता और दीर्घायु की कामना करती है । यह कृत्य भारतीय 'दर्शन' (विशिष्ट दृष्टि) के 'शुभ दृष्टि' या 'मंगल दर्शन' के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ पवित्रता के सर्वोच्च क्षण (पूरे दिन के तप और व्रत की पूर्णता के क्षण) में अपने आराध्य या प्रिय के दर्शन मात्र से उनमें दिव्य गुणों और ऊर्जा का स्वतः आरोपण हो जाता है । उस समय पत्नी की दृष्टि में तपस्या का तेज होता है, जो पति के लिए रक्षा-कवच का कार्य करता है।
दर्शन के पश्चात् पति अपनी पत्नी को उसी अर्घ्य वाले जलपात्र से जल पिलाकर तथा सरगी या पूजन का मिष्ठान्न खिलाकर उसका यह कठोर निर्जला व्रत पूर्ण (पारण) कराता है ।
करक-दान (वायना) का विधान एवं मन्त्र
चन्द्र-दर्शन और अर्घ्य के पश्चात् वह टोंटीदार करवा, जिसे सायं काल विशेष रूप से दान (वायना) के निमित्त वेदी पर स्थापित किया गया था, उसका दान किया जाता है। 'नारद पुराण' और 'व्रतराज' में इस दान का अत्यंत सुस्पष्ट और अनिवार्य विधान है。
करवे में शुद्ध जल या दूध, कुछ मिष्ठान्न, तथा सामर्थ्य के अनुसार रत्न, स्वर्ण, रजत या ताम्र का सिक्का डालकर सुवासिनी स्त्री को दान करने का आदेश है । यह दान सामान्यतः घर की सबसे वयोवृद्ध सुहागिन महिला (मुख्यतः सास) को दिया जाता है । यदि सास समीप उपस्थित न हों या जीवित न हों, तो यह पवित्र करवा जेठानी, ननद अथवा किसी योग्य सुवासिनी (ब्राह्मणी) को श्रद्धापूर्वक दान किया जा सकता है ।
दान का शास्त्रीय मन्त्र: सुवासिनी को करवा भेंट करते समय 'व्रतराज' में वर्णित इस शास्त्रीय मन्त्र का उच्चारण किया जाना चाहिए:
"करकं क्षीरसम्पूर्णा तोयपूर्णमथापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरञ्जीवतु मे पतिः॥"
मन्त्रार्थ: "दूध अथवा जल से पूर्णतः भरे हुए तथा रत्नों (स्वर्ण/सिक्के) से युक्त इस पवित्र करवे को मैं (सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ) आपको दान कर रही हूँ। इस दान के महान पुण्य-प्रभाव से मेरे पति को चिरंजीवी (दीर्घायु) प्राप्त हो।"
करवा भेंट करने के पश्चात् उस सुवासिनी महिला (सास) के चरण स्पर्श कर अखण्ड सौभाग्य और सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है ।
व्रत का पारण एवं अमोघ फलश्रुति
दान-प्रक्रिया पूर्ण होने के उपरान्त व्रती महिला अपने पति तथा घर के सभी बड़े-बुजुर्गों का चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती है । तदुपरान्त परिवार के सभी सदस्यों के साथ एकत्रित होकर सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज का) ग्रहण कर व्रत का विधिवत् पारण किया जाता है ।
फलश्रुति (व्रत का शाश्वत फल):
भारतीय धर्मशास्त्रों में किसी भी व्रत का समापन उसकी 'फलश्रुति' (व्रत के परिणाम का वर्णन) के बिना अपूर्ण माना जाता है। 'नारद पुराण' में महर्षि स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं: "यद्वा क्षीरेण करकं... स्त्रीणामेवाधिकारोऽत्र तद्विधानमुदीर्यते"। अर्थात् जो भी सुवासिनी स्त्री इस करक चतुर्थी का व्रत पूर्ण श्रद्धा, भक्ति, शारीरिक-मानसिक पवित्रता और उपर्युक्त शास्त्रीय विधि-विधान के साथ सम्पन्न करती है, उसके पति को निश्चित ही दीर्घायु प्राप्त होती है। उनके दाम्पत्य जीवन में शिव और पार्वती के समान अगाध, निश्छल और शाश्वत प्रेम स्थापित होता है । 'वामन पुराण' के अनुसार इस व्रत के महान पुण्य-प्रताप से स्त्री जीवन पर्यन्त (अन्तिम श्वास तक) सौभाग्यवती बनी रहती है और उसे वैधव्य का दुःख कदापि नहीं देखना पड़ता । इतना ही नहीं, इस घोर तपस्या के प्रभाव से जन्म-जन्मान्तर के संचित पापों, शारीरिक तथा मानसिक त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) का पूर्णतः शमन होता है , और अन्तकाल में वह सुवासिनी स्त्री शिवलोक (अथवा पतिलोक) में परम सद्गति को प्राप्त करती है ।
उपसंहार एवं निष्कर्ष
'करक चतुर्थी' अथवा 'करवा चौथ' मात्र एक रूढ़िवादी उपवास या शारीरिक क्षुधा को दबाने का कृत्य नहीं है, अपितु यह भारतीय धर्मशास्त्रों, पुराणों और दर्शन-परम्परा द्वारा दाम्पत्य जीवन की पवित्रता, निष्ठा, पारस्परिक प्रेम और आत्म-संयम को सींचने वाला एक अत्यंत गूढ़ मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है。
जहाँ एक ओर 'नारद पुराण', 'वामन पुराण', 'निर्णयसिन्धु' और 'धर्मसिन्धु' जैसे कालजयी शास्त्र इस व्रत की काल-गणना, यम-नियम और संकल्प-मन्त्रों की अत्यंत सुदृढ़ शास्त्रीय नींव रखते हैं, वहीं दूसरी ओर ब्रह्म मुहूर्त की 'सरगी', छलनी से चन्द्र-दर्शन, और करवा-बदलने (वायना देने) जैसी देशाचार की लोक-परम्पराएँ इस अनुष्ठान को एक अद्भुत भावनात्मक, सामाजिक और व्यावहारिक पूर्णता प्रदान करती हैं。
प्रातःकालीन "मम सुखसौभाग्य..." के संकल्प से लेकर, सायंकालीन गौरी-गणेश के षोडशोपचार पूजन, चन्द्रमा के शान्तिदायक अर्घ्य, और करक-दान के "चिरञ्जीवतु मे पतिः" जैसे वेदमन्त्रों तक, this व्रत का एक-एक अंग पति और पत्नी के मध्य पूर्ण समर्पण, विश्वास और त्याग के भाव को पुष्ट करता है। शास्त्र (ग्रन्थ) और लोक-व्यवहार (परम्परा) का यह अद्वितीय और अद्भुत समन्वय ही करक चतुर्थी को सनातन धर्म के सर्वाधिक सशक्त, जीवंत, प्रामाणिक और श्रद्धेय व्रतों में सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करता है। अतः विधि-विधान पूर्वक, त्रुटि-रहित होकर, पूर्ण निष्ठा के साथ किया गया यह निर्जला व्रत निश्चित रूप से वाञ्छित फलों—सुख, शान्ति, उत्तम सन्तति, ऐश्वर्य और अखण्ड सौभाग्य—की प्राप्ति कराने वाला अमोघ साधन है。






