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श्री गौरी तृतीया (गणगौर) व्रत कथा: संपूर्ण पारंपरिक पाठ

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श्री गौरी तृतीया (गणगौर) व्रत की संपूर्ण, अक्षुण्ण एवं पारंपरिक व्रत-कथा

प्रथम अध्याय: नैमिषारण्य में महर्षि शौनक एवं सूतजी का पावन संवाद

परम पावन और समस्त पापों का नाश करने वाले नैमिषारण्य तीर्थ में एक समय की बात है। उस अत्यंत पवित्र तपोवन में, जहाँ सिंह और गौ एक ही घाट पर जल पीते थे और सर्वत्र यज्ञों की पवित्र धूम्र-शिखाएँ आकाश की ओर उठ रही थीं, वहाँ अठासी हजार ऋषि-मुनि एकत्रित हुए । उन सभी तपस्वियों और ज्ञान-पिपासु मुनियों के मन में धर्म, कर्म और व्रतों के गूढ़ रहस्यों को जानने की तीव्र उत्कंठा थी। महर्षि शौनक, जो उन सभी ऋषियों में अग्रणी थे, उन्होंने परम ज्ञानी, व्यास-शिष्य और पुराणों के मर्मज्ञ श्री सूतजी से अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर प्रश्न किया ।

महर्षि शौनक ने पूछा, "हे महाभाग सूतजी! हे पुराणों के ज्ञाता! संसार में स्त्रियों के लिए अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख, और जीवन में सर्वत्र मंगल प्रदान करने वाला वह कौन-सा परम गोपनीय और श्रेष्ठ व्रत है? कलियुग में जब धर्म का लोप होने लगेगा, तब स्त्रियाँ किस व्रत के प्रभाव से अपने सतीत्व की रक्षा कर सकेंगी? कृपा कर उस व्रत की अक्षुण्ण और मूल कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन करें, जिसे स्वयं माता पार्वती ने अनुष्ठित किया हो और जिसके प्रभाव से सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है तथा कुमारी कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।"

सूतजी ने महर्षि शौनक और उपस्थित मुनिगणों का यह लोकमंगलकारी प्रश्न सुनकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने सर्वप्रथम देवाधिदेव भगवान शंकर और जगज्जननी माता भवानी का स्मरण किया। तदुपरांत सूतजी बोले, "हे शौनक आदि ऋषियों! आपने लोक-कल्याण की भावना से अत्यंत उत्तम और गूढ़ प्रश्न किया है। मैं आपको स्कन्द पुराण और शिव पुराण के अंतर्गत वर्णित, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किए जाने वाले 'गौरी तृतीया' अथवा 'गणगौर' व्रत की वह पावन कथा सुनाता हूँ, जो परम पुण्यमयी है । यह व्रत स्त्रियों के लिए सौभाग्य का अमोघ अस्त्र है। आप सभी एकाग्रचित्त और शांत होकर इस परम पावन कथा का श्रवण करें, जिसके सुनने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते हैं।"


द्वितीय अध्याय: भगवान शिव और माता पार्वती का पृथ्वी लोक पर आगमन

सूतजी ने कथा का आरंभ करते हुए कहा — हे ऋषियों! प्राचीन काल में एक बार भगवान देवाधिदेव महादेव, माता उमा (पार्वती) और देवर्षि नारद के साथ कैलाश पर्वत से पृथ्वी लोक के भ्रमण पर निकले । वह चैत्र मास का अत्यंत मनोहर समय था। प्रकृति अपने चरम सौंदर्य पर थी; वृक्षों पर नूतन पल्लव आ गए थे, वन-उपवन भांति-भांति के पुष्पों से आच्छादित होकर अपनी छटा बिखेर रहे थे, और वसंत ऋतु का प्रभाव सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा था । पृथ्वी का अवलोकन करते हुए, लोक-कल्याण की भावना से शिव-पार्वती वन-मार्ग से आगे बढ़ रहे थे。

मार्ग में चलते हुए माता पार्वती को प्यास की अनुभूति हुई। उन्होंने भगवान शिव से जल की इच्छा प्रकट की । भगवान शंकर ने दिशा की ओर संकेत करते हुए कहा कि जहाँ पक्षी उड़ रहे हैं, वहाँ अवश्य ही कोई जलाशय या नदी होगी । जब माता पार्वती उस दिशा में गईं, तो उन्हें एक निर्मल जल से भरी हुई नदी दिखाई दी। जब उन्होंने अपनी अंजलि (दोनों हाथों की हथेलियों को मिलाकर) से जल पीने का प्रयास किया, तो उनके हाथों में जल के साथ कुछ अन्य वस्तुएँ भी आ गईं। पहली बार अंजलि में दूर्वा (दूब) का गुच्छा आया, दूसरी बार टेसू (पलाश) के पुष्प आए और तीसरी बार ढोकला नामक फल उनके हाथों में आया ।

माता पार्वती ने विस्मयपूर्वक भगवान शिव से इसका कारण पूछा । तब अंतर्यामी शिवजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे देवी! आज चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि है । आज के दिन पृथ्वी लोक की सुहागिन स्त्रियाँ और कुमारी कन्याएँ अपने सुहाग की रक्षा और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए तुम्हारा ही गौरी-उत्सव (गणगौर) मना रही हैं। यह दूर्वा और पुष्प उन्हीं स्त्रियों द्वारा श्रद्धापूर्वक नदी में विसर्जित की पूजा-सामग्री है, जो तुम्हारी अंजलि में आ रही है।"

यह सुनकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने भगवान शिव से आग्रह किया, "हे स्वामी! कृपा कर अपनी माया से यहाँ एक नगर की रचना करें, जहाँ मैं स्वयं इन स्त्रियों की श्रद्धा देख सकूँ और उन्हें अपने हाथों से अखंड सौभाग्य का वरदान दे सकूँ।" भगवान शिव ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसी नदी के तट से कुछ दूरी पर एक अत्यंत सुंदर गाँव में वे तीनों प्रविष्ट हुए । जैसे ही उस गाँव के निवासियों को यह ज्ञात हुआ कि साक्षात् भगवान शंकर, माता भवानी और देवर्षि नारद उनके गाँव में पधारे हैं, पूरे गाँव में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। देव-दर्शन की लालसा में गाँव की स्त्रियाँ उनके स्वागत और पूजन की तैयारियों में जुट गईं ।


तृतीय अध्याय: निर्धन एवं निष्कपट स्त्रियों का पूजन और सुहाग-रस का वरदान

उस गाँव में रहने वाली निर्धन और साधारण परिवारों की स्त्रियों के पास न तो बहुमूल्य आभूषण थे, न रेशमी वस्त्र और न ही छप्पन प्रकार के भोग बनाने की सामग्री । किंतु उनके हृदयों में भगवान के प्रति भक्ति और माता पार्वती के प्रति अगाध श्रद्धा का सागर उमड़ रहा था। भगवान और माता के आगमन का समाचार सुनते ही वे स्त्रियाँ जिस अवस्था में थीं, उसी अवस्था में अपने-अपने घरों से दौड़ पड़ीं ।

उन निर्धन स्त्रियों की निष्ठा और सरलता का यह आलम था कि कोई स्त्री अपने घर में भोजन बना रही थी, तो वह चूल्हा जलता हुआ छोड़कर ही आ गई; कोई अपने घर के आँगन को लीप रही थी, तो वह मिट्टी से सने हाथों के साथ ही उसी अवस्था में दौड़ पड़ी; कोई अपने बच्चों को खिला रही थी, तो वह उन्हें वहीं छोड़कर माता के दर्शनों को लालायित हो उठी । उन निर्धन परंतु सच्ची साधिका स्त्रियों ने अपने साधारण पीतल और कांसे की थालियों में केवल निर्मल जल, हल्दी, कुमकुम और थोड़े से अक्षत (चावल) लिए और तीव्र गति से माता पार्वती तथा भगवान शिव के सम्मुख उपस्थित हो गईं ।

उन स्त्रियों ने अत्यंत श्रद्धा, विनय और प्रेम-विभोर होकर माता गौरी और भगवान शंकर के चरणों को पखारा और उनका विधि-विधान से पूजन किया । माता पार्वती उन निर्धन स्त्रियों की निश्छल भक्ति, सरलता, त्याग और अगाध श्रद्धा को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने देखा कि इन स्त्रियों ने अपने बाह्य आवरण की चिंता किए बिना केवल हृदय के शुद्ध भाव से मेरा स्मरण किया है。

माता भवानी ने अपने हाथों में जल लिया और अपनी ईश्वरीय शक्ति से उस साधारण जल को अमोघ 'सुहाग-रस' में परिवर्तित कर दिया । तत्पश्चात् माता ने वह सुहाग-रस उन सभी निर्धन और निष्कपट स्त्रियों के ऊपर छिड़क दिया ।

सुहाग-रस की पावन बूँदें जिन-जिन स्त्रियों पर पड़ीं, वे सभी स्त्रियाँ उसी क्षण अखंड सौभाग्यवती हो गईं। उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज आ गया। माता ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनका सुहाग अमर रहेगा, उनके पतियों की आयु दीर्घ होगी और उनके घरों में सदैव सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा। माता का यह मंगलमयी आशीर्वाद प्राप्त कर वे सभी निर्धन स्त्रियाँ परमानंद को प्राप्त हुईं और गद्गद कंठ से भगवान शिव तथा माता पार्वती की जय-जयकार करती हुई अपने घरों को लौट गईं ।


चतुर्थ अध्याय: कुलीन स्त्रियों का शृंगार और माता पार्वती के रक्त का सुहाग

निर्धन स्त्रियों के जाने के कुछ समय पश्चात्, उसी गाँव की धनी, संपन्न और कुलीन वर्ग की स्त्रियाँ वहाँ पहुँचीं । इन स्त्रियों ने भगवान के आगमन का समाचार सुनकर तत्काल दौड़ने के स्थान पर अपने बाह्य शृंगार और पूजन-सामग्री को भव्य बनाने में समय व्यतीत किया था । वे स्त्रियाँ अपने घरों में सोलह शृंगार कर रही थीं, नाना प्रकार के स्वादिष्ट पकवान, घेवर, चूरमा, मठरी, और मिठाइयाँ बना रही थीं । उन्होंने सोने और चाँदी के बहुमूल्य थालों में विविध प्रकार के मिष्ठान्न, सुवर्ण आभूषण, रोली, मोली, मेहंदी, काजल, हल्दी और शृंगार की बहुमूल्य सामग्रियाँ सजाई थीं । पूरे विधि-विधान, गाजे-बाजे और आडंबर के साथ सज-धज कर जब वे स्त्रियाँ मंथर गति से चलकर वहाँ पहुँचीं, तब तक माता पार्वती निर्धन स्त्रियों को अपना सारा सुहाग-रस बाँट चुकी थीं ।

धनी स्त्रियों की इस विशाल भीड़ और उनके द्वारा लाए गए बहुमूल्य पदार्थों को देखकर भगवान शंकर ने कौतुकवश माता पार्वती की ओर देखा। भगवान शिव जो त्रिकालदर्शी हैं, वे माता की महिमा को विस्तार देना चाहते थे, अतः उन्होंने मुस्कुराते हुए पार्वती जी से पूछा, "हे देवी! तुमने तो अपना सारा सुहाग-रस उन निर्धन स्त्रियों को ही दे दिया, जो सबसे पहले दौड़कर तुम्हारे पास आई थीं। अब ये धनी स्त्रियाँ जो इतने बहुमूल्य पदार्थ और छप्पन भोग लेकर आई हैं, जो उत्तम शृंगार करके आई हैं, इन्हें तुम क्या दोगी? तुम्हारे पास तो अब सुहाग-रस बचा ही नहीं है।"

भगवान शिव के इस प्रश्न को सुनकर माता पार्वती ने अत्यंत सहजता, करुणा और आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया, "हे प्राणनाथ! हे महादेव! आप तनिक भी चिंता न करें। उन निर्धन स्त्रियों को मैंने ऊपरी पदार्थों (जल, हल्दी आदि) से बना हुआ सुहाग-रस दिया है । परंतु इन धनी वर्ग की स्त्रियों को मैं अपने शरीर का रक्त निकालकर सुहाग के रूप में दूँगी। मेरा यह रक्त-सुहाग जिस भी स्त्री पर पड़ेगा, वह मेरे ही समान अखंड सौभाग्यवती हो जाएगी।"

जब उन धनी स्त्रियों ने अपने बहुमूल्य पदार्थों, छप्पन भोगों और शृंगार-सामग्रियों से माता पार्वती और भगवान शिव का विधि-विधान पूर्वक पूजन कर लिया, तब माता पार्वती ने उन पर कृपा करने का निश्चय किया। माता ने अपने दायें हाथ की उँगली को चीर दिया । माता की उँगली से लाल रक्त की पवित्र बूँदें छलकने लगीं। माता ने अपने हाथों से उस रक्त को उन सभी धनी स्त्रियों के ऊपर छिड़क दिया ।

रक्त की जिस बूँद का छींटा जिस स्त्री के जिस अंग पर गिरा, उसने वैसा ही अखंड सुहाग प्राप्त कर लिया । माता ने उन्हें उपदेश देते हुए आशीर्वाद दिया कि बाह्य वस्त्रों, बहुमूल्य आभूषणों और सांसारिक मोह-माया का त्याग करके, जो स्त्री पूर्ण निष्ठा और पवित्रता से अपने पति की सेवा करेगी, वह जीवन पर्यंत सौभाग्यशालिनी रहेगी और अंत में शिवलोक को प्राप्त करेगी । माता का यह अद्वितीय और अलौकिक सुहाग प्राप्त कर वे सभी कुलीन स्त्रियाँ भी अत्यंत संतुष्ट होकर अपने-अपने घरों को लौट गईं。


पंचम अध्याय: माता पार्वती की नदी तट पर गुप्त पूजा और बालू का शिवलिंग

गाँव की सभी स्त्रियों को सौभाग्य का वरदान देने के पश्चात्, माता पार्वती के मन में अपने पति (भगवान शिव) के निमित्त गुप्त पूजा करने की इच्छा जाग्रत हुई। उन्होंने भगवान शिव से विनम्रतापूर्वक आज्ञा माँगी और कहा, "हे प्रभु! मैं समीप ही बहने वाली इस पवित्र नदी के तट पर जाकर स्नान करना चाहती हूँ और अपने इष्ट देव का एकांत में पूजन करना चाहती हूँ।" भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उन्हें आज्ञा दे दी ।

माता पार्वती भगवान शिव और देवर्षि नारद को उसी स्थान पर छोड़कर नदी के निर्जन तट पर पहुँचीं। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक पवित्र जल से स्नान किया। तत्पश्चात्, उन्होंने नदी तट की पवित्र बालू (रेत) को एकत्रित किया और अपने हाथों से एक अत्यंत सुंदर शिवलिंग (बालू का महादेव) का निर्माण किया । माता पार्वती ने उस बालू के शिवलिंग का वन में उपलब्ध जंगली पुष्पों, पल्लवों, दूर्वा और जल से अत्यंत गुप्त रूप से और पूर्ण विधि-विधान के साथ षोडशोपचार पूजन किया ।

उन्होंने शिवलिंग पर चंदन, अक्षत, रोली और पुष्प अर्पित किए । पूर्ण ध्यान और समाधि में लीन होकर माता ने भगवान शिव की आराधना की। पूजा की यह विधि इतनी पूर्ण और एकाग्र थी कि माता को समय का भान ही नहीं रहा。

पूजन पूर्ण होने के पश्चात्, माता पार्वती ने बालू के शिवलिंग को अर्पित किए गए नैवेद्य में से बालू के दो कणों का प्रसाद रूप में भक्षण किया । उन्होंने अपने मस्तक पर पूजन का पवित्र टीका लगाया और शिवलिंग की प्रदक्षिणा कर उसे नदी के जल में पूर्ण श्रद्धा के साथ विसर्जित कर दिया । इस संपूर्ण गुप्त पूजन की प्रक्रिया में, बालू के शिवलिंग के निर्माण से लेकर विसर्जन तक, माता पार्वती को नदी तट पर बहुत अधिक समय लग गया ।


षष्ठम अध्याय: 'दूध-भात' का संवाद और भगवान शिव का हठ

इधर, गाँव की सीमा पर भगवान शिव और देवर्षि नारद माता पार्वती की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब माता पार्वती अत्यंत विलंब से लौटकर भगवान शिव के पास पहुँचीं, तो महादेव ने उनसे प्रश्न किया, "हे देवी! आज आपको नदी तट पर स्नान और पूजन में इतना विलंब क्यों हो गया? हम आपकी अत्यंत प्रतीक्षा कर रहे थे।"

माता पार्वती ने यह सोचकर कि यदि वह अपने द्वारा की गई गुप्त पूजा और बालू के शिवलिंग का सत्य बता देंगी तो उनके द्वारा पति के निमित्त किए गए व्रत का रहस्य खुल जाएगा और व्रत का पुण्य क्षीण हो जाएगा, उन्होंने भगवान शिव से एक कौतुकपूर्ण झूठ बोल दिया । उन्होंने कहा, "हे स्वामी! नदी के तट पर मुझे मेरे मायके वाले (मेरे भाई और भावज) मिल गए थे । वे बहुत समय पश्चात मिले थे, इसलिए उनसे भेंट करने, कुशल-मंगल पूछने और उनके साथ समय व्यतीत करने में मुझे विलंब हो गया।"

भगवान शंकर, जो अंतर्यामी हैं और संपूर्ण चराचर जगत के रहस्यों को जानते हैं, माता की इस लीला को तत्काल समझ गए। उन्होंने अपनी पत्नी के सतीत्व की परीक्षा लेने और एक नई लीला रचने के उद्देश्य से पुनः कौतुकवश पूछा, "हे पार्वती! यदि तुम्हारे भाई-भावज आए थे और तुम उनसे भेंट कर रही थीं, तो तुमने वहाँ किस पदार्थ का भोजन किया? क्योंकि तुम्हारे मुखमंडल पर एक अलौकिक तृप्ति और आभा दिखाई दे रही है, जो केवल उत्तम भोजन से ही संभव है।"

माता पार्वती ने अपने द्वारा ग्रहण किए गए बालू के दो कणों के प्रसाद को छिपाने के लिए पुनः झूठ बोला और कहा, "हे नाथ! मेरे भाई-भावज ने मुझे अत्यंत प्रेम से 'दूध और भात' (दूध और चावल) का अत्यंत स्वादिष्ट भोजन कराया । उसी मीठे और स्वादिष्ट दूध-भात को खाकर मैं यहाँ आ रही हूँ।"

माता का यह उत्तर सुनकर भगवान शिव ने हठ करते हुए कहा, "हे देवी! यदि ऐसा है, तो मुझे भी दूध-भात अत्यंत प्रिय है । मैं भी तुम्हारे भाइयों के पास जाऊँगा और उनके द्वारा बनाया गया वह स्वादिष्ट दूध-भात खाऊँगा तथा उनका आतिथ्य स्वीकार करूँगा। चलो, मुझे और नारद को भी तुरंत उस स्थान पर ले चलो जहाँ तुम्हारे भाई-भावज ठहरे हुए हैं।"


सप्तम अध्याय: माया-महल की अलौकिक रचना और सतीत्व का चमत्कार

भगवान शिव का यह हठ सुनकर माता पार्वती भारी दुविधा और संकट में पड़ गईं । उनके पैरों के नीचे से मानों धरती खिसक गई। उन्होंने तो नदी तट पर केवल बालू का शिवलिंग बनाया था, वहाँ न तो कोई भाई-भावज थे, न मायके वाले थे और न ही दूध-भात का कोई अस्तित्व था। शिवजी के हठ के आगे विवश होकर और अत्यंत भारी मन से माता पार्वती भगवान शिव और नारदजी को साथ लेकर पुनः उसी नदी तट की ओर चल पड़ीं ।

मार्ग में चलते हुए माता पार्वती मन ही मन अत्यंत व्याकुल थीं। वे निरंतर भगवान शिव (जो निराकार परमेश्वर हैं) का ही ध्यान कर रही थीं। उन्होंने अपने अंतर्मन में आर्त भाव से प्रार्थना की, "हे प्रभु! हे अंतर्यामी महादेव! यदि मैं आपकी सच्ची दासी हूँ, यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म पूर्ण है, यदि मैंने निष्कपट भाव से आपका पूजन किया है, तो आज मेरी लाज रख लीजिए । मेरे द्वारा कहे गए वचनों को सत्य कर दीजिए, अन्यथा आज स्वयं महादेव और देवर्षि नारद के सम्मुख मैं झूठी सिद्ध हो जाऊँगी और मेरा सतीत्व कलंकित हो जाएगा।"

माता पार्वती की यह मूक और आर्त प्रार्थना सुनकर, भगवान शिव की अपार कृपा और माता की अपनी योगमाया के प्रभाव से नदी के तट पर एक अत्यंत चमत्कारिक और अलौकिक घटना घटी।

जब वे तीनों नदी के तट पर उसी स्थान पर पहुँचे, तो देवर्षि नारद और भगवान शिव ने देखा कि वहाँ एक अत्यंत विशाल, भव्य, स्वर्ण-जड़ित और गगनचुंबी माया का महल खड़ा है । उस महल के कंगूरे स्वर्ण के थे और ध्वजाएँ वायु में फहरा रही थीं। उस माया महल के भीतर माता पार्वती के पिता (पर्वतराज हिमालय), माता (मैनावती), उनके सभी भाई, भावज और परिवार के अन्य सदस्य साक्षात रूप में उपस्थित थे । शिव, पार्वती और नारद को आता देख, उन्होंने अत्यंत आदर-सत्कार के साथ उनका स्वागत किया। उन्हें ऊँचे और भव्य रत्नों से जड़े आसनों पर बैठाया गया। उनके चरण पखारे गए। सोने और चाँदी के थालों में स्वादिष्ट 'दूध-भात', नाना प्रकार के मिष्ठान्न, छप्पन भोग और षडरस व्यंजन भगवान शिव, माता पार्वती और देवर्षि नारद को परोसे गए ।

भगवान शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर उस दूध-भात का भोजन किया और उस परिवार के आतिथ्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की । इस अद्भुत माया महल में भगवान शंकर, माता पार्वती और नारद मुनि पूरे दो दिनों तक अपने मायके के परिवार के साथ बड़े आनंद और सुखपूर्वक निवास करते रहे । माता पार्वती मन ही मन महादेव की इस कृपालु लीला पर गद्गद हो रही थीं。


अष्टम अध्याय: रुद्राक्ष की माला, देवर्षि नारद का विस्मय और शिवजी का उपदेश

तीसरे दिन की प्रातः बेला में माता पार्वती ने भगवान शिव से कैलाश लौटने का आग्रह किया । भगवान शिव ने पहले तो वहाँ रुकने की इच्छा प्रकट करते हुए आनाकानी की, परंतु पार्वती जी के रूठकर अकेले ही चल देने पर भगवान शिव भी विवश होकर उनके साथ प्रस्थान करने लगे ।

तीनों उस माया महल से विदा लेकर कैलाश की ओर चल पड़े। कुछ दूर वन-मार्ग पर चलने के पश्चात, अचानक भगवान शंकर रुक गए और चिंतित स्वर में बोले, "हे पार्वती! मैं तुम्हारे भाइयों के उस सुंदर महल में अपनी अत्यंत प्रिय रुद्राक्ष की माला भूल आया हूँ । वह माला मेरे गले का आभूषण है और मुझे अत्यंत प्रिय है।"

माता पार्वती ने तुरंत कहा, "हे स्वामी! आप यहीं विश्राम करें, मैं स्वयं जाकर आपकी माला ढूँढ कर ले आती हूँ।" परंतु भगवान शिव ने उन्हें रोक दिया और देवर्षि नारद की ओर देखकर आज्ञा दी, "हे नारद! तुम शीघ्र जाओ और उस महल से मेरी माला ढूँढ कर ले आओ। मुझे बिना माला के आगे बढ़ना उचित नहीं प्रतीत होता।"

देवर्षि नारद भगवान की आज्ञा पाकर तीव्र गति से उसी मार्ग से नदी के तट की ओर वापस गए । परंतु जब नारद जी उस स्थान पर पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य देखकर वे पूरी तरह से स्तब्ध रह गए। उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वहाँ न तो वह गगनचुंबी स्वर्ण-महल था, न माता पार्वती के भाई-भावज थे, न ही कोई दास-दासी थी और न ही दूध-भात का कोई चिह्न शेष था ।

उस स्थान पर तो एक भयंकर, घना, अंधकारमय और निर्जन वन खड़ा था, जहाँ भयानक जंगली पशु विचरण कर रहे थे और पक्षियों की डरावनी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। नारद जी भयभीत होकर चारों ओर देखने लगे कि यह क्या माया है। तभी उनकी दृष्टि एक विशाल वृक्ष पर पड़ी। उस वृक्ष की एक सूखी शाखा पर भगवान शिव की वह रुद्राक्ष की माला टँगी हुई थी । नारद जी ने काँपते हाथों से उस वृक्ष से वह माला उतारी और तीव्र गति से दौड़ते हुए भगवान शिव और माता पार्वती के पास लौट आए ।

हाँफते हुए और पसीने से लथपथ नारद जी ने भगवान शिव को वह माला सौंपी और अत्यंत विस्मय के साथ हाथ जोड़कर बोले, "हे प्रभु! यह कैसा आश्चर्य है? वहाँ तो कोई महल नहीं है। वहाँ कोई परिवार नहीं है। वहाँ तो केवल एक घना और डरावना वन है । वह स्वर्ण महल, वे लोग, वह छप्पन भोग कहाँ लुप्त हो गए? क्या वह कोई स्वप्न था?"

भगवान शिव यह सुनकर ज़ोर से हँसे और अत्यंत गंभीर वचनों में बोले, "हे देवर्षि नारद! यह सब मेरी सती पार्वती की ही रची हुई माया थी । इसने नदी के तट पर अत्यंत गुप्त रूप से मेरा बालू का शिवलिंग बनाकर मेरी पूजा की थी । जब मैंने इससे विलंब का कारण पूछा, तो अपने व्रत की गोपनीयता बनाए रखने और अपने धर्म की रक्षा के लिए इसने मायके वालों का और दूध-भात का बहाना बनाया था। अपने उन्हीं वचनों को सत्य सिद्ध करने और अपनी लाज बचाने के लिए इस पतिव्रता ने अपने अतुलनीय तपोबल से उस माया महल की रचना की थी । वहाँ वास्तव में कोई महल नहीं था, वह केवल इसके सत्य और सतीत्व का प्रभाव था। जहाँ सतीत्व है, वहाँ ईश्वर को भी उसकी लाज रखने के लिए अपनी माया का विस्तार करना पड़ता है।"

भगवान शिव के मुख से माता पार्वती के सतीत्व और तपोबल की यह महिमा सुनकर देवर्षि नारद भाव-विभोर हो गए। वे माता पार्वती के चरणों में गिर पड़े और उनकी वंदना करते हुए बोले, "हे जगदम्बा! हे भवानी! आप धन्य हैं। आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ और शिरोमणि हैं । आपके सतीत्व और तपोबल की कोई सीमा नहीं है। आज मैं यह घोषणा करता हूँ और आशीर्वाद देता हूँ कि मृत्युलोक पर जो भी सुहागिन स्त्रियाँ चैत्र शुक्ल तृतीया (गौरी तृतीया) के दिन आपके ही समान अपने पति की दीर्घायु के लिए गुप्त रूप से व्रत करेंगी और पूर्ण निष्ठा से महादेव का पूजन करेंगी, उन्हें शिव की कृपा से दीर्घायु वाले पति की प्राप्ति होगी और उनका सुहाग आपके ही समान अखंड रहेगा । जो कुमारी कन्याएँ पूर्ण श्रद्धा से इस गौरी तृतीया का व्रत कर आपका ध्यान करेंगी, उन्हें महादेव के समान सुयोग्य और मनचाहा वर प्राप्त होगा।"

नारद जी के इन कल्याणकारी वचनों को सुनकर माता पार्वती और भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और नारद जी को आशीर्वाद देते हुए अपने लोक कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए ।


नवम अध्याय: कुमारी कन्याओं के निमित्त विशेष प्रसंग — माली की दूब और राजा का जौ-चना

(गौरी तृतीया अथवा गणगौर व्रत की इस अक्षुण्ण पारंपरिक कथा के अंतर्गत, शिव-पार्वती की मूल कथा के साथ ही कुमारी कन्याओं और सुहागिन स्त्रियों द्वारा पारम्परिक रूप से 'माली और दूब' का यह प्रसंग अवश्य पढ़ा जाता है, जिसके बिना यह कथा पूर्ण नहीं मानी जाती।)

प्राचीन काल में एक अत्यंत समृद्ध राज्य में एक राजा राज करता था। राजा के विशाल खेतों में उत्तम कोटि का जौ और चना बोया गया था। उसी राज्य में एक अत्यंत परिश्रमी माली भी रहता था, जिसने अपने छोटे से बगीचे में अत्यंत जतन से हरी-हरी दूब (घास) बोई थी ।

जैसे-जैसे वसंत ऋतु का समय बीता, राजा के खेतों का जौ और चना तो निरंतर बढ़ता गया और लहलहाने लगा, परंतु माली की बोई हुई हरी दूब दिन-प्रतिदिन घटती जा रही थी । माली इस बात से अत्यंत चिंतित और आश्चर्यचकित था कि उसने इतनी मेहनत से जो दूब उगाई है और जिसे वह नित्य जल से सींचता है, वह रातों-रात कहाँ चली जाती है। इस रहस्य का पता लगाने और चोर को पकड़ने के लिए, एक दिन माली अपने बगीचे में हरी-हरी घास के बीच एक मोटा और काला कंबल ओढ़कर छिपकर बैठ गया । प्रातःकाल होने से पूर्व ही, जब आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, गाँव की कुछ कुंवारी कन्याएँ और नव-विवाहित सुहागिन स्त्रियाँ सज-धज कर, हाथों में कलश लिए उस बगीचे में आईं । वे सभी कन्याएँ और स्त्रियाँ माता गणगौर (गौरी) के पूजन के लिए उस हरी दूब को अत्यंत सावधानी से तोड़ने लगीं ।

जैसे ही वे पर्याप्त दूब तोड़कर अपने घरों की ओर प्रस्थान करने लगीं, कंबल ओढ़े हुए माली ने अचानक उठकर उनका मार्ग रोक लिया । माली ने क्रोधित होकर उन लड़कियों के गले से उनके कीमती हार और उनके हाथों के डोर (पवित्र धागे) छीन लिए । कन्याओं ने अत्यंत घबराकर और विनयपूर्वक माली से कहा, "हे माली दादा! क्यों हमारा हार खोसे, क्यों हमारा डोर खोसे? (तुमने हमारे यह पवित्र हार और डोर क्यों छीन लिए?)"

माली ने कड़े स्वर में उत्तर दिया, "तुम लोग प्रतिदिन भोर में आकर मेरी बोई हुई हरी दूब चुराकर ले जाती हो। मेरी सारी मेहनत व्यर्थ हो रही है। जब तक तुम इसका कारण नहीं बताओगी और मुझे मेरी दूब का मूल्य नहीं दोगी, मैं तुम्हारे हार नहीं लौटाऊँगा।"

तब उन कन्याओं और स्त्रियों ने हाथ जोड़कर माली से कहा, "हे माली दादा! हम यह दूब किसी स्वार्थ के लिए नहीं, अपितु माता गणगौर (गौरी) और ईशर जी (भगवान शिव) के पवित्र पूजन के लिए ले जाती हैं । क्योंकि दूब के बिना गौरी माता का पूजन अपूर्ण है। आज से हम निरंतर सोलह दिनों तक माता गणगौर का व्रत और पूजन करेंगी । जब सोलह दिन पूरे हो जाएँगे और हमारी गणगौर माता का उद्यापन होगा, तब हम सभी तुम्हारे घर आकर तुम्हें पूरा 'पुजापा' (पूजन की सामग्री, वस्त्र, अन्न और दक्षिणा) दे जाएँगी । कृपा करके हमारे हार और डोर लौटा दो, ताकि हमारा यह पवित्र व्रत खंडित न हो और हमें माता का श्राप न लगे।"

कन्याओं की यह धर्म, निष्ठा और व्रत से परिपूर्ण बात सुनकर माली अत्यंत प्रसन्न और गद्गद हुआ । उसने भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण किया और उन कन्याओं के हार तथा डोर ससम्मान उन्हें लौटा दिए । उन कन्याओं ने पूरे सोलह दिन तक अत्यंत पूर्ण भक्ति-भाव से, सोलह शृंगार करके, दीवार पर सोलह बिंदियां (रोली, मेहंदी, काजल की) लगाकर माता गणगौर का पूजन किया । अंतिम दिन उद्यापन के पश्चात उन सभी कन्याओं ने माली के घर जाकर उसे भरपूर पुजापा और सुवर्ण दक्षिणा दी । माता गणगौर की असीम कृपा से उन कुंवारी कन्याओं को शिव के समान सुयोग्य वर की प्राप्ति हुई और माली के घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि के भंडार सदैव के लिए भर गए ।


दशम अध्याय: मृत्युलोक की माया और शिव-पार्वती के वस्त्रों की गाँठ का प्रसंग

(गणगौर व्रत के इस पावन आख्यान में भगवान शंकर और माता पार्वती के मृत्युलोक में भ्रमण के दौरान एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और दार्शनिक भाव से ओत-प्रोत पारंपरिक प्रसंग का भी पूर्ण वर्णन मिलता है, जो इस प्रकार है:)

जब भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी लोक पर भ्रमण कर रहे थे, तब उनके प्रस्थान के समय उन दोनों के वस्त्रों (शिवजी के बाघाम्बर और पार्वती जी की चुनरी) में एक साथ एक दृढ़ गाँठ बँधी हुई थी । मार्ग में चलते-चलते वे एक ऐसे समृद्ध राज्य के समीप पहुँचे, जहाँ चारों ओर ढोल-नगाड़े और शहनाइयाँ बज रही थीं । संपूर्ण नगर को सुंदर तोरण-द्वारों, बंदनवारों और पुष्पों से सजाया गया था। लोग अत्यंत प्रसन्न होकर एक-दूसरे को बहुमूल्य मिठाइयाँ बाँट रहे थे, स्त्रियाँ घरों के आंगनों में मंगल गीत गा रही थीं और चारों ओर एक अभूतपूर्व उत्सव का वातावरण था ।

माता पार्वती ने यह दृश्य देखकर कौतुकवश वहाँ के निवासियों से पूछा, "हे ग्रामवासियों! यहाँ किस बात का इतना भारी उत्सव मनाया जा रहा है? सर्वत्र इतना आनंद क्यों है?"

नगरवासियों ने अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ उत्तर दिया, "हे भद्रे! हमारे नगर के राजा और रानी अत्यंत पुण्यात्मा हैं, किंतु वे लंबे समय से संतानहीन थे। कई वर्षों की कठोर तपस्या और देव-आराधना के पश्चात आज उनके यहाँ एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ है । उसी पुत्र-रत्न की प्राप्ति की अपार खुशी में पूरे राज्य में यह जश्न मनाया जा रहा है।"

माता पार्वती यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। वे दोनों वहाँ से कुछ और आगे चले। मार्ग में एक हरे-भरे खेत के समीप उन्होंने देखा कि एक घोड़ी अपने छोटे से नवजात बच्चे (बछेड़े) के साथ अत्यंत प्रसन्नता से खेल रही है । वह घोड़ी अपने बच्चे को बार-बार चूम रही थी, उसे दूध पिला रही थी और उस पर अपना संपूर्ण वात्सल्य लुटा रही थी ।

मृत्युलोक के इन वात्सल्य, मातृत्व और प्रेम से भरे दृश्यों को देखकर साक्षात् जगन्माता पार्वती के मन में भी सांसारिक मोह और वात्सल्य उत्पन्न हो गया । वे भगवान शिव से हठ करने लगीं और बोलीं, "हे स्वामी! मृत्युलोक का यह प्रेम और वात्सल्य कितना सुंदर, पवित्र और मोहक है। मुझे यहाँ का यह पारिवारिक सुख अत्यंत प्रिय लग रहा है। आप मेरे वस्त्रों से बँधी हुई यह गाँठ खोल दीजिए, ताकि मैं भी इस वात्सल्य का स्वतंत्र रूप से अनुभव कर सकूँ।"

भगवान शिव ने माता पार्वती को अत्यंत धैर्यपूर्वक समझाते हुए कहा, "हे भवानी! हे देवी! मैंने तो आपसे कैलाश से चलते समय पहले ही कहा था कि आप यह गाँठ मत लगवाओ । यहाँ पृथ्वी लोक पर मृत्युलोक की हर वस्तु माया से ग्रसित है। यह आपका ध्यान भंग करेगी । यहाँ का मोह, वात्सल्य और आकर्षण आपको लुभाएगा और देव-कार्य से विरत करेगा। परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी और ज़िद पकड़ ली थी।"

माता पार्वती के बार-बार अनुनय-विनय करने और हठ करने पर अंततः भगवान शिव मान गए । उन्होंने मुस्कराते हुए माता पार्वती के वस्त्रों से बँधी हुई वह गाँठ खोल दी । गाँठ खुलते ही माता पार्वती मृत्युलोक के इस क्षणिक मोह से तत्काल मुक्त हो गईं और उन्हें अपने ईश्वरीय स्वरूप का भान हुआ। तत्पश्चात् वे दोनों आनंदपूर्वक अपने परम निवास स्थान कैलाश पर्वत की ओर लौट गए ।

(पारंपरिक भाव: हे भगवान शंकर! जैसे पहले आपने माता पार्वती के वस्त्रों में गाँठ लगाई, वैसे ही हम सबके सुहाग की गाँठ को अत्यंत मज़बूत रखना, और जैसे बाद में पार्वती जी की गाँठ खुशी-खुशी खुली, वैसे ही इस कहानी को कहने, सुनने और हुंकार भरने वाले सभी सुहागिन स्त्रियों का सुहाग अमर करना और उनके जीवन में खुशियां भरना।)


एकादश अध्याय: श्री गणेश जी महाराज और बुढ़िया की खीर का प्रसंग

(गणगौर व्रत पूर्ण होने पर पारंपरिक रूप से श्री गणेश जी महाराज की यह कथा भी अनिवार्य रूप से पढ़ी जाती है, क्योंकि किसी भी व्रत, अनुष्ठान या पूजा की पूर्णता गजानन की कृपा और उनके स्मरण के बिना संभव नहीं है।)

एक गाँव में एक अत्यंत निर्धन, असहाय और बूढ़ी अम्मा रहती थी । गाँव में एक दिन भगवान श्री गणेश जी बाल रूप धारण करके आए और उन्होंने गाँव वालों के द्वारे-द्वारे जाकर कहा कि मुझे अत्यंत भूख लगी है, मुझे खीर खानी है, कोई मुझे खीर बनाकर खिलाओ । गाँव के धनी और संपन्न लोगों ने उस बालक की बात पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और उसे दुत्कार दिया, परंतु उस निर्धन बूढ़ी अम्मा ने अत्यंत प्रेम और वात्सल्य से कहा, "बेटा! तू मेरे साथ मेरे घर चल। मेरे पास जो भी थोड़ा-बहुत सामान है, मैं तुझे उसी से प्रेमपूर्वक खीर बनाकर खिलाऊँगी।"

गणेश जी उस बुढ़िया के साथ उसकी छोटी और जीर्ण-शीर्ण कुटिया में चले गए । बुढ़िया के पास केवल मुट्ठी भर चावल और एक कटोरी भर दूध था। उसने भगवान का नाम लेकर वह चावल और दूध एक छोटे से मिट्टी के बर्तन में उबलने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दिया । जैसे ही खीर उबलने लगी, भगवान गणेश की अलौकिक लीला से दूध में ऐसा भयंकर उफान आया कि वह छोटा बर्तन पूरा भर गया और खीर बाहर गिरने लगी । बुढ़िया ने आश्चर्यचकित होकर घर का सबसे बड़ा बर्तन (विशाल भगोना) निकाला और उसमें खीर पलट दी। देखते ही देखते वह विशाल भगोना भी सुगन्धित, केसरिया और अत्यंत स्वादिष्ट खीर से लबालब भर गया । उस खीर की मीठी और मनमोहक सुगंध पूरे घर और आस-पड़ोस में फैलने लगी ।

बुढ़िया की एक बहू थी, जो अत्यंत लालची और पेटू थी। खीर की दिव्य सुगंध से बहू के मुँह में पानी आ गया । जब बुढ़िया किसी काम से घर के बाहर गई, तो बहू ने लालचवश दरवाजे के पीछे छिपकर एक बड़ी कटोरी खीर निकाली और अतिथि के भोजन करने से पूर्व ही चोरी-छिपे खा ली ।

कुछ समय पश्चात बुढ़िया ने बाहर बैठे बालक रूपी गणेश जी को आवाज़ लगाई, "बेटा! तेरी खीर तैयार है। अंदर आकर पेट भर कर खीर खा ले।"

तब साक्षात् गणेश जी महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे अम्मा! तेरी बहू ने दरवाजे के पीछे बैठकर पहले ही मेरा भोग लगा दिया है । मेरा पेट तो उसी से भर गया है। अब मुझे तनिक भी भूख अनुया है । यह जो खीर का विशाल भगोना भरा हुआ रखा है, इसे तू जाकर पूरे गाँव वालों को खिला दे।"

बुढ़िया यह सुनकर भारी आश्चर्य में पड़ गई। वह बाहर गई और उसने पूरे गाँव वालों को खीर खाने का निमंत्रण दिया । गाँव वाले हँसने लगे और उपहास उड़ाते हुए बोले कि इस बुढ़िया के पास स्वयं खाने को अन्न का दाना नहीं है, यह पूरे गाँव को खीर कैसे खिलाएगी? परंतु जब गाँव वाले आए, तो बुढ़िया ने सबको आदरपूर्वक बैठाकर भरपेट खीर खिलाई । सभी ने जीवन में पहली बार इतनी स्वादिष्ट और दिव्य खीर खाई थी। पूरा गाँव उस खीर को खाकर तृप्त हो गया, परंतु फिर भी उस भगोने की खीर तनिक भी समाप्त नहीं हुई । बुढ़िया के घर के अन्न-धन के भंडार गणेश जी की कृपा से सदैव के लिए भर गए ।

हे गणेश जी महाराज! जैसे आपने उस निर्धन बुढ़िया का खीर का भगोना सदा भरा रखा और उसके घर की दरिद्रता दूर की, वैसे ही इस कथा को कहने और सुनने वाले सभी भक्तों के घर के भंडार सदैव अन्न-धन से भरे रखना ।


द्वादश अध्याय: पारंपरिक फल-श्रुति, प्रार्थना एवं फल-वचन

कथा के पूर्ण होने पर सभी सुहागिन स्त्रियाँ और कुमारी कन्याएँ अपने हाथों में अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर माता गौरी और भगवान शिव का एकाग्रचित्त होकर ध्यान करती हैं। वे अत्यंत आर्त और श्रद्धा भाव से इस पारंपरिक फल-वचन का पाठ करती हैं, जिसमें व्रत के प्रभाव और उससे मिलने वाले शुभ फलों का विस्तृत वर्णन है:

"हे माता गणगौर (गौरी)! हे भगवान ईशर (शिव)! जैसे आपने उन निर्धन स्त्रियों की निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर उनका सुहाग अखंड किया; जैसे आपने उँगली चीरकर अपने रक्त से धनी स्त्रियों को अमर सुहाग का वरदान दिया; जैसे आपने बालू के शिवलिंग की गुप्त पूजा स्वीकार कर सतीत्व का मान बढ़ाया; जैसे आपने नदी तट पर माया का स्वर्ण-महल रचकर माता पार्वती का सत और लाज रखी; जैसे आपने हरी दूब की रक्षा करने वाले माली के भंडार भरे और कन्याओं का व्रत पूर्ण किया; और जैसे श्री गणेश जी महाराज ने बुढ़िया का खीर का भगोना असीम कृपा से भरा रखा; वैसी ही कृपा आप हम सब पर करना।"

"हे माता उमा भवानी! जो भी स्त्री या कन्या इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा से करती है और इस कथा को सुनती है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण करना । 'खोटी की खरी, अधूरी की पूरी' (हे माता! हमारे व्रत में, हमारे पूजन में और हमारी कथा में यदि कोई त्रुटि (खोटी) रह गई हो, तो उसे क्षमा कर शुद्ध (खरी) कर देना। यदि हमारा व्रत किसी कारणवश अधूरा रह गया हो, तो अपनी कृपा-दृष्टि से उसे पूर्ण कर देना।)"

इस व्रत को करने वाले भक्तों को पारंपरिक श्रुति के अनुसार निम्नलिखित फलों की प्राप्ति होती है, जो माता गौरी की असीम कृपा का प्रतीक है :

श्रद्धायुक्त भक्त / अवस्था प्राप्त होने वाला फल (पारंपरिक वचन) भावार्थ / महत्त्व
संपूर्ण परिवार गणगौर माता सोवे, इन सोव्यां काईं होवे। अन्न होवे, धन होवे, लाभ होवे, लक्ष्मी होवे। घर में सदैव अन्न, धन, व्यापार में लाभ और माता लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है।
संतानहीन (निपुत्री) निपुत्री ने पुत्र होवे। जो स्त्री संतानहीन है, उसे माता गौरी की कृपा से सुयोग्य और दीर्घायु पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है।
विरही जन बिछुड्यां ने मेल होवे। जो परिवार या पति-पत्नी किन्हीं कारणों से बिछुड़ गए हैं, उनका पुनः मिलन होता है।
सुहागिन स्त्री सांईं रा दर्शन दीजो, गादी रो बेसन दीजो। पति के दर्शन सदैव प्राप्त हों और पति को उच्च आसन (राज-गद्दी या सम्मान) प्राप्त हो।
गृह स्वामिनी सासु रो पुरण दीजो, बहू रो जीमन दीजो। सास को अन्न दान (पुरण) का सौभाग्य मिले और बहू को सुखपूर्वक भोजन (जीमन) प्राप्त हो।
वृद्ध जन बेटा-पोता रो राज दीजो। परिवार में पुत्र और पौत्रों का सुख-साम्राज्य स्थापित हो और वंश वृद्धि हो।
समृद्धि की कामना पोता राँधी राबड़ी, दोता राँधी खीर। मीठी लागे राबड़ी, खाटी लागे खीर। गिलोड़ी में घी दीजो, तिलोड़ी में तेल। पीहर और ससुराल दोनों पक्षों में इतनी समृद्धि हो कि साधारण भोजन (राबड़ी) भी खीर से अधिक मीठा लगे और घर में घी-तेल के भंडार कभी खाली न हों।

हे गणगौर माता! हम सबको अमर सुहाग देना । कथा कहने वाले का, कथा सुनने वाले का, और हुंकार भरने वाले (कथा के बीच में हामी भरने वाले) का — सबका कल्याण करना । चंदन जैसी सुगन्धित महक हम सभी के जीवन में वरदान स्वरूप देना ।

बोलिए माता पार्वती और भगवान भोलेनाथ की जय!

बोलिए गणगौर माता की जय!

बोलिए श्री गणेश जी महाराज की जय!

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