जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रमाण-आधारित व्रत कथा
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ
व्रत-श्रवण की पारंपरिक भूमिका एवं पावन संदर्भ
सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन, पवित्र और लोकमंगलकारी परंपराओं में जीवित्पुत्रिका व्रत (जिसे लोक-परंपरा और क्षेत्रीय बोलचाल में 'जिउतिया' या 'जीउतिया' व्रत भी कहा जाता है) का स्थान अत्यंत विशिष्ट एवं अतुलनीय है । आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनी अष्टमी तिथि को सौभाग्यवती माताओं द्वारा अपनी संतानों की दीर्घायु, उनके जीवन की समस्त संकटों से रक्षा, अखंड आरोग्य, और वंश-वृद्धि की मंगल कामना से यह महाव्रत किया जाता है । पारंपरिक व्रत-विधान और पौराणिक ग्रंथों के अंतर्गत, इस व्रत की पूर्णता, सिद्धि और अभीष्ट फलाप्ति के लिए व्रत-कथा का एकाग्रचित्त होकर श्रवण अनिवार्य माना गया है । लोक और शास्त्रीय मान्यताओं में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि जब तक इस व्रत से जुड़ी पारंपरिक कथाओं का वाचन और श्रवण न किया जाए, तब तक यह कठिन निर्जला व्रत अपूर्ण ही माना जाता है और इसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता ।
इस परम पावन व्रत-कथा का मूल संदर्भ विभिन्न पुराणों, विशेषकर 'भविष्य पुराण' और 'स्कंद पुराण', तथा पीढ़ियों से चली आ रही लोक-प्रचलित प्रामाणिक धर्म-कथाओं से प्राप्त होता है । कथा का पारंपरिक आरंभ नैमिषारण्य के उस पवित्र तपोवन से होता है, जहाँ ज्ञान और वैराग्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनि संसार के कल्याणार्थ एकत्रित हुए थे। कथा का वाचन साक्षात् सूतजी महाराज द्वारा किया गया है, जिन्होंने इसे महर्षि व्यास और अन्य देव-तुल्य ऋषियों से श्रवण किया था。
पारंपरिक आरंभिक वाक्य एवं प्रसंग-स्थापना: "एक समय की बात है, परम पवित्र और समस्त पापों का नाश करने वाले नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषियों ने संसार के कल्याण और प्राणियों के सर्वस्व हित की कामना से सूतजी महाराज से एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न किया । ऋषियों ने अत्यंत विनीत भाव से पूछा, 'हे महाज्ञानी सूतजी! द्वापर युग के अंत और घोर कलियुग के आरंभिक प्रभाव वाले इस कठिन काल में, जब प्राणियों की आयु निरंतर क्षीण हो रही है, चारो ओर नाना प्रकार के आधि-व्याधि, रोग-शोक और संकट व्याप्त हैं, तब माताएँ अपनी प्रिय संतानों की अकाल मृत्यु से रक्षा और उनकी चिरंजीवी आयु के लिए कौन सा उपाय करें? वह कौन सा व्रत या अनुष्ठान है, जिसके प्रभाव से यमराज भी बालकों के प्राण हरण करने में असमर्थ हो जाएं?' ।
ऋषियों के इस अत्यंत लोक-कल्याणकारी और करुणा से भरे प्रश्न को सुनकर सूतजी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, 'हे तपोनिष्ठ मुनिजनों! आप सभी ने प्राणियों के हित की अत्यंत उत्तम बात पूछी है । इसलिए मैं आप लोगों को एक ऐसे श्रेष्ठ, दिव्य और प्रभावकारी व्रत की कथा सुनाऊँगा, जो माताओं के लिए कल्पवृक्ष के समान है और जिसके प्रभाव से मृत बालक भी जीवित हो उठते हैं। यह वही परम पवित्र कथा है जिसे पूर्वकाल में महर्षि गौतम ने दुखी और चिंतित स्त्रियों के समक्ष वर्णित किया था । यही नहीं, महाभारत के विनाशकारी युद्ध के पश्चात्, जब अपने पांचों पुत्रों के निर्मम वध से अत्यंत शोकाकुल और व्यथित द्रौपदी रुदन कर रही थीं, तब उन्हें सांत्वना देते हुए महर्षि धौम्य ने भी इसी कथा का गान किया था । हे मुनिजनों! आप सभी अत्यंत ध्यान और श्रद्धा-भाव से इस 'जीवित्पुत्रिका' व्रत की महिमा और इसकी कथा का श्रवण करें, जो समस्त पापों का क्षय करने वाली और संतानों को वज्र के समान आयु प्रदान करने वाली है।"
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
जीवित्पुत्रिका व्रत की असीम महिमा का गुणगान करने वाली तीन प्रमुख कथाएँ पारंपरिक रूप से वाचित और श्रवण की जाती हैं। इनमें पहली लोक-परंपरा में अत्यंत गहराई से रची-बसी "चील और सियारिन (चिल्हो-सियारो) की कथा" है; दूसरी शास्त्रीय और पौराणिक आधार (भविष्य पुराण) वाली "राजा जीमूतवाहन के महान त्याग और नाग-बलि की कथा" है; और तीसरी महाभारत-काल से जुड़ी "भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ की रक्षा (परीक्षित प्रसंग)" की कथा है । इन तीनों प्रसंगों का एक-एक बिंदु, पूर्ण और क्रमबद्ध विस्तार नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है。
प्रसंग १: चील और सियारिन (चिल्हो-सियारो) की कथा
यह कथा व्रत की निष्ठा, संकल्प की दृढ़ता, मन की पवित्रता और क्षुधा के वशीभूत होकर व्रत-भंग करने के भयंकर परिणामों का प्रत्यक्ष और मार्मिक प्रमाण है। यह इस बात को स्थापित करती है कि देव-कार्य में कपट और असत्य का परिणाम जन्म-जन्मांतर तक भोगना पड़ता है。
दो स्त्रियों (चील-सियारिन) का परिचय और संकल्प
प्राचीन काल की बात है, पुण्यतोया नर्मदा नदी के पावन तट पर एक अत्यंत सघन, एकांत और विस्तृत वन स्थित था । उस विशाल वन के मध्य में एक अत्यंत पुराना और विशालकाय सेमर (जिसे कई स्थानों पर पाकड़ का वृक्ष भी कहा जाता है) का वृक्ष अपनी सघन शाखाओं के साथ खड़ा था । उस गगनचुंबी वृक्ष की सबसे ऊंची और सुरक्षित डाल पर एक चील (लोक भाषा में 'चिल्हो') ने अपना घोंसला बना रखा था, जहाँ वह निवास करती थी। उसी सेमर के वृक्ष के ठीक नीचे, उसकी उलझी हुई जड़ों के मध्य स्थित एक घनी और अंधकारमयी झाड़ी में एक सियारिन (जिसे 'सियारो' या लोमड़ी भी कहा जाता है) का निवास था ।
एक ही वृक्ष के ऊपर और नीचे निवास करने के कारण चील और सियारिन के बीच अत्यंत घनिष्ठ और अगाध मित्रता हो गई थी । उनकी मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि वे दोनों एक साथ ही वन में विचरण करती थीं, एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करती थीं और यहाँ तक कि अपना प्राप्त किया हुआ भोजन भी मिल-बांटकर ही ग्रहण करती थीं ।
समय अपनी गति से बीत रहा था। एक बार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के पुनीत दिन, उन दोनों सखियों ने वन के समीप स्थित एक गाँव की सौभाग्यवती स्त्रियों को वन के एक पवित्र स्थान पर एकत्रित होते देखा । वे स्त्रियाँ अत्यंत श्रद्धा, पवित्रता और भक्ति-भाव से जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का कठिन अनुष्ठान कर रही थीं । स्त्रियों को कथा कहते-सुनते, पूजन-अर्चन करते और निर्जला उपवास के कठोर नियमों का पालन करते देख चील के मन में अत्यंत कौतूहल और जिज्ञासा उत्पन्न हुई ।
चील ने ध्यानपूर्वक उन स्त्रियों की बातें सुनीं और उसे ज्ञात हुआ कि यह अनुष्ठान संतानों की रक्षा के लिए किया जा रहा है। उसने तुरंत अपनी प्रिय सखी सियारिन से कहा, "हे सखी! तनिक देखो तो, ये मनुष्य योनि की स्त्रियाँ अपनी संतानों की मंगल-कामना, उनके सुखी जीवन और उनकी दीर्घायु के लिए यह कितना कठिन निर्जला व्रत कर रही हैं। यह जीवित्पुत्रिका का महान व्रत है। क्यों न हम दोनों भी अपनी भावी संतानों की सुख-समृद्धि, लंबी आयु और सुरक्षा के लिए भगवान जीमूतवाहन का यह परम कल्याणकारी व्रत आज ही संपन्न करें?" । सियारिन ने भी चील के इस मंगलकारी प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया और चील की बात का समर्थन किया। दोनों सखियों ने अपने अंतःकरण से यह दृढ़ संकल्प लिया कि वे भी उन स्त्रियों की भांति ही पूरे दिन और पूरी रात पूर्णतः निर्जला (बिना जल की एक बूंद भी ग्रहण किए) उपवास करेंगी और पूर्ण निष्ठा से भगवान जीमूतवाहन की आराधना करेंगी ।
व्रत-पालन की परीक्षा और सियारिन द्वारा व्रत-भंग की घटना
संकल्प के अनुसार, दोनों ने प्रातःकाल से ही अपना व्रत आरंभ कर दिया। दिन का समय तो जैसे-तैसे वन के दृश्यों को देखते हुए और एक-दूसरे को सांत्वना देते हुए व्यतीत हो गया। दोनों ने भगवान जीमूतवाहन का मन ही मन स्मरण करते हुए संध्याकाल की पूजा भी मानसिक रूप से संपन्न कर ली 9। परंतु जैसे ही सूर्य अस्त हुआ और रात्रि का अंधकार गहराने लगा, वन के निस्तब्ध वातावरण में सियारिन की जन्मजात पाशविक प्रवृत्तियाँ और क्षुधा (भूख) बलवती होने लगीं。
दुर्भाग्यवश, नियति को सियारिन की निष्ठा की परीक्षा लेनी थी। उसी दिन समीप के नगर के एक अत्यंत धनी व्यापारी (सेठ) की मृत्यु हो गई थी और उसके परिजनों द्वारा उसका शव वन के उसी श्मशान और निर्जन स्थान में दाह-संस्कार हेतु लाया गया था जो उस सेमर के वृक्ष से अधिक दूर नहीं था । जैसे ही शव वहां पहुंचा, हवा के साथ उड़कर आती हुई उस गंध ने सियारिन के नथुनों में प्रवेश किया। गंध पाते ही सियारिन के पेट में भूख की भयंकर अग्नि प्रज्वलित हो उठी ।
सियारिन ने अपनी तीव्र भूख को नियंत्रित करने का बहुत प्रयास किया। वह बार-बार करवटें बदलती और अपनी सखी चील को देखती जो शांत भाव से वृक्ष की डाल पर बैठी भगवान का ध्यान कर रही थी। परंतु सियारिन के लिए वह क्षुधा असहनीय हो गई। व्रत की निष्ठा और संकल्प पर उसकी तामसिक पाशविक क्षुधा पूरी तरह हावी हो गई। वह भूख-प्यास से इतनी व्याकुल और विक्षिप्त हो उठी कि व्रत के कठोर नियमों और अपने द्वारा लिए गए पवित्र संकल्प को पूरी तरह विस्मृत कर बैठी। आधी रात के घोर अंधकार में, जब उसे लगा कि चील सो रही है, वह चुपके से उठी और श्मशान की ओर चली गई । वहां पहुंचकर, शव को देखकर वह स्वयं को रोक न सकी और उसने उस मृत शरीर का मांस खा लिया तथा हड्डियाँ चबाने लगी ।
ऊपर वृक्ष की डाल पर बैठी चील सोई नहीं थी, बल्कि अत्यंत संयम और अगाध श्रद्धा के साथ जागृत अवस्था में अपना व्रत कर रही थी। रात्रि के उस डरावने सन्नाटे में चील के कुशाग्र कानों में हड्डियाँ चबाने की वह 'कड़क-कड़क' ध्वनि स्पष्ट रूप से पड़ी । उसने नीचे झांककर देखा कि सियारिन अपने स्थान पर नहीं है। उसने अंधकार में श्मशान की ओर देखते हुए सियारिन से पुकार कर पूछा, "हे सखी! यह कड़कड़ाने की कैसी ध्वनि आ रही है? क्या तुम कुछ खा रही हो? क्या तुमने अपना व्रत तोड़ दिया है?"
सियारिन, जो अपना व्रत भंग करने का महापाप कर चुकी थी, अत्यंत लज्जित और भयभीत हुई। उसने अपनी महान भूल को छिपाने के लिए अपनी मित्र के साथ असत्य का सहारा लिया। उसने ऊपर देखते हुए उत्तर दिया, "नहीं सखी! भला मैं अपना संकल्प कैसे तोड़ सकती हूँ? मैंने कुछ भी नहीं खाया है। दिन भर के निर्जला उपवास और भयंकर भूख के कारण मेरी आंतें सिकुड़ रही हैं और मेरे पेट में अत्यंत गुड़गुड़ाहट हो रही है, यह उसी की ध्वनि है जो तुम्हें सुनाई पड़ रही है" ।
परंतु चील की दृष्टि अत्यंत कुशाग्र थी और वह अपनी सखी के स्वभाव को भली-भांति जानती थी। उसे तनिक भी विलंब न लगा सियारिन के असत्य को पहचानने में। चील ने सियारिन को अत्यंत कठोर शब्दों में फटकारते हुए कहा, "हे सखी! तुमने यह क्या अनर्थ कर डाला? जब तुम इस कठिन निर्जला व्रत का पवित्र संकल्प पूर्ण करने में सर्वथा असमर्थ थीं, तो तुमने मेरी देखा-देखी यह व्रत रखा ही क्यों? तुमने न केवल अपना उपवास तोड़ा है, बल्कि इस देव-समान व्रत के साथ छल किया है और मुझसे झूठ बोलकर महापाप भी किया है। अब भगवान जीमूतवाहन ही तुम्हारे इस कृत्य का न्याय करेंगे" ।
सियारिन चील की फटकार सुनकर अत्यंत लज्जित और ग्लानि से भर गई, परंतु अब तीर कमान से निकल चुका था, व्रत भंग हो चुका था और अनर्थ हो गया था। उधर, चील ने तनिक भी विचलित हुए बिना अत्यंत संयम, अगाध श्रद्धा और कठोर नियम के साथ पूरी रात निर्जला उपवास किया और अगले दिन सूर्योदय होने के पश्चात् ही विधि-विधान से अपने व्रत का पारण किया ।
परिणामस्वरूप संतानों की स्थिति (पुनर्जन्म का प्रसंग)
कालचक्र अपनी गति से चलता रहा और दोनों की वन में ही आयु पूर्ण होने पर मृत्यु हो गई। परंतु, व्रत के पूर्ण प्रभाव और व्रत-भंग के कर्मों का फल दोनों को उनके अगले जन्म में भोगना ही था。
अपने अगले जन्म में, चील और सियारिन दोनों ने अयोध्या नगरी के एक अत्यंत धनी, प्रतिष्ठित और संभ्रांत व्यापारी (कई लोक-प्रसंगों में राजा या उच्च कुल) के घर में मनुष्य रूप में कन्याओं के रूप में जन्म लिया । इस जन्म में दोनों सगी बहनें थीं। क्षुधा के वशीभूत होकर व्रत भंग करने वाली सियारिन बड़ी बहन के रूप में उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'कपूरावती' रखा गया। वहीं, अगाध निष्ठापूर्वक व्रत पूर्ण करने वाली चील छोटी बहन के रूप में उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'शीलवती' रखा गया ।
समय के साथ दोनों कन्याएँ लाड़-प्यार से बड़ी हुईं और विवाह योग्य हो गईं। उनके पिता ने दोनों का विवाह अत्यंत उच्च कुलों में संपन्न कराया। बड़ी बहन कपूरावती (पूर्व जन्म की सियारिन) का विवाह उस राज्य के प्रतापी राजा (या राजकुमार) के साथ संपन्न हुआ और वह उस विशाल राज्य की पटरानी बन गई । वहीं, छोटी बहन शीलवती (पूर्व जन्म की चील) का विवाह उसी राज्य के राज-मंत्री के एक अत्यंत सुयोग्य पुत्र (जिसका नाम बुद्धिसेन था) के साथ संपन्न हुआ ।
विवाह के पश्चात् दोनों अपने-अपने घरों में जीवन व्यतीत करने लगीं। परंतु यहीं से उनके पूर्व जन्म के कर्मों का फल परिलक्षित होना आरंभ हुआ। रानी कपूरावती जब भी गर्भवती होती और किसी सुंदर संतान (पुत्र) को जन्म देती, तो वह बालक जन्म लेते ही या कुछ ही दिनों में अज्ञात कारणों से मृत्यु को प्राप्त हो जाता । पूर्व जन्म में जीवित्पुत्रिका व्रत का अनादर करने, संकल्प भंग करने और असत्य बोलने के भयंकर पाप-स्वरूप उसके भाग्य में संतान-सुख सर्वथा नहीं था। वह बार-बार पुत्रों को जन्म देती और वे अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाते。
इसके सर्वथा विपरीत, मंत्री-पत्नी शीलवती (पूर्व जन्म की चील) पर भगवान जीमूतवाहन की असीम कृपा थी। पूर्व जन्म में उसके द्वारा किए गए कठिन और निष्ठापूर्ण व्रत के प्रताप से शीलवती को सात (लोक-प्रसंगों के कुछ अन्य भेदों में आठ) अत्यंत सुंदर, हट्टे-कट्टे, स्वस्थ, और तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति हुई । शीलवती के सभी सातों पुत्र अजर-अमर और दीर्घायु हुए। जब वे बड़े हुए, तो अपनी-अपनी योग्यता और शौर्य के अनुसार वे सभी राजा के दरबार में ही उच्च पदों पर कार्य करने लगे ।
ईर्ष्या, भयंकर षड्यंत्र और दैवीय हस्तक्षेप
अपनी सदैव सूनी रहने वाली गोद और दूसरी ओर अपनी छोटी बहन शीलवती के घर में सात-सात स्वस्थ पुत्रों की किलकारियों को देखकर रानी कपूरावती के मन में भयंकर ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी । अपनी बहन के प्रति उसका प्रेम पूरी तरह से ईर्ष्या में परिवर्तित हो गया। जब शीलवती के पुत्र राजदरबार में काम करने लगे, तो रानी कपूरावती उन्हें देखकर जल-भुन जाती थी। अंततः, उसने मन ही मन शीलवती के सातों पुत्रों का समूल विनाश करने का अत्यंत क्रूर निश्चय कर लिया。
एक दिन, ईर्ष्या से पूरी तरह अंधी हो चुकी रानी ने राजा को अपने मोहपाश, हठ और झूठे आरोपों में फांस लिया और उनसे शीलवती के सातों पुत्रों का वध करने का कठोर आदेश पारित करवा दिया । राजा के जल्लादों ने उन सातों निर्दोष बालकों को पकड़ा और अत्यंत निर्ममता से उनके सिर धड़ से अलग कर दिए। रानी का प्रतिशोध यहीं नहीं रुका। उसने शीलवती को मानसिक आघात पहुंचाने के लिए उन सातों कटे हुए सिरों को सात नए बर्तनों (डिब्बों) में रखवाया, उन्हें ऊपर से लाल रंग के कपड़े से भली-भांति ढंकवा दिया और उन्हें उपहार का रूप देकर एक दूत के हाथों अपनी छोटी बहन शीलवती के घर भिजवा दिया । रानी अपने महल में यह सोचकर अत्यंत प्रसन्न हो रही थी कि जब शीलवती इन डिब्बों को खोलेगी और अपने हृदय के टुकड़ों के कटे हुए रक्त-रंजित शीश देखेगी, तो वह शोक के मारे वहीं तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग देगी。
परंतु, रानी यह भूल गई थी कि शीलवती की रक्षा स्वयं भगवान कर रहे हैं। शीलवती ने तो पूर्व जन्म में भी और इस जन्म में भी भगवान जीमूतवाहन का अत्यंत श्रद्धापूर्वक और नियमबद्ध जीवित्पुत्रिका व्रत किया था । भगवान जीमूतवाहन अपने सच्चे भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। जैसे ही उन बालकों के शीश काटे गए, परम कृपालु भगवान जीमूतवाहन ने तत्काल वहां प्रकट होकर पवित्र मिट्टी से उन सातों भाइयों के वैसे ही नए सिर बनाए और उनके धड़ों से जोड़ दिए। तदुपरांत, उन्होंने नागलोक से लाया हुआ दिव्य 'अमृत' उन पर छिड़क दिया । अमृत की बूंदें पड़ते ही, चमत्कारिक रूप से सातों युवक उसी क्षण जीवित हो उठे। वे ऐसे उठ खड़े हुए मानो गहरी नींद से जागे हों, और हंसते-खेलते सकुशल अपने घर लौट आए ।
दूसरी ओर, जो कटे हुए शीश रानी ने लाल कपड़े में बांधकर डिब्बों में भेजे थे, वे भगवान जीमूतवाहन की असीम और चमत्कारिक कृपा से सुस्वादु फलों, मिष्ठानों और सुंदर आभूषणों (उपहारों) में परिवर्तित हो गए । जब दूत ने वे डिब्बे शीलवती को दिए और शीलवती ने उन्हें खोला, तो उसे उनमें से केवल सुगंधित मिष्ठान और ताजे फल ही प्राप्त हुए। उसके सातों बच्चों का बाल भी बांका नहीं हुआ था और वे सभी सकुशल उसके सामने खड़े थे ।
पश्चाताप, सत्य का प्रकटीकरण और अनुकरण
रानी कपूरावती अपने विशाल राजमहल में बड़ी व्याकुलता और अधीरता से इस सूचना की प्रतीक्षा कर रही थी कि उसकी बहन बुद्धिसेन के घर से विलाप, रुदन और क्रंदन की ध्वनियां कब आती हैं । जब काफी समय व्यतीत हो जाने पर भी मंत्री के घर से कोई शोक-संदेश नहीं आया और न ही रोने की कोई आवाज़ आई, तो रानी से रहा नहीं गया। वह अपनी दुष्ट योजना का परिणाम अपनी आँखों से देखने के लिए स्वयं अपनी बहन के घर जा पहुंची ।
वहां पहुंचकर उसने जो दृश्य देखा, उस पर उसे अपने नेत्रों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने देखा कि शीलवती के सातों पुत्र तो पूर्णतः स्वस्थ, प्रसन्न और जीवित अवस्था में आंगन में खेल रहे हैं और शीलवती उन्हें स्नेह कर रही है। यह अद्भुत, अकल्पनीय और अविश्वसनीय दृश्य देखकर रानी कपूरावती के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह ईर्ष्या, आश्चर्य और भय से सन्न रह गई और चक्कर खाकर वहीं मूर्छित (बेहोश) होकर गिर पड़ी ।
जब उपचार के पश्चात् उसे होश आया, तो उसका सारा अहंकार टूट चुका था। उसने रोते हुए अपनी बहन शीलवती को अपने द्वारा रचे गए क्रूर षड्यंत्र, राजा से वध करवाने और उन कटे हुए शीशों को लाल कपड़े में भेजने की पूरी भयानक कथा सच-सच कह सुनाई ।
रानी के मुख से यह सब सुनकर शीलवती अत्यंत विस्मित हुई और उसने तत्काल भगवान जीमूतवाहन का स्मरण किया। उसी क्षण, ईश्वर की महती कृपा और व्रत के प्रताप से शीलवती को अपने पूर्व जन्म की सभी स्मृतियां चलचित्र की भांति स्मरण हो आईं । उसे नर्मदा तट का वह विशाल सेमर का पेड़, सियारिन की घनिष्ठ मित्रता, स्त्रियों का व्रत करना, और व्रत-भंग की वह भयानक रात्रि स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी。
शीलवती तुरंत अपनी बड़ी बहन कपूरावती का हाथ पकड़कर उसे वन में उसी पुराने विशाल पाकड़ (सेमर) के वृक्ष के पास ले गई । उस वृक्ष के नीचे पहुंचकर शीलवती ने रानी को उसके पूर्व जन्म का सारा वृत्तांत विस्तारपूर्वक सुनाया。
शीलवती ने कहा, "हे दीदी! पूर्व जन्म में तुम कोई और नहीं बल्कि एक सियारिन थीं और मैं तुम्हारी अभिन्न सखी एक चील थी। हम दोनों ने इसी वृक्ष के नीचे जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) का वह महान व्रत रखा था। परंतु तुमने क्षुधा-पीडित होकर रात्रि में श्मशान में जाकर मुर्दे का मांस भक्षण कर लिया था और अपना वह परम पवित्र व्रत भंग कर दिया था । तुमने भगवान के साथ भी छल किया था। हे दीदी! उसी घोर पाप के फलस्वरूप इस जन्म में तुम्हारे पुत्र जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं और तुम्हारे मन में मेरे प्रति ईर्ष्या ने जन्म लिया। मैंने वह व्रत पूर्ण निष्ठा और नियम से निर्जला पूरा किया था, जिसके पुण्य प्रताप से मेरे पुत्र आज अजर-अमर और दीर्घायु हैं। भगवान जीमूतवाहन की कृपा से वे तुम्हारे प्राणघातक षड्यंत्र से भी जीवित बच गए" ।
अपनी पूर्व जन्म की पशु योनि, अपनी मूर्खता, और इस जन्म में अपनी ही सगी बहन के बालकों की हत्या करने जैसे जघन्य पाप का बोध होते ही रानी कपूरावती असीम पश्चाताप की अग्नि में जल उठी। (कथा के एक पारंपरिक संस्करण के अनुसार, रानी कपूरावती इस भयंकर अपराधबोध, ग्लानि और मानसिक आघात को सहन नहीं कर सकी और उसी पाकड़ के पेड़ के नीचे चक्कर खाकर गिर पड़ी और वहीं उसने अपने प्राण त्याग दिए, जिसके पश्चात् राजा ने दुखी मन से वहीं उसका दाह-संस्कार करवा दिया ।
जबकि कथा के एक अन्य अति-प्रचलित, लोक-मान्य और मंगलकारी संस्करण के अनुसार, रानी ने अपनी महान भूल के लिए फूट-फूटकर रोते हुए भगवान जीमूतवाहन और अपनी बहन से क्षमा याचना की। शीलवती का हृदय अपनी बहन के लिए पसीज गया। उसने रानी को धैर्य बंधाया और उसे पुनः विधि-विधान से आश्विन कृष्ण अष्टमी को जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत करने का मार्ग दिखाया। रानी कपूरावती ने अगले वर्ष सच्चे हृदय, पूर्ण निष्ठा और पश्चाताप के आंसुओं के साथ भगवान शिव, माता पार्वती और जीमूतवाहन की पूजा कर निर्जला व्रत का पालन किया। उसके इस सच्चे प्रायश्चित से भगवान जीमूतवाहन ने उसके सभी पूर्व जन्म के पापों को क्षमा कर दिया और तदुपरांत रानी को भी सुंदर और दीर्घायु संतानों की प्राप्ति हुई ।)
इस प्रकार चील और सियारिन की यह कथा जीवित्पुत्रिका व्रत की असीम महिमा और नियम-निष्ठा का शाश्वत प्रमाण बन गई。
| पात्र का विवरण | चील (चिल्हो) / शीलवती | सियारिन (सियारो) / कपूरावती |
|---|---|---|
| पूर्व जन्म में योनि | चील (वृक्ष की डाल पर निवास) | सियारिन/लोमड़ी (वृक्ष की जड़ों में निवास) |
| व्रत का संकल्प एवं पालन | निर्जला व्रत लिया और पूर्ण निष्ठा से पालन किया | निर्जला व्रत लिया परंतु मध्यरात्रि में क्षुधावश श्मशान में मांस भक्षण कर व्रत भंग किया |
| पुनर्जन्म में स्थिति | शीलवती (राज-मंत्री बुद्धिसेन की पत्नी) | कपूरावती (राज्य की पटरानी) |
| संतानों का प्रारब्ध | सात (या आठ) स्वस्थ, दीर्घायु और तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए | सभी पुत्र जन्म लेते ही काल-कवलित (मृत्यु को प्राप्त) हो गए |
| कथा का निष्कर्ष | भगवान की कृपा से बच्चों की रक्षा हुई | पश्चाताप और पुनः व्रत करने पर ही संतान-सुख प्राप्त हुआ |
प्रसंग २: राजा जीमूतवाहन की कथा और नाग-बलि का प्रसंग
चील और सियारिन की लोक-कथा के पश्चात्, यह कथा जीवित्पुत्रिका व्रत का सबसे प्रमुख और शास्त्रीय (भविष्य पुराण और स्कंद पुराण पर आधारित) आधार है । इसमें राजा जीमूतवाहन के महान त्याग, असीम करुणा और परोपकार का अत्यंत मार्मिक और विस्तृत वर्णन है, जो यह सिद्ध करता है कि दूसरों की संतान की रक्षा करने वाले की संतानों की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं ।
राजा जीमूतवाहन का त्याग और वैराग्य
सत्ययुग के पवित्र कालखंड में, सूर्यवंशी राजा शालिवाहन और उनकी धर्मपत्नी माता शैव्या के यहाँ एक अत्यंत धर्मनिष्ठ, समदर्शी, दयालु और प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम जीमूतवाहन था । जीमूतवाहन गंधर्वों के राजकुमार थे और जन्म से ही उनके मुख पर देव-तुल्य तेज विद्यमान था। जब जीमूतवाहन युवा हुए, तो उनके वृद्ध पिता राजा शालिवाहन ने उन्हें राजसिंहासन सौंप दिया और स्वयं विश्राम करने लगे । यद्यपि जीमूतवाहन एक अत्यंत कुशल और न्यायप्रिय शासक थे, परंतु उनका मन राजमहलों के सांसारिक भोग-विलास, ऐश्वर्य और राज-पाट में तनिक भी नहीं लगता था। उनके हृदय में वैराग्य, करुणा और परोपकार की भावना कूट-कूटकर भरी थी。
अंततः, संसार की नश्वरता को जानकर उन्होंने अपना संपूर्ण राज-पाट और राज्य का भारी दायित्व अपने छोटे भाइयों को सौंप दिया और स्वयं राजसी वस्त्र त्यागकर, अपने वृद्ध माता-पिता की निरंतर सेवा करने हेतु वन (वानप्रस्थ आश्रम) की ओर प्रस्थान कर गए । मलय पर्वत के शांत और पवित्र वनों में रहते हुए उनका विवाह मलयवती नामक एक अत्यंत सुशील राजकन्या से संपन्न हुआ ।
नाग-बलि का प्रसंग एवं नाग-माता का हृदयविदारक क्रंदन
एक दिन वन के एकांत में विचरण करते हुए, राजा जीमूतवाहन ने बहुत दूर से किसी के अत्यंत हृदयविदारक और करुण विलाप की ध्वनि सुनी । वह रुदन इतना मार्मिक था कि किसी भी पाषाण हृदय को भी पिघला दे। उस रुदन का अनुसरण करते हुए वे जब बहुत आगे एक पहाड़ी के समीप गए, तो उन्होंने देखा कि एक अत्यंत वृद्ध स्त्री जमीन पर बैठी फूट-फूट कर विलाप कर रही है और उसके समीप ही एक अत्यंत सुंदर और युवा नाग-कुमार उदास मुख लिए खड़ा है ।
जीमूतवाहन का दयालु हृदय यह दृश्य देखकर द्रवित हो उठा। उन्होंने उस वृद्धा के पास जाकर अत्यंत नम्रतापूर्वक पूछा, "हे माता! तुम इस एकांत वन में इस प्रकार छाती पीट-पीटकर क्यों क्रंदन कर रही हो? तुम्हारे इस असहनीय दुख का क्या कारण है? मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?" ।
वृद्धा ने अपने आंसू पोंछते हुए राजा की ओर देखा और अत्यंत क्षीण व आर्त स्वर में उत्तर दिया, "हे महात्मन्! मैं नागवंश की एक अत्यंत अभागी माता हूँ। हमारे नागवंश और पक्षिराज गरुड़ (भगवान विष्णु के वाहन) के बीच एक अत्यंत क्रूर समझौता हुआ है। गरुड़ के नित्य के भयंकर क्रोध और संपूर्ण नागवंश के समूल विनाश से बचने के लिए, नागराज वासुकि ने यह व्यवस्था की है कि प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के आहार के रूप में उनके समक्ष सौंपा जाएगा । गरुड़ नित्य आते हैं और वासुकि द्वारा भेजे गए एक नाग का भक्षण करते हैं, जिसके कारण यहाँ वध्य-शिला (बलिदान की चट्टान) के पास मृत नागों की अस्थियों का एक विशाल पहाड़ एकत्रित हो गया है । हे दयालु पुरुष! आज इस भयंकर बलि-प्रथा में मेरे इकलौते और प्राणों से प्रिय पुत्र 'शंखचूड़' की बारी आ गई है । कुछ ही समय पश्चात, आकाश को चीरते हुए पक्षिराज गरुड़ आते ही होंगे और मेरे इस बुढ़ापे के एकमात्र सहारे को मेरे ही समक्ष अपना ग्रास बना लेंगे। हा विधाता! मैं अपने इस सुंदर पुत्र के बिना जीवित कैसे रहूंगी? मेरा तो सर्वस्व लुटने वाला है!" यह कहते हुए वृद्धा पुनः पछाड़ खाकर गिर पड़ी ।
महान त्याग, करुणा और वध्य-शिला का वर्णन
वृद्धा माता के इस दारुण दुख और करुण पुकार को देखकर दयानिधि जीमूतवाहन का हृदय करुणा के सागर में डूब गया। उन्होंने वध्य-शिला पर पड़ी उन सहस्रों अस्थियों को देखा और मन ही मन विचार किया, "यह कैसा कुटिल समझौता है! और यदि मैं इस क्षणभंगुर और नाशवान शरीर से इस दुखी माता के पुत्र की रक्षा न कर सका, तो मेरे इस मानव जन्म और मेरे जीवन को धिक्कार है! परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं है।" ।
जीमूतवाहन ने अत्यंत दृढ़ता और वात्सल्य के साथ वृद्धा से कहा, "हे माता! तुम तनिक भी रुदन मत करो। तुम्हारे इन तप्त अश्रुओं ने मेरे हृदय को विदीर्ण कर दिया है। मैं वचन देता हूँ कि आज तुम्हारे पुत्र पर कोई आंच नहीं आएगी। तुम्हारे पुत्र के स्थान पर आज मैं स्वयं अपना शरीर पक्षिराज गरुड़ को आहार के रूप में इस वध्य-शिला पर समर्पित करूँगा" ।
राजा के मुख से यह देव-तुल्य बात सुनकर युवा शंखचूड़ ने इसका कड़ा विरोध किया और हाथ जोड़कर कहा, "हे महात्मा! आपने एक अजनबी नाग के लिए बड़ी कृपालुता प्रकट की है, परंतु मैं अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपके जैसे महान और पुण्यात्मा पुरुष का बलिदान हरगिज़ स्वीकार नहीं करूँगा। आप देव-तुल्य हैं, मणि को बचाने लिए पत्थर की रक्षा नहीं की जाती, अपितु पत्थर को नष्ट कर मणि को बचाया जाता है। आपको अपना जीवन खोना नहीं चाहिए।" इतना कहकर, अपने अंतिम क्षणों को समीप जानकर, शंखचूड़ अपनी माता को समझा-बुझाकर वहां से विदा कर, समुद्र तट पर स्थित भगवान गोकर्ण (शिव) के अंतिम दर्शन और वंदना के लिए चला गया ।
परंतु जीमूतवाहन अपने प्राणों का मोह त्याग चुके थे और वे अपने परोपकार के संकल्प से तनिक भी नहीं डिगे। जैसे ही उन्होंने देखा कि आकाश में अत्यंत तेज भयंकर वायु चलने लगी है और बड़े-बड़े वृक्षों के पत्ते और डालियां तेजी से हिलने लगी हैं, जीमूतवाहन समझ गए कि गरुड़ के आगमन का समय हो गया है । उन्होंने शंखचूड़ द्वारा छोड़े गए बलि के लाल रंग के वस्त्र को उठाया, उसे अपने शरीर पर लपेटा और पूर्णतः निर्भय होकर उस मृत्यु की शय्या (लाल रक्त से सनी वध्य-शिला) पर लेट गए और भगवान का स्मरण करने लगे ।
कुछ ही क्षणों में, एक भयंकर आंधी उठी और अपने विशाल पंखों से आकाश को पूरी तरह आच्छादित करते हुए, पक्षिराज गरुड़ अत्यंत तीव्र गति से वहां आ पहुंचे। गरुड़ ने अपनी तीक्ष्ण चोंच और वज्र के समान पंजों से लाल वस्त्र में लिपटे जीमूतवाहन को कसकर पकड़ा और उन्हें लेकर एक अत्यंत ऊंचे पर्वत के शिखर पर उड़ गए । पर्वत शिखर पर बैठकर गरुड़ ने जीमूतवाहन के शरीर को अपनी चोंच से चीरना आरंभ किया और उनके बाएँ अंग का मांस नोच-नोच कर खाने लगे ।
दैवीय हस्तक्षेप, गरुड़ का पश्चाताप और जीवन-रक्षा
गरुड़ जब जीमूतवाहन का रक्त-रंजित मांस खा रहे थे, तब उन्होंने एक अत्यंत आश्चर्यजनक और अभूतपूर्व घटना देखी। गरुड़ का यह अनुभव था कि वे जिसका भी भक्षण करते थे, वह नाग भय और पीड़ा से चीखता था, छटपटाता था और अपने प्राणों की भीख मांगता था। परंतु आज उनके पंजों में दबे इस मनुष्य के नेत्रों में मृत्यु का रत्ती भर भी भय नहीं था ।
इसके सर्वथा विपरीत, जब गरुड़ ने बायां अंग पूरी तरह खा लिया और रक्त की धाराएं बहने लगीं, तो जीमूतवाहन ने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक और असीम शांति के साथ अपना दाहिना अंग भी गरुड़ की ओर कर दिया ताकि वे उसे भी खा सकें । उनके मुख से आह की एक ध्वनि तक नहीं निकल रही थी, बल्कि उनकी आँखों में एक दुखी माता के पुत्र को बचाने की असीम संतुष्टि और परोपकार की दिव्य चमक थी । उनकी आँखों से केवल करुणा के अश्रु बह रहे थे。
यह अलौकिक दृश्य देखकर गरुड़ ठिठक गए। उनके भीतर का देवत्व जाग उठा। उन्होंने मांस खाना तुरंत रोक दिया और चकित होकर पूछा, "हे वीर पुरुष! तुम कौन हो? तुम कोई साधारण नाग नहीं हो सकते। तुम्हारा शरीर पूरी तरह से रक्त-रंजित है, मेरी चोंच से तुम्हारे प्राण निकल रहे हैं, फिर भी तुम्हारे मुख पर ऐसी असीम शांति और प्रसन्नता क्यों है? तुमने किस कारण से स्वयं को मेरे आहार के रूप में इस वध्य-शिला पर प्रस्तुत किया है? सत्य कहो।" ।
राजा जीमूतवाहन ने पीड़ा को सहते हुए, अत्यंत शांत स्वर में अपना परिचय देते हुए कहा, "हे पक्षिराज गरुड़! मेरा नाम जीमूतवाहन है और मैं शालिवाहन तथा माता शैव्या का पुत्र हूँ । मैं कोई नाग नहीं हूँ। मैंने एक असहाय और विलाप करती नाग-माता के इकलौते पुत्र शंखचूड़ की प्राण-रक्षा करने हेतु स्वेच्छा से स्वयं को आपके समक्ष बलि-रूप में समर्पित किया है। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरे शरीर का शेष मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत करें और उस माता के पुत्र को अभय दान दें।" ।
राजा के इस अप्रतिम त्याग, असीम साहस, निस्वार्थ बलिदान और करुणा की पराकाष्ठा को सुनकर पक्षिराज गरुड़ को अत्यंत भयंकर ग्लानि और पश्चाताप हुआ। वे आत्मग्लानि से भर उठे और सोचने लगे, "मैं कैसा अज्ञानी, स्वार्थी और पापी हूँ जो अपने उदर-पोषण के लिए नित्यप्रति प्राणियों की हत्या करता हूँ, और एक यह महापुरुष है जो एक अजनबी माता के पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे रहा है! इसका जीवन धन्य है और मेरा जीवन धिक्कार है!" । यह सब दृश्य माता पार्वती भी कैलाश पर्वत से देख रही थीं और राजा के त्याग पर अत्यंत गदगद हो रही थीं ।
गरुड़ ने तुरंत अपने पंजे ढीले किए और जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया और कहा, "हे राजन्! हे श्रेष्ठ मनुष्य! तुम्हारी परोपकार की भावना और तुम्हारे इस महान त्याग ने आज मुझे पराजित कर दिया है। मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं, मैं अपने देव-बल से तुरंत ठीक करता हूँ। मैं तुम्हारे इस महान बलिदान से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहो, मुझसे वरदान मांग लो।" ।
जीमूतवाहन ने हाथ जोड़कर कहा, "हे पक्षिराज! यदि आप वास्तव में मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मुझे यह वरदान दें कि आप भविष्य में कभी किसी नाग की बलि नहीं लेंगे और नागवंश को अपना ग्रास बनाना सर्वथा छोड़ देंगे। साथ ही, अब तक आपने जिन नागों और बालकों का भक्षण किया है और जिनकी केवल अस्थियां यहाँ वध्य-शिला के पास शेष हैं, उन सभी को पुनः जीवनदान प्रदान करें" ।
अमृत-वर्षा और जीवित्पुत्रिका व्रत का वरदान
पक्षिराज गरुड़ ने प्रसन्नतापूर्वक 'तथास्तु' कहा। उन्होंने तत्काल नागलोक से दिव्य 'अमृत' लाकर वहां मृत प्राणियों और नागों की अस्थियों के विशाल ढेर पर बरसाया । अमृत की बूंदें पड़ते ही चमत्कार हुआ और अस्थियों से सभी मृत नाग और बालक पुनः जीवित हो उठे और अपने-अपने परिवारों से जा मिले । गरुड़ ने प्रतिज्ञा की कि वे भविष्य में किसी भी नाग या बालक का भक्षण नहीं करेंगे और नागवंश को अभय दान दे दिया ।
तदुपरांत गरुड़ ने जीमूतवाहन को यह शाश्वत वरदान भी दिया कि, "हे राजन्! तुम्हारे इस अभूतपूर्व त्याग और करुणा की स्मृति में आज का यह दिन त्रिलोकी में अमर रहेगा। आज आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। जो भी माता आज के दिन कुशा से तुम्हारी (जीमूतवाहन की) और जीवित्पुत्रिका की आकृति बनाकर तुम्हारा पूर्ण विधि-विधान से पूजन करेगी, और तुम्हारी इस बलिदान की कथा का श्रवण करेगी, उसकी संतानों की आयु अजर-अमर होगी । उस स्त्री के पुत्र मृत्यु के मुख से भी जीवित बाहर निकल आएंगे, उन पर कभी कोई संकट नहीं आएगा और उसके वंश की निरंतर वृद्धि होगी" ।
इस प्रकार राजा जीमूतवाहन के महान कृत्य से संपूर्ण नागवंश की रक्षा हुई और त्रिलोकी में उनका यश सूर्य की भांति चमक उठा । यही पावन कथा भगवान शिव ने माता पार्वती को कैलाश पर्वत पर सुनाई थी और तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की यह प्रथा ब्रह्मांड में प्रचलित हुई ।
प्रसंग ३: भगवान श्रीकृष्ण और महाभारत का प्रसंग (अभिमन्यु-उत्तरा और परीक्षित प्रसंग)
जीवित्पुत्रिका व्रत के महात्म्य और उसके नामकरण की तीसरी अत्यंत महत्वपूर्ण कथा महाभारत के उस कालखंड से संबंधित है, जो यह स्पष्ट करती है कि इस व्रत का नाम 'जीवित्पुत्रिका' (अर्थात् जीवित है पुत्र जिसका) क्यों पड़ा और कैसे सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने एक अजात (अजन्मे) शिशु की रक्षा कर माताओं को यह विश्वास दिलाया कि वे रक्षक हैं ।
कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत के अठारह दिनों के घोर और विनाशकारी युद्ध के पश्चात्, जब कौरव सेना का पूर्ण विनाश हो गया और दुर्योधन अपनी जंघा टूट जाने के कारण मृत्यु-शय्या पर पड़ा तड़प रहा था, तब गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा के हृदय में प्रतिशोध की भयंकर ज्वाला भड़क उठी । अश्वत्थामा ने किसी भी मूल्य पर अपने पिता की मृत्यु और कौरवों की पराजय का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया。
युद्ध समाप्ति के पश्चात् रात्रि के घने अंधकार में, जब पांडव पक्ष के लोग अपने शिविर में गहरी निद्रा में सो रहे थे, तब अश्वत्थामा ने कायरों की भांति चोरी-छिपे पांडवों के शिविर में प्रवेश किया । वहां पांच व्यक्ति एक साथ सो रहे थे। अश्वत्थामा ने अंधकार में उन्हें ही पांचों पांडव समझ लिया और अपनी तलवार से उन पांचों की निर्मम हत्या कर दी। परंतु प्रातःकाल होने पर उसे ज्ञात हुआ कि वास्तव में वे पांडव नहीं थे, बल्कि वे द्रौपदी और पांडवों के पांच किशोर पुत्र (जिन्हें उपपांडव कहा जाता था) थे ।
जब पांडवों और द्रौपदी को अपने निर्दोष पुत्रों के इस जघन्य हत्याकांड का पता चला, तो वे भयंकर शोक और क्रोध से भर गए। अर्जुन ने क्रोधित होकर अश्वत्थामा का पीछा किया, उसे युद्ध में परास्त कर बंदी बना लिया और दंडस्वरूप द्रौपदी के समक्ष उसके मस्तक से उसकी वह दिव्य मणि निकाल ली जो उसके जन्म से ही उसके मस्तक पर सुशोभित थी ।
इस घोर अपमान, मणि छिन जाने की पीड़ा और अपनी पराजय से अश्वत्थामा का क्रोध अपनी चरम सीमा को भी पार कर गया। उसने सोचा कि पांडवों को शारीरिक कष्ट देने से अधिक उन्हें मानसिक कष्ट देना होगा, और पांडवों का समूल नाश करने के लिए उनके वंश का ही अंत करना होगा ताकि कोई जल देने वाला भी न बचे। यह क्रूर विचार कर उसने अपना अमोघ, दिव्यास्त्र और अत्यंत विनाशकारी 'ब्रह्मास्त्र' का आह्वान किया और उसे अर्जुन के मृत पुत्र अभिमन्यु की विधवा पत्नी उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया ।
ब्रह्मास्त्र का वेग और ताप इतना भयंकर था कि उसे निष्फल करना संसार के किसी भी मनुष्य के लिए पूर्णतः असंभव था। ब्रह्मास्त्र की विनाशकारी अग्नि से उत्तरा का गर्भ जलने लगा और उसके गर्भ में पल रहे उस अजन्मे शिशु की वहीं मृत्यु हो गई । उत्तरा अत्यंत व्यथित होकर, असहनीय पीड़ा सहते हुए त्राहि-त्राहि करती हुई सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ी और अपने मृत शिशु के प्राणों की भीख मांगने लगी。
चूंकि उस बालक का जन्म लेना पांडव वंश की निरंतरता और भविष्य में धर्म की स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक था, इसलिए सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उस शिशु की रक्षा का प्रण लिया । भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन के सभी अर्जित पुण्यों और अपने असीम तपोबल का फल उत्तरा के उस मृत शिशु को प्रदान कर दिया । भगवान श्रीकृष्ण के उन पुण्यों के प्रताप और उनके दिव्य स्पर्श से उत्तरा के गर्भ में मृत पड़ा वह शिशु, जो ब्रह्मास्त्र की अग्नि में भस्म हो चुका था, पुनः जीवित हो उठा ।
गर्भ के भीतर ही मृत्यु को प्राप्त होकर पुनः जीवित होने (जीवनदान पाने) के कारण, भगवान श्रीकृष्ण ने उस बालक का नाम "जीवित्पुत्रिका" (अर्थात् जिसका पुत्र जीवित हो गया हो) रखा (यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से विश्व-विख्यात हुआ और जिसने शुकदेव जी से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया) ।
ऐसी शास्त्रीय और लोक-मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा एक माता के अजात शिशु की रक्षा करने की उसी अद्भुत घटना के पश्चात् से, संसार की सभी माताएं अपनी संतान की गर्भ से लेकर जीवन पर्यन्त रक्षा के लिए, और उनकी दीर्घायु की मंगल कामना से 'जीवित्पुत्रिका' (जिउतिया) व्रत का पूरी श्रद्धा से पालन करती आ रही हैं ।
३. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
तीनों मुख्य कथाओं के पूर्ण होने पर व्रती माताओं द्वारा पारंपरिक रूप से उपसंहार और फल-वचन (फलश्रुति) का श्रवण किया जाता है, जिसमें भगवान जीमूतवाहन से प्रार्थना और व्रत के असीम पुण्यफलों का वर्णन होता है。
सेठ-सेठानी (साहूकार) की कथा (फलश्रुति का लोक-दृष्टांत)
व्रत के असीम फल और चमत्कार को दर्शाने के लिए कथा के अंत में एक साहूकार की कथा का दृष्टांत भी कहा जाता है, जो यह सिद्ध करता है कि यह व्रत न केवल संतान देता है, बल्कि खोया हुआ ऐश्वर्य भी लौटाता है ।
एक नगर में एक अत्यंत धनी साहूकार (सेठ) रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी, परंतु वह संतानहीन होने के कारण सदैव अत्यंत दुखी और चिंतित रहता था। उसकी पत्नी (सेठानी) ने भगवान शिव और जीमूतवाहन की आराधना कर पूर्ण विधि-विधान से यह जीवित्पुत्रिका व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसे एक अत्यंत सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई ।
एक बार सेठ जी व्यापार के लिए किसी दूर देश गए थे और वहां से लौटते समय मार्ग में एक भयानक जंगल में डाकुओं और लुटेरों ने उनका सारा धन, स्वर्ण और आभूषण लूट लिया । सेठ जी अत्यंत हताश और दरिद्र अवस्था में अपने घर की ओर लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें एक भूखे साधु मिले। सेठ जी के पास केवल कुछ बची हुई रोटियां थीं। उन्होंने अपनी बची हुई रोटियों में से एक रोटी उन साधु को दान में दे दी। साधु ने प्रसन्न होकर एक रोटी सेठ जी को वापस दे दी और आशीर्वाद देते हुए कहा, "इसे बांधकर ले जाओ और घर जाकर अपनी पत्नी के साथ मिलकर खाना।"
जब सेठ जी अपने घर पहुंचे, तो उन्होंने अपनी पत्नी को एक सुंदर बालक को गोद में खिलाते देखा। अपनी दरिद्रता और लुटे हुए धन का स्मरण कर सेठ जी अत्यंत क्रोधित और निराश हुए (उन्हें लगा कि अब वे इस बालक का भरण-पोषण कैसे करेंगे)। तब सेठानी ने उन्हें शांत किया और जितिया (जीमूतवाहन) भगवान की कृपा और अपने व्रत के प्रताप की सारी बात सेठ जी को बताई ।
सेठ जी को बहुत भूख लगी थी, उन्होंने अपनी यात्रा का सारा वृत्तांत सुनाया और सेठानी से कहा कि जो रोटी की पोटली साधु ने दी थी, वह ला दो, उसे खाकर मैं थोड़ा आराम कर लूंगा। सेठानी ने जाकर जैसे ही वह पोटली खोली, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने देखा कि वह पोटली अब रोटियों की नहीं, बल्कि हीरे, मोती, सोने-चांदी और अनमोल जवाहरात से पूरी तरह भरी हुई थी ।
सेठानी भागती हुई सेठ जी के पास गई और बोली, "आप तो कह रहे थे कि आपका सारा धन लुटेरों ने लूट लिया है, परंतु इस पोटली में तो अपार धन भरा हुआ है।" तब सेठ जी ने जाकर उस पोटली को खोलकर देखा तो वह सोने-चांदी से जगमगा रही थी। यह देखकर सेठ जी के नेत्रों से अश्रु बह निकले और उन्होंने सेठानी से कहा, "हे प्रिये! यह सब तुम्हारे इसी पावन जीवित्पुत्रिका व्रत का ही शुभ फल है, जिसके प्रताप से हमें यह सुंदर पुत्र भी मिला और मेरा सारा खोया हुआ अपार धन-दौलत भी ईश्वर की कृपा से वापस मिल गया" । इसके पश्चात् दोनों पति-पत्नी ने मिलकर भगवान जीमूतवाहन की हृदय से जय-जयकार की。
पारंपरिक फल-वचन और अंतिम वाक्य
कथा के पूर्ण समापन पर जो फल-वचन पारंपरिक रूप से पढ़ा और उच्चारित किया जाता है, वह इस प्रकार है:
"जो स्त्री पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान जीमूतवाहन का यह जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत निर्जला रहकर करती है, और एकाग्रचित्त होकर इस पावन व्रत-कथा को सुनती है या पढ़ती है, उसके घर में कभी भी अकाल मृत्यु का प्रवेश नहीं होता । उस व्रती माता की संतानों को भगवान जीमूतवाहन दीर्घायु (लंबी उम्र), अखंड आरोग्य (निरोगी काया) और असीम संपन्नता का आशीर्वाद प्रदान करते हैं ।
जिस प्रकार भगवान जीमूतवाहन ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर नागमाता के इकलौते पुत्र शंखचूड़ की रक्षा की; जिस प्रकार उन्होंने शीलवती (चील) के सातों पुत्रों को मृत्यु के मुख से निकालकर नवजीवन प्रदान किया; और जिस प्रकार सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे अजात शिशु को ब्रह्मास्त्र की अग्नि से बचाया; ठीक उसी प्रकार हे भगवान जीमूतवाहन! इस कथा को कहने वाले, इस कथा को सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले सभी की संतानों की आप रक्षा करना । उन्हें सभी संकटों से बचाना。
यह पावन व्रत मातृत्व की श्रद्धा और पुत्र के प्रति असीम प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक है । जो भी माता-बहनें इनकी व्रत कथा को ध्यान लगाकर सुनती हैं, उनके घर में सदैव सुखी और निरोगी संतान पैदा होती है । इस कथा को पढ़ने और सुनने से उपासकों का वंश दिनों-दिन बढ़ता है, उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और उनके जीवन के सभी पितृ दोष एवं संकट समूल नष्ट हो जाते हैं । हे पक्षिराज गरुड़ देवता! हे माता पार्वती! हे शिव शंकर! हम सब पर अपनी कृपा सदैव बनाए रखना।"
(यहाँ कथा पूर्णतः संपन्न होती है। कथा के उपरांत भगवान जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित मूर्ति या आकृति की धूप-दीप से आरती उतारी जाती है ।)
बोलिए प्रेम से राजा जीमूतवाहन की जय!
जितिया माता की जय!
गरुड़ देवता की जय!
सर्व देवी-देवताओं की जय!