फाल्गुन शुक्ल पक्ष आमलकी एकादशी व्रत कथा
पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का संवाद
पाण्डुकुल भूषण, धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनीत भाव से, दोनों हाथ जोड़कर असीम श्रद्धा के साथ देवाधिदेव, त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में प्रणाम निवेदित किया और विनम्रतापूर्वक अपना प्रश्न प्रस्तुत किया: "हे देवदेवेश्वर! हे कमलनयन! हे जगत्पति! आपने पूर्व में अनेक व्रतों और उपवासों की महिमा का वर्णन कर मेरे अंतःकरण को पवित्र किया है। हे मधुसूदन! अब मेरी यह जानने की उत्कट अभिलाषा है कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में जो परम कल्याणकारी एकादशी तिथि का आगमन होता है, उसका क्या नाम है? उस पावन एकादशी की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, उसका विधान क्या है और उसके व्रत का क्या माहात्म्य है? हे प्रभो! आप कृपा करके मुझे इस एकादशी की वह संपूर्ण और अक्षुण्ण कथा विस्तारपूर्वक सुनाने की कृपा करें, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के घोर पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति सुलभ हो जाती है।"
धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसे धर्मयुक्त और विनीत वचनों को सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई। उन्होंने अपनी अमृतमयी वाणी में कहा: "हे महाभाग धर्मनन्दन! हे कुंतीपुत्र! तुमने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और उद्धार के निमित्त अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस परम पुनीत और त्रैलोक्य-विख्यात एकादशी का नाम 'आमलकी एकादशी' (आंवला एकादशी) है। यह व्रत मनुष्यों के समस्त प्रकार के पापों का समूल नाश करने वाला, परम पुण्यदायी और अंत में श्री वैकुंठ धाम की प्राप्ति कराने वाला है। हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में सूर्यवंशी राजा मान्धाता और महर्षि वसिष्ठ के मध्य जो अत्यंत गूढ़ और पापनाशक संवाद हुआ था, जिसमें इस एकादशी का संपूर्ण माहात्म्य और व्रत-कथा निहित है, वही उत्तम आख्यान मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तुम अपने मन को एकाग्र कर और पूर्ण श्रद्धा-भाव से इस कथा का श्रवण करो।"
आमलकी वृक्ष की उत्पत्ति: राजा मान्धाता और महर्षि वसिष्ठ का संवाद
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे राजन! प्राचीन काल की बात है, इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए चक्रवर्ती सम्राट राजा मान्धाता ने अपने गुरु, ब्रह्मर्षि वसिष्ठ जी के आश्रम में जाकर उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। राजा मान्धाता ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर महर्षि से पूछा: "हे द्विजश्रेष्ठ! हे मुनीश्वर! मेरी यह जानने की तीव्र लालसा है कि इस धरातल पर सर्वप्रथम 'आमलकी' (आंवले) के वृक्ष की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? इस वृक्ष को इतना पवित्र और पूज्य क्यों माना जाता है? कृपा कर मेरे इस संशय का निवारण करें और मुझे आमलकी वृक्ष के प्राकट्य की वह पावन कथा सुनाएँ।"
राजा मान्धाता के इस जिज्ञासापूर्ण प्रश्न को सुनकर महर्षि वसिष्ठ जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले: "हे महाभाग नृपश्रेष्ठ! सुनो, मैं तुम्हें संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों से युक्त और अत्यंत पुण्यदायिनी यह कथा सुनाता हूँ कि पृथ्वी पर आमलकी का वृक्ष कैसे अस्तित्व में आया। जब कल्प का अंत होता है, तब भगवान नारायण अपने रौद्र रूप में संपूर्ण प्राणियों का संहार कर देते हैं और सर्वत्र केवल एकाकार जल ही जल रह जाता है। उस प्रलयकाल के जल में सर्वेश्वर भगवान विष्णु स्वयं शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं। तदनंतर, जब वे पुनः जागृत होते हैं और उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी का प्राकट्य होता है, तब ब्रह्मा जी नई सृष्टि की रचना का आरंभ करते हैं। उसी आदि काल में, जब सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, तब देवाधिदेव भगवान श्रीहरि विष्णु के श्रीमुख से एक अत्यंत प्रकाशमान, चंद्र-मंडलाकार, तेजोमय बिंदु पृथ्वी पर गिरा। हे राजन! भगवान विष्णु के मुख से गिरे उसी दिव्य और दैवीय बिंदु से सर्वप्रथम जिस वृक्ष की उत्पत्ति हुई, वही महान 'आमलकी वृक्ष' (आंवले का पेड़) कहलाया।"
महर्षि वसिष्ठ ने आगे कहा: "हे सम्राट! क्योंकि यह वृक्ष भगवान श्रीहरि के मुख-कमल से उत्पन्न हुआ है, अतः यह समस्त वृक्षों में आदि-वृक्ष है और भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय है। यह कोई साधारण वृक्ष नहीं है, अपितु यह सर्वदेवमय है अर्थात् इसमें समस्त देवी-देवताओं का साक्षात वास है। जो भी विष्णु-भक्त इस वृक्ष का दर्शन, स्पर्श और पूजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके स्मरण मात्र से ही गोदान का पुण्य फल प्राप्त होता है।"
महर्षि वसिष्ठ ने आमलकी वृक्ष के विभिन्न अंगों में निवास करने वाले देवताओं का विस्तृत वर्णन करते हुए बताया:
| आमलकी वृक्ष का अंग | निवास करने वाले देवता |
|---|---|
| मूल (जड़) भाग | भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं |
| ऊपरी भाग | सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी |
| स्कन्ध (मध्य तना) | परमेश्वर भगवान शिव (रुद्र) |
| विस्तृत शाखाएँ | समस्त मुनिगण एवं महर्षि |
| टहनियाँ (प्रशाखाएँ) | समस्त देवतागण |
| पत्र (पत्ते) | अष्ट वसु |
| पुष्प | मरुद्गण |
| फल | समस्त प्रजापति |
महर्षि वसिष्ठ बोले: "हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह आमलकी वृक्ष साक्षात् देव-स्वरूप और परम पावन है। इसके दर्शन मात्र से पापियों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। इसलिए, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन इस पावन वृक्ष के नीचे जो भी वैष्णव-जन विधि-विधान पूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे निश्चय ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं।"
मुख्य कथा: वैदिशा नगरी और धर्मनिष्ठ राजा चैत्ररथ
महर्षि वसिष्ठ ने राजा मान्धाता को कथा का विस्तार बताते हुए आगे कहा: "हे राजन! अब मैं तुम्हें इस आमलकी एकादशी के अद्भुत और अकल्पनीय प्रभाव की वह सत्य घटना सुनाता हूँ, जो प्राचीन काल में घटित हुई थी। पूर्व काल में पृथ्वी पर 'वैदिशा' नामक एक अत्यंत विख्यात, सुरम्य और वैभवशाली नगरी थी। वह नगरी स्वर्ग की अमरावती के समान ही सुंदर और संपन्न थी। उस वैदिशा नगरी में चंद्र वंश में उत्पन्न हुए राजा 'चैत्ररथ' (जिन्हें चित्ररथ भी कहा जाता था) राज्य करते थे। राजा चैत्ररथ अत्यंत धर्मनिष्ठ, वीर, सत्यवादी, न्यायप्रिय और साक्षात् भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य और परम भक्त थे।"
राजा चैत्ररथ के राज्य में सर्वत्र शांति और धर्म का साम्राज्य था। उनकी प्रजा भी राजा के ही समान अत्यंत आस्तिक, धर्मपरायण और श्रीहरि की भक्त थी। उस वैदिशा नगरी में कोई भी मनुष्य दरिद्र, दुखी, रोगी, अथवा पापी नहीं था। राज्य में नास्तिक विचारों वाला, झूठ बोलने वाला, चोरी करने वाला या मर्यादा भंग करने वाला एक भी व्यक्ति नहीं था। नगरी के सभी निवासी—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—अपने-अपने वर्ण-धर्म का पालन करते हुए नियमित रूप से भगवान विष्णु की उपासना करते थे। वहाँ के बाल, वृद्ध, स्त्री और पुरुष, सभी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ प्रत्येक एकादशी का निराहार व्रत धारण करते थे। संपूर्ण राज्य भगवद्-भक्ति के अमृत रस में डूबा रहता था।
समय अपनी गति से बीतता रहा। एक बार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की वह अत्यंत पवित्र तिथि, 'आमलकी एकादशी' का आगमन हुआ। इस एकादशी के आते ही राजा चैत्ररथ ने अपने संपूर्ण राज्य में यह उद्घोष करवा दिया कि कोई भी प्राणी इस पावन दिन अन्न का ग्रहण न करे और सभी श्रीहरि के इस महाव्रत का पूर्ण निष्ठा से पालन करें।
प्रातःकाल होते ही राजा चैत्ररथ ने विधिपूर्वक स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर एकादशी व्रत का संकल्प लिया। उन्होंने संकल्प करते हुए कहा: "हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! हे श्रीहरि! आज इस आमलकी एकादशी के दिन मैं निराहार रहकर आपका व्रत करूँगा और अगले दिन पारण करूँगा। हे प्रभु! आप मुझे अपनी शरण में रखें और मेरे इस व्रत को निर्विघ्न पूर्ण कराएँ।"
तदनंतर, राजा अपनी समस्त प्रजा, राजपुरोहितों, मुनियों और सेवकों के साथ वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि और शंख-नाद के मध्य, अपनी नगरी के समीप स्थित एक अत्यंत सुरम्य वन में गए, जहाँ भगवान विष्णु को प्रिय आमलकी (आंवले) का एक अत्यंत प्राचीन और विशाल वृक्ष स्थित था।
आमलकी वृक्ष के नीचे कलश स्थापन और पारम्परिक पूजा-विधान
वन में उस दिव्य आमलकी वृक्ष के समीप पहुँचकर राजा चैत्ररथ ने उस स्थान को गाय के गोबर से लीपकर पवित्र किया और वहाँ एक सुंदर वेदी का निर्माण करवाया। उस वेदी पर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार स्वर्ण, पंचरत्न, दिव्य सुगंधियों, पल्लवों और निर्मल जल से परिपूर्ण एक कलश की स्थापना की गई। उस पवित्र कलश के ऊपर भगवान श्रीहरि के अवतार, महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम जी की एक अत्यंत सुंदर और तेजोमयी स्वर्ण प्रतिमा स्थापित की गई।
राजा ने अपनी प्रजा के साथ मिलकर पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव से, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, और नाना प्रकार के फलों से भगवान परशुराम जी और आमलकी वृक्ष की सविधि पूजा आरंभ की। उस समय वैदिक मंत्रोच्चार से संपूर्ण वन-प्रांत गूंज उठा। राजा ने भगवान श्रीहरि के विभिन्न अंगों की वंदना करते हुए शास्त्रों में वर्णित पारम्परिक मंत्रों का उच्चारण किया और प्रत्येक अंग की पूजा की। महर्षि वसिष्ठ ने राजा मान्धाता को वे पावन मंत्र भी बताए, जो इस प्रकार हैं:
| पूजित श्री अंग | पारंपरिक अंग-पूजा मंत्र |
|---|---|
| जाँघें (चरण) | 'उग्राय नमः' (भगवान उग्र को नमस्कार है) |
| कटिभाग (कमर) | 'दामोदराय नमः' (भगवान दामोदर को नमस्कार है) |
| उदर (पेट) | 'पद्मनाभाय नमः' (भगवान पद्मनाभ को नमस्कार है) |
| वक्षःस्थल (हृदय) | 'श्रीवत्सधारिणे नमः' (श्रीवत्स चिह्न धारण करने वाले को नमस्कार है) |
| बायीं भुजा | 'चक्रिणे नमः' (चक्रधारी भगवान को नमस्कार है) |
| दाहिनी भुजा | 'गदिने नमः' (गदाधारी भगवान को नमस्कार है) |
| कण्ठ (गला) | 'वैकुण्ठाय नमः' (वैकुंठनाथ को नमस्कार है) |
| मुख (चेहरा) | 'यज्ञमुखाय नमः' (यज्ञमुख भगवान को नमस्कार है) |
| नासिका (नाक) | 'विशोकनिधये नमः' (विशोकनिधि को नमस्कार है) |
| नेत्र (आँखें) | 'वासुदेवाय नमः' (भगवान वासुदेव को नमस्कार है) |
| ललाट (मस्तक) | 'वामनाय नमः' (भगवान वामन को नमस्कार है) |
| संपूर्ण अंग एवं सिर | 'सर्वात्मने नमः' (सर्वात्मा भगवान को नमस्कार है) |
इस प्रकार अत्यंत भक्ति-भाव से भगवान के श्री अंगों की पूजा करने के पश्चात् राजा चैत्ररथ ने अत्यंत शुद्ध और ताजे आंवले के फलों से देवाधिदेव भगवान परशुराम जी को अर्घ्य प्रदान किया। अर्घ्य प्रदान करते समय राजा ने इस परम पावन मंत्र का उच्चारण किया:
"नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोऽस्तु ते। गृहाणार्घ्यमिमं दत्तमामलक्या युतं हरे॥"
(अर्थात् हे देवदेवेश! हे जमदग्नि-नंदन भगवान परशुराम! आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीहरि! आंवले के फल से युक्त मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें।)
अर्घ्य दान और पूर्ण पूजा-विधान संपन्न होने के पश्चात् राजा अपनी संपूर्ण प्रजा और मुनिगणों के साथ उसी आमलकी वृक्ष के नीचे बैठ गए और वाद्य यंत्रों, शंख और मृदंग की मधुर ध्वनि के साथ भगवान दामोदर के भजनों, स्तोत्रों और महात्म्य-कथाओं का गान करते हुए रात्रि-जागरण करने लगे। उस वन में चारों ओर असंख्य दीपकों का प्रकाश जगमगा रहा था, जिससे वह वन देवलोक के समान प्रतीत हो रहा था।
एक व्याध (शिकारी) का आगमन और अनजाने में व्रत-संयोग
महर्षि वसिष्ठ ने आगे बताया: "हे राजा मान्धाता! जिस समय राजा चैत्ररथ अपनी प्रजा सहित उस निर्जन वन में आमलकी वृक्ष के नीचे भगवान श्रीहरि के जागरण और कीर्तन में लीन थे, उसी समय देव-संयोग से एक अत्यंत क्रूर और भयानक व्याध (शिकारी) वन में भटकता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वह शिकारी अत्यंत निर्दयी और अधर्मी था। उसका संपूर्ण जीवन वन के मूक और निर्दोष पशु-पक्षियों की निर्मम हत्या करने और उनके माँस से अपने तथा अपने परिवार का भरण-पोषण करने में व्यतीत हुआ था। उसके हृदय में दया, धर्म और करुणा का लेशमात्र भी नहीं था, और पापों के भारी बोझ से उसका अंतःकरण सर्वथा मलिन हो चुका था।"
वह पापी शिकारी उस दिन अत्यंत भूखा और प्यास से व्याकुल था। पूरे दिन उसे शिकार के लिए कोई भी पशु प्राप्त नहीं हुआ था, जिसके कारण वह क्षुधा की तीव्र अग्नि से पीड़ित होकर वन में इधर-उधर भोजन की तलाश में भटक रहा था। भटकते-भटकते उसने अचानक उस घने वन के मध्य भाग में दीपकों की एक विशाल और चमचमाती हुई रोशनी देखी। साथ ही, उसके कानों में भगवान नारायण के दिव्य भजनों और शंख-मृदंग की अत्यंत कर्णप्रिय ध्वनि पड़ी।
यह अद्भुत और अलौकिक दृश्य देखकर वह शिकारी अत्यंत विस्मित हुआ। वह छिपते-छिपाते और दबे पाँव उस स्थान की ओर बढ़ा, जहाँ वह भारी जनसमूह एकत्रित था। उसने देखा कि वहाँ राजा चैत्ररथ अपनी प्रजा के साथ कलश-स्थापित भगवान दामोदर की आराधना कर रहे हैं और आमलकी वृक्ष की परिक्रमा और महिमा का गान कर रहे हैं। उस हिंसक शिकारी ने जीवन में कभी ऐसा सात्विक और भक्तिमय दृश्य नहीं देखा था।
भूख और थकान से जर्जर वह व्याध उस जनसमूह के पीछे, एक वृक्ष की ओट में छिपकर बैठ गया। उसने विचार किया कि यहाँ इतनी भीड़ है, यदि मैं यहाँ से गया तो भूखा ही मर जाऊँगा, अतः यहीं बैठकर देखता हूँ कि यह क्या हो रहा है। वह शिकारी पूरी रात वहीं एक कोने में बैठा रहा। न तो उसने कुछ खाया और न ही जल की एक बूँद पी। भगवान श्रीहरि की कथा और सुमधुर कीर्तन सुनते-सुनते उसकी भूख-प्यास शांत सी हो गई और उसकी आँखों से नींद भी कोसों दूर चली गई।
इस प्रकार, उस क्रूर और पशुहंता शिकारी ने अनजाने में ही और बिना किसी धार्मिक संकल्प के, भगवान विष्णु के समीप, आमलकी वृक्ष के नीचे बैठकर एकादशी का पूर्ण निराहार व्रत और संपूर्ण रात्रि-जागरण कर लिया। उसने भगवान दामोदर के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया और श्रीहरि के पावन चरित्रों का श्रवण किया।
प्रातःकाल सूर्योदय होने पर एकादशी का व्रत पूर्ण हुआ। राजा चैत्ररथ ने अपनी प्रजा और महर्षियों के साथ भगवान की आरती की और व्रत का पारण करने के पश्चात् वे सभी अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ होकर वापस वैदिशा नगरी को लौट गए। राजा और प्रजा के जाने के पश्चात् वह व्याध भी वहाँ से उठा और अपने घर को लौट आया। घर आकर उसने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक अपना सामान्य भोजन ग्रहण किया।
व्याध की मृत्यु और अगले जन्म में राजा वसूरथ के रूप में प्राकट्य
समय व्यतीत होने के साथ, कालचक्र के विधान अनुसार एक दिन उस व्याध की मृत्यु हो गई। यद्यपि उसने जीवन भर क्रूरतापूर्ण पशु-हत्याएँ की थीं और घोर पापों का संचय किया था, परंतु उस आमलकी एकादशी की रात्रि में अनजाने में किए गए उपवास, रात्रि-जागरण, और भगवान विष्णु की कथा-श्रवण के पुण्य-प्रताप से उसके पूर्वार्जित समस्त घोर पाप जलकर भस्म हो गए। एकादशी व्रत का यह अचूक और अमिट फल उसे प्राप्त हुआ कि मृत्यु के पश्चात् उसे किसी भी नरक की यातना नहीं सहनी पड़ी।
आमलकी एकादशी के उसी महान पुण्य के प्रभाव से उस व्याध ने अपने अगले जन्म में क्षत्रिय कुल में जन्म लिया। उसका जन्म जयंती नगरी के महाप्रतापी राजा 'विदूरथ' के पुत्र के रूप में हुआ। राजा विदूरथ ने अपने इस तेजस्वी पुत्र का नाम 'वसूरथ' रखा।
जब वसूरथ युवा हुए और पिता के पश्चात् उन्होंने राज्य-सिंहासन ग्रहण किया, तो वे एक अत्यंत पराक्रमी, न्यायप्रिय और धर्मात्मा सम्राट सिद्ध हुए। राजा वसूरथ चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों) के स्वामी थे। वे शारीरिक रूप से सूर्य के समान तेजस्वी, कांतिमान और बलवान थे, परंतु उनका स्वभाव पृथ्वी माता के समान अत्यंत क्षमाशील और सहनशील था। पूर्व जन्म के एकादशी व्रत के प्रभाव से वे साक्षात् भगवान श्रीहरि विष्णु के अनन्य और परम भक्त बन गए। उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान किया, वेदों और शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया, और अपनी प्रजा की सभी आवश्यकताओं का पुत्रवत् ध्यान रखते हुए दान-पुण्य में सदा स्वयं को अग्रणी रखा। उनका शासन सर्वथा निष्कंटक था और चारों दिशाओं में उनकी कीर्ति पताका फहरा रही थी।
वन में आखेट, म्लेच्छों (डाकुओं) का आक्रमण और ईश्वरीय रक्षा
महर्षि वसिष्ठ कथा को आगे बढ़ाते हुए बोले: "हे राजा मान्धाता! एक दिन राजा वसूरथ अपने सैनिकों और अंगरक्षकों के साथ एक अत्यंत घने और भयानक वन में आखेट (शिकार) खेलने के लिए गए। शिकार का पीछा करते-करते राजा वन के भीतरी और दुर्गम भाग में पहुँच गए। उस गहन वन में वे अपना मार्ग भटक गए और उनकी पूरी सेना उनसे बिछड़ गई। राजा पूर्णतः अकेले पड़ गए। दिन भर वन में भटकने के कारण वे अत्यंत श्रांत, क्लांत और भूख-प्यास से व्याकुल हो गए।"
अत्यधिक थकान के कारण जब राजा से एक पग भी आगे नहीं चला गया, तो उन्होंने एक विशाल वृक्ष की छाया देखी। राजा उसी वृक्ष के नीचे अपनी बायीं भुजा का सिरहाना बनाकर विश्राम करने के लिए लेट गए। थकावट इतनी अधिक थी कि लेटते ही राजा को अत्यंत गहरी निद्रा आ गई।
संयोगवश, उसी निर्जन वन में कुछ अत्यंत क्रूर, बर्बर और हिंसक म्लेच्छों (डाकुओं और जंगली कबीले वालों) का निवास था। वे म्लेच्छ वन में घूमते हुए उसी वृक्ष के समीप आ पहुँचे जहाँ राजा वसूरथ निद्रा में लीन थे। जैसे ही उन म्लेच्छों ने राजा को देखा, वे उन्हें तुरंत पहचान गए। उन म्लेच्छों की राजा वसूरथ के साथ पुरानी शत्रुता थी, क्योंकि पूर्व काल में राजा ने राज्य में न्याय स्थापित करते हुए उन म्लेच्छों के अनेक कुख्यात संबंधियों, माता-पिता, भाइयों, भतीजों, पौत्रों और मामाओं को उनके जघन्य अपराधों के लिए कठोर मृत्युदंड दिया था।
अपने उस घोर शत्रु को आज वन में निहत्था और गहरी निद्रा में सोता हुआ पाकर, उन म्लेच्छों के भीतर प्रतिशोध की भयंकर ज्वाला धधक उठी। वे आपस में फुसफुसाते हुए चर्चा करने लगे: "इसी अत्याचारी राजा ने हमारे परिवार के सभी प्रियजनों का वध किया है, जिसके कारण आज हम वन-वन पागलों की भांति भटकने को विवश हैं। आज भाग्य ने इसे हमारे समक्ष अत्यंत असहाय अवस्था में प्रस्तुत कर दिया है। हमें इस स्वर्ण अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए और अभी इसी क्षण इसका वध कर अपने परिजनों की मृत्यु का प्रतिशोध लेना चाहिए।"
ऐसा दृढ़ निश्चय कर, प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए उन समस्त म्लेच्छों ने अपने भयंकर और प्राणघातक अस्त्र-शस्त्र—भाले, तलवारें, फरसे और बाण—निकाल लिए। वे क्रोध से चीखते हुए राजा वसूरथ पर टूट पड़े और उनके शरीर पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने लगे।
परंतु हे राजन! वहाँ एक अत्यंत अद्भुत और अकल्पनीय चमत्कार घटित हुआ। भगवान श्रीहरि की माया और एकादशी के पुण्यों के प्रताप से, उन क्रूर म्लेच्छों के वे भयंकर और तीखे शस्त्र जैसे ही राजा वसूरथ के शरीर को स्पर्श करते, वे तत्काल अत्यंत कोमल पुष्पों की पंखुड़ियों और रुई (कपास) में परिवर्तित होकर भूमि पर गिर जाते। डाकुओं का कोई भी भयानक प्रहार सोते हुए राजा के शरीर पर एक खरोंच तक न ला सका।
जब वे डाकू अपने शस्त्रों को विफल होते देख और अधिक क्रोधित होकर प्रहार करने लगे, ठीक उसी क्षण निद्रा में लीन राजा वसूरथ के शरीर से एक अत्यंत दिव्य, तेजोमयी और अलौकिक स्त्री प्रकट हुई। वह कोई साधारण स्त्री नहीं थी, अपितु साक्षात् एकादशी माता का वैष्णवी शक्ति रूप था। वह देवी अत्यंत रूपवती होने के साथ-साथ अत्यंत भयंकर और रौद्र रूप धारण किए हुए थी। उसने नाना प्रकार के दिव्य और विनाशकारी अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए थे। उसकी भृकुटी क्रोध से तनी हुई थी और उसके विशाल नेत्रों से प्रलयंकारी अग्नि की लाल किरणें तीव्र वेग से निकल रही थीं।
उस दिव्य और क्रुद्ध देवी ने सिंह के समान भयंकर गर्जना की और देखते ही देखते काल-रूप धारण कर उन समस्त क्रूर म्लेच्छों और डाकुओं पर टूट पड़ी। पलक झपकते ही उस देवी ने अपने अस्त्रों से उन सभी आततायी डाकुओं का वध कर दिया। संपूर्ण वन प्रांत उनके रक्त से लाल हो गया और वे सभी पृथ्वी पर निष्प्राण होकर गिर पड़े।
आकाशवाणी और राजा का जागरण
कुछ समय पश्चात्, जब राजा वसूरथ की गहरी निद्रा टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले, तो अपने चारों ओर का दृश्य देखकर वे हतप्रभ रह गए। राजा ने देखा कि जो भयानक म्लेच्छ और डाकू उनके प्राण लेने आए थे, वे सभी छिन्न-भिन्न और मृत अवस्था में रक्त से लथपथ भूमि पर पड़े हैं।
राजा वसूरथ अत्यंत आश्चर्यचकित होकर मन ही मन विचार करने लगे: "मेरे सो जाने के पश्चात् यहाँ यह क्या भीषण संग्राम हुआ? इन भयंकर शत्रुओं ने अवश्य ही मुझ पर आक्रमण किया होगा, परंतु इनका वध किसने किया? इस अत्यंत निर्जन और भयानक वन में मेरा ऐसा कौन परम हितैषी और रक्षक निवास करता है, जिसने मेरी निद्रावस्था में मेरे प्राणों की रक्षा की और इन दुर्दांत शत्रुओं को यमलोक पहुँचा दिया?"
राजा वसूरथ जब इस प्रकार गहन विचार में मग्न थे, तभी अचानक गगनमंडल से एक अत्यंत स्पष्ट, गंभीर और देवमयी 'आकाशवाणी' गूंज उठी। आकाशवाणी ने कहा:
"हे राजन! तुम व्यर्थ ही आश्चर्य कर रहे हो। इस नश्वर और असार संसार में भगवान श्रीहरि विष्णु (केशव) के अतिरिक्त शरणागत निस्सहाय भक्तों की रक्षा करने में और कौन समर्थ हो सकता है? हे वसूरथ! यद्यपि इस जन्म में तुमने अभी तक वह व्रत नहीं किया था, परंतु अपने पूर्व जन्म में एक व्याध के रूप में तुमने अनजाने में ही सही, फाल्गुन मास की 'आमलकी एकादशी' का महाव्रत पूर्ण निष्ठा और रात्रि-जागरण के साथ किया था। यह उसी आमलकी एकादशी के महान पुण्य का प्रताप है कि आज जब तुम घोर संकट में थे, तब भगवान विष्णु की आज्ञा से स्वयं 'एकादशी माता' ने तुम्हारे शरीर से वैष्णवी शक्ति के रूप में प्रकट होकर तुम्हारे प्राणों की रक्षा की है और तुम्हारे समस्त शत्रुओं का संहार किया है। अतः हे राजन! भगवान नारायण की अहैतुकी कृपा पर विश्वास रखो।"
उस परम रहस्यमयी और सत्य आकाशवाणी को सुनकर राजा वसूरथ का हृदय भगवान नारायण की अटल भक्ति, कृतज्ञता और प्रेमावेश से गदगद हो उठा। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। भगवान की असीम और अकारण कृपा का स्मरण कर उन्होंने वहीं उस वन की भूमि पर लेटकर श्रीहरि को साष्टांग प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजा अपनी राजधानी जयंती नगरी लौट आए और वहाँ बिना किसी बाधा के, देवराज इंद्र के समान सुखपूर्वक अपने राज्य पर शासन करने लगे। उनका जीवन पूर्णतः श्रीहरि को समर्पित हो गया।
पारंपरिक फल-श्रुति एवं उपसंहार
राजा मान्धाता को यह कथा पूर्ण रूप से सुनाने के पश्चात् महर्षि वसिष्ठ ने अपने संवाद का उपसंहार करते हुए कहा: "हे राजन! तुमने आमलकी एकादशी के व्रत का यह अद्भुत और अकल्पनीय प्रभाव सुना। जो व्यक्ति निष्काम भाव और शुद्ध भक्ति से इस परम पावन व्रत का पालन करता है, उसके समस्त पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अग्नि में तिनके। वह इस लोक में जीवन के सभी सुखों और ऐश्वर्यों को भोगकर अंत में भगवान विष्णु के परमधाम, श्री वैकुंठ को प्राप्त होता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को इस व्रत का अवश्य ही पालन करना चाहिए।"
महर्षि वसिष्ठ और राजा मान्धाता के इस अत्यंत पवित्र और पाप-नाशक संवाद का वर्णन करने के पश्चात्, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर की ओर दृष्टिपात किया और कहा:
"हे धर्मराज युधिष्ठिर! यह आमलकी एकादशी का दुर्धर्ष और महान व्रत मनुष्यों को समस्त प्रकार के भयंकर पापों से सर्वथा मुक्त करने वाला है। जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, अटल नियम और शुद्ध भक्ति-भाव से इस फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी का व्रत करता है, रात्रि में दीप दान कर जागरण करता है, तथा आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान श्रीहरि की पूजा कर इस पावन कथा को एकाग्रचित्त होकर सुनता अथवा पढ़ता है, उसे एक सहस्त्र (एक हजार) गोदान करने के समान महान और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। वह मनुष्य अपने समस्त सांसारिक और दैहिक पापों से मुक्त होकर अंत में भगवान विष्णु के शाश्वत लोक को जाता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।"
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से आमलकी एकादशी की यह संपूर्ण, पारंपरिक और अक्षुण्ण कथा सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीहरि के चरणों में पुनः साष्टांग प्रणाम निवेदित किया।
(आमलकी एकादशी की पारंपरिक व्रत-कथा संपूर्ण)