विस्तृत उत्तर
जंगल में भटकते हुए धृष्टबुद्धि एक दिन महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम में पहुँचा। महर्षि गंगा स्नान करके लौट रहे थे, उनके गीले वस्त्रों से टपकती जल की बूंदों के स्पर्श मात्र से धृष्टबुद्धि के हृदय में चेतना जागी और उसे अपने पापों का गहरा बोध हुआ। उसने ऋषि के चरणों में गिरकर प्रायश्चित का उपाय पूछा। महर्षि कौण्डिन्य ने उसे वैशाख शुक्ल पक्ष की 'मोहिनी एकादशी' का व्रत करने को कहा। इस व्रत के प्रभाव से उसके सुमेरु पर्वत जैसे विशाल पाप भस्म हो गए और उसे विष्णुलोक की प्राप्ति हुई।

