विस्तृत उत्तर
पद्म पुराण के अनुसार, त्रेता युग में ज्योतिषियों ने राजा दशरथ को बताया कि शनि देव 'रोहिणी' नक्षत्र का भेदन करने वाले हैं, जिससे पृथ्वी पर 12 वर्षों का भयंकर अकाल और प्रलय आ सकता है। प्रजा की रक्षा के लिए राजा दशरथ अपने रथ पर सवार होकर नक्षत्र मंडल गए और अपने संहारास्त्र से शनि देव को चुनौती दी। शनि देव उनके पौरुष और कर्तव्य-निष्ठा से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। दशरथ ने वरदान माँगा कि वे रोहिणी का भेदन न करें। इस अवसर पर राजा दशरथ ने शनि देव की जो स्तुति की, वह 'दशरथ कृत शनि स्तोत्र' कहलायी। यह कथा सिद्ध करती है कि शनि को केवल भय से नहीं, बल्कि पराक्रम और भक्ति से भी वश में किया जा सकता है।

