दशरथ का देहांत और भरत का शोक
परिचय:
राम के वनगमन के पश्चात अयोध्या की स्थिति ऐसी हो गई जैसे आत्मा के बिना शरीर। राजा दशरथ पुत्रवियोग की पीड़ा में क्षीण होते जा रहे थे। दूसरी ओर भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे, जिन्हें इस सबका समाचार भी नहीं था। यह प्रसंग केवल एक पिता की मृत्यु नहीं, बल्कि एक पूरे राष्ट्र की आत्मा के बिछड़ने की कथा है।
विरह की वेदना और दशरथ का अंत:
राम के वन प्रस्थान के बाद दशरथ दिन-रात उसी स्मृति में डूबे रहते। वे बार-बार राम का नाम लेते, और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा थमती ही नहीं थी। रात्रियाँ करवटों में कटतीं और मन राम के चरणों की ओर भागता।
एक रात उन्होंने कौसल्या से अपनी एक पुरानी भूल का उल्लेख किया। युवावस्था में एक बार उन्होंने एक तपस्वी बालक — श्रवण कुमार — को गलती से हिरण समझकर बाण से मार दिया था। उसके अंधे माता-पिता ने उन्हें श्राप दिया था कि वे भी पुत्र वियोग में प्राण त्यागेंगे। आज वही क्षण उपस्थित था। दशरथ ने अंतिम बार पुकारा — “राम… सीता… लक्ष्मण…” और उनके प्राण निकल गए।
सारी अयोध्या स्तब्ध रह गई। रानियाँ विलाप करने लगीं। गुरु वशिष्ठ ने धैर्य रखा और तत्काल अंतिम संस्कार की तैयारियों में लग गए।
भरत और शत्रुघ्न की वापसी:
उधर भरत और शत्रुघ्न कैकेयी के पिता के यहाँ थे। उन्हें ना राम के वनवास का ज्ञात था, ना दशरथ के निधन का। जब गुरु वशिष्ठ का दूत पहुंचा, तो भरत का हृदय आशंका से भर उठा। वे तुरंत अयोध्या के लिए रवाना हुए।
नगर के प्रवेश द्वार पर सन्नाटा देख उनका दिल बैठ गया। कोई स्वागत नहीं, कोई उत्सव नहीं — सब कुछ जैसे ठहर गया हो। महल पहुँचते ही कौसल्या ने भरत को गले लगाया और अश्रुओं में डूब गईं। भरत समझ गए कि कुछ बहुत भीषण घटा है।
भरत पर टूटा दुःख का पर्वत:
गुरु वशिष्ठ और सुमंत्र ने सारा वृतांत सुनाया — राम का वनवास, दशरथ का देहांत, और अयोध्या की स्थिति। भरत को जैसे आकाश गिर पड़ा। वे वहीं भूमि पर गिर पड़े और कहने लगे, “पिता नहीं रहे? और राम भैया वन में?”
शत्रुघ्न भी गहन शोक में डूब गए। दोनों भाइयों ने महल में स्तब्धता फैला दी। थोड़ी देर बाद जब भरत को होश आया, तो उनके मन में एक ही नाम गूंज रहा था — कैकेयी।
कैकेयी पर भरत का क्रोध:
वे सीधा कैकेयी के कक्ष में पहुंचे। कैकेयी ने जैसे ही पुत्र को देखा, वे प्रसन्न होकर बाहें फैलाने लगीं, लेकिन भरत ने तीव्र स्वर में कहा, “माँ? नहीं, तुमने वह अधिकार खो दिया है।”
उन्होंने रोते हुए कहा, “तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई! पिताजी इस संसार में नहीं रहे, राम भैया वनवास को चले गए। क्या तुम अब तृप्त हो?”
“जाके प्रिय न राम बैदेही,
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥”
भरत के मुख से यह वचन सुनकर कैकेयी स्तब्ध रह गईं। उनके गर्व की मृगत्रष्णा अब गलानी के आँसुओं में बह चुकी थी। वे फूट-फूटकर रो पड़ीं और कहा — “पुत्र! मुझे क्षमा करो… मैंने मोह में अंधी होकर यह सब किया…”
दशरथ की अंत्येष्टि:
गुरु वशिष्ठ के निर्देशन में अगले दिन दशरथ जी का अंतिम संस्कार किया गया। भरत ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। सारे नगर की प्रजा बिलख उठी। उनके राजा, जिन्होंने राम को सबसे अधिक चाहा, वे राम के बिना ही विदा हो गए।
चंदन की चिता पर लेटे दशरथ, और उसके चारों ओर रोते हुए जन — यह दृश्य स्वयं देवताओं को भी द्रवित कर गया। भरत ने मन ही मन संकल्प लिया — "जब तक राम नहीं लौटते, मैं गद्दी को छुऊँगा भी नहीं।"
भरत का प्रतिज्ञा और अयोध्या का समर्थन:
भरत ने घोषणा की, “जब तक भैया राम अयोध्या नहीं लौटते, मैं राजमहल में नहीं रहूँगा, न राजसिंहासन स्वीकार करूँगा। मैं केवल उनका सेवक बनकर रहूँगा।” यह सुनकर अयोध्या के सभी नागरिक भावविभोर हो उठे।
चारों ओर यही चर्चा थी — अब भरत क्या करेंगे? क्या वे राम को वापस लाएँगे? और क्या राम लौटने को तैयार होंगे?
समापन:
पिता का श्राद्ध पूरा करने के बाद भरत अब केवल एक ही संकल्प में स्थिर थे — श्रीराम को किसी भी प्रकार अयोध्या लौटाना। आगे के प्रसंग में हम देखेंगे — भरत की चित्रकूट यात्रा और वह अद्भुत मिलन, जो रामायण को भावुकता और भक्ति की चरम सीमा तक ले जाता है।




