विस्तृत उत्तर
अध्याय 2 की कथा अत्यंत क्रांतिकारी है जो 'सामाजिक समावेशिता' (Social Inclusivity) को दर्शाती है। काशी का एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण और एक भील (लकड़हारा) भगवान का व्रत करते हैं और संपन्न हो जाते हैं। यह कथा सिद्ध करती है कि सत्यनारायण की पूजा का अधिकार सबको है, चाहे वह शूद्र हो या जनजाति। लकड़हारा अपनी मेहनत की कमाई से प्रसाद खरीदता है, जो 'कर्म' और 'पुरुषार्थ' की महत्ता स्थापित करता है। यह भगवान को 'गरीबों के देवता' के रूप में प्रतिष्ठित करता है।





