विस्तृत उत्तर
मनसा देवी की इच्छा थी कि मृत्युलोक का कोई अत्यंत प्रतापी और श्रेष्ठ जन सर्वप्रथम उनकी पूजा करे। यह कार्य अंततः 'चाँद सौदागर' ने किया। जब उसकी पुत्रवधू बिहुला देवलोक से उसके सातों मृत पुत्रों और खोई हुई संपत्ति को लौटा लाई, तो चाँद का अहंकार टूट गया। उसने पूजा तो की, लेकिन अपने हठ के कारण देवी की मूर्ति की ओर पीठ कर ली और उल्टे (बाएँ) हाथ से पीछे की तरफ फूल फेंका। माता ने उस प्रथम अर्पण को स्वीकार कर लिया और उसी दिन से पृथ्वी पर उनकी भव्य पूजा शुरू हो गई।





