विस्तृत उत्तर
कुष्ठ रोग का श्राप भुगतते हुए हेममाली कई वर्षों तक भटकने के बाद हिमालय में साक्षात ब्रह्मा के समान दीप्तिमान 'ऋषि मार्कण्डेय' के आश्रम में पहुँचा। ऋषि ने उसकी दुर्दशा देखकर उसका महापाप पूछा। हेममाली ने रोते हुए अपना सारा सच बता दिया। उसके सच्चे पश्चाताप को देखकर ऋषि मार्कण्डेय ने उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की 'योगिनी एकादशी' का व्रत करने को कहा। हेममाली ने पूरे विधि-विधान और रात्रि जागरण के साथ यह व्रत किया, जिससे उसका कुष्ठ रोग ठीक हो गया और वह वापस दिव्य रूप पाकर अलकापुरी लौट गया।



