बाल कांड – पोस्ट 8: विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध और अहल्या उद्धार
प्रमुख घटनाक्रम: राम और लक्ष्मण किशोरावस्था में आ गए थे। उसी समय ऋषि विश्वामित्र दशरथ के दरबार में आए और उन्होंने यज्ञ की रक्षा हेतु राम और लक्ष्मण को अपने साथ मांग लिया। राजा दशरथ पहली बार अपने सुकुमार पुत्रों को वन जाने देने में हिचकिचाए, लेकिन वशिष्ठ के समझाने पर मान गए।
राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ सिद्धाश्रम की ओर चल पड़े। रास्ते में जंगल में उन्होंने विश्वामित्र के कहने पर भयंकर राक्षसी ताड़का का वध किया और आश्रम पर आने वाले राक्षसों (सुबाहु आदि) को भी मार भगाया। इसके बाद विश्वामित्र दोनों राजकुमारों को मिथिला (जनकपुर) की ओर ले चले।
मार्ग में गौतम ऋषि के आश्रम में राम ने शापग्रस्त शिला (पत्थर) का पैर से स्पर्श किया तो वह स्त्री रूप में बदल गई – यह अहल्या उद्धार की परम पुनीत घटना थी। इस पोस्ट में हम इन घटनाओं को क्रम से वर्णन करेंगे और प्रमुख चौपाइयों के द्वारा सरल व्याख्या समझेंगे।
ऋषि विश्वामित्र का आगमन और राम-लक्ष्मण को वन गमन
एक दिन अयोध्या के राजदरबार में मुनि विश्वामित्र पधारे। राजा दशरथ ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया। विश्वामित्र महान तपस्वी थे, पर उनकी यज्ञ-विधि को राक्षस अनेक बार बाधित करते थे।
उन्होंने दशरथ से कहा, “मैं सिद्धाश्रम में यज्ञ कर रहा हूँ, वहाँ राक्षस विघ्न डालते हैं। हे राजन, आप अपने ज्येष्ठ पुत्र राम (और साथ में लक्ष्मण) को मेरे साथ भेज दें। वे इन राक्षसों का संहार कर सकेंगे।”
यह सुनते ही दशरथ घबरा गए – १६ वर्ष के कोमल किशोर राम को भयानक राक्षसों से लड़ने भेजना! दशरथ ने विनम्रतापूर्वक कहा, “मुनिवर, राम अभी बालक हैं, मैं स्वयं आपकी रक्षा के लिए सेना लेकर चलूँगा।”
इस पर विश्वामित्र क्रोधित होने लगे – उन्होंने कहा कि क्षत्रिय धर्म यही है कि आप गुरुहित पर अपने पुत्र अर्पित करें। गुरु वशिष्ठ ने दशरथ को समझाया कि “हे राजन, बिना संकोच राम-लक्ष्मण को जाने दें, इनकी अनुपस्थिति में कोई अनिष्ट नहीं होगा, बल्कि राम का यश बढ़ेगा और लोककल्याण होगा।”
अंततः दशरथ मान गए और राम तथा लक्ष्मण को संपूर्ण दिव्यास्त्रों का ज्ञान देकर विदा किया गया।
राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे-पीछे पैदल चल पड़े। विश्वामित्र जी रास्ते में उन्हें सर्वत्र ज्ञान और शिक्षाएँ देते जाते थे। सबसे पहले उन्हें माल और नीद्रा पर विजय के मंत्र (“बाला” और “अतिबाला” विद्याएँ) दीं ताकि थकान-भूख उनपर प्रभाव न करे। राम-लक्ष्मण संध्या समय गुरु के साथ वेद पाठ और ध्यान भी करते जाते थे। कुछ ही दिन में वे ताड़का वन में पहुँचे।
ताड़का राक्षसी का वध
ताड़का वन एक भयंकर जंगल था जहाँ की अधिवासी राक्षसी ताड़का नाम की असुर थी। वह अत्यंत बलशालिनी और क्रूर थी – ऋषियों के यज्ञ, गाँव के बस्तियाँ – सब उजाड़ डालती थी।
विश्वामित्र ने राम से कहा, “यह स्थान कभी सुंदर वन था, पर इस राक्षसी ने इसे श्मशान बना दिया है, अब तुम इस राक्षसी का अंत करो।”
राम के लिए नारी-वध का धर्मसंकट था, किंतु ऋषि के आदेश पर धर्म हेतु उन्होंने धनुष उठाया। ताड़का एक विकराल आकार वाली राक्षसी थी, उसने पेड़ उखाड़ रामों पर फेंके। राम ने बाणों से वार करके अंत में एक तीक्ष्ण बाण उसकी छाती में मारा जिससे ताड़का धराशायी हो गई। लक्ष्मण ने भी राम की सहायता की और ताड़का का अंत कर दिया।
देवताओं ने प्रसन्न होकर पुष्प वर्षा की, क्योंकि यह अत्याचारी बाधा दूर हुई। ताड़का के वध से सिद्धाश्रम के ऋषि निर्भय हो गए।
यज्ञ की रक्षा और राक्षस संहार
इसके बाद विश्वामित्र के सिद्धाश्रम में पहुँचकर राम-लक्ष्मण ने छः दिन तक राक्षसों से यज्ञ की रक्षा की। जैसे ही अंतिम दिन यज्ञ पूरा होने को था, राक्षस मारीच और सुबाहु अपने दल के साथ आकाश मार्ग से आए और रक्त-वर्षा करने लगे।
राम ने तुरंत धनुष सँभाला – उन्होंने एक ही प्रत्यंचा पर अग्निबाण चढ़ाकर सुबाहु को मार गिराया और मारीच को मानसरोवर की ओर सागर में बहुत दूर तक अपने मानसोत्तार बाण से फेंक दिया (मारीच बच गया, बाद में वही रावण की मदद से स्वर्ण मृग बनकर आया था)।
शेष तुच्छ राक्षसों को भी लक्ष्मण ने नष्ट कर डाला। इस प्रकार विश्वामित्र का यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हुआ। सारे ऋषि “रामचंद्र की जय” बोले।
अहल्या उद्धार (गौतम ऋषि आश्रम)
यज्ञ पूर्ण होने के बाद विश्वामित्र मुनि ने राम से कहा कि “अब हम मिथिला नगरी चलेंगे, वहाँ राजा जनक के यहाँ महादेव के धनुष-यज्ञ (स्वयंवर) का आयोजन है।” राम-लक्ष्मण गुरु के साथ जनकपुर की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्होंने अनेक पवित्र तीर्थ देखे।
जब वे गौतम ऋषि के आश्रम के पास पहुँचे तो राम ने देखा कि आश्रम का माहौल अजीब सा निर्जन है – वहाँ पेड़-पौधे तो हैं, पर कोई जीव-जन्तु नहीं। राम ने मुनि विश्वामित्र से कारण पूछा।
विश्वामित्र ने बताया, यह स्थान वर्षों से शापग्रस्त है – यहाँ महान तपस्वी गौतम ऋषि का आश्रम था। उनकी पत्नी अहल्या थी, जो अत्यंत रूपवती थी। एक बार देवराज इंद्र ने कपट से उनका सतीत्व भंग करना चाहा।
गौतम ऋषि को यह पता चला तो उन्होंने कुपित होकर इंद्र को श्राप दिया और अपनी पत्नी अहल्या को भी यह शाप दिया कि “तू पत्थर की शिला बनकर पड़े, जब श्रीहरि राम अवतार में आकर तुझे पवित्रीकरण करेंगे तभी तेरा उद्धार होगा।”
तब से अहल्या एक पत्थर के रूप में पड़ी हैं और उनकी मुक्ति की प्रतीक्षा है। यह सुनकर राम ने मन ही मन संकल्प किया कि अहल्या का उद्धार करना है।
तुलसीदास जी चित्रण करते हैं कि राम आश्रम में प्रवेश करते हैं, तो उनके कदम पड़ते ही सम्पूर्ण आश्रम प्रकाश से जगमगा उठता है। राम ने जैसे ही चरण उस पत्थर (शिला) पर रखा, तुरंत वह स्त्री के रूप में प्रकट हो गईं – अहल्या अपने पूर्वरूप में आ गईं:
दोहा:
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
भावार्थ: (विश्वामित्र ने कहा था-) “गौतम मुनि की स्त्री अहल्या शापवश पत्थर की देह धारण किए बड़ी धीरता से आपके चरणकमलों की धूलि चाह रही है। हे रघुवीर, इस पर कृपा कीजिए।”
(इसी को राम ने सत्य कर दिखाया।)
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