विस्तृत उत्तर
व्रतराज' के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने नवग्रहों के विवाद में शनि देव का अपमान कर दिया था। इसके फलस्वरुप शनि की दशा आने पर राजा का राज्य छिन गया, हाथ-पैर कटवाने पड़े और तेली के यहाँ कोल्हू चलाना पड़ा। भूल का अहसास होने पर राजा ने शनि देव का व्रत किया, जिससे प्रसन्न होकर शनि देव ने उन्हें सब कुछ वापस लौटा दिया। दूसरी कथा स्कंद पुराण की है, जिसमें महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्पलाद ने अपने पिता की मृत्यु का कारण शनि को मानकर उन्हें अपने तपोबल से दंडित किया। तब देवताओं के हस्तक्षेप से समझौता हुआ कि जो पिप्पलाद मुनि का स्मरण करेगा या 16 वर्ष से कम आयु का होगा, शनि उसे पीड़ा नहीं देंगे।



