लक्ष्मण-रेखा और शूर्पणखा का छल
इधर आश्रम पर माता सीता ने मरिच की निकली “हा लक्ष्मण!” की पीड़ाभरी आवाज़ सुन ली। रामजी दूर जंगल में हैं और अचानक इस तरह भाई को पुकार रहे हैं – यह सोचकर सीताजी घबरा उठीं। वे तुरंत लक्ष्मण के पास आईं और बोलीं कि “तुम्हारे भैया बहुत संकट में हैं, जल्दी उनकी सहायता को जाओ!”
लक्ष्मणजी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि “माता! जिन श्रीराम की भौंह के इशारे मात्र से पूरी सृष्टि का संहार हो सकता है, भला वे स्वप्न में भी किसी संकट में कैसे पड़ सकते हैं?” तुलसीदास कहते हैं:
सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥
लेकिन सीताजी इस समय पतिदेव के लिए अत्यंत चिंतित थीं। भगवान की इच्छा से (लीलावश) सीता ने व्याकुल होकर लक्ष्मण को कुछ कठोर वचन कह दिए। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि “शायद तुम्हारे मन में ही गलत भाव आ गए हैं, तभी तुम राम की सहायता करने नहीं जाना चाहते! मुझे शक है कि तुमने मन ही मन कुछ और ही इच्छा पाल रखी है….”
सीताजी ऐसे कटु शब्द बोलते ही पछताने लगीं, पर लक्ष्मण को इन वचनों ने अंदर तक कष्ट पहुँचा दिया। लक्ष्मणजी ने कभी सोचा भी न था कि माँ सीता, जिन्हें वे मातृतुल्य मानते हैं, उन पर ऐसा आक्षेप करेंगी। वे क्षुब्ध होकर बोले – “जैसी आपकी आज्ञा माता, मैं जाता हूँ।”
जाने से पहले लक्ष्मणजी ने चारों ओर पर्णकुटी के आसपास अपने बाण की नोक से एक दिव्य रेखा खींच दी और सीता को विनीत भाव से कहा कि “जब तक हम न लौटें, कृपा करके इस लक्ष्मण-रेखा के बाहर कदम न रखना। इस रेखा के भीतर आप पूर्णतया सुरक्षित रहेंगी।” फिर लक्ष्मणजी ने हृदय भारी करके प्रभु राम का स्मरण किया और सीताजी को वनदेवताओं की रक्षा में छोड़कर वहाँ से चल दिए।
भगवान की लीला देखिए – उधर भक्त लक्ष्मण हटे और इधर रावण को मौका मिल गया। रावण काफी देर से ऋषि के वेश में दूर खड़ा यह दृश्य देख रहा था। अब उसने कुटिया की ओर कदम बढ़ाए। उस समय आश्रम सूना था – राम और लक्ष्मण दोनों बाहर थे, केवल सीताजी अकेली थीं। तुलसीदास वर्णन करते हैं:
सीता हरण: रावण का कपट और सीता की गरिमा
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥
रावण ने जटाधारी, भिक्षु का रूप ले रखा था। हाथ में भिक्षापात्र और लकुटी लिए वह मृदु वचन बोलता हुआ कुटिया के निकट पहुँचा। पहले उसने नियमानुसार “भिक्षां देहि” कहा, तो सीताजी लक्ष्मण-रेखा के भीतर से ही कुछ भिक्षा देने लगीं।
लेकिन कपटी रावण ने चाल चली – उसने विनीत स्वर में कहा कि “देवी, मैं वनवासी तपस्वी हूँ, रेखा के उस पार से दी गई भिक्षा स्वीकार नहीं करता। आप मेरे निकट आकर ही दान दें, तभी मुझे मान्य होगा।”
सीताजी विचार करने लगीं कि यह तपस्वी संदेहास्पद तो है, पर कहीं वास्तव में कोई ऋषि होकर क्रोध न कर बैठे। वे रामजी की प्रेरणा से लक्ष्मण-रेखा लाँघकर बाहर आईं और जैसे ही भिक्षा के लिए हाथ बढ़ाया, रावण ने अपना असली रूप प्रकट कर दिया!
सामने अचानक रावण को प्रकट देखकर जानकी चकित और भयभीत हुईं। रावण ने अपना नाम भी बताया जिससे सीता को एक पल के लिए तीव्र भय का अनुभव हुआ। पर अगले ही क्षण उन्होंने धीरज धरकर कठोर वचन कहे – “अरे दुष्ट! ज़रा ठहर, मेरे प्रभु आते ही होंगे।”
सीता के इस प्रकार दृढ़तापूर्वक ललकारने पर रावण क्रोध से लाल हो गया, पर उनके तेज और पवित्रता को मन ही मन प्रणाम भी किया। इसके बाद रावण ने एक क्षण देर करना उचित न समझा। उसने बलपूर्वक सीताजी को पकड़ लिया और अपने पुष्पक रथ पर बैठा लिया।
रावण द्वारा सीता हरण
क्रोधित रावण जैसे ही सीताजी को रथ में बैठाकर आकाशमार्ग से उड़ चला, उसे अतीव उतावली और भय ने घेर लिया। तुलसीदास लिखते हैं:
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥
रावण के रथ के दूर आकाश में पहुँचते ही जानकीजी प्रलाप करने लगीं। उन्होंने दिग-दिगंत को गुहार लगाई और राम-लक्ष्मण को पुकारा। बिलखते हुए सीताजी ने आर्तनाद किया:
आरति हरन सरन सुखदायक, हा रघुकुल सरोज दिननायक!॥
उन्होंने व्याकुल पुकार लगाई कि प्रभु अब कहाँ हैं। अगली ही घड़ी जानकीजी को अपने किए पर पछतावा हुआ। वे बोलीं – “हाय लक्ष्मण! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। मैं ही क्रोध में अंधी हो गई और तुम्हें कड़े वचन कहे, उसी का फल मैं भोग रही हूँ।”
माता सीता विलाप करते हुए चारों दिशाओं, नदी, वृक्ष, पर्वतों को संबोधित करके कहने लगीं – “मेरी विपत्ति की खबर कौन मेरे प्रभु राम को देगा?” वे व्यथा में डूबकर कहती हैं कि “यह तो ऐसा है मानो यज्ञ का अन्न कोई गधा खाने जा रहा हो!” (नीच रावण पवित्र सीता को ले जा रहा है)।
सीताजी की करुण पुकार सुनकर जंगल के जड़-चेतन सब जीव दुःखी हो गए – पक्षी व्याकुल हो उड़ने लगे, पेड़ सूखने से लगे, पशुओं की आँखों से आँसू बह चले। मानो सारी सृष्टि उस क्षण जानकी के दुःख में संतप्त हो उठी।
इधर रावण अपने रथ को तेज़ी से हाँके चला जा रहा था। सीताजी रोते-रोते थककर चुप होने लगीं तो रावण ने मौका देख उन्हें फिर बहलाने-फुसलाने की कोशिश की।
वह उन्हें अपने महल के ऐश्वर्य और रानी बनाने का लालच देता, कभी डराता, तो कभी प्रेम का छल दिखाता। जानकीजी ने उसकी ओर देखना तक गवारा नहीं किया।
रावण के हृदय में सीता के सौंदर्य और तेज को लेकर एक भय भी था। अंततः जब सभी प्रयास निष्फल हो गए तो क्रुद्ध रावण ने उन्हें धमकी दी कि “यदि तुमने मेरा कहना न माना तो मैं तुम्हें कष्ट पहुँचाऊंगा।”
लेकिन यह तेजस्विनी जनकसुता किसी भी हाल में रावण के आगे झुकने को तैयार न थीं।
जटायु का बलिदान और सीता की लंका यात्रा
रावण का पुष्पक रथ आकाश में तेज़ी से बढ़ा जा रहा था। पृथ्वी पर जंगली जीव-जंतु यह विकट घटना देख रहे थे। उसी समय गिद्ध-राज जटायु की नज़र आकाश में उड़ते रथ पर पड़ी।
जटायु वृद्ध हुआ गृध्र (गिद्ध) था, दशरथ का पुराना मित्र और वन का रक्षक। उसने देखा कि रावण सीता को बलपूर्वक ले जा रहा है। सीताजी को पहचानते ही जटायु व्याकुल हो उठा और तुरंत रावण को ललकारते हुए उसके रथ के सामने आ डटा।
जटायु ने ऊँची आवाज़ में कहा – “हे दशमुख रावण! रुक जा! क्या तूने मुझे नहीं पहचाना? मैं दशरथ का मित्र गृध्रराज जटायु हूँ। तू निडर होकर कहाँ चला जा रहा है? जानकी को छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा, नहीं तो तेरी मृत्यु निश्चित है!”
रावण पहले तो जटायु को देख अचरज में पड़ गया कि यह अचानक कहाँ से आ गया। एक पल को उसने सोचा यह कहीं गरुड़ या कोई देवता तो नहीं। पर अगले ही क्षण उसने जटायु को पहचान लिया और क्रूर हँसी के साथ बोला – “अरे जटायु! तू बूढ़ा हो चला है, फिर भी मेरा मार्ग रोक रहा है? जानकी को बचाने चला है? अच्छा, तू तो मेरे हाथों मोक्ष पाएगा!”
दोनों में भयानक युद्ध छिड़ गया। वीर जटायु ने अपनी तीखी चोंच और मज़बूत पंजों से रावण पर ऐसा प्रहार किया कि रावण रथ से नीचे गिर पड़ा। जटायु ने झपटकर रावण के बाल पकड़ लिये और उसे घसीटकर भूमि पर ला पटका। हतप्रभ रावण को एक क्षण के लिए मूर्छा आ गई।
गिद्धराज ने अपनी चोंच और पैरों के प्रहार से रावण के शरीर को ज़ख्मी कर डाला। थोड़ी देर में रावण संभला और असहनीय पीड़ा से क्रोधित होकर अपनी तलवार खींच ली।
दोनों में घमासान द्वंद्व हुआ, लेकिन रावण अब छल पर उतर आया – उसने तीव्रता से तलवार घुमाकर जटायु के पंख काट डाले। पंख कटते ही वृद्ध जटायु लहूलुहान होकर भूमि पर गिर पड़ा।
परम भक्त जटायु उस क्षण भी भगवान श्रीराम का नाम जप रहा था और उनके अद्भुत चरित्र का स्मरण कर रहा था।
अब रावण और भी जल्दी में था – उसे लगा कि कहीं और विघ्न न आ जाए। भयभीत रावण आतुरता से रथ हाँक रहा था।
सीताजी रोती हुई आकाश मार्ग में जाती थीं, मानो किसी शिकारी के जाल में फँसी हुई मृगी भय के मारे चीत्कार कर रही हो!
जटायु ने अंतिम प्रयास करते हुए रावण के रथ के पीछे उड़ने की चेष्टा की, पर पंख कट जाने से गिर पड़ा। वह मृत्यु-सन्निकट था। सीताजी की आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित थी।
अचानक उनकी नजर नीचे पर्वत पर बैठे वानरों के एक समूह पर पड़ी। आशा की एक किरण जानकी के मन में जागी। उन्होंने “हरि! हरि!” कहकर उन वानरों की ओर अपने ऊपर ओढ़ा हुआ लाल रंग का चमकीला उत्तरीय वस्त्र नीचे फेंक दिया।
उस वस्त्र के टुकड़े पहाड़ियों पर बिखर गए। (यही वस्त्र और आभूषण आगे चलकर सुग्रीव की वानर सेना को मिले और सीता की खोज का मार्गदर्शन बने)। इस प्रकार रावण सीताजी को लेकर लंका की ओर बढ़ गया।
रावण सीधे अपनी राजधानी लंका पहुँचा और अशोक वाटिका में सीताजी को कड़ाई से बंदी बनाकर रख दिया। उसने राक्षसों को आज्ञा दी कि सीता के चारों ओर कड़ी पहरा रखें।
सीताजी को प्रसन्न करने या डराने के लिए रावण ने अनेक उपाय किए – कोमल शब्दों से उनसे अपना होने का अनुरोध किया, राजमहल का सुख देने की बात की; फिर उनके इंकार पर भय दिखाया, धमकियाँ दीं।
पर जानकी जी चट्टान की तरह अडिग रहीं। अंत में थक-हारकर रावण ने क्रोधित हो राक्षसनियों को सीता पर निगरानी करने भेज दिया और खुद सभा में चला गया। अशोक-वाटिका में सीता दिन-रात राम का स्मरण कर अश्रु बहाती रहीं।
ध्यान देने योग्य: गोस्वामी तुलसीदासजी के अनुसार प्रभु श्रीराम की माया से वास्तविक सीताजी ने रावण के आगमन से पूर्व ही अग्नि-देवता के संरक्षण में अपना रूप उन्हें समर्पित कर दिया था।
अर्थात रावण जिस सीता को हर कर ले गया, वह सीताजी की मायाछाया थी। वास्तविक जनकात्मजा श्रीराम की अग्नि में सुरक्षित रहीं और लंका में रावण जिस सीता को कैद किए था, वह एक मायावी प्रतिरूप थी।
इस कथा का विस्तार आगे उत्तरकांड में आता है, पर रामचरितमानस के भक्त कवियों की मान्यता है कि रावण स्पर्श तो क्या, सीता के निकट भी कभी नहीं जा सका – वह केवल माया सीता को लेकर गया था।






