विस्तृत उत्तर
नवधा भक्ति भक्ति के नौ प्रकारों का एक सुव्यवस्थित मार्ग है। इसका सर्वाधिक प्रामाणिक वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण (7.5.23-25) में भक्त प्रह्लाद के वचनों में मिलता है जब उन्होंने अपने पिता हिरण्यकशिपु को इसका उपदेश दिया। रामचरितमानस के अरण्यकांड में भगवान श्रीराम ने माता शबरी को इन्हीं नौ प्रकारों का उपदेश दिया।
श्रवण — भगवान की कथा, लीला, गुण और महिमा को श्रद्धापूर्वक सुनना। परीक्षित इसके आदर्श हैं।
कीर्तन — भगवान के नाम, गुण और पराक्रम का प्रेमपूर्वक गायन और संकीर्तन। शुकदेव इसके आदर्श माने गए हैं।
स्मरण — सतत और अनन्य भाव से भगवान के स्वरूप का चिंतन और स्मरण। प्रह्लाद इसके आदर्श हैं।
पाद-सेवन — भगवान के चरणों का आश्रय और सेवा। लक्ष्मीजी इसके आदर्श हैं।
अर्चन — मन, वचन और कर्म से पवित्र सामग्री द्वारा भगवान की पूजा। राजा पृथु इसके आदर्श हैं।
वंदन — भगवान के प्रत्येक स्वरूप के प्रति साष्टांग प्रणाम और स्तुति। अक्रूर इसके आदर्श हैं।
दास्य — भगवान को स्वामी और स्वयं को उनका दास समझकर सेवा। हनुमानजी इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
सख्य — भगवान को अपना परम मित्र मानकर सर्वस्व समर्पण। अर्जुन इसके आदर्श हैं।
आत्मनिवेदन — अहंकाररहित होकर सम्पूर्ण आत्मा, मन और जीवन को भगवान को समर्पित कर देना। बलि राजा इसके आदर्श हैं।
इन नौ में भी श्रवण, कीर्तन और स्मरण को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।





