विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में देवता का त्रिकाल (तीन बार — सुबह, दोपहर, शाम) पूजन बताया गया है। परंतु कलियुग के व्यस्त जीवन को ध्यान में रखते हुए संतों ने न्यूनतम एक बार — प्रातःकाल — की पूजा का विधान बताया है।
न्यूनतम समय — एक सरल और भावपूर्ण दैनिक पूजा के लिए 10 से 15 मिनट पर्याप्त हैं। इसमें स्नान, स्वच्छ वस्त्र, दीप-धूप, नैवेद्य, आरती और एक छोटी प्रार्थना — सब कुछ आ सकता है।
समय से अधिक भाव महत्वपूर्ण है — शास्त्र और संतों दोनों का एक स्वर में कहना है कि 5 मिनट की सच्ची और भावपूर्ण पूजा, एक घंटे की यांत्रिक पूजा से अधिक फलदायी है। भगवद्गीता में भी कहा है — 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति' — अर्थात पत्ती, फूल, फल या जल — कुछ भी भक्तिभाव से अर्पित करो, मैं स्वीकार करता हूँ।
व्यावहारिक सुझाव:
सुबह उठकर 5-7 मिनट — स्नान के बाद दीप जलाएँ, गंध लगाएँ, एक फूल अर्पित करें और आरती करें।
7-8 मिनट — अपने इष्टदेव का एक मंत्र 21 या 108 बार जपें।
2-3 मिनट — क्षमापन मंत्र बोलें और प्रसाद ग्रहण करें।
इस प्रकार कुल 15-20 मिनट में पूरी सार्थक दैनिक पूजा सम्पन्न हो सकती है।





