विस्तृत उत्तर
यह एक गहरा और व्यावहारिक प्रश्न है। शास्त्रों में भगवान से माँगने की एक सुंदर परंपरा है — किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि सच्ची भक्ति 'माँगने' से परे होती है।
क्या माँगना उचित है:
विवेक-बुद्धि — 'दे प्रभु विवेक बुद्धि, जिससे तेरी राह मिले' — सही-गलत को पहचानने की बुद्धि माँगना सबसे श्रेष्ठ माँग है।
शक्ति — जीवन के संकटों को झेलने की शक्ति, धर्म के मार्ग पर चलने का सामर्थ्य।
भक्ति — 'भक्ति देहि दासवत् सदा' — भगवान से स्वयं भक्ति माँगना सबसे उत्तम है।
क्षमा और शुद्धि — पापों के लिए पश्चाताप करके क्षमा माँगना।
दूसरों का कल्याण — प्रियजनों और सभी प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना।
जो माँगना हो सावधानी से माँगें — धन, पद, सफलता — इन्हें माँगना बुरा नहीं। किंतु इनके साथ यह भाव रखें कि 'जो मेरे लिए उचित हो वो दो।'
क्या नहीं माँगना चाहिए:
किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए — किसी के बुरे के लिए भगवान से माँगना — यह भक्ति नहीं, यह उन्हें अपमानित करना है।
अहंकार की पूर्ति के लिए — केवल श्रेष्ठता दिखाने के लिए शक्ति या सफलता।
शास्त्र का आदर्श — भगवान से सबसे उत्तम माँग — गीता (12.8) — 'मय्येव मन आधत्स्व' — अपना मन मुझ में लगा दो। यह माँगो तो भगवान स्वयं बाकी सब देते हैं।
ध्रुव की कथा याद करें — ध्रुव राजगद्दी के लिए तपस्या करने गए, पर भगवान का साक्षात्कार होने पर सब माँगना भूल गए।





