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पढ़िए: भगवान राम के किस प्रभाव को देखकर जगतजननी जगदंबा देवी सती डर गईं?
राम

भगवान राम के किस प्रभाव को देखकर जगतजननी जगदंबा देवी

📿 पौराणिक•3 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 28 मार्च 2025
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पढ़िए: भगवान राम के किस प्रभाव को देखकर जगतजननी जगदंबा देवी सती डर गईं? पढ़िए: भगवान राम के किस प्रभाव को देखकर जगतजननी जगदंबा सती डर गईं? जब भगवान शंकर के बार-बार मना करने पर भी सती नहीं मानीं और भगवान राम की परीक्षा ली, तब भगवान राम उन्हें पहचान गए, जिससे देवी सती को...

ज्ञान-सार

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पढ़िए: भगवान राम के किस प्रभाव को देखकर जगतजननी जगदंबा सती डर गईं?

जब भगवान शंकर के बार-बार मना करने पर भी सती नहीं मानीं और भगवान राम की परीक्षा ली, तब भगवान राम उन्हें पहचान गए, जिससे देवी सती को अपने किए गए कार्य पर दुःख हुआ। फिर भगवान राम ने सती को अपना प्रभाव दिखाया।

आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं कि सती ने भगवान राम की परीक्षा क्यों ली।

पढ़िए: देवी सती ने किस संदेह के कारण सीता जी का रूप लेकर भगवान राम की परीक्षा ली?

“जाना राम सति दुखु पावा। निज प्रभाव कछु प्रगटि जनावा।। सति दिख कौतुक मग जाता। आग रामु सहित श्री भ्राता।।”

सतीजी को दुख हुआ; तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके उन्हें दिखलाया। सतीजी ने मार्ग में जाते हुए यह कौतुक देखा कि श्रीरामचंद्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी सहित आगे चले जा रहे हैं। [इस अवसर पर सीताजी को इसलिए दिखाया गया, ताकि सतीजी, श्रीराम के सच्चिदानंदमय रूप को देखकर, वियोग और दुख की कल्पना जो उन्हें हुई थी, वह दूर हो जाए। तथा वे अपने प्राकृतिक (स्वाभाविक) अवस्था में लौट आएं।]

“फिर चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा।। जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।।”
“देखें सिव बिरंचि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।। बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखें सब देवा।।”

जब सती पीछे मुड़कर देखती हैं, तो उन्हें भाई लक्ष्मण और सीता के साथ भगवान राम सुंदर वेश में दिखाई देते हैं। वे (सती) जहाँ भी देखती हैं, वहाँ भगवान राम विराजमान हैं और चतुर सिद्ध मुनि उनकी सेवा कर रहे हैं। उन्होंने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक से बढ़कर एक असीम प्रभाव वाले थे। उन्होंने देखा कि विभिन्न रूपों में सभी देवता भगवान राम के चरणों की वंदना और उनकी सेवा कर रहे हैं।

“सती बिधात्री इंदिरा देखि अनगिनत अनूप। जेहि जेहिं बेष अज आदि सुर तेहि तेहिं तनु अनुरूप।।”
“देखें जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।। जीव चराचर जो संसारा। देखें सकल अनेक प्रकारा।। पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।। अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।।”

सती ने जहाँ-तहाँ जितने राम देखे, उतने ही उनकी शक्तियों के साथ सभी देवताओं को भी देखा। संसार के सभी चर-अचर जीवों को भी अनेक प्रकार से देखा। अनेक वेश धारण करके देवता प्रभु राम की पूजा कर रहे हैं, परंतु राम का दूसरा रूप कहीं नहीं देखा। सीता सहित बहुत से राम देखे, परंतु उनके वेश अनेक नहीं थे।

“सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता। हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।। बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।। पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।”

वही राम, वही लक्ष्मण और वही सीता को देखकर सती बहुत भयभीत हुईं। हृदय काँपने लगा, शरीर का कुछ होश नहीं रहा, आँखें बंद करके मार्ग में ही बैठ गईं। फिर आँखें खोलकर देखा तो वहाँ कुछ नहीं दिखा। बार-बार राम के चरणों में सिर झुकाकर वे वहाँ चली गईं जहाँ शिव थे !

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी के सीता रूप धारण करने पर लक्ष्मणजी ने क्या किया?

लक्ष्मणजी सतीजी का बनावटी सीता वेष देखकर चकित हो गये, हृदय में भ्रम हुआ। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके — क्योंकि धीरबुद्धि लक्ष्मणजी प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे।

आदर्श स्त्री

सीता जी से स्त्रियाँ क्या सीखें?

धैर्य(लंका 11 माह), आत्मसम्मान(अग्निपरीक्षा+पृथ्वी), पतिव्रत+स्वतंत्रता(रावण ठुकराया), शिक्षा(विदुषी), करुणा। Strong+Compassionate दोनों। अपमान=स्वीकार नहीं।

रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने सीता रूप धारण करके राम की परीक्षा क्यों ली?

संदेह — सर्वव्यापक ब्रह्म मनुष्य कैसे? शिवजी ने मना किया पर नहीं मानीं — यही पतन का कारण।

असितांग भैरव परिचय और स्वरूप

अष्ट भैरवों में असितांग भैरव का क्या स्थान है?

असितांग भैरव अष्ट भैरवों में तृतीय स्थान पर हैं — वे पूर्व दिशा के संरक्षक (दिक्पाल) हैं और ज्ञान, सृजनात्मकता तथा शाप-निवृत्ति से संबंधित हैं।

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विवाह के सात फेरे और सात वचन — विस्तार से?

1.अन्न/पोषण 2.बल/स्वास्थ्य 3.धन/समृद्धि 4.सुख/सम्मान 5.संतान 6.ऋतु/संयम 7.मित्रता/वफादारी(सबसे महत्वपूर्ण)। ऋग्वेद सप्तपदी। 7 वचन=भोजन से मोक्ष=सम्पूर्ण जीवन।

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