विस्तृत उत्तर
स्वर्लोक और मोक्ष में मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है। स्वर्लोक भौतिक ब्रह्मांड के भीतर एक अस्थायी विश्राम स्थल है जहाँ आत्मा अपने अच्छे कर्मों का फल भोगने के लिए रुकती है। पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से वापस पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। इसके विपरीत मोक्ष वह परम अवस्था है जहाँ से कोई वापस नहीं आता। भगवद्गीता (15.6) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम' — वह परम धाम जहाँ जाने के पश्चात जीव लौटकर वापस संसार में नहीं आता। कर्मकांडी केवल स्वर्लोक को अंतिम लक्ष्य मानते हैं परंतु ब्रह्मज्ञानी और अनन्य भक्त इस स्वर्गिक सुख को भी अस्थायी मानते हैं क्योंकि यहाँ से पतन निश्चित है। भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि शुद्ध भक्ति के मार्ग पर चलने वाले साधक स्वर्लोक की कामना नहीं करते।
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