विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के पिण्ड-ब्रह्माण्ड तादात्म्य सिद्धान्त में मानव शरीर और ब्रह्माण्ड के बीच गहरे संबंध स्थापित किए गए हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार महर्लोक का स्थान मानव शरीर में कण्ठ (गले) के क्षेत्र में है जो कि योगशास्त्र में विशुद्ध चक्र का स्थान है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में महर्लोक भौतिक त्रैलोक्य (विनाशशील लोक) और नित्य-अविनाशी लोकों (जनलोक से सत्यलोक तक) के बीच सेतु है उसी प्रकार विशुद्ध चक्र मानव शरीर में निचले भौतिक चक्रों और उच्चतर आध्यात्मिक चक्रों के बीच सेतु है। इसी कारण जब कुंडलिनी शक्ति विशुद्ध चक्र को पार करती है तो साधक की चेतना भौतिक बंधनों से मुक्त होकर उच्चतर आध्यात्मिक अनुभवों में प्रवेश करती है — ठीक जैसे महर्लोक से आगे जनलोक और सत्यलोक का क्षेत्र आरम्भ होता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





