विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के छठे अंश (६.३.२८-२९) में संकर्षण की अग्नि द्वारा महर्लोक के संतापित होने और भृगु आदि महर्षियों के पलायन का अत्यंत सजीव और हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है। इस वर्णन के अनुसार जब नैमित्तिक प्रलय आती है और संकर्षण की अग्नि त्रैलोक्य को भस्म करते हुए ऊपर उठती है तो उसकी प्रचंड लपटें और असहनीय ताप महर्लोक तक पहुँचता है। इस भयंकर ताप से महर्लोक का वातावरण इस कदर संतापित हो जाता है कि वहाँ रहना असंभव हो जाता है। इस असहनीय स्थिति में महर्लोक में निवास करने वाले भृगु आदि महर्षि इस लोक का परित्याग कर देते हैं और अपनी योग-शक्ति से जनलोक या सत्यलोक की ओर पलायन कर जाते हैं। विष्णु पुराण का यह वर्णन महर्लोक की कृतकाकृतक प्रकृति को सबसे स्पष्ट और प्रामाणिक रूप से सिद्ध करता है।
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