विस्तृत उत्तर
समग्र शास्त्रीय अन्वेषण और पुराणों के तार्किक समन्वय से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि महर्लोक भौतिक ब्रह्माण्ड और विशुद्ध आध्यात्मिक लोकों के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभाजक रेखा (Transitional Realm) है। नीचे के तीन लोक (त्रैलोक्य) कृतक हैं — पूर्णतः भौतिक, सकाम कर्मों के फलों से आबद्ध और विनाशशील। ऊपर के तीन लोक (जनलोक से सत्यलोक) अकृतक हैं — पूर्णतः अविनाशी और नित्य। महर्लोक इन दोनों के बीच में है और कृतकाकृतक है — आंशिक रूप से विनाशी और आंशिक रूप से अविनाशी। यह वह ऊर्ध्व लोक है जो ब्रह्माण्ड के दैनंदिन प्रलय से आंशिक रूप से अछूता रहता है और जो भौतिक सूर्य की अग्नि से नहीं अपितु योग और तप की अतीन्द्रिय आन्तरिक अग्नि से प्रकाशित होता है। इसके एक तरफ भोग की दुनिया है और दूसरी तरफ मुक्ति की राह — इसीलिए यह भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच की विभाजक रेखा है।
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