अग्नि पुराण के विशिष्ट मंत्र
(ज्वर नाशन एवं अन्य)
मंत्र संग्रह
ज्वर नाशक मंत्र: ओम भस्माय विधम एकदम धीमहि तन्नो ज्वर प्रचोदयात
(यह अग्नि पुराण के ३००वें अध्याय से संभावित है, जहाँ ज्वर चिकित्सा का वर्णन है।)
अग्नि आवाहन मंत्र: ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम॥ 78
अग्नि गायत्री मंत्र: ऊँ महाज्वालाय विद्महे अग्नि मध्याय धीमहि । तन्नो: अग्नि प्रचोदयात ॥
देवता
अग्नि देव।
स्रोत
अग्नि पुराण।
प्रयोजन
ज्वर (बुखार) एवं अन्य रोगों का नाश, यज्ञ एवं अनुष्ठानों की सफलता, बुद्धि एवं आत्मिक प्रकाश की प्राप्ति।
विधि
ज्वर नाशक मंत्र का जप करने से ज्वर दूर होता है। अग्नि आवाहन मंत्र का प्रयोग हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित करते समय किया जाता है। अग्नि गायत्री मंत्र का जप अग्नि देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। साधना से पूर्व स्नान कर लाल वस्त्र धारण कर, पूजा स्थल पर अग्नि देव की प्रतिमा स्थापित कर, आचमन, धूप , घी का दीपक, लाल वस्त्र और जनेऊ अर्पित कर मंत्र जप करना चाहिए।
महत्व
अग्नि पुराण एक सात्विक पुराण है जिसमें विविध विषयों के साथ-साथ मंत्र, पूजा-विधान और चिकित्सा पद्धतियों का भी वर्णन है। इसमें वर्णित अनेक मंत्र, विशेषकर विभिन्न व्याधियों के निवारण हेतु, आज के समय में अल्पज्ञात हैं किन्तु अत्यंत प्रभावी हो सकते हैं। ज्वर नाशक मंत्र इसका एक उदाहरण है।




