विस्तृत उत्तर
ब्रह्माण्ड पुराण में महर्लोक के निवासियों के पाँच महान आध्यात्मिक ऐश्वर्यों में पहला ऐश्वर्य 'विजय' (Vijaya) है। इस विजय का अर्थ है — काम, क्रोध, लोभ जैसी वृत्तियों, अज्ञान और काल (समय) के प्रभाव पर पूर्ण विजय। यह केवल इन्द्रियों के दमन की बात नहीं है। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — ये षड्विकार — पूर्णतः निर्मूल हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त काल (समय) के प्रभाव पर विजय का अर्थ है कि इन ऋषियों पर बुढ़ापे, रोग और मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह विजय स्वर्गलोक के देवताओं को भी प्राप्त नहीं है क्योंकि स्वर्ग में भी पतन का भय बना रहता है। महर्लोक के ऋषियों की यह विजय उन्हें ब्रह्माण्ड के उच्चतम आध्यात्मिक स्तरों में से एक पर स्थापित करती है।
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