अरण्यकाण्ड भाग 5 – विराध वध और शरभंग ऋषि दर्शन
परिचय
अरण्य कांड के भाग 4 में हमने माता सीता के अत्रि मुनि तथा अनसूया जी से मिलन और अनसूया जी द्वारा सीताजी को पतिव्रत धर्म का उपदेश व अलौकिक उपहार मिलने तक की कथा देखी। अब भाग 5 में प्रभु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण दंडकारण्य के और भीतर प्रस्थान करते हैं।
इस भाग में दो प्रमुख घटनाएँ हैं – भयावह राक्षस विराध का वध एवं महान तपस्वी शरभंग ऋषि से भेंट और उन्हें प्रभु द्वारा परमगति प्रदान करना। प्रस्तुत कथा में तुलसीदास रचित चौपाइयों के साथ उनका आधुनिक हिन्दी अर्थ और आध्यात्मिक भावार्थ दिया गया है, जिससे विद्यार्थी, आध्यात्मिक साधक और सामान्य पाठक सभी लाभान्वित हों। आइये, पिछले प्रसंग के आगे की कथा का श्रद्धापूर्ण अनुकरण करते हुए देखते हैं कि वन में आगे क्या हुआ।
विराध राक्षस का वध
पिछले प्रसंग के अंत में श्रीरामचन्द्रजी, माता सीता और लक्ष्मणजी तपस्विनी अनसूया और ऋषि अत्रि को प्रणाम करके उनके आश्रम से विदा लेते हैं। भगवन् श्रीराम अब दंडक वन में आगे बढ़ रहे हैं। तुलसीदासजी वर्णन करते हैं:
आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥
व्याख्या: अत्रि मुनि के चरणकमलों में सिर नवाकर त्रिदेव (देवता), मानव और मुनियों के ईश्वर श्रीराम वन को प्रस्थान करते हैं। आगे-आगे स्वयं रामजी चल रहे हैं और उनके पीछे अनुज लक्ष्मण। दोनों भाई मुनि के जैसे वल्कल-वेष में हैं और अत्यंत सुशोभित दिखाई देते हैं। इनके बीच में जनकनंदिनी सीताजी चल रही हैं, जो उस दल की शोभा बढ़ा रही हैं:
व्याख्या: राम और लक्ष्मण के बीच में श्री जानकीजी ऐसी शोभा पा रही हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया हो। इस सुंदर उपमा में तुलसीदासजी ने आध्यात्मिक संकेत दिया है – भगवान राम परम ब्रह्म हैं, लक्ष्मण भक्त जीवात्मा के प्रतीक हैं, और सीताजी ब्रह्म एवं जीव के मध्य विराजमान ईश्वरीय शक्ति (माया या शक्ति स्वरूपा) हैं।
जैसे माया ब्रह्म तथा जीव को जोड़ती है, वैसे ही सीता जी की उपस्थिति राम-लक्ष्मण की जोड़ी को पूर्णता देती है। प्रकृति भी अपने स्वामी श्रीराम को पहचानकर उनकी सेवा करती चलती है – नदियाँ, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ अपने-आप मार्ग सुगम कर देती हैं, तथा सूर्य की तपिश से रक्षा करने हेतु बादलों की छाया हर स्थान पर श्रीराम के साथ-साथ चलती है।
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता॥”
व्याख्या: भगवान रामचन्द्र जहां-जहां जाते हैं वहां आकाश में मेघ छाया करते चलते हैं। इसी मार्ग में आगे चलकर उन्हें विराध नाम का एक भयानक राक्षस मिला। वह पर्वत के समान विशालकाय राक्षस मार्ग रोके खड़ा था और मनुष्यों को मारकर खाने वाला नरभक्षी दानव था।
विराध ने अचानक गरजते हुए आक्रमण किया और सीताजी को उठाकर दूर खड़ा हो गया। वह क्रोध में चिल्लाकर पूछने लगा – “तुम दोनों धनुष-बाण लिये वन में घुस आए हो, क्या मेरा नाम नहीं सुना? मैं प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाकर क्षुधा शांत करने वाला विराध हूँ। तुम दोनों की मृत्यु ही तुम्हें यहाँ खींच लाई है। अब मैं तुम दोनों का रक्तपान करूँगा और इस सुंदरी स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊंगा।”
इस प्रकार भयनाक धमकी देकर उस दुष्ट ने वार किया, परंतु श्रीराम-लक्ष्मण ने क्षण भर में ही उसे घेर लिया।
विराध स्वयं को ब्रह्माजी से मिले वरदान के कारण अजेय समझ रहा था – उसे वर था कि किसी भी शस्त्र से उसकी हत्या नहीं की जा सकती, न ही शस्त्रों द्वारा उसके अंग काटे जा सकते हैं। लेकिन प्रभु श्रीराम ने अपनी रणनीति से उस दानव का अंत करने का निश्चय किया।
दोनों भाइयों ने अपने दिव्य पराक्रम से उसे निःशस्त्र करके धरती पर गिरा दिया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राम-लक्ष्मण ने शस्त्र प्रयोग के बजाय उसे गड्ढे में जीवित गाड़कर मारने की विधि अपनाई। लक्ष्मणजी ने तेजी से एक बड़ा गड्ढा खोदा और श्रीराम ने उस पछाड़ खाए राक्षस की गर्दन अपने चरणों तले दबाकर रखा। अंततः दोनों ने बलपूर्वक उस दैत्य को गड्ढे में ढकेल दिया और पत्थरों-मिट्टी से उसे भर दिया। इस प्रकार घोर राक्षस का संहार कर दिया गया।
विराध का उद्धार
जैसे ही विराध का अंत हुआ, एक अद्भुत घटना घटी:
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥
व्याख्या: श्रीराम के हाथों मरते ही उस राक्षस ने सुन्दर दिव्य रूप प्राप्त कर लिया। वास्तव में विराध कोई साधारण राक्षस नहीं था बल्कि तुम्बुरु नामक एक गंधर्व था जिसे कुबेर ने श्राप देकर राक्षस योनि में भेज दिया था।
अपने पूर्व जन्म में किसी अपराध पर कुपित होकर कुबेर ने तुम्बुरु को भयंकर राक्षस बन जाने का शाप दिया था। श्राप यह भी था कि भगवान राम के हाथों वध होने पर ही उसे मुक्ति मिलेगी। आज प्रभु की कृपा से उसका श्राप समाप्त हो गया था और वास्तविक स्वरूप लौट आया था।
अपने सुन्दर दिव्य रूप को पाकर वह प्रभु राम के चरणों में गिरकर कृतज्ञ हुआ। श्रीराम ने उसके दुःख को देखकर कृपापूर्वक उसे अपने परमधाम को भेज दिया– अर्थात उस आत्मा को बैकुंठ की सद्गति प्रदान की। इस प्रकार रामजी ने एक ओर ऋषियों को आतंकित करने वाले राक्षस का संहार किया और दूसरी ओर एक शापग्रस्त आत्मा का उद्धार करके उसे मोक्ष प्रदान किया। भगवान का प्रकाट्य कर्म केवल दुष्टदमन ही नहीं, बल्कि जीवों को तारना भी है, जो यहाँ स्पष्ट होता है।
विराध राक्षस के उद्धार के बाद श्रीराम, लक्ष्मण और जानकीजी आगे वन में बढ़ते हुए महर्षि शरभंग के आश्रम पहुँचे। वहाँ तपस्यारत वृद्ध शरभंग ऋषि श्रीराम के आगमन के समाचार पहले ही सुन चुके थे और आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे थे। अब उन्हें साक्षात राम-सागर के दर्शन का सौभाग्य मिलने वाला है।इस भावपूर्ण मिलन की घटना हम आगे के लेख में विस्तार से पढ़ेंगे।






