विस्तृत उत्तर
महर्लोक में यज्ञेश्वर भगवान की उपासना अत्यंत उच्च कोटि की और सूक्ष्म प्रकृति की होती है। यद्यपि महर्लोक तपस्वियों, मुनियों और सिद्धों का लोक है और यहाँ स्वर्गलोक के इन्द्र के समान कोई भौतिक राजा या शासक नहीं होता तथापि यज्ञेश्वर भगवान (विष्णु का यज्ञ-स्वरूप) ही यहाँ के उपास्य, रक्षक और अधिपति हैं। महर्लोक में यज्ञ से तात्पर्य भौतिक अग्नि में घृत की आहुति से नहीं है अपितु यहाँ ज्ञान यज्ञ और तपो यज्ञ की प्रधानता है। ज्ञान यज्ञ में ऋषि गण अपने सूक्ष्म अहंकार, अज्ञान और चित्त-वृत्तियों की आहुति परम सत्य (ब्रह्म) की अग्नि में देते हैं। महर्लोक के निवासी निरंतर यज्ञेश्वर भगवान की मानसिक और आध्यात्मिक आराधना में लीन रहते हैं। एक अत्यंत गूढ़ प्रसंग में श्रीमद्भागवत में जब भगवान अपने वराह अवतार में घोर गर्जना करते हैं तो महर्लोक के मुनिगण वेदों के गुह्य मंत्रों से भगवान यज्ञेश्वर की स्तुति करते हैं।
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