विस्तृत उत्तर
नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय में महर्लोक की अवस्था में मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है। नैमित्तिक प्रलय (ब्रह्मा की रात्रि) में महर्लोक की स्थिति अनूठी है — यह संकर्षण की अग्नि से पूरी तरह भस्म नहीं होता (यह इसका अकृतक गुण है) और एकार्णव के जल से भी जलमग्न नहीं होता क्योंकि यह ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर है। परंतु असहनीय ताप और धुएँ के कारण यहाँ के ऋषि जनलोक की ओर पलायन कर जाते हैं जिससे यह निर्जन हो जाता है। ब्रह्मा की रात्रि के बाद जब नई सृष्टि होती है तो ऋषि पुनः लौट आते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक प्रलय (महाप्रलय) में जब ब्रह्मा जी की पूरी आयु के 100 दिव्य वर्ष पूर्ण हो जाते हैं तो महर्लोक भी अन्य सभी लोकों की भाँति पूर्ण रूप से भस्म और नष्ट हो जाता है। इस महाप्रलय में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (सत्यलोक और महर्लोक सहित सभी 14 लोक) भगवान नारायण की प्रकृति में विलीन हो जाते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





