विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण दोनों महर्लोक की मूल अवधारणा पर एकमत हैं परंतु अपने-अपने दृष्टिकोण से इसका वर्णन करते हैं। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सातवें अध्याय में पराशर ऋषि द्वारा अपने शिष्य मैत्रेय को दिए गए उपदेश में महर्लोक की स्थिति और प्रलय के समय इसके कृतकाकृतक स्वभाव का सबसे प्रामाणिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण विशेष रूप से इस बात पर बल देता है कि स्वर्ग और त्रैलोक्य के सभी भोग केवल सकाम कर्मों के तुच्छ फल हैं और मुमुक्षु को इन सबसे पूर्णतः विरक्त होकर केवल अविनाशी भगवान वासुदेव में लीन होने का यत्न करना चाहिए। दूसरी ओर श्रीमद्भागवत पुराण पिण्ड-ब्रह्माण्ड तादात्म्य के माध्यम से महर्लोक को विराट् पुरुष की ग्रीवा बताता है (२.१.२८)। भागवत (५.२३.९) ध्रुवलोक और शिशुमार चक्र के संदर्भ में महर्लोक की दूरियों का ज्यामितीय विवरण देता है। भागवत यह भी सुनिश्चित करता है कि यह लोक सात्त्विक है और भय, रोग तथा वृद्धावस्था से पूर्णतः मुक्त है।
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