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विष्णु पुराण अध्याय 3: काल-तत्त्व और 'युग-गणना' का रहस्य!
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण अध्याय 3: काल-तत्त्व और 'युग-गणना' का रहस्य!

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श्रीविष्णुपुराणम्: प्रथम अंश, तृतीय अध्याय

श्रीविष्णुपुराणम्: प्रथम अंश, तृतीय अध्याय का विस्तृत भाष्य

ब्रह्मा का प्राकट्य, काल-स्वरूप का माहात्म्य एवं सृष्टि का क्रमिक विस्तार

यह विस्तृत भाष्य परम पावन श्रीविष्णुपुराण के प्रथम अंश के तृतीय अध्याय पर आधारित है। इस अध्याय में महर्षि पराशर अपने परम श्रद्धालु शिष्य मैत्रेय जी को काल के गूढ़ स्वरूप, सृष्टि के प्राकट्य और महाकाल के स्वामी भगवान विष्णु की अचिन्त्य शक्तियों का विशद वर्णन करते हैं। यह विवरण न केवल सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम प्रस्तुत करता है, अपितु मानवीय एवं दिव्य काल गणनाओं के माध्यम से ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अटल नियमों को भी स्थापित करता है।

पृष्ठभूमि, मंगलाचरण एवं दार्शनिक आधार

इस अध्याय का प्रारम्भ गुरु-शिष्य के मध्य एक अत्यंत गंभीर और सूक्ष्म दार्शनिक संवाद से होता है, जो निर्गुण ब्रह्म और सगुण सृष्टिकर्ता के बीच के संबंध की जटिलता को स्पष्ट करता है।

मैत्रेय जी का गहन प्रश्न: निर्गुण में सगुणता का विरोधाभास

महर्षि मैत्रेय ने अपने गुरु से पूछते हुए संपूर्ण दर्शन के मूलभूत प्रश्न को उठाया। उनका प्रश्न ब्रह्म के स्वरूप और उसकी क्रियाशीलता पर केन्द्रित था:

मैत्रेय उवाच। निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्य् अमलात्मनः । कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥
(मैत्रेय जी बोले:) "हे भगवन्! वह ब्रह्म जो निर्गुण है—अर्थात् समस्त गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से परे है—जो अप्रमेय (अर्थात् माप से परे, जिसका अनुमान या ज्ञान सीमित बुद्धि से नहीं किया जा सकता) है, तथा जो परम शुद्ध और निर्मलात्मा है (जिसमें कोई दोष या विकार नहीं है), उसका सर्गादि (सृष्टि की रचना आदि) का कर्त्ता होना कैसे सिद्ध हो सकता है? यदि वह निर्विकार है, तो वह सृष्टि जैसी क्रिया में कैसे प्रवृत्त हो सकता है?"

यह प्रश्न भारतीय दर्शन के मूलभूत विरोधाभास की ओर इंगित करता है: यदि ब्रह्म निष्क्रिय, असीम और दोषरहित है (अद्वैत सिद्धांत), तो वह गतिशील, ससीम और माया-जनित सृष्टि का निर्माण कैसे कर सकता है? मैत्रेय जी का यह संशय दर्शाता है कि सृष्टि की प्रक्रिया को केवल भौतिक क्रिया नहीं माना जा सकता, अपितु इसे परम तत्त्व के साथ समन्वयित करना आवश्यक है।

पराशर जी द्वारा निर्गुण ब्रह्म की अचिन्त्य शक्ति का प्रतिपादन

मैत्रेय के इस गहन दार्शनिक प्रश्न का उत्तर देते हुए, महर्षि पराशर ब्रह्म की शक्ति को तर्क और अनुमान से परे (अचिन्त्य) घोषित करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म की सृजनात्मक शक्तियाँ, उसके स्वरूप से भिन्न या आरोपित नहीं हैं, अपितु स्वाभाविक रूप से ही उसमें निहित हैं:

पराशर उवाच। शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्र्णता ॥
(पराशर जी बोले: ) "हे तपस्वियों में श्रेष्ठ मैत्रेय! समस्त भाव-पदार्थों (अर्थात् अस्तित्व में आने वाले सभी तत्त्वों) की शक्तियाँ अचिन्त्य (विचार और तर्क की पहुँच से बाहर) ज्ञान का विषय होती हैं; अतः ब्रह्म की वे सर्गादि रचनारूप शक्तियाँ, अग्नि की शक्ति उष्णता (गर्मी) के समान ही स्वाभाविक होती हैं।"

इस उत्तर में 'स्वाभाविकता का सिद्धांत' स्थापित किया गया है। जिस प्रकार अग्नि का स्वभाव ही उष्णता है और उसे अग्नि से पृथक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार सृष्टि करने की शक्ति ब्रह्म के सार का एक सहज और अविभाज्य हिस्सा है। इस शक्ति का कारण मनुष्य की सीमित बुद्धि द्वारा पूर्णतः समझा नहीं जा सकता, इसलिए इसे अचिन्त्य कहा गया है। यह सिद्धांत यह सिद्ध करता है कि सृष्टि की रचना कोई आकस्मिक, बाहरी या श्रमसाध्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि परमेश्वर का सहज स्फुरण है। इस प्रकार, भगवान नारायण (जो ब्रह्म हैं) सृष्टि के कर्ता होते हुए भी अपनी निर्विकारता और शुद्धता को बनाए रखते हैं।

नारायण (विष्णु) द्वारा ब्रह्मा के रूप में सृष्टि का प्रारंभ

आगे महर्षि पराशर बताते हैं कि किस प्रकार नारायण ही ब्रह्मा के रूप में प्रकट होकर सृष्टि के कार्य में प्रवृत्त होते हैं। यह स्पष्ट किया जाता है कि त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और शिव—एक ही परमेश्वर की भिन्न-भिन्न क्रियाशील अभिव्यक्तियाँ हैं।

तन्निबोध यथा सर्गे भगवान् संप्रवर्तते । नारायणाख्यो भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ॥
"अब वह सुनो कि जिस प्रकार नारायण नामक लोक-पितामह (संसार के पितामह) भगवान ब्रह्माजी सृष्टि की रचना में प्रवृत्त होते हैं।"
उत्पन्नः प्रोच्यते विद्वन्नित्य एवोपचारतः ॥
"हे विद्वान्! वे (ब्रह्मा) वास्तव में नित्य (शाश्वत) होते हुए भी, सदा उपचार (केवल कहने मात्र या लौकिक परिपाटी) से ही उत्पन्न हुए कहलाते हैं।"

ब्रह्मा को 'उत्पन्न' कहना केवल एक उपचार है। चूँकि परम ब्रह्म (नारायण) अनादि और नित्य हैं, उनका कोई वास्तविक जन्म नहीं होता। ब्रह्मा का रूप, जो सृष्टि के कार्य में संलग्न होता है, केवल उनकी एक कार्य-विशेष अभिव्यक्ति या प्राकट्य है। यह व्याख्या विष्णु पुराण के इस मौलिक सिद्धांत को पुष्ट करती है कि समस्त क्रियाएँ—उत्पत्ति, स्थिति और संहार—एक ही परम सत्ता (नारायण/विष्णु) की इच्छा से संचालित होती हैं, और ब्रह्मा उस इच्छा के साकार प्रतीक हैं।

२. भगवान विष्णु का काल-स्वरूप और सृष्टि का परिमाण

सृष्टि के वास्तविक विवरण में प्रवेश करने से पहले, महर्षि पराशर काल के स्वरूप को समझाते हैं। काल को यहाँ भगवान विष्णु का ही एक अनिवार्य स्वरूप बताया गया है, जो समस्त चराचर की आयु का मापक है और ब्रह्मांड की व्यवस्था का नियामक है।

कालस्वरूपं विष्णोश्च यन्मयॊक्तं तवानघ । तॆन तस्य निबॊध त्वं परिमाणॊपपादनम् ॥
अन्यॆषां चैव जन्तूनां चराणामचराश्च यॆ । भूभूभृत्सागरादीनामशॆषाणां च सत्तम ॥
"हे अनघ! मैंने जो तुमसे विष्णु भगवान का काल स्वरूप कहा था, उसी के द्वारा उस ब्रह्मा की तथा और भी जो पृथ्वी, पर्वत, समुद्र आदि समस्त चराचर (चलने वाले और अचल) जीव हैं, उनकी आयु का परिमाण किया जाता है।

काल को विष्णु का स्वरूप बताने का यह आशय है कि ब्रह्मांड का प्रत्येक तत्त्व—चाहे वह चेतन हो या जड़, गतिशील हो या अचल—दैवीय नियम और निश्चित अवधि के अधीन है। काल वह सर्वव्यापी नियामक शक्ति है, जो ब्रह्मा की परमायु (100 वर्ष) से लेकर एक पत्ती के जीवन काल तक, प्रत्येक सत्ता को एक निश्चित सीमा में बांधती है। यह परिमाण की स्थापना विष्णु की सर्वव्यापकता को उनके कालगत नियंत्रण के माध्यम से सुनिश्चित करती है। यह विवरण सृष्टि को एक अराजक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, मापा जा सकने वाले चक्रीय क्रम के रूप में प्रस्तुत करता है।

मानवीय काल की सूक्ष्म एवं स्थूल गणना

सृष्टि के महाकाल को समझने के लिए, पराशर जी पहले सूक्ष्म मानवीय काल-इकाइयों को स्थापित करते हैं। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि ब्रह्मांडीय काल गणना का आधार हमारे अनुभवजन्य काल से ही लिया गया है।

काल की सूक्ष्मतम इकाई से मुहूर्त तक

महर्षि पराशर काल की सूक्ष्मतम इकाई निमेष (पलक झपकने) से गणना प्रारम्भ करते हैं:

काष्ठा पचदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम । काष्ठात्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तिको विधिः ॥
"हे मुनिश्रेष्ठ! पंद्रह निमेष (पलक झपकने के समय) को एक काष्ठा कहा जाता है। तीस काष्ठा की एक कला होती है, तथा तीस कला का एक मुहूर्त होता है।"

यह गणना प्रणाली समय की परिशुद्धता और चक्रीयता को स्थापित करती है, जहाँ अत्यंत क्षणिक क्रिया (निमेष) को भी ब्रह्मांडीय काल से जोड़ा गया है।

मुहूर्त से संवत्सर (मानव वर्ष) तक

सूक्ष्म इकाइयों के समुच्चय से मानवीय दिन, मास और वर्ष का निर्माण होता है:

त्रिंशन्मुहूर्तस्त्वहोरात्रं मानुषं मुनिसत्तम । तावतैव च संख्यानं मासः साद्धो द्विजोत्तम ॥
पक्षद्वयेन विप्रर्षे मनुष्याणां भवेन्मासः षड्भिरर्द्धायनं स्मृतम् । ॥
अयनद्वयं च वर्षं स्यान्मानुषं द्विजसत्तम । ।
"हे मुनिश्रेष्ठ! तीस मुहूर्त का मनुष्यों का एक दिन-रात (अहोरात्र) कहा जाता है। हे द्विजोत्तम! उतने ही दिन-रात का, दो पक्षों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) युक्त एक मास होता है। हे विप्रर्षे! छह मास का एक अयन होता है (दक्षिणायन या उत्तरायण), और दो अयन मिलकर एक मनुष्य वर्ष होता है।"

[श्लोक अप्राप्त]

यह गणना ज्योतिषीय और व्यावहारिक काल-विज्ञान का समन्वय है। यह सुनिश्चित करता है कि मानवीय समय की प्रत्येक इकाई खगोलीय गतियों (जैसे चन्द्रमा के पक्ष और सूर्य के अयन) के साथ पूर्णतः संरेखित हो।

मानवीय काल गणना (सूक्ष्म इकाई)
सूक्ष्म इकाई परिमाण (माप) स्थूल इकाई
निमेष (पलक का झपकना) 15 निमेष 1 काष्ठा
काष्ठा 30 काष्ठा 1 कला
कला 30 कला 1 मुहूर्त
मुहूर्त 30 मुहूर्त 1 दिन-रात (अहोरात्र)
दिन-रात 2 पक्ष (30 दिन-रात) 1 मास (महीना)
मास 6 मास 1 अयन (अर्ध वर्ष)
अयन 2 अयन (12 मास) 1 मानव वर्ष (संवत्सर)

दिव्य काल मान: देवताओं का अहोरात्र एवं युगों की अवधि

मानव वर्ष की गणना के आधार पर, महर्षि पराशर अब दिव्य काल (देवताओं के काल) की व्याख्या करते हैं, जो युगों की गणना का मूलाधार है।

देवताओं का दिन और रात्रि (उत्तरायण-दक्षिणायन)

पुराणों के अनुसार, देवताओं का काल मान मनुष्यों के काल से 360 गुना बड़ा होता है।

तद्द्वादशगुणं वर्षं दिव्याह्नोरात्रमुच्यते । तत्प्रमाणमहःप्रोक्तमुत्तरायणमेव हि ॥
रात्रिस्तत्र तथा ज्ञेया यत्सा चा दक्षिणायनम् ॥
"मनुष्यों के बारह मास (अर्थात् एक वर्ष) देवताओं का एक दिन-रात (दिव्याहोरात्र) कहलाता है। सूर्य का उत्तरायण (उत्तर दिशा में गमन) देवताओं का दिन होता है, और दक्षिणायन (दक्षिण दिशा में गमन) उनकी रात्रि कही जाती है।"

[श्लोक अप्राप्त, पर व्याख्या में निहित]

यह स्थापित करता है कि एक मानव वर्ष देवताओं के लिए एक अहोरात्र है। इसका अर्थ यह हुआ कि 360 मानव वर्ष मिलकर एक दिव्य वर्ष का निर्माण करते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायन का विभाजन केवल खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह दैवीय सत्ताओं के क्रियाकलापों को भी नियंत्रित करता है। दक्षिणायन को देवताओं का शयनकाल माना जाता है, इसीलिए इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्यों की गति धीमी हो जाती है, जबकि उत्तरायण (दिन) में वे जाग्रत होते हैं और सृष्टि में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

युगों का विभाजन (दिव्य वर्ष के आधार पर)

दिव्य वर्ष के आधार पर चार युगों—कृत (सत्य), त्रेता, द्वापर और कलि—का परिमाण निर्धारित किया जाता है। इन युगों की गणना में सन्ध्या (आरंभिक काल) और सन्ध्यांश (समाप्ति काल) का समावेश अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् । तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥
"कृत (सत्य) युग चार सहस्र (4000) दिव्य वर्षों का कहा गया है। उस युग के आदि में चार सौ (400) दिव्य वर्षों की सन्ध्या होती है, और अंत में चार सौ (400) दिव्य वर्षों का सन्ध्यांश होता है।"

[श्लोक अप्राप्त, पर व्याख्या में निहित]

सन्ध्या (युगारंभ) और सन्ध्यांश (युगसमाप्ति) के ये संक्रमण काल केवल गणितीय जोड़ नहीं हैं, बल्कि ये नैतिक और सामाजिक बदलाव के अत्यंत महत्वपूर्ण चरण होते हैं। सन्ध्यांश वह समय है जब पिछले युग के धर्म का ह्रास होने लगता है, और सन्ध्या वह काल है जब नए युग के धर्म की स्थापना और पुनर्निर्माण प्रारम्भ होता है।

युगों का विभाजन और काल-परिमाण
युग का नाम युग का मूल काल (दिव्य वर्ष) सन्ध्या काल (दिव्य वर्ष) सन्ध्यांश काल (दिव्य वर्ष) कुल अवधि (दिव्य वर्ष)
कृत (सत्य) युग 4000 400 400 4800
त्रेता युग 3000 300 300 3600
द्वापर युग 2000 200 200 2400
कलि युग 1000 100 100 1200
महायुग (चातुर्युग) योग 10000 1000 1000 12000

महायुग (चातुर्युग) का परिमाण:
उपर्युक्त चारों युगों (सन्ध्या और सन्ध्यांश सहित) का योगफल एक महायुग कहलाता है। इसका कुल परिमाण 12,000 दिव्य वर्ष है।

महायुग को मानवीय वर्ष में रूपांतरित करने पर:
चूँकि 1 दिव्य वर्ष = 360 मानव वर्ष।
अतः, 1 महायुग = 12,000 × 360 = 4,320,000 (तैंतालीस लाख बीस हज़ार) मानव वर्ष।

यह सन्ध्या और सन्ध्यांश का अनुपात (10:1) स्पष्ट करता है कि काल की व्यवस्था में संक्रमण काल का कितना महत्व है, क्योंकि यही वह अवधि है जब धर्म और नैतिकता के मापदंड अस्थिर होते हैं।

ब्रह्मा जी का महाकाल, परमायु और प्रलय की व्यवस्था

काल गणना का क्रम अब ब्रह्मांडीय स्तर पर पहुँचता है, जहाँ ब्रह्मा जी के दिन, रात्रि और उनकी संपूर्ण आयु का निर्धारण होता है।

ब्रह्मा का एक दिन (कल्प) और मन्वन्तर

बारह हज़ार दिव्य वर्षों वाले एक महायुग के एक हज़ार (1000) गुना काल को ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है, जिसे 'कल्प' कहते हैं।

एतत्सहस्रपर्यन्तं ब्रह्मादिवसमुच्यते । तत्र चतुर्दश प्रोक्ता मनवो भूभृत्सत्तम ॥
"ऐसे एक सहस्र (1000) महायुगों का काल ब्रह्मा का एक दिन (कल्प) कहा जाता है। हे भूभृत्सत्तम (पृथ्वी धारण करने वालों में श्रेष्ठ)! इस एक कल्प के दौरान चौदह मनु (प्रजापतियों के पूर्वज) शासन करते हैं।"

[श्लोक अप्राप्त]

कल्प का परिमाण: 1,000 × 4,320,000 = 4,320,000,000 (चार अरब बत्तीस करोड़) मानव वर्ष।

मनुओं की संख्या (14) यह दर्शाती है कि कल्प की अवधि में सृष्टि को संचालित करने वाले नियमों और व्यवस्थाओं में 14 बार मूलभूत परिवर्तन होते हैं, जहाँ प्रत्येक मनु अपने काल में धर्म की स्थापना करते हैं।

ब्रह्मा की रात्रि (नैमित्तिक प्रलय)

ब्रह्मा का दिन जब समाप्त होता है, तो उनकी रात्रि प्रारम्भ होती है, जिसका परिमाण ठीक दिन (कल्प) के समान ही होता है। इस काल में नैमित्तिक प्रलय होती है।

ब्रह्मा की वह रात्रि भी उनके दिन (कल्प) के परिमाण के बराबर ही कही जाती है। जब तीनों लोक (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) एक विशाल महासागर बन जाते हैं, तब जनलोकवासी योगियों द्वारा ध्यान किए जाते हुए, नारायण स्वरूप कमल-योनि ब्रह्मा जी, सृष्टि के संहार से तृप्त होकर, दिन के बराबर ही परिमाण वाली उस रात्रि में शेष शैया पर शयन करते हैं। उस रात्रि के बीत जाने पर वे पुनः संसार की सृष्टि करते हैं।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि प्रलय के काल में भी, जब ब्रह्मा शयन करते हैं, वे वास्तव में नारायण (विष्णु) के स्वरूप में स्थित होते हैं। यह स्थिति इस बात की पुष्टि करती है कि ब्रह्मा और विष्णु में कोई भेद नहीं है; एक ही परम सत्ता सृष्टि के लय और पुनः सृष्टि के चक्र को नियंत्रित करती है। सृष्टि और प्रलय, दोनों ही नारायण के अधीन काल-चक्र की क्रियाएँ हैं, और इस काल में योगीजन ब्रह्मज्ञान में लीन रहते हैं।

ब्रह्मा की परमायु (पर एवं परार्ध)

मानवीय गणनाओं को आधार बनाकर ब्रह्मा जी की संपूर्ण आयु निर्धारित की जाती है। ब्रह्मा जी के 360 दिन-रात (कल्प एवं रात्रि) मिलकर उनका एक वर्ष बनता है। ऐसे सौ वर्ष उनकी परमायु है।

निजॆन तस्य मानॆन आयुर्वर्षशतं स्मृतम् । तत् पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयतॆ ॥
"इस प्रकार पक्ष, मास आदि की गणना से ब्रह्मा का एक वर्ष होता है, और फिर ऐसे सौ वर्ष उनकी परमायु (सर्वाधिक आयु) है। उस संपूर्ण काल को पर कहते हैं, और उसका आधा भाग परार्ध कहलाता है।"
ब्रह्मा जी के काल का महापरिमाण
काल इकाई तुलनात्मक विवरण परिमाण (मानव वर्ष में)
ब्रह्मा का 1 दिन (कल्प) 1000 महायुग 4.32 बिलियन (4 अरब 32 करोड़)
ब्रह्मा का 1 रात्रि 1,000 महायुग 4.32 बिलियन (4 अरब 32 करोड़)
ब्रह्मा का 1 वर्ष 360 दिन-रात (कल्प) 3.1104 ट्रिलियन
ब्रह्मा का १ परार्ध (अर्ध आयु) 50 ब्रह्मा वर्ष 155.52 ट्रिलियन
ब्रह्मा की परमायु (पर) 100 ब्रह्मा वर्ष 311.04 ट्रिलियन

वर्तमान काल का निर्धारण: पाद्म कल्प का समापन और वाराह कल्प का प्राकट्य

काल के इस महा-चक्र को स्थापित करने के पश्चात्, महर्षि पराशर वर्तमान समय की स्थिति को निश्चित करते हैं, जिससे यह ज्ञात होता है कि ब्रह्मा की आयु का कितना भाग व्यतीत हो चुका है।

प्रथम परार्ध का अंत: पाद्म कल्प

महर्षि पराशर मैत्रेय जी को संबोधित करते हुए बताते हैं कि ब्रह्मा जी की आधी आयु (एक परार्ध) समाप्त हो चुकी है:

तस्यैकं यद्विमुक्तं हि परार्द्धममितद्युतेः । तस्यान्ते पाद्म इत्येष कल्पो विख्यातयेऽभवत् ॥
"हे अनघ! उन असीम तेजस्वी ब्रह्मा जी का एक परार्ध (50 ब्रह्मा वर्ष) व्यतीत हो चुका है। उस प्रथम परार्ध के अंत में पाद्म (पद्म अर्थात् कमल) नाम से विख्यात महाकल्प हुआ था।"

[श्लोक अप्राप्त, पर व्याख्या में निहित]

पाद्म कल्प (कमल कल्प) का यह उल्लेख अत्यंत प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह ब्रह्मा जी के नारायण की नाभि से निकले कमल पर प्रकट होने या सृष्टि में पद्म तत्त्वों की प्रमुखता को दर्शाता है। यह एक पूर्ण ब्रह्मांडीय चक्र का समापन था।

वर्तमान काल: द्वितीय परार्ध का वाराह कल्प

वर्तमान कालखंड, जिसमें कथा का वर्णन किया जा रहा है, ब्रह्मा जी की आयु के दूसरे अर्ध भाग (द्वितीय परार्ध) का प्रथम कल्प है।

द्विजैस्तस्याप्ययं पूर्वो वाराहः कल्प उच्यते ॥
"हे द्विज (मैत्रेय)! इस समय वर्तमान (चल रहे) उनके दूसरे परार्ध का यह वाराह नामक पहला कल्प कहा गया है।"

[श्लोक अप्राप्त, पर व्याख्या में निहित]

इस अध्याय द्वारा वर्तमान कल्प का नाम वाराह निर्धारित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वर्णन सीधे तौर पर भगवान विष्णु के प्रसिद्ध वाराह अवतार से जुड़ता है। वाराह कल्प वह काल है, जिसके प्रारंभ में भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण करके प्रलय के जल में डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार किया था, और तत्पश्चात् ही ब्रह्मा जी सृष्टि के पुनर्निर्माण में पूर्ण रूप से प्रवृत्त हो सके। यह काल-निर्धारण आगे आने वाले सर्ग (सृष्टि) के विस्तृत विवरण के लिए एक ठोस धार्मिक और कालगत पृष्ठभूमि तैयार करता है।

ब्रह्मा द्वारा तत्त्व-सृष्टि का विस्तार: सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग प्रक्रिया

काल के परिमाण को समझने के बाद, महर्षि पराशर अब ब्रह्मा द्वारा की जाने वाली वास्तविक भौतिक और सूक्ष्म तत्त्वों की सृष्टि (सर्ग) की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं, जो सांख्य दर्शन के सिद्धांतों पर आधारित है।

प्रकृति, क्षेत्रज्ञ, और गुणों की अभिव्यक्ति

सृष्टि का कार्य स्वतः नहीं होता, अपितु गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) में साम्यावस्था के भंग होने से होता है। यह साम्यावस्था तब भंग होती है, जब क्षेत्रज्ञ (आत्मा या पुरुष) का अधिष्ठान (उपस्थिति) होता है।

गुणसाम्यात्ततस्तस्मात्क्षेत्रज्ञाधिष्ठितान्मुने । गुणव्यञ्जनसम्भूतिः सर्गकाले द्विजोत्तम ।
"हे मुने! गुणों की साम्यावस्था (संतुलन) के भंग होने पर, और क्षेत्रज्ञ (अर्थात् पुरुष या चेतन सत्ता) के अधिष्ठान (अधिकार या उपस्थिति) से, हे द्विजोत्तम, सृष्टि के काल में गुणों की अभिव्यक्ति (गुणव्यञ्जनसम्भूतिः) होती है।"

यह श्लोक सृष्टि की प्रक्रिया में पुरुष (चेतनता) और प्रकृति (जड़ तत्त्व) के संयोग को अनिवार्य बनाता है। ब्रह्मा केवल निमित्त (कारण) मात्र होते हैं, जबकि चेतन सत्ता (क्षेत्रज्ञ) की उपस्थिति ही जड़ प्रकृति को क्रियाशील बनाकर सृष्टि हेतु विवश करती है।

महत्तत्त्व (बुद्धि) और त्रिविध अहंकार का प्राकट्य

गुणों की अभिव्यक्ति के बाद, प्रकृति से जो पहला तत्त्व प्रकट होता है, वह महत्तत्त्व (महान्) है, जिसे बुद्धि भी कहा जाता है। यह तत्त्व प्रधान (प्रकृति) को आवृत्त कर लेता है और स्वयं त्रिगुण युक्त होता है।

प्रधानतत्त्वमुद्भूतं महान्तं तत्समावृणोत् । सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान् ॥
"प्रधान तत्त्व (मूल प्रकृति) से महत्तत्त्व (महान्) उद्भूत होता है, जो उस प्रधान को चारों ओर से आवृत्त (ढक) कर लेता है। वह महत्तत्त्व स्वयं भी सत्त्व, रजस और तमस—इन तीन भेदों वाला होता है।"

महत्तत्त्व से ही आगे चलकर अहंकार की उत्पत्ति होती है, जो समस्त जड़ और चेतन सृष्टि का मूल कारण है।

वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिचैव तामसः ॥
त्रिविधोऽयमहङ्कारो महत्तत्त्वादजायत । भूतेन्द्रियाणां हेतुस्स त्रिगुणत्वान्महामुने ।
"इस महत्तत्त्व से त्रिविध अहंकार उत्पन्न हुआ: वैकारिक (जो सात्त्विक है), तैजस (जो राजस है), और भूतादि (जो तामस है)। हे महामुने! यह त्रिगुण अहंकार ही आगे चलकर भूत (तन्मात्राएँ या सूक्ष्म तत्त्व) और इंद्रियों (ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ) का हेतु (कारण) बनता है।"

अहंकार का यह विभाजन सृष्टि की संरचना को समझने के लिए केंद्रीय है:

  • वैकारिक (सात्त्विक अहंकार): इससे ग्यारह इंद्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन) तथा अधिष्ठाता देवता उत्पन्न होते हैं।
  • तैजस (राजस अहंकार): यह क्रियाशील शक्ति है, जो सात्त्विक और तामसिक दोनों प्रकार के अहंकार को उनकी क्रियाओं में सहायता देता है।
  • भूतादि (तामस अहंकार): इससे पाँच सूक्ष्म तत्त्व या तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं, जो पंचभूतों का आधार बनती हैं।

पंचभूतों का क्रमवार प्राकट्य (तन्मात्रा और भूत)

तामस अहंकार (भूतादि) के विकृत होने से ही सृष्टि के भौतिक तत्त्वों (तन्मात्रा और पंचभूत) का निर्माण एक क्रमिक प्रक्रिया में होता है।

भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्धात्रकं ततः । ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम् ॥
"भूतादि (तामस अहंकार), विकार को प्राप्त होकर, सबसे पहले शब्द तन्मात्रा (सूक्ष्म ध्वनि) को उत्पन्न करता है। उस शब्द तन्मात्रा से, शब्द को लक्षण रूप में धारण करने वाला आकाश (ईथर या स्पेस) उत्पन्न होता है।"

आगे यह प्रक्रिया जटिल आवरण विधि (समावृणोत्) से जारी रहती है, जहाँ एक भूत अपने मूल तत्त्व को आवृत्त करता है:

शब्दमात्रं तथाकाशं भूतादिः स समावृणोत् । आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ॥
"वह भूतादि अहंकार, केवल शब्द को लक्षण रूप में धारण करने वाले आकाश को चारों ओर से आवृत्त कर लेता है। फिर वह आकाश स्वयं विकृत होकर स्पर्श तन्मात्रा (सूक्ष्म स्पर्श) को उत्पन्न करता है।"

यह सर्ग प्रक्रिया एक जटिल परतदार संरचना को दर्शाती है। आकाश (ईथर) के विकृत होने से स्पर्श तन्मात्रा उत्पन्न होती है, जिससे आगे चलकर वायु (स्पर्श गुण वाला) का निर्माण होगा। इसी क्रमिक विकास द्वारा पंचभूत—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—तथा उनके संगत तन्मात्राएँ—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध—एक के बाद एक उत्पन्न होते हैं। प्रत्येक भूत अपने पूर्ववर्ती भूत के गुणों को भी धारण करता है (जैसे पृथ्वी में पाँचों गुण होते हैं), जिससे सृष्टि में विविधता और जटिलता आती है।

८. ब्रह्मा की मानसी सृष्टि: देवताओं, ऋषियों एवं वंशों की उत्पत्ति

तत्त्वों की प्राथमिक सृष्टि पूर्ण करने के बाद, ब्रह्मा जी द्वितीयक सृष्टि (मानसी सृष्टि) में प्रवृत्त होते हैं। यह सृष्टि उनके संकल्प या मन से उत्पन्न होती है, जिसका उद्देश्य ब्रह्मांड के क्रियान्वयन और वंश-विस्तार के लिए सक्षम सत्ताओं को जन्म देना है।

प्रजापति और ऋषियों का प्राकट्य

ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम उन महान ऋषियों और प्रजापतियों को अपने मन से उत्पन्न किया, जो आगे चलकर सृष्टि का विस्तार करते हैं। इन मानस पुत्रों में प्रमुख थे: मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, और दक्ष। इन ऋषियों को ही सृष्टि के आरंभिक विस्तार का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

मानस पुत्रों से वंश का विस्तार

महर्षि पराशर इन ऋषियों के वंशों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं, जो देवताओं और अन्य महत्वपूर्ण सत्ताओं को जन्म देते हैं:

मरीचि और भृगु का वंश

महर्षि मरीचि की पत्नी संभूति ने पौर्णमास नामक पुत्र को जन्म दिया। उनके दो पुत्र विरजा और पर्वत हुए। महर्षि भृगु की कन्याओं, आयती और नियति, ने दो तेजस्वी पुत्रों—प्राण और मृकंडु—को जन्म दिया। मृकंडु से आगे चलकर महर्षि मार्कंडेय उत्पन्न हुए।

अंगिरा और अत्रि का वंश

महर्षि अंगिरा की पत्नी स्मृति ने चार पुत्रियों को जन्म दिया: सिनी वाली, कुहू, राका, और अनुमति। ये चारों देवियाँ देवताओं की उपासना में सदैव संलग्न रहती थीं। अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया ने तीन महान पुत्रों को जन्म दिया: चंद्रदेव (सोम), तपस्वी दुर्वासा, और महान योगी दत्तात्रेय। इन तीनों ने अपने तपोबल से संपूर्ण ब्रह्मांड में अपनी महिमा स्थापित की।

अग्नियों की उत्पत्ति

ब्रह्मा जी के पुत्र अग्नि ने महादेवी से विवाह किया। उनसे तीन तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए: पावक, पवमान, और शोची। ये तीनों अग्नि जल को ग्रहण करने वाले थे। इन तीनों अग्नियों के प्रत्येक के पंद्रह-पंद्रह पुत्र हुए, जिससे कुल 49 प्रकार के अग्नि (चट्टान, जल, वनस्पति आदि में निहित अग्नि तत्त्व) उत्पन्न हुए।

पितर और वालखिल्य मुनि

पितरों की उत्पत्ति अग्निश्वत्थ और बर्हिषद् के रूप में हुई, जो स्वधा देवी के पुत्र थे। ये पितर पूर्वजों की उपासना और यज्ञों के माध्यम से देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु का कार्य करते हैं। महर्षि क्रतु की पत्नी ने 60,000 वालखिल्य मुनियों को जन्म दिया। वे सभी अंगुष्ठ के समान छोटे थे, किंतु उनका तेज सूर्य के समान प्रखर था।

यह मानसी सृष्टि स्पष्ट करती है कि सृष्टि का पहला चरण भौतिकता नहीं थी, अपितु चेतना, तप, और ज्ञान की स्थापना थी, जिसके माध्यम से ब्रह्मांड का संचालन और नैतिक व्यवस्था स्थापित की जा सके।

उपसंहार एवं परम फलश्रुति

महर्षि पराशर द्वारा वर्णित विष्णु पुराण के प्रथम अंश का यह तृतीय अध्याय, काल, तत्त्व, और सृष्टिकर्ता के स्वरूप के गहन ज्ञान से परिपूर्ण है। यह अध्याय केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के संचालन के अटल सिद्धांतों की व्याख्या है।

अध्याय का सार और निहितार्थ

इस अध्याय का अध्ययन श्रोता को निम्नलिखित परम सत्यों से परिचित कराता है:

  • ब्रह्म की अद्वैत स्थिति: निर्गुण ब्रह्म और सगुण सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा/नारायण) के मध्य कोई मौलिक भेद नहीं है। सृजनात्मक शक्ति (सर्गादि शक्ति) ब्रह्म के स्वरूप में उतनी ही स्वाभाविक रूप से निहित है, जितनी अग्नि में उष्णता।
  • काल का नियंत्रण: काल स्वयं भगवान विष्णु का स्वरूप है, और यह समस्त चराचर सृष्टि की आयु का नियामक है। सूक्ष्म निमेष से लेकर ब्रह्मा के परार्ध तक की गणनाएँ सिद्ध करती हैं कि ब्रह्मांड चक्रीय, सुव्यवस्थित और दैवीय नियंत्रण के अधीन है।
  • वर्तमान कल्प का संदर्भ: वर्तमान काल ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध का वाराह कल्प है , जो पृथ्वी के उद्धार और धर्म की पुनर्स्थापना के महत्व को रेखांकित करता है।
  • सृष्टि का क्रमिक विकास: सृष्टि की प्रक्रिया सांख्य दर्शन पर आधारित है, जो प्रकृति से महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्रा और अंततः पंचभूतों के क्रमिक और तार्किक विकास को दर्शाती है।
  • वंश परंपरा का आधार: मानसी सृष्टि द्वारा उत्पन्न ऋषियों और प्रजापतियों (मरीचि, अत्रि, आदि) ने ही आगे चलकर देवता, मनुष्य और पितरों के वंशों को स्थापित किया।

इस प्रकार, महर्षि पराशर ने काल के महात्म्य और सृष्टि के दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार को समझाकर, आगे के अध्यायों में आने वाले मन्वन्तरों, विस्तृत वंश-वृक्षों और पृथ्वी के भूगोल (द्वितीय अंश) के वर्णन के लिए सुदृढ़ नींव तैयार की है।

परम फलश्रुति

इस परम पवित्र और गूढ़ कथा के श्रवण से श्रोता काल के नश्वर बंधनों से परे, अविनाशी नारायण के स्वरूप को गहराई से समझ पाते हैं। जो व्यक्ति इस परम ज्ञान को धारण करता है, वह संसार की क्षणभंगुरता को पहचान कर, उस नित्य, शुद्ध और अप्रमेय ब्रह्म की ओर उन्मुख होता है, जो समस्त सृष्टि का आधार है। यही ज्ञान अंततः मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने में सहायक होता है।

बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय!

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