विस्तृत उत्तर
महर्लोक और वैकुंठ में जो मूलभूत अंतर है वह वैष्णव आचार्यों और श्रीमद्भागवत के अनुसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। महर्लोक यद्यपि एक अत्यंत पवित्र और सात्त्विक गंतव्य है फिर भी यह जीव का अंतिम गंतव्य या पूर्ण मोक्ष नहीं है। यह लोक भौतिक ब्रह्माण्ड के आवरण (Material Universe) के भीतर ही स्थित है। भगवद्गीता (८.१६) का यह शाश्वत सिद्धांत कि आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन — महर्लोक पर भी लागू होता है। यहाँ के निवासियों की आयु एक कल्प की है तथापि यदि वे मोक्ष प्राप्त नहीं करते तो उन्हें पुनः सृष्टि चक्र में आना पड़ सकता है। इसके विपरीत भगवान का वैकुण्ठ धाम या गोलोक धाम तीनों गुणों और प्रलय से सर्वथा परे है। वहाँ से कोई वापस नहीं आता (गीता १५.६ — यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम)। इसीलिए परमार्थ को जानने वाले भक्तियोगी इन मध्यवर्ती लोकों के आकर्षण को पार करके सीधे वैकुण्ठ की प्राप्ति का ही लक्ष्य रखते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





