विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के सूक्ष्म शरीर-विज्ञान के अनुसार जब कोई साधक ध्यान और योग की प्रक्रिया में संलग्न होता है तो महर्लोक का स्थान कण्ठ (Throat) के क्षेत्र में माना गया है। यह पिण्ड-ब्रह्माण्ड तादात्म्य सिद्धान्त का ही एक सूक्ष्म पहलू है। श्रीमद्भागवत में महर्लोक को विराट पुरुष की ग्रीवा (गर्दन) कहा गया है और गरुड़ पुराण उसी ग्रीवा के भीतर स्थित कण्ठ को महर्लोक का स्थान बताता है। योगशास्त्र में यह विशुद्ध चक्र का स्थान है जो सत्य, पवित्रता और उच्चतर पारमार्थिक चेतना का मुख्य द्वार माना जाता है। इसी कारण महर्लोक में जाने वाले सिद्ध जीव अपनी चेतना को कण्ठ से ऊपर की ओर ले जाते हैं जहाँ अज्ञान और भौतिक प्रलोभनों का पूर्णतः शमन हो जाता है।
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