भूलोक का तात्विक परिचय एवं ब्रह्माण्डीय संरचना में उसका अद्वितीय स्थान
सनातन वैदिक वाङ्मय, विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, गरुड़ पुराण और मार्कण्डेय पुराण के ब्रह्माण्डीय वर्णनों का यदि सूक्ष्म और तात्विक अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि 'भूलोक' केवल एक स्थूल भौतिक ग्रह मात्र नहीं है। यह परब्रह्म परमात्मा की अचिन्त्य योगमाया द्वारा रचित कर्म, भोग, और मोक्ष का एक अत्यंत रहस्यमय, सुव्यवस्थित और विस्तृत अधिष्ठान है। ब्रह्माण्ड रूपी अण्ड की लंबवत संरचना में कुल चौदह भुवनों (लोकों) का उल्लेख प्राप्त होता है, जिन्हें मुख्य रूप से तीन भागों—ऊर्ध्व लोक, मध्य लोक और अधोलोक—में विभाजित किया गया है। इसी त्रि-स्तरीय ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में भूलोक 'मध्य लोक' के अंतर्गत आता है और यह ऊर्ध्व लोकों की शृंखला का सबसे निचला या प्रथम सोपान है।
ब्रह्माण्ड के इस अण्डकार स्वरूप में भूलोक के ऊपर छह ऊर्ध्व लोक—भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—स्थित हैं। वहीं इसके नीचे सात अधोलोक—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल—विद्यमान हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का यह विशाल भार और इन चौदह लोकों की मध्यवर्ती धुरी के रूप में भूलोक को भगवान शेषनाग (अनन्त देव) अपने फनों पर धारण करते हैं। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सातवें अध्याय और भागवत पुराण के अनुसार, जहाँ तक पृथ्वी का स्थूल विस्तार है और जहाँ तक प्राणी अपने पैरों से विचरण कर सकते हैं, तथा जहाँ तक सूर्य और चन्द्रमा की किरणों का प्रकाश पहुँचता है, वह सम्पूर्ण क्षेत्र भूलोक कहलाता है। यह लोक अपनी भौगोलिक सीमा में न केवल उस स्थान को समेटे हुए है जहाँ सामान्य मानव निवास करते हैं, अपितु इसमें अनेक ऐसे दिव्य क्षेत्र भी सम्मिलित हैं जहाँ सिद्ध, चारण, गंधर्व, विद्याधर और देवगण विचरण करते हैं। यह भौतिक और स्थूल तत्वों का वह लोक है जो जीव को उसके कर्मों का फल भोगने तथा नवीन सकाम या निष्काम कर्म करने का अवसर प्रदान करता है, इसीलिए इसे शास्त्रों में कर्मभूमि और जीवात्माओं के ब्रह्माण्डीय अनुभव का मूलाधार कहा गया है।
भूमण्डल का स्वरूप, महाविस्तार और सप्तद्वीपों की उत्पत्ति की कथा
शास्त्रों में भूलोक अथवा भू-मण्डल के आकार की तुलना एक विशाल खिले हुए कमल-पत्र (कमल के पत्ते) से की गई है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध और श्री विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में इस भू-मण्डल का महाविस्तार पचास करोड़ योजन (लगभग चार अरब मील) बताया गया है। इस विशाल भू-मण्डल की संरचना अत्यंत जटिल, सममितीय और गणितीय पूर्णता लिए हुए है। यह सम्पूर्ण भूलोक सात विशाल वृत्ताकार द्वीपों (महाद्वीपों) और उन्हें घेरने वाले सात महासागरों में विभक्त है। इन सप्तद्वीपों की उत्पत्ति के विषय में श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में एक अत्यंत रोचक, वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण आख्यान मिलता है जो ब्रह्माण्डीय काल-गणना और भू-आकृति विज्ञान का अद्भुत समन्वय है।
स्वायम्भुव मनु के पुत्र और विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती के पति, महाराज प्रियव्रत ने इस भू-मण्डल पर ग्यारह करोड़ (110 मिलियन) वर्षों तक अत्यंत प्रताप और धर्म के साथ शासन किया। जब उन्होंने देखा कि भगवान सूर्य के प्रकाश के कारण पृथ्वी का केवल आधा भाग ही प्रकाशित होता है और शेष आधा भाग अंधकार में डूबा रहता है, तो उन्होंने अपने योगबल और परमपिता ब्रह्मा की प्रेरणा से रात्रि के अंधकार को मिटाने का निश्चय किया। उन्होंने सूर्य के रथ का अनुसरण करते हुए एक अत्यंत तेजोमय रथ पर सवार होकर पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की। महाराज प्रियव्रत के इस अलौकिक रथ के पहियों के प्रगाढ़ दबाव से पृथ्वी पर जो सात गहरी वलयाकार खाइयाँ बनीं, वे ही कालांतर में सात महासागरों में परिवर्तित हो गईं और उन महासागरों के मध्य बचे हुए वृत्ताकार भू-भाग सप्त-द्वीप कहलाए।
ये सात द्वीप भीतर से बाहर की ओर क्रमशः जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मलि द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप हैं। भूमण्डल की यह ज्यामितीय संरचना इस प्रकार है कि प्रत्येक द्वीप अपने पूर्ववर्ती द्वीप से आकार में ठीक दोगुना विशाल है, और प्रत्येक द्वीप एक विशिष्ट द्रव से भरे हुए महासागर द्वारा घिरा हुआ है। इन सात महासागरों ने सम्पूर्ण भू-मण्डल को वलयाकार रूप में एक के बाद एक आच्छादित कर रखा है।
| द्वीप का नाम |
विस्तार (योजन में) |
घिरे हुए महासागर का नाम |
महासागर का तत्व |
| जम्बू द्वीप |
1,00,000 योजन |
लवण सागर |
खारा जल |
| प्लक्ष द्वीप |
2,00,000 योजन |
इक्षु सागर |
गन्ने का रस |
| शाल्मलि द्वीप |
4,00,000 योजन |
सुरा सागर |
मदिरा (शराब) |
| कुश द्वीप |
8,00,000 योजन |
सर्पि सागर |
घृत (घी) |
| क्रौंच द्वीप |
16,00,000 योजन |
दधि सागर |
दही |
| शाक द्वीप |
32,00,000 योजन |
दुग्ध सागर |
दूध |
| पुष्कर द्वीप |
64,00,000 योजन |
जल सागर |
शुद्ध (मीठा) जल |
इन सभी द्वीपों और सागरों का यह अनुक्रम विष्णु पुराण (2.2) में महर्षि पराशर द्वारा मैत्रेय जी को अत्यंत विस्तार से समझाया गया है, जहाँ वे कहते हैं:
"कथितो भवता ब्रह्मन् सर्गः स्वायम्भुवस्य मे। श्रोतुम् इच्छाम्य् अहं त्वत्तः सकलं मण्डलं भुवः॥" (हे ब्रह्मन्, आपने मुझे स्वायम्भुव सर्ग का वर्णन सुनाया, अब मैं आपसे पृथ्वी के सम्पूर्ण मण्डल का वर्णन सुनना चाहता हूँ)।
इसी श्लोक के उत्तर में पराशर मुनि ने इस सप्तद्वीपमयी पृथ्वी का पूर्ण रहस्योद्घाटन किया है।
भूमण्डल के शासक: महाराज प्रियव्रत के पुत्र और उनका प्रशासकीय विभाजन
शास्त्रों के अनुसार, भूलोक का प्रशासन अत्यंत दैवीय और धर्मसम्मत रहा है। महाराज प्रियव्रत और उनकी पत्नी बर्हिष्मती के कुल दस पुत्र थे, जिनके नाम साक्षात् अग्नि के समान तेजस्वी थे—आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सवन, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि। इन दस पुत्रों में से तीन पुत्र—कवि, महावीर और सवन—बाल्यकाल से ही नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। वे परम वैरागी थे और उन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को पहचान कर पारमहंस्य आश्रम स्वीकार कर लिया था। उनका हृदय भगवान वासुदेव के चरणकमलों के प्रति पूर्णतः समर्पित था, अतः उन्होंने किसी भी लौकिक सत्ता या साम्राज्य को स्वीकार नहीं किया।
शेष सात पुत्रों को महाराज प्रियव्रत ने इन सात महाद्वीपों का अधिपति (राजा) नियुक्त कर सम्पूर्ण भूमण्डल का प्रशासन उन्हें सौंप दिया। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के अनुसार, महाराज प्रियव्रत ने आग्नीध्र को जम्बू द्वीप का, इध्मजिह्व को प्लक्ष द्वीप का, यज्ञबाहु को शाल्मलि द्वीप का, हिरण्यरेता को कुश द्वीप का, घृतपृष्ठ को क्रौंच द्वीप का, मेधातिथि को शाक द्वीप का और वीतिहोत्र को पुष्कर द्वीप का शासक बनाया। शासन के उत्तरार्ध में, जब इन राजाओं के हृदय में भी अपने पिता के समान वैराग्य उत्पन्न हुआ, तो उन्होंने अपने-अपने द्वीपों को खण्डों (वर्षों) में विभाजित करके अपने पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं तपस्या हेतु वन को प्रस्थान कर गए। उनके पुत्रों के नाम पर ही उन द्वीपों के भौगोलिक खण्डों (वर्षों) का नामकरण हुआ।
| द्वीप के अधिपति |
द्वीप का नाम |
पुत्रों / भौगोलिक वर्षों के नाम |
| आग्नीध्र |
जम्बू द्वीप |
भरत, किम्पुरुष, हरि, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व, केतुमाल |
| इध्मजिह्व |
प्लक्ष द्वीप |
शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत, अभय |
| यज्ञबाहु |
शाल्मलि द्वीप |
सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देव-वर्ष, पारिभद्र, आप्यायन, अविज्ञात |
| हिरण्यरेता |
कुश द्वीप |
वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त, वामदेव |
| घृतपृष्ठ |
क्रौंच द्वीप |
आम, मधुरूह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण, वनस्पति |
| मेधातिथि |
शाक द्वीप |
पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप, विश्वधार |
| वीतिहोत्र |
पुष्कर द्वीप |
रमणक, धातकि |
इस प्रकार सम्पूर्ण भूलोक महाराज प्रियव्रत के सुयोग्य वंशजों द्वारा अत्यंत सुव्यवस्थित, वेदोक्त और धर्मपूर्ण नियमों के अधीन सहस्रों वर्षों तक संचालित किया जाता रहा, जहाँ भौतिक ऐश्वर्य और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अद्भुत संतुलन विद्यमान था।
जम्बूद्वीप: भूलोक का हृदय और सुमेरु पर्वत की स्वर्णिम धुरी
इन सप्तद्वीपों के बिल्कुल केंद्र में जम्बू द्वीप स्थित है, जिसका विस्तार एक लाख योजन (लगभग 800,000 मील) है। यह द्वीप अपने चारों ओर से लवण सागर (खारे पानी के समुद्र) से घिरा हुआ है। जम्बू द्वीप की भौगोलिक संरचना अत्यंत अद्भुत और विलक्षण है; मार्कण्डेय पुराण के अनुसार यह महाद्वीप उत्तर और दक्षिण दिशा की ओर से कुछ दबा हुआ है तथा मध्य भाग में यह अत्यंत विस्तृत और उभरा हुआ है, जिससे इसकी समग्र आकृति एक खिले हुए कमल के चार पत्तों जैसी प्रतीत होती है। इस द्वीप का नामकरण एक अत्यंत विशाल और दिव्य 'जम्बू' (जामुन) वृक्ष के कारण हुआ है। शास्त्रों के अनुसार, इस अलौकिक वृक्ष के फल पर्वतों के समान विशाल और हाथियों के आकार के होते हैं। जब ये विशालकाय फल पककर पर्वत के शिखर से नीचे गिरते हैं, तो उनके फटने से निकलने वाले रस से 'जम्बू नदी' का निर्माण होता है। इस पवित्र नदी का मीठा और सुगन्धित रस पीने से वहाँ के निवासियों को कभी बुढ़ापा, रोग, शोक, शारीरिक दुर्गन्ध या थकान नहीं सताती। इसी रस के मिट्टी के साथ संपर्क में आने से और वायु तथा सूर्य के ताप से पकने पर 'जाम्बूनद' नामक दिव्य स्वर्ण (सोना) उत्पन्न होता है, जिससे देवगण और विद्याधर अपने आभूषणों का निर्माण करते हैं।
जम्बू द्वीप के बिल्कुल केंद्र में 'इलावृत वर्ष' स्थित है, जिसके ठीक मध्य में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वर्णिम अक्ष, सुमेरु (मेरु) पर्वत विराजमान है। मेरु पर्वत भूलोक की ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की धुरी है। इसका विस्तार ऊपर की ओर 84,000 योजन है और यह पृथ्वी के नीचे 16,000 योजन तक गहराई में धंसा हुआ है। इसके शिखर का व्यास 32,000 योजन और आधार का व्यास 16,000 योजन है, जो इसे एक उल्टे शंक्वाकार का स्वरूप प्रदान करता है, जो कमल की कर्णिका के समान प्रतीत होता है।
इस महान मेरु पर्वत को चारों दिशाओं से सहारा देने और स्थिर रखने के लिए चार अन्य अत्यंत विशाल पर्वत (जिन्हें विष्कम्भ पर्वत कहा जाता है) स्थापित हैं। ये पर्वत हैं—पूर्व दिशा में मन्दर, दक्षिण दिशा में गंधमादन, पश्चिम दिशा में विपुल और उत्तर दिशा में सुपार्श्व। इन चारों पर्वतों की ऊंचाई दस-दस हज़ार योजन है। इन चारों पर्वतों के शिखरों पर चार अति-विशालकाय वृक्ष स्थित हैं जो सम्पूर्ण द्वीप की पहचान कराने वाली ध्वजाओं के समान प्रतीत होते हैं—मन्दर पर्वत पर कदम्ब वृक्ष, गंधमादन पर्वत पर जम्बू वृक्ष (जिससे द्वीप का नाम पड़ा), विपुल पर्वत पर पीपल वृक्ष और सुपार्श्व पर्वत पर वट वृक्ष। ये सभी वृक्ष 1,100 योजन के विस्तृत क्षेत्र में फैले हुए हैं।
इन विष्कम्भ पर्वतों के मध्य देवगणों, यक्षों, गंधर्वों और विद्याधरों के विहार के लिए चार अत्यंत मनोरम और दिव्य सरोवर विद्यमान हैं—अरुणोद, महाभद्र, शीतोद और मानस। इन सरोवरों के निर्मल जल में स्नान करके देवगण अलौकिक आनंद और ऊर्जा प्राप्त करते हैं। मेरु पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर साक्षात् परमेष्ठी ब्रह्मा जी की स्वर्णमयी पुरी (नगर) स्थित है, जिसे 'ब्रह्मपुरी' या 'शातकौम्भी' कहा जाता है। मार्कण्डेय पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, यह ब्रह्मपुरी चौकोर है और दस हजार योजन विस्तृत है। इस शातकौम्भी पुरी को चारों ओर से देवराज इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर, ईश और निर्ऋति सहित आठ लोकपालों (अष्ट-दिक्पालों) की स्वर्ण और मणियों से निर्मित नगरियों ने घेर रखा है।
देवनदी गंगा का भूलोक पर अवतरण और उसकी चार पावन धाराएं
भूलोक में जम्बूद्वीप का वर्णन तब तक अपूर्ण माना जाता है, जब तक कि त्रिपथगामिनी, मोक्षदायिनी देवनदी गंगा के अवतरण और उसकी भौगोलिक यात्रा का शास्त्रीय विवेचन न किया जाए। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध (अध्याय 17) और मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 56) में इस दिव्य नदी की ब्रह्माण्डीय यात्रा का अत्यंत सजीव, वैज्ञानिक और पारमार्थिक वर्णन प्राप्त होता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि की यज्ञशाला में त्रिविक्रम रूप का विस्तार किया था, तब उनके वाम चरण (बाएं पैर) के अंगूठे के नख (नाखून) के प्रहार से ब्रह्माण्ड का ऊपरी आवरण छिन्न-भिन्न हो गया था। उस आवरण के छिद्र से ब्रह्माण्ड के बाहर स्थित कारण-जल ब्रह्माण्ड के भीतर प्रविष्ट हुआ। भगवान के साक्षात् चरण-रेणु (चरणों की धूलि) के पवित्र स्पर्श से वह जल गुलाबी आभा से युक्त होकर 'विष्णुपदी' गंगा के रूप में परिणत हो गया।
यह पावन नदी सहस्रों युगों तक स्वर्गीय लोकों में प्रवाहित होने के पश्चात सर्वप्रथम ध्रुवलोक में ध्रुव महाराज के मस्तक पर गिरती है, जहाँ से यह आनंदावेश में सप्तर्षि मंडल को पार करते हुए चंद्रलोक से होकर मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित ब्रह्मा जी की पुरी (ब्रह्मपुरी) में अवतरित होती है। मेरु पर्वत के शिखर पर ब्रह्मपुरी को आप्लावित करने के पश्चात गंगा चार समान और विशाल धाराओं में विभक्त हो जाती है, जो भूलोक की चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं।
- सीता: नाम की पहली धारा पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। यह मेरु पर्वत से गिरकर चैत्ररथ वन और अरुणोद सरोवर को पार करते हुए शीतान्त आदि पर्वत शिखरों से होती हुई भद्राश्व वर्ष की भूमि में प्रवेश करती है और अंततः पूर्व दिशा के लवण (खारे) समुद्र में विलीन हो जाती है।
- अलकनंदा: नाम की दूसरी धारा दक्षिण दिशा में प्रवाहित होती है। यह गंधमादन पर्वत से होते हुए नंदन वन और मानसरोवर को आप्लावित करती है। यह अनेक पर्वत शिखरों को पार करते हुए भूलोक के सर्वोच्च शिखर हिमालय तक पहुँचती है। शास्त्रों के अनुसार, इसी अलकनंदा की धारा को महाराज भगीरथ की घोर तपस्या के कारण भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया था। भगवान शिव ने इसे इसलिए रोका था ताकि इसके प्रचंड ब्रह्माण्डीय वेग से भूलोक नष्ट न हो जाए और रसातल में न चला जाए। बाद में शिव जी द्वारा प्रसन्न होकर मुक्त किए जाने पर यह सात धाराओं में बँटकर भारतवर्ष से होते हुए दक्षिण सागर में जा मिली। महाराज भगीरथ के रथ का अनुगमन करने के कारण ही अलकनंदा के इस पृथ्वी पर प्रवाहित होने वाले स्वरूप को 'भागीरथी' कहा गया।
- चक्षु (या स्वरक्षु): नाम की तीसरी धारा पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती है। यह मेरु के पश्चिमी भाग से विपुल पर्वत पर गिरती है और वैभ्राज वन को पार करते हुए शीतोद सरोवर को भरती है। वहाँ से यह त्रिशिख आदि पश्चिमी पर्वतों को पार कर केतुमाल वर्ष में प्रवेश करती है और अपने जल से उस क्षेत्र को सिंचित करते हुए पश्चिमी सागर में प्रवेश कर जाती है।
- सोमा (या भद्रा): नाम की चौथी धारा उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती है। यह सुपार्श्व पर्वत पर गिरकर सवितृ वन को पार कर महाभद्र सरोवर को जलमग्न करती है। इसके पश्चात यह शंखकूट और वृषभ आदि उत्तर दिशा के पर्वतों को पार करते हुए उत्तरकुरु वर्ष की भूमि को सिंचित करती है और अंत में उत्तरी सागर में समाहित हो जाती है। इस प्रकार देवनदी गंगा अपने चार स्वरूपों में सम्पूर्ण जम्बूद्वीप को पवित्र और पोषित करती है।
जम्बूद्वीप के नव-वर्ष और विभिन्न अधिष्ठाता देवताओं की उपासना
श्रीमद्भागवत पुराण (5.17-19) और विष्णु पुराण (2.2) के अनुसार, जम्बू द्वीप को पर्वत शृंखलाओं द्वारा नौ मुख्य भौगोलिक खण्डों (जिन्हें 'वर्ष' कहा जाता है) में विभाजित किया गया है। प्रत्येक वर्ष की अपनी एक विशिष्ट आध्यात्मिक और भौगोलिक पहचान है, और प्रत्येक वर्ष में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और अंशों की प्रत्यक्ष आराधना वहाँ के मुख्य निवासियों द्वारा विशिष्ट मंत्रों के साथ की जाती है।
| वर्ष का नाम |
भौगोलिक स्थिति |
प्रमुख आराधक |
पूजित अधिष्ठाता देवता |
| इलावृत वर्ष |
मेरु के चारों ओर (मध्य) |
भगवान शिव |
संकर्षण (चतुर्व्यूह का रूप) |
| भद्राश्व वर्ष |
मेरु के पूर्व में |
भद्रश्रवा |
हयग्रीव (हयशीर्ष) |
| हरि वर्ष |
मेरु के दक्षिण में |
प्रह्लाद |
भगवान नृसिंह |
| केतुमाल वर्ष |
मेरु के पश्चिम में |
देवी लक्ष्मी |
कामदेव (प्रद्युम्न) |
| रम्यक वर्ष |
मेरु के उत्तर में |
वैवस्वत मनु |
मत्स्य अवतार |
| हिरण्मय वर्ष |
श्वेत और शृंगी के मध्य |
पितृपति अर्यमा |
कूर्म अवतार |
| उत्तरकुरु वर्ष |
शृंगी पर्वत के पार (उत्तर) |
भूदेवी (पृथ्वी) |
वराह अवतार |
| किम्पुरुष वर्ष |
हिमालय और हेमकूट के मध्य |
हनुमान जी |
भगवान श्रीराम |
| भारतवर्ष |
हिमालय के दक्षिण में |
सम्पूर्ण मानव जाति |
नर-नारायण (तथा कूर्म) |
इलावृत वर्ष जम्बूद्वीप का बिल्कुल मध्य भाग है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, इस वर्ष में साक्षात् भगवान शिव ही एकमात्र पुरुष हैं; देवी भवानी (दुर्गा) के एक प्राचीन शाप के कारण यहाँ प्रवेश करने वाला कोई भी अन्य पुरुष तुरंत स्त्री रूप में परिवर्तित हो जाता है। भगवान शिव यहाँ करोड़ों दासियों से घिरे रहते हैं और वे स्वयं चतुर्व्यूह के चतुर्थ अंश, 'संकर्षण' की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति और उपासना करते हैं। भगवान संकर्षण यद्यपि तमोगुणी संहारक रूप माने जाते हैं, किन्तु उनका मूल स्वरूप विशुद्ध सत्वमय है।
भद्राश्व वर्ष मेरु के पूर्व में स्थित है, जहाँ के शासक भद्रश्रवा हैं। यहाँ के निवासी भगवान विष्णु के 'हयग्रीव' (या हयशीर्ष) रूप की आराधना करते हैं, जो समस्त वेदों और धर्म के साक्षात् नियंता हैं और जिन्होंने प्रलय काल में रसातल से वेदों का उद्धार किया था।
हरि वर्ष में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र और भगवान के परम भक्त प्रह्लाद जी के नेतृत्व में वहाँ के निवासी भगवान 'नृसिंह' की उपासना करते हैं। प्रह्लाद जी यहाँ अपने स्तुति गान में अंतःकरण की शुद्धि, मृत्यु के भय से निर्भयता, गृह और संसार की आसक्ति से मुक्ति तथा भक्तों के संग की प्रार्थना करते हैं।
केतुमाल वर्ष में साक्षात् धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी निवास करती हैं। वे प्रजापति संवत्सर की पुत्रियों के साथ मिलकर भगवान के 'कामदेव' (प्रद्युम्न) रूप की आराधना करती हैं। यहाँ के निवासी अत्यंत सुंदर, कमल के समान वर्ण वाले होते हैं और देवताओं के समान दस हज़ार वर्ष का नीरोग जीवन व्यतीत करते हैं।
रम्यक वर्ष में श्राद्धदेव वैवस्वत मनु भगवान के 'मत्स्य' अवतार की आराधना करते हैं और उन्हें प्रलय के भयानक जल में जगत की रक्षा करने वाले तथा वर्णाश्रम धर्म के आदि प्रवर्तक के रूप में पूजते हैं।
हिरण्मय वर्ष में पितरों के अधिपति अर्यमा अपने निवासियों के साथ भगवान 'कूर्म' (कच्छप) अवतार की स्तुति करते हैं। वे भगवान के विराट-रूप का ध्यान करते हुए जगत को उनकी अचिन्त्य शक्ति का क्षणिक प्रदर्शन मात्र मानते हैं।
उत्तरकुरु वर्ष को शास्त्रों में निरंतर सुख और आनंद का क्षेत्र (भोगभूमि) माना गया है। यहाँ साक्षात् पृथ्वी देवी (भूदेवी) भगवान 'वराह' की आराधना करती हैं, जिन्होंने प्रलय के जल से पृथ्वी का उद्धार कर अपनी दाढ़ों पर उसे स्थापित किया था और हिरण्याक्ष का वध किया था।
किम्पुरुष वर्ष में परम रामभक्त हनुमान जी अन्य किम्पुरुषों के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की निरंतर आराधना करते हैं और उनके आदर्शों का गान करते हैं।
अंततः भारतवर्ष, जो हिमालय के दक्षिण और लवण सागर के उत्तर में स्थित है, साक्षात् कर्मभूमि है। यहाँ भगवान की उपासना मुख्य रूप से 'नर-नारायण' ऋषि के रूप में तथा विभिन्न ग्रंथों के अनुसार 'कूर्म' रूप में की जाती है।
अन्य छह महाद्वीपों का भौगोलिक विस्तार एवं आध्यात्मिक वर्णन
जम्बू द्वीप के बाहर स्थित शेष छह द्वीपों का जीवन और पर्यावरण पूर्णतः 'भौम स्वर्ग' (पृथ्वी पर स्थित स्वर्ग) के समान है। वहाँ किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक व्याधि, रोग, शोक अथवा आयु का क्षय नहीं होता। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत के अनुसार, इन बाहरी द्वीपों में रहने वाले मनुष्य हजारों वर्षों की आयु भोगते हैं और उनका स्वरूप देवताओं के समान अत्यंत कान्तियुक्त और सुन्दर होता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध (अध्याय 20) में इन द्वीपों के शासकों, उनके पुत्रों के नाम पर रखे गए वर्षों, पर्वतों, नदियों और वहाँ की उपासना पद्धतियों का गणितीय और आध्यात्मिक वर्णन प्राप्त होता है।
| द्वीप का नाम |
विस्तार (योजन) |
शासक |
पुत्रों / वर्षों के नाम |
प्रमुख वर्ण (जातियां) |
उपास्य देव |
| प्लक्ष द्वीप |
2,00,000 |
इध्मजिह्व |
शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत, अभय |
हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन, सत्यांग |
सूर्य देव |
| शाल्मलि द्वीप |
4,00,000 |
यज्ञबाहु |
सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देव-वर्ष, पारिभद्र, आप्यायन, अविज्ञात |
श्रुतिधर, विद्याधर, वसुन्धर, ईशधर |
चन्द्र देव |
| कुश द्वीप |
8,00,000 |
हिरण्यरेता |
वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, स्तुत्यव्रत, विविक्त, वामदेव |
कुशल, कोविद, अभियुक्त, कुलक |
अग्नि देव |
| क्रौंच द्वीप |
16,00,000 |
घृतपृष्ठ |
आम, मधुरूह, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, लोहितार्ण, वनस्पति |
पुरुष, ऋषभ, द्रविण, देवक |
वरुण देव |
| शाक द्वीप |
32,00,000 |
मेधातिथि |
पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप, विश्वधार |
ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत, अनुव्रत |
वायु देव |
| पुष्कर द्वीप |
64,00,000 |
वीतिहोत्र |
रमणक, धातकि |
(विशिष्ट वर्णों का उल्लेख नहीं) |
ब्रह्मा जी |
प्लक्ष द्वीप: जम्बू द्वीप से दोगुना विशाल प्लक्ष द्वीप है। भागवत पुराण के अनुसार, यहाँ के सात पर्वत—मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल—हैं। यहाँ सात पवित्र नदियाँ—अरुणा, नृम्णा, आंगिरसी, सावित्री, सुप्तभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा—प्रवाहित होती हैं। इन नदियों के जल के स्पर्श मात्र से निवासियों के रजोगुण और तमोगुण धुल जाते हैं। यहाँ हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग नामक चार वर्ण हैं, जो वेदोक्त कर्मकांडों के माध्यम से भगवान सूर्य की उपासना करते हैं: "स्वर्ग-द्वारं त्रय्या विद्यया भगवन्तं त्रयीमयं सूर्यम् आत्मानं यजन्ते।" अर्थात्, वे त्रयी विद्या (वेदों) के द्वारा भगवान के त्रयीमय सूर्य स्वरूप की आराधना करते हैं।
शाल्मलि द्वीप: सुरा (मदिरा) के सागर से घिरे इस द्वीप का विस्तार प्लक्ष द्वीप से दोगुना है। इस द्वीप में एक अत्यंत विशाल शाल्मलि (सेमल) का वृक्ष स्थित है, जो भगवान विष्णु के वाहन पक्षिराज गरुड़ का विश्राम स्थल और निवास है। वहाँ से गरुड़ देव भगवान विष्णु की वेदमयी स्तुति करते हैं। यहाँ के निवासी वेदमंत्रों के द्वारा चन्द्र देव की उपासना करते हैं, जो वनस्पतियों और मन के स्वामी हैं।
कुश द्वीप: घृत (घी) के सागर से घिरे इस द्वीप में कुश नामक घास की प्रधानता है, जो अग्नि के समान देदीप्यमान है। यहाँ के निवासियों को कुशल, कोविद, अभियुक्त और कुलक कहा जाता है, जो जम्बूद्वीप के क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के समान हैं। ये लोग यज्ञीय कर्मकांडों में अत्यंत निपुण हैं और भगवान हरि के साक्षात् 'अग्नि' स्वरूप की पूजा करते हैं। उनका यह विश्वास है कि परब्रह्म परमात्मा ही यज्ञों के वास्तविक भोक्ता हैं, और वे अपने यज्ञों की आहुति अग्निदेव के माध्यम से उन तक पहुँचाते हैं।
क्रौंच द्वीप: दधि (दही) के सागर से घिरे इस द्वीप के शासक घृतपृष्ठ का उल्लेख भागवत पुराण के इस श्लोक में आता है: "तस्मिन्नपि प्रैयव्रतो घृतपृष्ठो नामाधिपति: स्वे द्वीपे वर्षाणि सप्त विभज्य..." यहाँ के सात मुख्य पर्वत—शुक्ल, वर्धमान, भोजन, उपबर्हिण, नन्द, नन्दन और सर्वतोभद्र—हैं, तथा अभया, अमृतौघा, आर्यका, तीर्थवती, रूपवती, पवित्रवती और शुक्ला नामक सात पावन नदियाँ प्रवाहित होती हैं। यहाँ पुरुष, ऋषभ, द्रविण और देवक नामक चार वर्ण जल के अधिष्ठाता देवता भगवान वरुण के चरणकमलों में अंजलि भरकर जल अर्पित करते हुए परब्रह्म की उपासना करते हैं।
शाक द्वीप: दुग्ध (दूध) के सागर से घिरे शाक द्वीप में एक विशाल शाक वृक्ष है। यहाँ के निवासी ऋतव्रत, सत्यव्रत, दानव्रत और अनुव्रत नामक चार वर्णों में विभाजित हैं। ये लोग अत्यंत योगी और तपस्वी हैं, जो प्राणायाम और अष्टांग योग के माध्यम से समाधिस्थ होकर भगवान के 'वायु' स्वरूप (प्राणतत्व) की आराधना करते हैं। वे मानते हैं कि जिस प्रकार वायु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, उसी प्रकार परब्रह्म भी सर्वत्र विद्यमान है।
पुष्कर द्वीप: सबसे बाहरी और सबसे विशाल पुष्कर द्वीप शुद्ध और मीठे जल के सागर से घिरा है। यहाँ एक अत्यंत विशाल पुष्कर (कमल) का पुष्प स्थित है। इस द्वीप में केवल दो ही वर्ष हैं और यहाँ के निवासी साक्षात् परमेष्ठी ब्रह्मा जी की उपासना करते हैं।
इन सभी बाहरी द्वीपों में देव-समान और रोगमुक्त जीवन होने के बावजूद, यहाँ के निवासियों को अपने पुण्य क्षीण होने पर पुनः कर्मानुसार अन्य योनियों या भारतवर्ष में जन्म लेना पड़ता है, क्योंकि ये विशुद्ध कर्मभूमियाँ नहीं, अपितु केवल पूर्व पुण्यों को भोगने की भोगभूमियाँ हैं।
लोकालोक पर्वत: प्रकाश और अन्धकार की रहस्यमयी सीमा
भू-मण्डल के सबसे बाहरी छोर पर, सातों द्वीपों और समुद्रों के बहुत आगे एक अत्यंत रहस्यमय, दुर्गम और विशाल पर्वतमाला स्थित है, जिसे 'लोकालोक पर्वत' कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध (5.20) के अनुसार, यह पर्वत उस क्षेत्र को विभाजित करता है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और जहाँ पूर्ण अंधकार रहता है। 'लोक' का अर्थ है सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित और बसा हुआ क्षेत्र, तथा 'अलोक' का अर्थ है पूर्णतः अंधकारमय और निर्जन क्षेत्र जहाँ प्रकाश की कोई किरण नहीं पहुँचती।
सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहमंडलों की किरणें इसी लोकालोक पर्वत तक ही भूलोक को प्रकाशित कर पाती हैं; इस पर्वत के पार प्रकाश का जाना वर्जित है। इस पर्वत की ऊँचाई और चौड़ाई दस हजार योजन बताई गई है, और यह भू-मण्डल को चारों ओर से एक अभेद्य दीवार के समान घेरे हुए है, जिससे ब्रह्माण्ड की एक निश्चित भौतिक सीमा का निर्धारण होता है। शास्त्रों के अनुसार, लोकालोक पर्वत पर चारों दिशाओं में चार विशाल गजराज (हाथी) खड़े हैं जो इस ब्रह्माण्ड के संतुलन को बनाए रखते हैं। इस पर्वत पर स्वयं भगवान नारायण (विष्णु) अपनी अचिन्त्य योगमाया से अष्ट-महासिद्धियों से युक्त होकर और अपने पार्षदों (विष्वक्सेन आदि) के साथ निवास करते हैं। भगवान विष्णु वहाँ अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर समस्त लोकों के कल्याण और उनके भौगोलिक संरक्षण हेतु विराजते हैं। लोकालोक पर्वत के आगे केवल अलौकिक अंधकार (अलोक) है और उसके पश्चात ब्रह्माण्ड का आवरण आ जाता है, जो जल, अग्नि, वायु, आकाश और अहंकार आदि तत्वों से निर्मित है।
भारतवर्ष: एकमात्र कर्मभूमि और देवताओं की लालसा
समस्त भूलोक में जम्बूद्वीप और जम्बूद्वीप में भी 'भारतवर्ष' का स्थान सबसे अद्वितीय, विलक्षण और परम पवित्र है। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश (अध्याय 3) में महर्षि पराशर मैत्रेय जी को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जम्बूद्वीप के अन्य आठ वर्ष केवल 'भोगभूमियाँ' हैं, जहाँ पूर्वजन्म के पुण्यों का भोग किया जाता है, किन्तु केवल भारतवर्ष ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकमात्र 'कर्मभूमि' है। जीव अपने श्रेष्ठ कर्मों से स्वर्ग प्राप्त करता है और दुष्कर्मों से नर्क में जाता है, किंतु नए कर्म करने की स्वतंत्रता और जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मोक्ष (अपवर्ग) प्राप्ति का अधिकार उसे केवल भारतवर्ष की भूमि पर मानव देह प्राप्त होने पर ही मिलता है।
देवता स्वर्ग में बैठकर भी इस भारत भूमि पर जन्म लेने की लालसा करते हैं और इसका स्तुतिगान करते हैं। विष्णु पुराण (2.3.24) का यह प्रसिद्ध श्लोक इस सत्य का उद्घोष करता है: "गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥" अर्थात्, देवगण निरंतर यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) के मार्ग स्वरूप भारतवर्ष में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओं से भी अधिक धन्य और बड़भागी हैं। देवगण कहते हैं कि हमारे स्वर्ग-प्रद कर्मों (पुण्यों) का क्षय होने पर न जाने हम कहाँ जन्म लेंगे, किंतु वे मनुष्य धन्य हैं जो भारत भूमि में उत्पन्न होकर अपनी इंद्रियों की शक्ति से क्षीण नहीं हुए हैं और निष्काम कर्म करते हुए साक्षात् श्री हरि में लीन होने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।
केवल इसी भारत भूमि पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चारों युग अपना काल-चक्र पूरा करते हैं; अन्य किसी भी वर्ष या द्वीप में युग-व्यवस्था लागू नहीं होती, वहाँ सदैव त्रेता युग के समान एक-सा सुखद वातावरण रहता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अन्य वर्षों के निवासियों को बिना कर्म किए ही छह प्रकार की सिद्धियाँ (वृक्षों से, स्वभाव से, भूमि से, जल से, ध्यान से और धर्म से) स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। किन्तु भारतवर्ष में परम तपस्वी ऋषि घोर तपस्या करते हैं, भक्तजन यज्ञ करते हैं और दान-पुण्य के माध्यम से परलोक संवारते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार भी, जीव चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् जब उसके पाप और पुण्य का संतुलन होता है, तब उसे यह दुर्लभ मनुष्य शरीर भारत भूमि पर प्राप्त होता है। इस भूमि पर जन्म लेना हज़ारों जन्मों के पुण्यों का एकत्रीकरण है, जिसे सांसारिक विषय-भोगों में व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।
भूलोक का अन्य लोकों से संबंध एवं गरुड़ पुराण का प्रेत कल्प
भूलोक की स्थिति और उसका वातावरण ब्रह्माण्ड के अन्य लोकों के साथ एक अत्यंत गहरा स्थानिक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है। यह एक संक्रमण क्षेत्र है। भूलोक से लेकर ध्रुवलोक (जहाँ सूर्य अवस्थित है) के बीच के अंतरिक्ष को 'भुवर्लोक' (अन्तरिक्ष लोक) कहा जाता है, जहाँ सिद्ध, मुनि और चारण विचरण करते हैं। सूर्य और ध्रुव के मध्य का चौदह लाख योजन का क्षेत्र 'स्वर्लोक' है, जो देवराज इन्द्र और अन्य देवताओं का निवास है। इसके ऊपर क्रमशः महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) हैं, जो तपस्वियों, ऋषियों और ब्रह्मा जी के निवास स्थान हैं।
गरुड़ पुराण के पूर्व-खण्ड और विशेषकर उत्तर-खण्ड (प्रेत कल्प) के अनुसार, मृत्यु के पश्चात जीवात्मा अपने द्वारा भूलोक में किए गए कर्मों के अनुसार यमराज के लोक (नरक या पितृलोक) की यात्रा करती है और अपने पापों का भयंकर दंड भोगती है। इसके विपरीत, पुण्य कर्म करने वाली सात्विक आत्माएं स्वर्लोक या उससे भी उच्च लोकों में जाती हैं।
परंतु भगवद्गीता और पुराणों का स्पष्ट मत है कि स्वर्ग हो या पाताल, जीव को अपने पुण्यों या पापों को भोगने के पश्चात् पुनः इसी भूलोक में आना पड़ता है। भूलोक ब्रह्माण्ड का वह केंद्र बिंदु है जहाँ आत्माएँ अपने अज्ञान (अविद्या) और जन्म-मरण (भव-रोग) के चक्र को तोड़ने का सचेतन प्रयास करती हैं। भूलोक के ठीक नीचे के सात अधोलोक (अतल, वितल, सुतल आदि) सूर्य के प्रकाश से वंचित हैं, किंतु वहाँ सर्पों के मणियों का अलौकिक प्रकाश रहता है। वहाँ असुर, नाग एवं दानव भौतिक ऐश्वर्य का भोग करते हैं, जो स्वर्ग के समान ही है, इसीलिए उसे 'बिल-स्वर्ग' कहा जाता है। तथापि, वहाँ आध्यात्मिक उन्नति या आत्म-साक्षात्कार का कोई मार्ग नहीं है, क्योंकि वे विशुद्ध रूप से भौतिक भोग के लोक हैं जहाँ जीव अहंकार और माया में डूबे रहते हैं। यही भूलोक की सबसे बड़ी विशेषता है जो इसे चौदह भुवनों में सर्वोपरि बनाती है—यहाँ दुःख और सुख का वह संतुलित मिश्रण है जो वैराग्य, ज्ञान और परब्रह्म की प्राप्ति की तीव्र इच्छा को जन्म देता है।
विभिन्न पुराणों में भूलोक वर्णन का तुलनात्मक और समन्वयात्मक दृष्टिकोण
भूलोक के इस विस्तृत स्वरूप का वर्णन यद्यपि सभी प्रमुख अष्टादश पुराणों में मिलता है, तथापि प्रत्येक पुराण ने इसे अपने एक विशिष्ट दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। जब इन सभी मतों का समन्वय किया जाता है, तब भूलोक का पूर्ण पारमार्थिक चित्र उभरता है:
- 1. श्रीमद्भागवत पुराण: यह पुराण भूलोक की भौगोलिक, खगोलीय और गणितीय संरचना (योजनों में सटीक माप) का सबसे विशद वर्णन प्रस्तुत करता है। यह भगवान की विराट माया और उनके विश्वरूप को भूगोल के माध्यम से समझाने का प्रयास करता है। भागवत में राजाओं की वंशावली, द्वीपों के शासकों, उनके पुत्रों और वहाँ पूजे जाने वाले भगवान के विशिष्ट अवतारों (जैसे इलावृत में संकर्षण, भद्राश्व में हयग्रीव) का अत्यंत सूक्ष्मतम विवरण प्राप्त होता है।
- 2. श्री विष्णु पुराण: यह पुराण अपनी संक्षिप्तता के बावजूद भूलोक के तात्विक अर्थ और भारतवर्ष के आध्यात्मिक महात्म्य (कर्मभूमि) पर सर्वाधिक बल देता है। इसमें सप्तद्वीपों और सागरों के विस्तार का वर्णन तो है (अंश 2, अध्याय 2), किन्तु इसका मूल संदेश यह है कि भौगोलिक विस्तार अंततः आत्मा के कल्याण (अपवर्ग) के लिए ही रचित है, और भगवान विष्णु ही समस्त लोकों के एकमात्र आश्रय हैं।
- 3. मार्कण्डेय पुराण: यह पुराण (अध्याय 56-59) भौगोलिक संरचना के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य, पर्वतों की श्रृंखलाओं (कूर्म विभाग) और देवनदी गंगा के अवतरण की चार धाराओं (सीता, अलकनंदा, चक्षु, সোमा) का अत्यंत विस्तृत वर्णन करता है। यह जम्बूद्वीप के अन्य आठ वर्षों में निवास करने वाले लोगों की आयु, वर्ण, उनकी सिद्धियों (वृक्ष-प्रदत्त, स्वभाव-प्रदत्त आदि) और पूर्णता का अधिक सूक्ष्म वर्णन करता है।
- 4. गरुड़ पुराण: यह पुराण अपने प्रेत कल्प में इस भूलोक को पूर्णतः मृत्यु, कर्मफल और पुनर्जन्म के परिप्रेक्ष्य में देखता है। यह बताता है कि कैसे भूलोक में किए गए सूक्ष्मतम कर्म (दान, यज्ञ, श्राद्ध) परलोक की यात्रा और अगले जन्म को निर्धारित करते हैं। यह भूलोक को चौरासी लाख योनियों की यात्रा के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में स्थापित करता है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों में 'भूलोक' की परिकल्पना मात्र मिट्टी, जल, भौतिक वायु और पर्वतों का एक निर्जीव समूह नहीं है। यह साक्षात् परब्रह्म परमात्मा की अचिन्त्य और अनंत शक्ति द्वारा रचित एक ऐसा महा-रंगमंच है, जहाँ अनगिनत जीवात्माएं अपने पूर्व कर्मों का नाटक खेलती हैं। सातों महाद्वीप, सातों महासागर, सुमेरु पर्वत की स्वर्णिम धुरी, जम्बूद्वीप के नव-वर्ष और लोकालोक पर्वत की अभेद्य सीमा—ये सभी उस परम सत्य की महिमा का उद्घोष करते हैं। भूलोक वह पावन तीर्थ है जहाँ देवगण भी जन्म लेने की आकांक्षा करते हैं, क्योंकि केवल इसी धरा पर निष्काम कर्म और भगवद्-भक्ति के माध्यम से जीव अपने अज्ञान के बंधनों को काटकर शाश्वत मोक्ष (अपवर्ग) की प्राप्ति कर सकता है।