विस्तृत उत्तर
सनातन वैदिक वाङ्मय के अनुसार भूलोक केवल एक स्थूल भौतिक ग्रह मात्र नहीं है। यह परब्रह्म परमात्मा की अचिन्त्य योगमाया द्वारा रचित कर्म, भोग और मोक्ष का एक अत्यंत रहस्यमय, सुव्यवस्थित और विस्तृत अधिष्ठान है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार जहाँ तक पृथ्वी का स्थूल विस्तार है, जहाँ तक प्राणी अपने पैरों से विचरण कर सकते हैं और जहाँ तक सूर्य और चन्द्रमा की किरणों का प्रकाश पहुँचता है वह सम्पूर्ण क्षेत्र भूलोक कहलाता है। यह लोक अपनी भौगोलिक सीमा में न केवल उस स्थान को समेटे हुए है जहाँ सामान्य मानव निवास करते हैं अपितु इसमें अनेक ऐसे दिव्य क्षेत्र भी सम्मिलित हैं जहाँ सिद्ध, चारण, गंधर्व, विद्याधर और देवगण विचरण करते हैं। यह भौतिक और स्थूल तत्वों का वह लोक है जो जीव को उसके कर्मों का फल भोगने तथा नवीन सकाम या निष्काम कर्म करने का अवसर प्रदान करता है। इसीलिए इसे शास्त्रों में कर्मभूमि और जीवात्माओं के ब्रह्माण्डीय अनुभव का मूलाधार कहा गया है।
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