अहिर्बुध्न्य देवता मंत्र
(वैदिक, नक्षत्र शांति एवं जल-अंधकार प्रतीकात्मक)
मंत्र
मंत्र: ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेस्तुमामाहि गवं सो निर्वत्तयाम्यायुषेत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय (सुप्रजास्वाय)। ॐ अहिर्बुधाय नम:।
देवता
अहिर्बुध्न्य (रुद्र का एक स्वरूप, पाताल या जलों के देवता, अंधकार और गूढ़ शक्तियों के प्रतीक)।
स्रोत
यह मंत्र वेदों से सम्बंधित है, विशेषकर यजुर्वेद या अथर्ववेद की नक्षत्रशाखा से। इसका सम्बन्ध उत्तरभाद्रपद नक्षत्र से बताया गया है। शिवपुराण में महामृत्युंजय मंत्र के संदर्भ में 'पु' अक्षर अहिर्बुध्न्य का बोधक है।
प्रयोजन
उत्तरभाद्रपद नक्षत्र की ऊर्जा को सशक्त करना, ज्योतिषीय बाधाओं से मुक्ति, आयु वृद्धि, उत्तम प्रजा, धन-धान्य एवं पोषण की प्राप्ति, तथा आध्यात्मिक शक्ति जागरण।
विधि
इस मंत्र का प्रयोग मुख्यतः ज्योतिषीय साधनाओं में नक्षत्र शांति और उससे सम्बंधित शुभ फलों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। विशिष्ट अनुष्ठान और जप संख्या गुरु के निर्देशानुसार करनी चाहिए।
महत्व
अहिर्बुध्न्य एक प्राचीन वैदिक देवता हैं, जिनका उल्लेख संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है, परन्तु कालांतर में इनकी उपासना सीमित हो गई। यह मंत्र उन गूढ़ वैदिक मंत्रों में से है जो नक्षत्रों की विशिष्ट शक्तियों से जुड़े हैं और सामान्य जनमानस में अल्पज्ञात हैं। इनकी उपासना गहन आध्यात्मिक और ज्योतिषीय ज्ञान की अपेक्षा रखती है।






