वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान में भुवर्लोक का सर्वांगीण और प्रामाणिक शास्त्रीय विवेचन
सनातन धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, विशेषकर अष्टादश महापुराणों, उपनिषदों और वेदांत दर्शन में, ब्रह्मांड की संरचना का अत्यंत सूक्ष्म, गणितीय और तात्विक वर्णन प्राप्त होता है। वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड मुख्य रूप से चौदह लोकों (भुवनों) में विभाजित है। इन चौदह लोकों को उनकी स्थिति और चेतना के स्तर के आधार पर दो वृहत श्रेणियों में विभक्त किया गया है: सात ऊर्ध्व लोक (ऊपर के लोक) और सात अधोलोक (नीचे के लोक)। अधोलोकों की शृंखला में अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल का समावेश होता है, जो भूमण्डल (पृथ्वी) के नीचे स्थित हैं। इसके विपरीत, पृथ्वी सहित इसके ऊपर के लोकों को ऊर्ध्व लोक की संज्ञा दी गई है, जिनमें क्रमशः भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) शामिल हैं। इस ब्रह्मांडीय पदानुक्रम और ऊर्ध्व लोकों की शृंखला में 'भुवर्लोक' दूसरा सबसे महत्वपूर्ण लोक है, जो भूलोक (पृथ्वी) और स्वर्लोक (स्वर्ग) के ठीक मध्य में स्थित है। शास्त्रों में भुवर्लोक को 'अन्तरिक्ष' के नाम से भी जाना जाता है, जो भौतिक और दैवीय जगत के बीच एक पारगमन क्षेत्र के रूप में कार्य करता है। यह लेख पूर्णतः विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण, वायु पुराण, ब्रह्मांड पुराण और गरुड़ पुराण जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर भुवर्लोक के भौगोलिक, खगोलीय, भौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप का अत्यंत गहन और विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है।
ब्रह्मांड की संरचना में 'त्रैलोक्य' (तीन लोकों के समूह) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, ब्रह्मांड के प्रथम तीन लोक—भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—'कृतक त्रैलोक्य' कहलाते हैं। 'कृतक' का अर्थ है वह जो उत्पन्न हुआ है और जो विनाशी है। इसका तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा जी के एक दिन (कल्प) के अंत में होने वाले नैमित्तिक प्रलय के समय ये तीनों लोक पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं, जबकि महर्लोक आदि उच्च लोक (अकृतक लोक) इस विनाश से आंशिक रूप से ही प्रभावित होते हैं या सुरक्षित रहते हैं। अतः, भुवर्लोक भौतिक सृष्टि के उस हिस्से में आता है जो निरंतर निर्माण और विनाश के चक्र (प्रकृति के विकारों) के अधीन रहता है। मार्कण्डेय पुराण और वेदांत के उपनिषदों में 'ॐ' (प्रणव) के तीन अक्षरों (अ, उ, म) की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि 'अ' कार भूलोक (स्थूल जगत) का, 'उ' कार भुवर्लोक (अन्तरिक्ष या प्राण जगत) का, और 'म' कार स्वर्लोक (स्वर्ग या दिव्य जगत) का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भुवर्लोक भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से एक मध्यवर्ती और अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था है, जहाँ स्थूलता समाप्त होती है और दिव्यता का आरंभ होता है।
इस लोक के भौगोलिक और खगोलीय विस्तार को समझने के लिए विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के प्रमाण सर्वाधिक सटीक हैं। विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सातवें अध्याय में महर्षि पराशर मैत्रेय जी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए ब्रह्मांड के विस्तार का अत्यंत सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करते हैं। महर्षि पराशर स्पष्ट करते हैं कि जहाँ तक सूर्य और चंद्रमा की किरणों का प्रकाश जाता है, समुद्र, नदी और पर्वतों से युक्त वह पूरा प्रदेश 'भूलोक' कहलाता है। इसके तुरंत बाद भुवर्लोक के विस्तार का वर्णन करते हुए वे कहते हैं:
इस श्लोक का अर्थ यह है कि भुवर्लोक का क्षैतिज विस्तार बिल्कुल भूलोक के ही समान है, परंतु इसका ऊर्ध्वाधर विस्तार पृथ्वी के वायुमंडल के ठीक ऊपर से प्रारंभ होकर सूर्यमंडल के ठीक नीचे तक होता है। महर्षि पराशर आगे बताते हैं कि पृथ्वी से सूर्यमंडल की दूरी एक लाख योजन (लगभग आठ लाख मील) है। इसी एक लाख योजन के मध्यवर्ती शून्य आकाश (अंतरिक्ष) में भुवर्लोक का विस्तार है। यह कोई ठोस ग्रह या भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि एक अत्यंत विस्तृत त्रि-आयामी आकाश है, जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और स्वर्ग के पूर्ण प्रकाश के बीच सेतु का कार्य करता है।
श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को इस ऊर्ध्व विस्तार का और अधिक सूक्ष्म तथा परत-दर-परत विभाजन बताते हैं। वे वर्णन करते हैं कि सूर्यमंडल से दस हजार योजन (अस्सी हजार मील) नीचे राहु का ग्रह स्थित है। शास्त्रों के अनुसार, राहु सिंहिका का पुत्र और एक असुर है, जिसे भगवान की कृपा से ग्रहों के समान स्थिति प्राप्त हुई है। इस राहु ग्रह के ठीक नीचे से भुवर्लोक की सर्वोच्च सीमा प्रारंभ होती है। श्रीमद्भागवत पुराण (5.24.4) का मूल श्लोक इस प्रकार है:
इसका अर्थ है कि राहु ग्रह से दस हजार योजन (अस्सी हजार मील) नीचे सिद्धलोक, चारणलोक और विद्याधरलोक स्थित हैं, जो भुवर्लोक के सबसे ऊपरी, सर्वाधिक पवित्र और अलौकिक क्षेत्र हैं। यह विवरण सिद्ध करता है कि भुवर्लोक कोई एक समान रिक्त स्थान नहीं है, बल्कि इसके भीतर भी चेतना और सत्ताओं के निवास के आधार पर विभिन्न स्तर और उप-लोक विद्यमान हैं। इस प्रकार, भुवर्लोक पृथ्वी के वायुमंडल के तुरंत बाद से प्रारंभ होकर राहु ग्रह के नीचे तक फैला हुआ एक विशाल ब्रह्मांडीय क्षेत्र है।
चूंकि भुवर्लोक मुख्य रूप से 'अंतरिक्ष' है, इसलिए इसकी भौतिक संरचना भूलोक (पृथ्वी) के समान मिट्टी, जल, अग्नि या चट्टानों से नहीं बनी है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध (5.24.5) के अगले ही श्लोक में इस लोक के वातावरण का सटीक भौतिक और तत्वमीमांसीय चित्रण किया गया है। श्लोक इस प्रकार है:
शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि विद्याधर और सिद्ध लोकों के नीचे का जो आकाश है, उसे 'अंतरिक्ष' कहा जाता है। इस अंतरिक्ष की भौतिक सीमा वहीं तक मानी गई है, जहाँ तक वायु (हवा) बहती है (यावद्वायु: प्रवाति) और जहाँ तक आकाश में बादल (मेघ) तैरते हुए देखे जा सकते हैं (यावन्मेघा उपलभ्यन्ते)। इसके ठीक ऊपर वायु का प्रवाह समाप्त हो जाता है। यह श्लोक आधुनिक विज्ञान के उस तथ्य की भी वैदिक पुष्टि करता है कि पृथ्वी के वायुमंडल की एक निश्चित सीमा है, जिसके पार निर्वात या वायुहीन अंतरिक्ष है। पुराणों के अनुसार, यह वायु और मेघों से युक्त पूरा क्षेत्र ही भुवर्लोक का निचला और मध्य भाग है।
इससे यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि भुवर्लोक का स्वरूप मुख्य रूप से 'वायु-तत्व' और 'आकाश-तत्व' से निर्मित है। यहाँ पृथ्वी-तत्व (ठोसपन) और जल-तत्व (स्थूल तरल रूप) का लगभग अभाव होता है, यद्यपि जल वाष्प (मेघ) के रूप में यहाँ सदैव विद्यमान रहता है। यह लोक न तो पूर्णतः अंधकारमय है और न ही पूर्णतः प्रकाशमान। चूँकि यह सूर्य के ठीक नीचे और पृथ्वी के ऊपर स्थित है, इसलिए सूर्य की रश्मियाँ इस लोक से होकर ही पृथ्वी तक पहुंचती हैं। तथापि, इसके निचले स्तरों में, जहाँ सघन बादल और वायु के भयंकर भंवर होते हैं, वहाँ एक प्रकार का धुंधलापन या छायामयी स्थिति बनी रहती है। यही कारण है कि पुराणों में इसके निचले हिस्सों को तमोगुणी सत्ताओं और प्रेतादि के रहने योग्य माना गया है। यहाँ की ऊर्जा स्थूल भौतिक न होकर अत्यंत सूक्ष्म होती है। वायु-प्रधान क्षेत्र होने के कारण यहाँ गति सर्वाधिक है। यह लोक उन सूक्ष्म ध्वनियों, शक्तियों और ऊर्जा-तरंगों का संवाहक है जो पृथ्वी पर यज्ञों के दौरान उत्पन्न होती हैं। जब भूलोक में अग्निहोत्र किया जाता है, तो उस आहुति का सूक्ष्म तत्व इसी भुवर्लोक से होकर देवताओं तक स्वर्लोक में पहुँचता है। अतः भुवर्लोक का वातावरण एक ओर तो मेघों और तूफानों से युक्त है, वहीं दूसरी ओर यह मन्त्रों और यज्ञीय हव्य का वहन करने वाला एक अत्यंत पवित्र ब्रह्मांडीय मार्ग भी है।
भुवर्लोक किसी एक प्रकार के जीवों का निवास स्थान नहीं है, बल्कि यहाँ चेतना और कर्म के विभिन्न स्तरों वाली कई सूक्ष्म और अर्ध-दैवीय सत्ताएं निवास करती हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से इस लोक को निवासियों के आधार पर मुख्य रूप से दो स्पष्ट भागों में विभाजित किया जा सकता है: ऊपरी भुवर्लोक (सिद्ध, चारण और विद्याधर लोक) और निचला भुवर्लोक (यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाचों का क्षेत्र)। भुवर्लोक के सर्वोच्च शिखर पर, जो राहु के ठीक नीचे है, सिद्धों, चारणों और विद्याधरों का निवास है। सिद्धगण वे महान आत्माएं हैं जो जन्म से ही अष्ट-सिद्धियों (अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता) से युक्त होते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण (3.20.44 और 4.22.48) के अनुसार, सिद्धलोक के निवासियों को एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाने के लिए किसी भी यांत्रिक विमान (हवाई जहाज आदि) की आवश्यकता नहीं होती; वे अपनी स्वाभाविक योग-शक्ति और अंतर्धान विद्या के बल पर ही अंतरिक्ष में निर्बाध रूप से विचरण कर सकते हैं। विद्याधर ज्ञान और कला के अधिष्ठाता होते हैं, जो अत्यंत सुंदर और रहस्यमयी विद्याओं के धारक हैं। चारण वे अर्ध-दैवीय गायक और स्तुति-पाठक हैं जो अंतरिक्ष में विचरण करते हुए देवताओं और भगवान के अवतारों की कीर्ति का गान करते हैं। ये तीनों समूह सात्त्विक और रजो-गुणी स्वभाव के होते हैं और इनका जीवन काल मनुष्यों की तुलना में अत्यंत दीर्घ (हजारों वर्ष) होता है। ये सत्ताएं पृथ्वी का स्पर्श नहीं करतीं, बल्कि अंतरिक्ष में ही अपना जीवन व्यतीत करती हैं।
इसके विपरीत, भुवर्लोक का वह निचला हिस्सा जहाँ सघन वायु बहती है और बादल तैरते हैं, वह 'विहाराजिरम्' अर्थात् यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रेतों के क्रीड़ा-स्थल या विचरण का क्षेत्र है। श्रीमद्भागवत (5.24.5) स्पष्ट रूप से बताता है कि ये तामसिक और सूक्ष्म सत्ताएं इसी अंतरिक्ष (निचले भुवर्लोक) में निवास करती हैं। यक्ष मुख्य रूप से धन और प्रकृति के रक्षक होते हैं, जो कुबेर के अनुचर माने जाते हैं। यद्यपि ये राक्षसों की तरह पूर्णतः क्रूर नहीं होते, परंतु इनमें भौतिक आसक्ति प्रबल होती है। इस क्षेत्र में रहने वाले राक्षस पाताल (रसातल आदि) निवासी असुरों (दैत्यों और दानवों) से सर्वथा भिन्न होते हैं; ये वायुमंडलीय राक्षस हैं जो रात के समय अंधकार में अधिक बलवान हो जाते हैं और अंतरिक्ष में विचरण करते हैं। भूत, प्रेत और पिशाच वे सूक्ष्म आत्माएं हैं जो अपने भारी कर्म-बंधनों, अकाल मृत्यु या अत्यधिक भौतिक आसक्ति के कारण स्थूल शरीर खोने के बाद भी पृथ्वी के मोह से मुक्त नहीं हो पातीं। चूँकि उनके पास स्थूल देह नहीं होती, अतः वे भूलोक पर सीधे निवास नहीं कर सकते, इसलिए वे इसी निचले भुवर्लोक (अंतरिक्ष) में वायु-शरीर (सूक्ष्म शरीर) धारण करके भटकते रहते हैं। ये आत्माएं भूख-प्यास और वासनाओं से पीड़ित रहती हैं, क्योंकि सूक्ष्म शरीर में वासना तो होती है, परंतु उसे भोगने के लिए स्थूल इंद्रियां नहीं होतीं। इसी कारण से सनातन धर्म के गरुड़ पुराण आदि स्मृति ग्रंथों में मृत्यु के उपरांत 'श्राद्ध' और 'पिंडदान' की अनिवार्य व्यवस्था की गई है, ताकि वायुमंडल (भुवर्लोक) में भटकी हुई इन प्रेत-आत्माओं को सूक्ष्म ऊर्जा प्राप्त हो सके और वे इस कष्टदायी लोक को पार करके पितृलोक या अपने अगले गंतव्य तक जा सकें। यह लोक उन सत्ताओं का निवास कहा गया है जिनका कोई स्थायी घर नहीं है, जो केवल एक पारगमन अवस्था में हैं।
जिस प्रकार भूलोक के प्रमुख अधिष्ठाता देव अग्नि हैं और स्वर्लोक के अधिपति देवराज इंद्र व सूर्य हैं, उसी प्रकार भुवर्लोक (अंतरिक्ष) के अधिपति और प्रशासक 'वायु देव' (पवन देव) हैं। वायु देव को वेदों और उपनिषदों में 'प्राण' (विश्व की जीवन-शक्ति या मुख्याप्राण) के रूप में पूजा गया है। चूंकि भुवर्लोक मुख्य रूप से वायु-तत्व का क्षेत्र है, इसलिए इस पूरे लोक का संतुलन, संचालन और यहाँ की सूक्ष्म सत्ताओं का नियंत्रण साक्षात वायु देव के ही अधीन होता है। श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध (11.24.11-12) में भगवान श्रीकृष्ण उद्धव को ज्ञान देते हुए बताते हैं कि जब ब्रह्मा जी ने अपने तपोबल और रजोगुण से भूः, भुवः और स्वः—इन तीन लोकों की रचना की, तो उन्होंने इनके लिए अधिष्ठाता देवताओं की भी नियुक्ति की। स्वर्ग देवताओं के निवास के लिए, पृथ्वी मनुष्यों और मरणशील जीवों के लिए, और भुवर्लोक भूत-प्रेतों तथा सूक्ष्म सत्ताओं के निवास के लिए निर्धारित किया गया। इन सूक्ष्म सत्ताओं का शरीर चूंकि अन्नमय न होकर प्राण-मय और मनो-मय होता है, इसलिए उनका सीधा संबंध वायु देव से होता है। वायु देव भुवर्लोक में केवल तूफानों या हवा के झोंकों का संचालन ही नहीं करते, बल्कि वे ब्रह्मांडीय संवाहक भी हैं। भूलोक में यज्ञ कुंड से उठने वाले धुएं और हविष्य को वायु ही स्वर्लोक के देवताओं तक पहुंचाती है। इसके अतिरिक्त, भुवर्लोक में बादलों का निर्माण, उनका संचलन और पृथ्वी पर वर्षा कराने वाले बादलों को दिशा प्रदान करने का कार्य भी वायु देव और उनके सहायक उनंचास मरुत-गणों के द्वारा इसी लोक से संपादित होता है। वायु पुराण और वेदांत दर्शन में भुवर्लोक को प्रज्ञा और प्राण का समन्वय माना गया है, और इसी कारण अष्टांग योग या हठ योग के साधक जब अपने प्राण (वायु) को वश में करते हैं, तो वे भौतिक देह की सीमाओं को लांघकर मानसिक रूप से भुवर्लोक की सिद्धियों तक पहुँचने में सक्षम हो जाते हैं।
भगवान के विराट स्वरूप (विश्वरूप) की अवधारणा में भुवर्लोक की स्थिति अत्यंत रहस्यमयी और तात्विक है। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध (2.1.26 और 2.5.38) के अनुसार, जब भगवान के ब्रह्मांडीय स्वरूप की कल्पना की जाती है, तो पाताल से लेकर भूलोक तक का हिस्सा उनके चरणों और कटि (कमर) भाग में स्थित माना जाता है। शुकदेव गोस्वामी स्पष्ट करते हैं कि मध्यवर्ती लोक, जिनका आरंभ भुवर्लोक से होता है, भगवान के नाभि-कमल में स्थित हैं, और स्वर्लोक आदि उच्च लोक उनके वक्षस्थल और सिर में स्थित हैं। देवी भागवत पुराण में भी इस लोक को देवी के ब्रह्मांडीय स्वरूप की नाभि के रूप में ही वर्णित किया गया है। यह नाभि-स्थिति कोई साधारण भौगोलिक संकेत नहीं है, बल्कि यह एक गहरा तात्विक रहस्य है। जिस प्रकार मानव शरीर में नाभि प्राण ऊर्जा का उद्गम और माता के गर्भ से पोषण प्राप्त करने का केंद्र है, उसी प्रकार भुवर्लोक ब्रह्मांड की मध्यवर्ती प्राण-ऊर्जा का केंद्र है। उपनिषदों की एक अन्य वेदांतिक व्याख्या के अनुसार, जब परब्रह्म को 'ॐ' रूपी पक्षी के रूप में ध्यान किया जाता है, तो भुवर्लोक को उस पक्षी के घुटनों में स्थित माना गया है। यह भी मध्यवर्ती और पारगमन अवस्था का ही प्रतीक है।
शास्त्रों के अनुसार कोई भी जीव अपने कर्मों के आधार पर विभिन्न लोकों की यात्रा करता है। मृत्यु के पश्चात जीवात्मा तुरंत ही मोक्ष या सर्वोच्च लोक को प्राप्त नहीं करती, बल्कि उसे अपने कर्म-संस्कारों के अनुरूप ऊर्ध्व या अधो लोकों से गुजरना पड़ता है। भुवर्लोक मृत्यु के तुरंत बाद की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पारगमन अवस्था है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जब जीव स्थूल शरीर (भौतिक देह) का त्याग करता है, तो वह 'लिंग शरीर' (सूक्ष्म देह) में आ जाता है। यदि जीव ने जीवन भर अत्यधिक पाप कर्म किए हैं, भौतिक वस्तुओं के प्रति तीव्र लालसा रखी है, या उसकी अकाल मृत्यु हुई है (जैसे आत्महत्या, दुर्घटना), तो वह जीवात्मा सीधे स्वर्ग या नरक में नहीं जाती। ऐसी आत्मा 'प्रेत' योनि को प्राप्त होकर निचले भुवर्लोक के घने वायुमंडल में ही फंस जाती है। यहाँ उन्हें तीव्र वायु के झोंकों के बीच बिना किसी आश्रय के रहना पड़ता है। दूसरी ओर, जो लोग सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं, जिन्होंने जीवन में दान, पुण्य और यज्ञानुष्ठान किए हैं, वे मृत्यु के पश्चात अपने सूक्ष्म शरीर से इसी भुवर्लोक से होते हुए बड़ी सरलता से स्वर्लोक या पितृलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। ऐसे पुण्यात्माओं के लिए भुवर्लोक कोई कष्टकारी स्थान नहीं है, बल्कि यह एक पारदर्शी मार्ग के समान है। इसके अतिरिक्त, जो साधक योग-मार्ग पर हैं परंतु जिन्हें पूर्ण वैराग्य और आत्म-ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, वे अपनी योग-सिद्धियों के फलस्वरूप मृत्यु के बाद भुवर्लोक के सर्वोच्च स्तर, अर्थात् 'सिद्धलोक' में जन्म लेते हैं। भगवद्गीता (8.16) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—"आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन" अर्थात् ब्रह्मलोक से लेकर भूलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती हैं (जहाँ से वापस लौटना पड़ता है)। इसलिए, भुवर्लोक या सिद्धलोक में चाहे कितने भी दीर्घ काल का निवास हो, वहाँ संचित पुण्यों या सिद्धियों के क्षीण होने पर जीव को पुनः भूलोक (पृथ्वी) पर जन्म लेना ही पड़ता है। गीता के चौदहवें अध्याय के अनुसार, सत्व, रज और तम गुण आत्मा को बांधते हैं; भुवर्लोक के निवासी पूर्णतः सत्वगुणी नहीं होते, बल्कि उनमें रजोगुण (गति, सिद्धि की इच्छा) और तमोगुण (प्रेतादि में मोह) की प्रधानता होती है।
विभिन्न प्रामाणिक पुराणों में भुवर्लोक के निवासियों और इस लोक के महत्व को दर्शाने वाले कई वृत्तांत आते हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि यह लोक भूलोक की घटनाओं से कितना निकटता से जुड़ा हुआ है। श्रीमद्भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध में महाभारत युद्ध के पश्चात् शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह के प्राण त्यागने का अत्यंत दिव्य प्रसंग आता है। जब भीष्म पितामह ने उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा के बाद अपने प्राण भगवान श्रीकृष्ण में लीन किए, तो उस समय उनकी महिमा का दर्शन करने के लिए न केवल देवतागण स्वर्लोक से आए, बल्कि भुवर्लोक से सिद्ध, चारण और विद्याधर भी वहाँ एकत्रित हुए। जब भीष्म ने देह त्याग किया, तब इन भुवर्लोक के निवासियों ने अंतरिक्ष से पुष्पों की भारी वर्षा की। यह प्रसंग यह प्रमाणित करता है कि भुवर्लोक के निवासी (सिद्ध, विद्याधर आदि) भूलोक (पृथ्वी) पर घटित होने वाली महान घटनाओं पर निरंतर दृष्टि रखते हैं और अंतरिक्ष से बिना किसी यांत्रिक उपकरण के पृथ्वी तक आ-जा सकते हैं। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध में महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञों का प्रसंग है। जब महाराज पृथु यज्ञ कर रहे थे, तब भगवान विष्णु वहाँ साक्षात प्रकट हुए। भगवान के साथ केवल बैकुंठ के पार्षद ही नहीं, बल्कि भुवर्लोक के निवासी—सिद्धलोक और विद्याधरलोक के वासी—भी वहाँ उपस्थित हुए। साथ ही यक्ष और राक्षस भी वहां आए। यह संवाद दर्शाता है कि देवों के अतिरिक्त भुवर्लोक की ये मध्यवर्ती सत्ताएं भी भगवान के महान आयोजनों में सम्मिलित होने का पूर्ण अधिकार रखती हैं।
मार्कण्डेय पुराण में मदालसा और उनके पुत्र अलर्क का एक अत्यंत दार्शनिक और प्रसिद्ध संवाद है। रानी मदालसा अपने नवजात पुत्रों को पालने में झुलाते हुए ब्रह्मज्ञान का उपदेश (लोरी) देती हैं। हालांकि यह प्रसंग सीधे तौर पर भुवर्लोक के भूगोल का वर्णन नहीं करता, परंतु मदालसा अपने उपदेशों में जीव के जन्म-मरण, कर्म-बंधन और त्रैलोक्य (भूः, भुवः, स्वः) की नश्वरता का विस्तृत वर्णन करती हैं। वे स्पष्ट करती हैं कि ये सभी लोक, चाहे वह भुवर्लोक हो या स्वर्ग, आत्मा के लिए अस्थायी पड़ाव मात्र हैं और अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' ही होना चाहिए। इसी पुराण में रुचि ऋषि द्वारा पितरों की स्तुति का प्रसंग आता है, जहाँ रुचि मुनि सात लोकों और उनमें विचरण करने वाले देवताओं, सिद्धों और मरुत गणों की वंदना करते हैं, जो भुवर्लोक और स्वर्लोक के मध्य निवास करते हैं।
भारतीय काल-गणना और ब्रह्मांड विज्ञान में 'प्रलय' (सृष्टि का विनाश) एक निरंतर चलने वाली चक्रीय प्रक्रिया है। प्रलय मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं: नैमित्तिक (ब्रह्मा के दिन का अंत), प्राकृत (ब्रह्मा की आयु का अंत) और आत्यंतिक (मोक्ष या मोक्षदायिनी प्रलय)। विष्णु पुराण के छठे अंश के तीसरे अध्याय में नैमित्तिक प्रलय का अत्यंत विस्तृत और रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन किया गया है। जब ब्रह्मा जी का एक दिन (एक कल्प, जिसमें चौदह मन्वंतर होते हैं) समाप्त होता है, तब यह प्रलय आती है। इस समय पृथ्वी पर सौ वर्षों तक भयानक सूखा पड़ता है और वर्षा बिल्कुल बंद हो जाती है। तत्पश्चात, भगवान विष्णु 'रुद्र' (संहारकर्ता) का रूप धारण करते हैं। प्रलयकाल में सूर्य की सात रश्मियाँ सात अलग-अलग प्रलयंकारी सूर्यों का रूप धारण कर लेती हैं। इन सात सूर्यों की प्रचंड ऊष्मा और ताप के कारण सबसे पहले भूलोक (पृथ्वी) जलकर भस्म हो जाता है। भूलोक के नष्ट होने के बाद, यह भयानक ताप और रुद्र के मुख से निकलने वाली संकर्षण अग्नि ऊपर की ओर उठती है और 'भुवर्लोक' को भी पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लेती है। भुवर्लोक का पूरा वायुमंडल, इसके सभी सघन बादल, और इसमें निवास करने वाले यक्ष, गंधर्व, पिशाच आदि (जो पहले ही कर्मानुसार अन्यत्र स्थानांतरित हो जाते हैं) का निवास स्थान राख में बदल जाता है। अग्नि भुवर्लोक को भस्म करती हुई स्वर्लोक तक पहुँचती है और उसे भी जला डालती है। इस प्रकार, भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—ये तीनों लोक ('कृतक त्रैलोक्य') पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। इस त्रैलोक्य के ऊपर स्थित महर्लोक इस अग्नि से जलता नहीं है, परंतु वहां पहुंचने वाले भयंकर ताप के कारण महर्लोक के निवासी (भृगु आदि ऋषि) उस स्थान को छोड़कर जनलोक में चले जाते हैं। तदनंतर, सौ वर्षों तक प्रलयंकारी बादल (सांवर्तक मेघ) भयंकर वर्षा करते हैं, जिससे यह पूरा त्रैलोक्य (भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक) एक विशाल जलार्णव (कारण-समुद्र) में डूब जाता है। इसी जल में भगवान नारायण शेषनाग पर शयन करते हैं, जब तक कि ब्रह्मा जी का अगला दिन (अगला कल्प) प्रारंभ नहीं होता और इन तीनों लोकों की पुनः रचना नहीं होती। यह विवरण स्पष्ट करता है कि भुवर्लोक की प्रकृति नश्वर है और यह ब्रह्मांड के उस हिस्से में है जो नियमित विनाश और सृजन के अधीन है।
यद्यपि सभी प्रामाणिक पुराण भुवर्लोक की मूल अवधारणा पर एकमत हैं, फिर भी प्रत्येक पुराण अपने मुख्य विषय और दर्शन के अनुसार इस लोक का वर्णन अलग-अलग दृष्टिकोणों से करता है। विष्णु पुराण ब्रह्मांड की खगोलीय और गणितीय संरचना पर अधिक बल देता है। इसमें भुवर्लोक को मुख्य रूप से सूर्य और पृथ्वी के बीच के योजन-विस्तार के रूप में परिभाषित किया गया है। पराशर मुनि का यह कथन कि भुवर्लोक का क्षैतिज विस्तार पृथ्वी के ठीक बराबर है, ब्रह्मांड की एक बेलनाकार या स्तंभ रूपी संरचना की ओर संकेत करता है, जहाँ प्रत्येक लोक एक के ऊपर एक समान घेरे में स्थित है। श्रीमद्भागवत पुराण सबसे अधिक विस्तृत भौगोलिक और निवासियों का विवरण प्रस्तुत करता है। भागवत (5.24) इस बात का सूक्ष्म वर्णन करता है कि भुवर्लोक में 'अंतरिक्ष' कहाँ तक है (जहां तक हवा और बादल हैं) और इसके ऊपरी हिस्से (राहु के नीचे) में सिद्ध और विद्याधर कहाँ रहते हैं। यह पुराण इस लोक को भगवान के विश्वरूप के एक अंग (नाभि) के रूप में देखकर भक्ति और वैराग्य के दृष्टिकोण से इसका मूल्यांकन करता है। वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण में ब्रह्मांड की प्राण-विद्या पर विशेष ध्यान दिया गया है। वायु पुराण में भुवर्लोक को प्राण-मनस लोक अर्थात् 'सूक्ष्म जीवन-ऊर्जा का लोक' कहा गया है। चूंकि वायु इसका अधिपति है, यह पुराण इस लोक को भौतिक शरीर और विशुद्ध आध्यात्मिक बुद्धि के बीच की कड़ी मानता है। इसके अतिरिक्त, वायु पुराण में स्वायंभुव मन्वंतर में प्रियव्रत के पुत्रों द्वारा इस लोक के निकटवर्ती क्षेत्रों की व्यवस्था का भी प्रतीकात्मक वर्णन मिलता है। मार्कण्डेय पुराण वैदिक दर्शन और 'ॐ' (प्रणव) के साथ लोकों का समन्वय करता है। इसमें 'अ', 'उ', 'म' के द्वारा भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक की एकता को दर्शाया गया है। मार्कण्डेय पुराण यह स्थापित करता है कि भुवर्लोक कोई अलग-थलग इकाई नहीं है, बल्कि उसी एक परब्रह्म (प्रणव) का मध्यवर्ती कंपन या ध्वनि-तरंग है।
समस्त प्रामाणिक वैदिक और पौराणिक साक्ष्यों के गहन विश्लेषण से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि 'भुवर्लोक' ब्रह्मांड की एक अत्यंत रहस्यमयी, गतिशील और अपरिहार्य कड़ी है। यह केवल पृथ्वी और सूर्य के बीच का खाली आकाश मात्र नहीं है, बल्कि यह वह सक्रिय वायुमंडलीय और सूक्ष्म क्षेत्र है, जहाँ प्रचुर मात्रा में 'प्राण' और 'वायु' तत्व विद्यमान हैं। यह लोक सिद्धों, विद्याधरों और चारणों के लिए जहाँ एक ओर उनके तपोबल से प्राप्त अलौकिक शक्तियों का क्रीड़ांगन है, वहीं दूसरी ओर यह अपने कर्म-बंधनों में उलझे प्रेतों, पिशाचों और राक्षसों के लिए एक सूक्ष्म आश्रय-स्थल भी है। इस लोक की सत्ता यह स्थापित करती है कि भौतिक शरीर (भूलोक) के छूटने के बाद भी चेतना समाप्त नहीं होती, बल्कि वह सूक्ष्म शरीर धारण करके इसी अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) के वायुमंडल में अपने कर्मों के अनुसार गति करती है। प्रलय काल में इसके भस्म होने की प्रक्रिया यह स्थापित करती है कि भौतिक और अर्ध-भौतिक सिद्धियां भी शाश्वत नहीं हैं। भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न यह भुवर्लोक, अपने अधिपति वायु देव के नियंत्रण में, संपूर्ण ब्रह्मांड की यज्ञीय ऊर्जाओं, मेघों और प्राण-वायु का संवहन करता हुआ, सनातन धर्म के ब्रह्मांड विज्ञान की पूर्णता और उसकी वैज्ञानिक व दार्शनिक गहराई का एक अद्वितीय और प्रामाणिक प्रमाण प्रस्तुत करता है। शास्त्रों का यह ज्ञान केवल खगोलीय जिज्ञासा को शांत नहीं करता, अपितु जीव को उसके कर्मों की गति और ब्रह्मांडीय पदानुक्रम में उसकी वास्तविक स्थिति का यथार्थ बोध कराता है।



