सनातन हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान और प्रामाणिक पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, यह सम्पूर्ण दृश्यमान और अदृश्य ब्रह्माण्ड (सृष्टि) चौदह लोकों में विभक्त है। इन चौदह लोकों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है: सात ऊर्ध्व लोक (ऊपर के लोक) और सात अधोलोक (नीचे के लोक)। इन चौदह लोकों के मध्य में भूर्लोक (पृथ्वी) स्थित है। पृथ्वी के नीचे अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल नामक सात अधोलोक हैं, जहाँ आसुरी शक्तियों, नागों और भौतिक ऐश्वर्यों का साम्राज्य है। पृथ्वी के ऊपर अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) और स्वर्ग (स्वर्लोक) स्थित हैं। स्वर्गलोक से भी ऊपर ब्रह्माण्ड के उच्चतम शिखरों की ओर जाने पर जो प्रथम विशुद्ध आध्यात्मिक और तपोमयी भूमि प्राप्त होती है, वह 'महर्लोक' है। महर्लोक ब्रह्माण्ड के सात ऊर्ध्व लोकों की शृंखला में चतुर्थ स्थान पर अवस्थित है। यह भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक के ऊपर तथा जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) के ठीक नीचे स्थित है।
वैदिक व्याहृतियों (सात रहस्यमयी ध्वनियों) में महर्लोक का प्रतिनिधित्व 'महः' व्याहृति द्वारा किया जाता है। पौराणिक पारिभाषिक शब्दावली में नीचे के प्रथम तीन लोकों (भूः, भुवः, स्वः) को सामूहिक रूप से 'त्रैलोक्य' कहा जाता है। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि यह त्रैलोक्य पूर्णतः भौतिक, सकाम कर्मों के फलों से आबद्ध और विनाशशील है, जिसे 'कृतक' कहा जाता है। इसके विपरीत सबसे ऊपर के तीन लोकों (जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक) को पूर्णतः अविनाशी और नित्य माना गया है, जिन्हें 'अकृतक' की संज्ञा दी गई है। महर्लोक इन दोनों सर्वथा भिन्न प्रकृतियों के मध्य स्थित एक महान संक्रमण क्षेत्र है। विष्णु पुराण के अत्यन्त सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त के अनुसार, महर्लोक का स्वरूप 'कृतकाकृतक' है। कृतकाकृतक का अर्थ है—जो आंशिक रूप से विनाशशील हो और आंशिक रूप से अविनाशी हो। इस गूढ़ सिद्धान्त का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर होने वाले नैमित्तिक प्रलय के समय यद्यपि यह लोक अग्नि से पूरी तरह नष्ट या भस्म नहीं होता (अकृतक गुण), परन्तु अत्यधिक संताप के कारण यहाँ रहने वाले ऋषियों और मुनियों को यह लोक खाली करना पड़ता है, जिससे यह पूर्णतः निर्जन हो जाता है (कृतक गुण)। इस प्रकार महर्लोक ब्रह्माण्ड का वह सीमांत क्षेत्र है जहाँ भौतिकता का पूर्णतः अंत हो जाता है और विशुद्ध आध्यात्मिक तपस्या तथा योग का निर्बाध साम्राज्य आरम्भ होता है。
श्रीमद्भागवत पुराण, गरुड़ पुराण और अन्य योग-प्रधान शास्त्रों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक ही परम विराट् पुरुष के विशाल शरीर के रूप में कल्पित किया गया है। इसे 'पिण्ड-ब्रह्माण्ड' का सिद्धान्त कहा जाता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि जो कुछ भी इस असीम ब्रह्माण्ड में है, वही सब अत्यंत सूक्ष्म रूप में मानव शरीर के भीतर भी विद्यमान है। देवता, लोक, नदियाँ और नक्षत्र सभी मानव शरीर के विभिन्न अंगों में सूक्ष्म रूप से अवस्थित हैं। इसी ब्रह्माण्डीय शरीर रचना विज्ञान के अन्तर्गत लोकों का शारीरिक अंगों के साथ तादात्म्य स्थापित किया गया है।
श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध के प्रथम अध्याय (2.1.28) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को भगवान के विराट् रूप का ध्यान करने की विधि बताते हुए विभिन्न लोकों की शारीरिक स्थिति का अत्यंत विशद वर्णन करते हैं। इस शास्त्रीय और ध्यान-परक वर्णन के अनुसार, महर्लोक भगवान विराट् पुरुष की 'ग्रीवा' (गर्दन) का साक्षात् प्रतिनिधित्व करता है। श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों में वर्णित विराट् रूप की यह शरीर-रचना इस प्रकार है:
| विराट् पुरुष का अंग | मानव शारीरिक भाग | ब्रह्माण्डीय लोक का नाम |
|---|---|---|
| उरःस्थल | वक्षस्थल या छाती | स्वर्लोक / ज्योतिर्लोक |
| ग्रीवा | गर्दन या कण्ठ | महर्लोक |
| वदन | मुख | जनलोक |
| वराटी | मस्तक या ललाट | तपोलोक |
| शीर्ष | सिर | सत्यलोक / ब्रह्मलोक |
शास्त्रों का यह तादात्म्य अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी है। जिस प्रकार मानव शरीर में गर्दन (ग्रीवा) धड़ (निचले भौतिक अंगों) और सिर (उच्चतम वैचारिक और चेतनात्मक अंगों) को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण सेतु है, ठीक उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में महर्लोक विनाशशील त्रैलोक्य (स्वर्ग तक के सकाम कर्मों वाले लोक) और नित्य-अविनाशी लोकों (जनलोक से सत्यलोक तक के मोक्ष-गामी लोक) के बीच एक सशक्त आध्यात्मिक सेतु का कार्य करता है। गरुड़ पुराण के सूक्ष्म शरीर-विज्ञान के अनुसार भी, जब कोई साधक ध्यान और योग की प्रक्रिया में संलग्न होता है, तो महर्लोक का स्थान कण्ठ के क्षेत्र में माना गया है। योगशास्त्र में यह विशुद्ध चक्र का स्थान है, जो सत्य, पवित्रता और उच्चतर पारमार्थिक चेतना का मुख्य द्वार माना जाता है। इसी कारण महर्लोक में जाने वाले सिद्ध जीव अपनी चेतना को कण्ठ से ऊपर की ओर ले जाते हैं, जहाँ अज्ञान और भौतिक प्रलोभनों का पूर्णतः शमन हो जाता है।
विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण जैसे महापुराणों में सभी लोकों की दूरियों और उनके स्थानिक विस्तार का अत्यंत गणितीय, खगोलीय और सुनिश्चित विवरण प्राचीन वैदिक मापन इकाई में प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि विभिन्न युगों और टीकाकारों के अनुसार योजन की भौतिक लम्बाई में किंचित भिन्नता रही है (इसे सामान्यतः 8 से 15 मील के समकक्ष माना जाता है), परन्तु शास्त्रों में लोकों के मध्य का तुलनात्मक अनुपात और गुणात्मक दूरियां सर्वत्र पूर्णतः स्थिर और अकाट्य हैं। ब्रह्माण्ड की इस ऊर्ध्वाधर संरचना को समझने के लिए ध्रुवलोक को एक केंद्रीय मापदंड माना गया है।
श्रीमद्भागवत पुराण के पञ्चम स्कन्ध के तेईसवें अध्याय (5.23.9) और विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के विस्तृत ब्रह्माण्ड वर्णन के अनुसार, महर्लोक की स्थिति ध्रुवलोक के सापेक्ष मापी जाती है। ध्रुवलोक भगवान की इच्छा से स्थापित ब्रह्माण्ड का वह अचल और महान धुरी-बिन्दु है, जिसके चारों ओर शिशुमार चक्र और समस्त ग्रह-नक्षत्र वायु के द्वारा प्रेरित होकर निरंतर परिक्रमा करते हैं। श्रीमद्भागवत (5.23.3) में इस खगोलीय परिक्रमा का वर्णन करते हुए एक अत्यंत सुंदर संस्कृत श्लोक प्रस्तुत किया गया है:
अर्थात् जिस प्रकार खलिहान में एक केंद्रीय खंभे (मेढीस्तम्भ) से बंधे हुए पशु अपने-अपने मंडल में परिक्रमा करते हैं, उसी प्रकार सकाम कर्मों के परिणाम से कालचक्र से जुड़े हुए ये समस्त नक्षत्र और ग्रह भगवान की भौतिक प्रकृति द्वारा प्रेरित होकर कल्प के अंत तक ध्रुवलोक का आश्रय लेकर वायु के प्रभाव से अंतरिक्ष में परिक्रमा करते रहते हैं। महर्लोक इसी शिशुमार चक्र और ध्रुवलोक की सीमाओं से परे अत्यंत ऊँचाई पर स्थित है। पुराणों में वर्णित दूरियों का यह क्रम इस प्रकार है:
| प्रस्थान बिन्दु | गंतव्य बिन्दु | शास्त्रीय दूरी (योजन में) | दूरी का विस्तृत संदर्भ |
|---|---|---|---|
| ध्रुवलोक | महर्लोक | 1,00,00,000 योजन | एक करोड़ योजन ऊपर स्थित है |
| महर्लोक | जनलोक | 2,00,00,000 योजन | दो करोड़ योजन ऊपर स्थित है |
| जनलोक | तपोलोक | 8,00,00,000 योजन | आठ करोड़ योजन ऊपर स्थित है |
| तपोलोक | सत्यलोक | 12,00,00,000 योजन | बारह करोड़ योजन ऊपर स्थित है |
इन प्रामाणिक शास्त्रीय प्रमाणों से यह नितांत स्पष्ट होता है कि महर्लोक, ब्रह्माण्ड के अचल बिंदु ध्रुवलोक से भी एक करोड़ योजन (लगभग 8 से 15 करोड़ मील) ऊपर नितांत शून्य या महाकाश में स्थित है। महर्लोक से ऊपर जनलोक की दूरी महर्लोक और ध्रुवलोक की दूरी की ठीक दोगुनी (दो करोड़ योजन) है। यह अकल्पनीय और विशाल दूरी इस तथ्य की प्रबल पुष्टि करती है कि महर्लोक भौतिक आकाश और इन्द्रिय-ग्राह्य सीमाओं की उन ऊँचाइयों पर है जहाँ तक न तो भौतिक वायुमण्डल का कोई प्रभाव है, न गुरुत्वाकर्षण का और न ही साधारण ग्रहीय गति का। यह केवल उन महान सिद्धों, प्रजापतियों, मुनियों और उच्चतर योगियों का सुरक्षित निवास है, जो अपनी तपोबल से प्राप्त अणिमा-गरिमा आदि अष्ट-सिद्धियों के प्रभाव से ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में मन की गति से विचरण करने की क्षमता रखते हैं।
पुराणों में त्रैलोक्य (भूर्लोक, भुवर्लोक, और स्वर्लोक) को भौतिक इन्द्रिय-तृप्ति और सकाम कर्मों के फल-भोग का प्रमुख स्थान माना गया है। स्वर्गलोक (इन्द्रलोक) में अप्सराएँ, अमृत, नन्दन वन, कल्पवृक्ष और कामधेनु जैसी भौतिक सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य का आधिक्य है, परन्तु महर्लोक का स्वरूप और वातावरण इन सबसे नितांत भिन्न और श्रेष्ठ है। महर्लोक कोई भौतिक भोग-भूमि या इन्द्रिय-विषयों का लोक नहीं है, अपितु यह एक विशुद्ध आध्यात्मिक, चेतनात्मक और तपोमयी ऊर्जा का लोक है。
महर्लोक के वातावरण में लौकिक सूर्य, चन्द्रमा या तारों के प्रकाश की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ध्रुवलोक (जहाँ शिशुमार चक्र समाप्त होता है) के ऊपर भौतिक सूर्य की किरणों का उस रूप में प्रभाव नहीं होता। शास्त्रों और वैदिक संहिताओं के अनुसार, ऊर्ध्व लोकों में ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत वहां निवास करने वाले सिद्ध योगियों, प्रजापतियों और महर्षियों का अपना आन्तरिक तपोबल और साक्षात् दैवीय प्रकाश है। यह लोक पूर्ण रूप से विशुद्ध सत्त्व गुण से आच्छादित है, जहाँ रजोगुण (लोभ और गति) तथा तमोगुण (अज्ञान और निद्रा) का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं है। यहाँ भौतिक जगत के किसी भी विकार—जैसे रोग, शोक, वृद्धावस्था, थकावट, ईर्ष्या, क्रोध, और क्षुधा (भूख)—का पूर्णतः अभाव है। यहाँ के निवासी अन्न या जल पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि वे योग-अग्नि और परब्रह्म के ध्यान से ही पोषण प्राप्त करते हैं।
यहाँ का वातावरण तपस्या, प्रगाढ़ वैराग्य और यज्ञीय ऊर्जा से निरंतर स्पंदित रहता है। जो पुण्यात्मा अपने शुभ कर्मों के बल पर स्वर्ग में जाते हैं, उन्हें पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) पर लौट आना पड़ता है, परन्तु महर्लोक की स्थिति और वहाँ का स्थायित्व इससे कहीं अधिक दृढ़ है। महर्लोक के निवासियों की सामान्य आयु एक पूर्ण कल्प (ब्रह्मा का एक दिन, अर्थात् 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष) के बराबर होती है। ब्रह्मा के पूरे दिन तक वे बिना किसी भौतिक व्यवधान या शारीरिक कष्ट के भगवान की उपासना और समाधि में लीन रहते हैं। महर्लोक की भौतिक संरचना स्वर्णिम या किसी पार्थिव धातु या मिट्टी की न होकर विशुद्ध चिन्मय और मनोमय तत्त्वों से निर्मित मानी गई है, जो ध्यान और संकल्प शक्ति के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती है।
यद्यपि महर्लोक तपस्वियों, मुनियों और सिद्धों का लोक है और यहाँ स्वर्गलोक के इन्द्र के समान कोई भौतिक राजा या शासक नहीं होता, तथापि विभिन्न पुराणों और शास्त्रों में इस लोक के उपास्य, रक्षक और अधिपति देव के रूप में 'यज्ञेश्वर' का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। भगवान यज्ञेश्वर और कोई नहीं, अपितु स्वयं परब्रह्म भगवान विष्णु का ही एक अत्यंत पावन और यज्ञ-प्रतिपादक स्वरूप हैं। 'यज्ञो वै विष्णुः' इस प्रसिद्ध श्रुति के अनुसार भगवान विष्णु ही साक्षात् यज्ञ हैं और यज्ञ ही विष्णु है।
महर्लोक में निवास करने वाले अधिकांश महान ऋषि और प्रजापति वे हैं जिन्होंने अपने पूर्व जन्मों या कल्पों में पूर्ण निष्काम भाव से महान वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान किया था और जिन्होंने बिना किसी लौकिक (धन, राज्य) या पारलौकिक (स्वर्ग, अप्सरा) फल की इच्छा के अपना सर्वस्व भगवान के श्रीचरणों में अर्पित कर दिया था। नरसिंह पुराण और अन्य सात्विक ग्रंथों में यज्ञेश्वर की विस्तृत स्तुति करते हुए कहा गया है कि वे ही समस्त निष्काम कर्मों और योग के परम अधिष्ठाता हैं। महर्लोक के निवासी निरंतर यज्ञेश्वर भगवान की मानसिक और आध्यात्मिक आराधना में लीन रहते हैं।
महर्लोक के संदर्भ में 'यज्ञ' से तात्पर्य भौतिक अग्नि में घृत या समिधा की आहुति देने से नहीं है, अपितु यहाँ 'ज्ञान यज्ञ' और 'तपो यज्ञ' की प्रधानता है। इस ज्ञान यज्ञ में ऋषि गण अपने सूक्ष्म अहंकार, अज्ञान और चित्त-वृत्तियों की आहुति परम सत्य (ब्रह्म) की अग्नि में देते हैं। एक अत्यंत गूढ़ प्रसंग में श्रीमद्भागवत में जब भगवान अपने वराह अवतार में अवतरित होकर घोर गर्जना करते हैं, तो जनलोक, तपोलोक और महर्लोक के मुनिगण वेदों के गुह्य मंत्रों से भगवान यज्ञेश्वर की स्तुति करते हैं। यह प्रमाणित करता है कि भगवान के प्रति शुद्ध भक्ति और स्तुति ही इस लोक के निवासियों का मुख्य कर्म है。
महर्लोक कोई ऐसा सामान्य लोक नहीं है जो किसी साधारण पुण्यात्मा या यज्ञकर्ता के लिए सुलभ हो। यह ब्रह्माण्ड की उन विशिष्ट और महान आत्माओं का सुरक्षित निवास है जिन्होंने ब्रह्माण्डीय शासन और सृष्टि के संचालन में युगों-युगों तक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शास्त्रों और महापुराणों के अनुसार इस लोक में मुख्य रूप से महान ऋषि, सृष्टि-कर्त्ता प्रजापति, पितृगण, सिद्ध योगी और आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारी निवास करते हैं।
विष्णु पुराण, भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि महर्लोक में महर्षि भृगु जैसे महान प्रजापति निवास करते हैं। महर्षि भृगु उन प्रमुख प्रजापतियों में से एक हैं जो सृष्टि के आरम्भ में स्वयं ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए थे और जिन्हें ब्रह्माण्ड के विस्तार और धर्म-स्थापना का कार्य सौंपा गया था। भृगु वंश के अन्य प्रतापी और तेजस्वी ऋषि जैसे महर्षि च्यवन, और्व, जमदग्नि और दैत्यगुरु शुक्राचार्य का भी इस लोक से अत्यंत घनिष्ठ संबंध रहा है। इसके अतिरिक्त अजर-अमर माने जाने वाले मार्कण्डेय मुनि भी अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से इस लोक के सम्मानित निवासी माने गए हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध (11.17.31) में भगवान श्रीकृष्ण उद्धव जी को वर्णाश्रम धर्म का उपदेश देते हुए स्पष्ट करते हैं कि वे विद्यार्थी (ब्रह्मचारी) जो जीवन भर पूर्ण रूप से अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वेदों का अत्यंत गहन अध्ययन करते हैं और बिना किसी सांसारिक इच्छा के अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् सीधे महर्लोक को प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार भागवत पुराण (11.18.9) में यह भी वर्णित है कि वे वानप्रस्थी जो वन में जाकर अत्यंत कठोर तपस्या करते हैं, जो अपने शरीर को कष्ट सहने का अभ्यस्त बना लेते हैं, जो जीवन की केवल न्यूनतम आवश्यकताओं पर जीवित रहते हैं और जिनकी देह घोर तपस्या के कारण केवल अस्थि-पंजर मात्र रह जाती है, वे भी अपने प्राण त्यागने के पश्चात इसी तपोमयी महर्लोक को प्राप्त होते हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण और वायु पुराण के अत्यंत सूक्ष्म खगोलीय और मन्वन्तर विवरणों के अनुसार, यहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य के मन्वन्तरों के ऋषि, मनु और श्रेष्ठ पितृगण भी निवास करते हैं। एक मन्वन्तर (मनु का काल) में इन्द्र, सप्तर्षि और मनु ब्रह्माण्ड का प्रशासन संभालते हैं। जब एक मन्वन्तर समाप्त होता है, तो उस मन्वन्तर के शासक देव और ऋषि अपने अधिकार पदों से मुक्त होकर विश्राम और परब्रह्म के ध्यान हेतु महर्लोक में ही आ जाते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण महर्लोक के इन निवासियों की आध्यात्मिक विशेषताओं का अत्यंत स्पष्ट और स्तुत्य वर्णन करता है। इन महर्षियों का आध्यात्मिक तेज और प्रभाव साक्षात् सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के समान होता है (केवल ब्रह्मा के सृष्टि-आधिपत्य शक्ति को छोड़कर)। ये ऋषि पाँच महान आध्यात्मिक ऐश्वर्यों से परिपूर्ण होते हैं, जो ब्रह्माण्ड पुराण में इस प्रकार वर्णित हैं:
- विजय: काम, क्रोध, लोभ जैसी वृत्तियों, अज्ञान और काल (समय) के प्रभाव पर पूर्ण विजय।
- ऐश्वर्य: अणिमा, महिमा, गरिमा आदि अष्ट-सिद्धियों से युक्त असीम दैवीय क्षमताएँ।
- स्थिति: बिना किसी विक्षेप या विचलन के एक ही स्थिर अवस्था में सम्पूर्ण कल्प के अंत तक ध्यान-मग्न स्थित रहना।
- वैराग्य: सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों और स्वर्ग के प्रलोभनों से भी पूर्ण विरक्ति।
- दर्शन: परब्रह्म परमात्मा का प्रत्यक्ष, स्पष्ट और निर्बाध विज़न।
वैदिक सृष्टि विज्ञान और काल-गणना में महर्लोक की सबसे महत्वपूर्ण और रहस्यमयी विशेषता प्रलय काल में इसकी अवस्था है। महापुराणों में प्रलय को मुख्यतः चार भागों में विभक्त किया गया है: नित्य प्रलय (प्रतिदिन जीवों की मृत्यु), नैमित्तिक प्रलय (ब्रह्मा की रात्रि), प्राकृतिक प्रलय (ब्रह्मा की मृत्यु या महाप्रलय), और आत्यन्तिक प्रलय (मोक्ष की प्राप्ति)। महर्लोक का सबसे सीधा और प्रत्यक्ष सम्बन्ध नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय की भयंकर घटनाओं से है।
एक पूर्ण कल्प (अर्थात् 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष या एक सहस्र चतुर्युगी) के पश्चात् जब ब्रह्मा जी का एक दिन समाप्त होता है और उनकी विश्राम की रात्रि आरम्भ होती है, तब 'नैमित्तिक प्रलय' घटित होता है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, इस नैमित्तिक प्रलय में ब्रह्माण्ड के सभी चौदह लोक नष्ट नहीं होते, अपितु केवल नीचे के तीन लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक, और स्वर्लोक) ही पूरी तरह से भस्म और जलमग्न होते हैं। इस प्रलय की प्रक्रिया अत्यंत भयंकर और प्रदीर्घ होती है। सर्वप्रथम सौ वर्षों तक भयंकर अनावृष्टि (सूखा) होती है, जिससे पृथ्वी का समस्त रस और जल सूख जाता है। तत्पश्चात भगवान सूर्य की किरणें सात प्रचंड सूर्यों में विभक्त होकर अपने अत्यंत तीव्र ताप से त्रैलोक्य को जलाना आरम्भ कर देती हैं।
त्रैलोक्य को भस्म करने वाली यह अग्नि केवल सूर्य से ही नहीं, अपितु ब्रह्माण्ड के सबसे निचले तल (पाताल) के मूल में स्थित भगवान शेषनाग (सङ्कर्षण) के मुख से उत्पन्न होती है, जिसे 'सङ्कर्षण की अग्नि' या 'कालानल' कहा जाता है। जब सङ्कर्षण की यह प्रलयंकारी अग्नि भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को जलाकर भस्म कर देती है, तो उस अग्नि की प्रचंड लपटें, ज्वालाएं और असहनीय ताप ऊपर की ओर उठकर महर्लोक तक पहुँचने लगता है। विष्णु पुराण के छठे अंश (6.3.28-29) में सङ्कर्षण की अग्नि द्वारा महर्लोक के संतापित होने का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यद्यपि महर्लोक इस प्रलय की अग्नि से भस्म नहीं होता या इसके भौतिक अस्तित्व का नाश नहीं होता, परन्तु सङ्कर्षण की इस अग्नि के भयंकर ताप और धुएँ के कारण यह लोक निवासियों के रहने योग्य नहीं रह जाता। इस असहनीय स्थिति में महर्लोक में निवास करने वाले भृगु आदि महर्षि, पितृगण और प्रजापति इस लोक का परित्याग कर देते हैं और अपनी योग-शक्ति से इससे भी ऊपर स्थित 'जनलोक' या 'सत्यलोक' (ब्रह्मलोक) की ओर पलायन कर जाते हैं।
अग्नि द्वारा त्रैलोक्य के भस्म होने के पश्चात्, अगले सौ वर्षों तक प्रलयंकारी संवर्तक नामक मेघ उत्पन्न होते हैं जो अत्यंत मूसलाधार और प्रलयंकारी वर्षा करते हैं, जिससे सम्पूर्ण त्रैलोक्य एक असीम और अंधकारमय विशाल महासागर (एकार्णव) में परिवर्तित हो जाता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, इस एकार्णव के जल का स्तर निरंतर बढ़ता हुआ सप्तर्षि मंडल (ध्रुवलोक के समीप) तक पहुँच जाता है, परन्तु महर्लोक अपनी अत्यधिक ऊँचाई के कारण जलमग्न होने से बच जाता है।
चूंकि महर्लोक इस नैमित्तिक प्रलय में पूर्णतः भस्म नहीं होता (यह अकृतक गुण है), परन्तु निवासियों से पूर्णतः निर्जन हो जाता है (यह कृतक गुण है), इसीलिए विष्णु पुराण (2.7.13) इसे पारिभाषिक रूप से "कृतकाकृतक" कहता है। ब्रह्मा की संपूर्ण रात्रि (कल्प के अंत) के दौरान यह महर्लोक पूर्णतः रिक्त अवस्था में महाकाश में स्थिर रहता है। जब ब्रह्मा जी की रात्रि समाप्त होती है और वे प्रातःकाल पुनः जागकर त्रैलोक्य की सृष्टि की रचना आरम्भ करते हैं, तब महर्षि भृगु आदि जनलोक से पुनः नीचे उतरकर महर्लोक में आ जाते हैं और अपने-अपने सृष्टि-सम्बन्धी अधिकारों को पुनः ग्रहण करते हैं।
इसके विपरीत, जब ब्रह्मा जी की पूरी आयु के 100 दिव्य वर्ष (दो परार्ध या महाकल्प) पूर्ण हो जाते हैं, तब 'प्राकृतिक प्रलय' या महाप्रलय होता है। इस महाप्रलय में महत्-तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (सत्यलोक और महर्लोक सहित सभी 14 लोक) भगवान नारायण की प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। इस प्राकृतिक प्रलय के समय महर्लोक भी अन्य लोकों की भाँति पूर्ण रूप से भस्म और नष्ट हो जाता है। उस समय महर्लोक के निवासी, जो सत्यलोक पहुँच चुके होते हैं, वे ब्रह्मा जी के साथ ही आत्यन्तिक प्रलय (मोक्ष) को प्राप्त होकर साक्षात् भगवान के परम धाम (वैकुण्ठ) में प्रवेश कर जाते हैं।
महर्लोक तक पहुँचने के जो साधन और कर्म शास्त्रों में वर्णित हैं, वे सामान्य पुण्य कर्मों से अत्यंत उच्च कोटि के और अत्यंत कठिन हैं। केवल सकाम दान, सामान्य व्रत और भौतिक यज्ञ मनुष्य को अधिक से अधिक स्वर्लोक (इन्द्रलोक) तक ही ले जा सकते हैं। स्वर्लोक के भोगों के समाप्त होने के पश्चात् जीव को पुनः मृत्युलोक में लौटना पड़ता है। परन्तु महर्लोक में प्रवेश के लिए विशुद्ध सत्त्वगुण, पूर्ण अनासक्ति और निष्काम भावना की आवश्यकता होती है।
श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और अन्य शास्त्रों के संयुक्त अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति अत्यंत कठोर तपस्या करते हैं, जो शास्त्रों में वर्णित महायज्ञों का निष्काम भाव (बिना किसी फल की इच्छा) से अनुष्ठान करते हैं और अपनी सम्पत्ति का अधिकांश भाग धर्मार्थ कार्यों में दान कर देते हैं, वे अपनी चेतना के उन्नत स्तर के कारण मृत्यु के पश्चात ध्रुवलोक की कक्षाओं को पार करके महर्लोक तक पहुँचने के अधिकारी बन सकते हैं। इसके अतिरिक्त जो ब्रह्मचारी आजीवन इन्द्रिय-संयम रखते हैं और जो वानप्रस्थी वनों में जाकर केवल कंद-मूल पर निर्वाह करते हुए देह को सुखा डालते हैं, वे भी महर्लोक को प्राप्त होते हैं। रहस्यमयी यौगिक सिद्धियों और अष्टांग योग के अभ्यास से सिद्ध योगी जन स्वेच्छा से अपने प्राणों को ब्रह्माण्ड के ऊर्ध्व लोकों (महर्लोक, जनलोक, तपोलोक) में ले जा सकते हैं। श्रीमद्भागवत (11.24.14) स्पष्ट करता है कि अष्टांग योग, महान तपस्या और संन्यास के माध्यम से इन ऊर्ध्व लोकों को प्राप्त किया जा सकता है।
यद्यपि महर्लोक एक अत्यंत पवित्र और सात्त्विक गंतव्य है, फिर भी वैष्णव आचार्यों और श्रीमद्भागवत के अनुसार यह जीव का अंतिम गंतव्य या पूर्ण मोक्ष नहीं है। यह लोक भौतिक ब्रह्माण्ड के आवरण के भीतर ही स्थित है। भगवद्गीता (8.16) का यह शाश्वत सिद्धांत कि "आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन" (ब्रह्मलोक तक जाने वाले सभी लोक पुनरावर्ती हैं, अर्थात् वहाँ से लौटकर आना पड़ता है) महर्लोक पर भी लागू होता है। यद्यपि यहाँ के निवासियों की आयु एक कल्प की है, तथापि यदि वे सत्यलोक तक की यात्रा तय करके ब्रह्मा जी के साथ मोक्ष प्राप्त नहीं करते, तो उन्हें पुनः सृष्टि चक्र में आना पड़ सकता है। महर्लोक भगवान विष्णु की भौतिक ऊर्जा का ही एक अत्यंत उन्नत प्रकटीकरण है, अतः यह भगवान के साक्षात् वैकुण्ठ धाम या गोलोक धाम (जो तीनों गुणों और प्रलय से सर्वथा परे है) से पूर्णतः भिन्न है। इसीलिए परमार्थ को जानने वाले भक्तियोगी इन मध्यवर्ती लोकों (महर्लोक, जनलोक आदि) के आकर्षण को पार करके सीधे वैकुण्ठ की प्राप्ति का ही लक्ष्य रखते हैं।
विष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सातवें अध्याय में पराशर ऋषि द्वारा अपने शिष्य मैत्रेय को दिए गए उपदेश में महर्लोक की स्थिति और प्रलय के समय इसके कृतकाकृतक स्वभाव का सबसे प्रामाणिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण विशेष रूप से इस बात पर बल देता है कि स्वर्ग और त्रैलोक्य के सभी भोग केवल सकाम कर्मों के तुच्छ फल हैं और जीव अज्ञानवश इन्हीं लोकों में युगों-युगों तक भटकता रहता है। मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) को इन सबसे पूर्णतः विरक्त होकर केवल अविनाशी भगवान वासुदेव में लीन होने का यत्न करना चाहिए। विष्णु पुराण के छठे अंश (6.3.28-29) में सङ्कर्षण की अग्नि द्वारा महर्लोक के संतापित होने और भृगु आदि महर्षियों के पलायन का भी अत्यंत हृदयस्पर्शी चित्रण है। इसी पुराण के छठे अंश में राजा खांडिक्य और केशीध्वज के संवाद में भी आत्मज्ञान की महत्ता को महर्लोक आदि से श्रेष्ठ बताया गया है।
शुकदेव गोस्वामी और राजा परीक्षित के परम पावन संवाद में (श्रीमद्भागवत 2.1.28) महर्लोक को भगवान के विराट् पुरुष की ग्रीवा कहा गया है। श्रीमद्भागवत (5.23.9) विशेष रूप से ध्रुवलोक और शिशुमार चक्र के संदर्भ में महर्लोक की दूरियों का ज्यामितीय विवरण प्रस्तुत करता है। भागवत (5.23.9) का श्लोक "गयहर्क्षतारामयमाधिदैविकं..." स्पष्ट करता है कि यह पूरा शिशुमार चक्र और इसके ऊपर स्थित महर्लोक भगवान का साक्षात् आधिदैविक स्वरूप है, जिसका तीनों संध्याओं में स्मरण करने से समस्त पापों का तत्क्षण नाश हो जाता है। भागवत यह भी सुनिश्चित करता है कि यह लोक सात्त्विक है और भय, रोग तथा वृद्धावस्था के द्वंद्वों से पूर्णतः मुक्त है।
गरुड़ और भगवान विष्णु के संवाद पर आधारित गरुड़ पुराण में, जहाँ एक ओर मृत्यु के पश्चात आत्मा की भयंकर यात्रा, वैतरणी नदी और यमलोक का भयावह वर्णन है, वहीं दूसरी ओर अष्टांग योग और मोक्ष के सन्दर्भ में पिण्ड-ब्रह्माण्ड तादात्म्य का भी गंभीर वर्णन है। गरुड़ पुराण मानव शरीर के कण्ठ को महर्लोक का स्थान मानता है। यह योगमार्ग और कुंडलिनी जागरण में विशुद्ध चक्र को जाग्रत करके महर्लोक की उच्च चेतना तक पहुँचने का एक स्पष्ट शास्त्रीय संकेत है。
इन दोनों महापुराणों का ब्रह्माण्ड विज्ञान लगभग एक समान है। ये पुराण महर्लोक के निवासियों के आधिकारिक पदों की समाप्ति और उनके महर्लोक में विश्राम का अत्यंत सूक्ष्म विवरण देते हैं। जो ऋषि और देवता किसी मन्वन्तर काल में सप्तर्षि, मनु या इन्द्र के पद पर ब्रह्माण्ड का प्रशासन करते हैं, वे अपना युग और कार्यकाल पूरा होने पर इस लोक में आसीन होते हैं और सत्यलोक जाने की शांतिपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं।
मार्कण्डेय पुराण (जैमिनि ऋषि और पक्षियों का प्रख्यात संवाद) नैमित्तिक प्रलय के समय उत्पन्न होने वाले एकार्णव की स्थिति का विशद वर्णन करता है। इसमें वर्णन है कि त्रैलोक्य के निवासी जलमग्न होने से पूर्व रक्षा के लिए महर्लोक की ओर भागते हैं, परन्तु महर्लोक के मूल निवासी संकर्षण की अग्नि के ताप से घबराकर जनलोक की ओर पलायन करते हैं। मार्कण्डेय पुराण में पक्षियों को विश्वामित्र द्वारा दिए गए शाप और कर्म-विपाक का प्रसंग भी यह सिद्ध करता है कि कोई भी जीव अपने कर्मों के अनुसार ही महर्लोक या मृत्युलोक की गति प्राप्त करता है।
समग्र शास्त्रीय अन्वेषण और पुराणों के तार्किक समन्वय से यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि महर्लोक भौतिक ब्रह्माण्ड और विशुद्ध आध्यात्मिक लोकों के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण विभाजक रेखा है। यह वह ऊर्ध्व लोक है जो ब्रह्माण्ड के दैनंदिन प्रलय से आंशिक रूप से अछूता रहता है और जो भौतिक सूर्य की अग्नि से नहीं अपितु योग और तप की अतीन्द्रिय आन्तरिक अग्नि से प्रकाशित होता है। महर्लोक की 'कृतकाकृतक' प्रकृति, विराट् पुरुष की ग्रीवा के रूप में इसका तादात्म्य, यज्ञेश्वर भगवान की यहाँ होने वाली नित्य मानसिक उपासना, और महर्षि भृगु जैसे महामानवों का यहाँ शाश्वत निवास—ये सभी प्रामाणिक तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि यह लोक सकाम कर्मकांडीय स्वर्ग से बहुत ऊपर, तपस्या, ब्रह्मचर्य और ज्ञान के उच्च शिखर पर अवस्थित है। महापुराण स्पष्ट करते हैं कि जब तक जीव अपनी इन्द्रियों का शमन कर अखंड ब्रह्मचर्य, निष्काम कर्म और योग का पूर्ण आश्रय नहीं लेता, तब तक इस दुर्लभ लोक में उसका प्रवेश सर्वथा असंभव है। यह लोक भगवान विष्णु की उस महान और रहस्यमयी ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का अभिन्न अंग है जो जीवात्मा को धीरे-धीरे भौतिकता के अज्ञान से निकालकर परब्रह्म परमात्मा के शाश्वत सत्य की ओर ले जाती है।

