द्वादशाक्षर वासुदेव मंत्र: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
मंत्र का स्रोत
यह मंत्र विभिन्न पुराणों एवं वैष्णव आगमों में प्रमुखता से वर्णित है। श्रीमद्भागवत पुराण में इसका विशेष महत्व बताया गया है ।
सम्बद्ध देव
भगवान् श्री वासुदेव (विष्णु)।
मंत्र का शब्दार्थ एवं भावार्थ
"ॐ (परमब्रह्म), मैं भगवान् वासुदेव को नमन करता हूँ।" यह मंत्र शरणागति एवं पूर्ण समर्पण के भाव को दर्शाता है। 'भगवते' शब्द भगवान के षड्-ऐश्वर्यों (ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य, तेज) से युक्त स्वरूप को इंगित करता है, और 'वासुदेवाय' का अर्थ है जो सर्वत्र वास करते हैं या वसुदेव के पुत्र।
शास्त्रोक्त फलश्रुति
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, बालक ध्रुव को देवर्षि नारद द्वारा इसी मंत्र की दीक्षा मिली थी, और इसके जप से उन्हें अति शीघ्र भगवान् के साक्षात् दर्शन हुए थे। यह मंत्र अंतःकरण की शुद्धि, भगवत्कृपा की प्राप्ति, एवं अंततः मोक्ष प्रदायक माना गया है। इसके जप से समस्त पापों का नाश होता है और साधक को अभय प्राप्त होता है।
विस्तृत जप-विधि एवं अनुष्ठान प्रक्रिया
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, शुद्ध आसन पर बैठकर इस मंत्र का जप करना श्रेयस्कर माना गया है । नारदीय विधि से जप करने पर श्रीविष्णु के साक्षात् दर्शन की बात कही गई है। कुछ ग्रंथों में ५ लाख जप से इस मंत्र की सिद्धि प्राप्त होने का विधान है। यद्यपि यह मंत्र अत्यंत प्रसिद्ध है, इसकी "अल्पज्ञात" शक्ति इसके सरल प्रतीत होने वाले स्वरूप में छिपी हुई है। विभिन्न पुराणों में इसके जप से असाधारण सिद्धियों की प्राप्ति का वर्णन है, जो सामान्य साधक की जानकारी से परे हो सकता है। इसकी सरलता ही इसकी गहनता है। यह मंत्र व्यापक रूप से जाना जाता है, परन्तु इसकी गूढ़ फलश्रुतियाँ (जैसे ध्रुव को भगवद्दर्शन) और विशिष्ट जपादि विधान (जैसे ५ लाख जप से सिद्धि) सामान्य जानकारी में कम हैं। अनेक "सरल" मंत्रों की शक्ति उनके बीज अक्षरों और उनसे उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म कंपनों में निहित होती है, जिसे केवल सतत साधना से ही अनुभव किया जा सकता है। इसका विभिन्न पुराणों में बार-बार उल्लेख इसकी सार्वभौमिक शक्ति और विभिन्न प्रकार के फलों को प्रदान करने की क्षमता को इंगित करता है, जो इसे "अल्पज्ञात" शक्तिशाली मंत्रों की श्रेणी में रखता है, यदि इसकी पूर्ण क्षमता पर विचार किया जाए।






