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विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के अनुसार तपोलोक के वैराज देवगणों का मन, उनकी चेतना और उनकी समस्त क्रियाएँ भगवान वासुदेव को पूर्णतः समर्पित होती हैं। वे निरंतर ब्रह्म-ध्यान में लीन रहते हैं। तपोलोक की प्राप्ति भी उन वासुदेव-परायण सिद्ध योगियों को होती है जो भगवान के द्वादशाक्षर मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का निरंतर चिंतन करते हैं। दस्तावेज़ के निष्कर्ष में भी तपोलोक को भगवान वासुदेव के प्रति अनन्य और निष्काम भक्ति का अंतिम प्रतिफल कहा गया है।
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