विस्तृत उत्तर
सनातन हिन्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान और प्रामाणिक पौराणिक शास्त्रों के अनुसार यह सम्पूर्ण दृश्यमान और अदृश्य ब्रह्माण्ड चौदह लोकों में विभक्त है। स्वर्गलोक से भी ऊपर ब्रह्माण्ड के उच्चतम शिखरों की ओर जाने पर जो प्रथम विशुद्ध आध्यात्मिक और तपोमयी भूमि प्राप्त होती है वह महर्लोक है। महर्लोक ब्रह्माण्ड के सात ऊर्ध्व लोकों की शृंखला में चतुर्थ स्थान पर अवस्थित है। यह भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक के ऊपर तथा जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक के ठीक नीचे स्थित है। महर्लोक ब्रह्माण्ड का वह सीमांत क्षेत्र है जहाँ भौतिकता का पूर्णतः अंत हो जाता है और विशुद्ध आध्यात्मिक तपस्या तथा योग का निर्बाध साम्राज्य आरम्भ होता है। यह कोई भौतिक भोग-भूमि या इन्द्रिय-विषयों का लोक नहीं है अपितु यह एक विशुद्ध आध्यात्मिक, चेतनात्मक और तपोमयी ऊर्जा का लोक है। यहाँ महान ऋषि, सृष्टि-कर्त्ता प्रजापति, पितृगण, सिद्ध योगी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी निवास करते हैं।
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