तपोलोक: वैदिक एवं पौराणिक शास्त्रों के आधार पर एक विस्तृत एवं प्रामाणिक शोध
सनातन हिंदू धर्म के प्रामाणिक शास्त्रों, अष्टादश महापुराणों, उपनिषदों और स्मृतियों में सृष्टि की संरचना तथा ब्रह्मांडीय भूगोल का अत्यंत सूक्ष्म, गणितीय और दार्शनिक विवेचन प्राप्त होता है। इस वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अंतर्गत संपूर्ण चराचर जगत को चौदह लोकों (चतुर्दश भुवन) में विभाजित किया गया है, जो परमेश्वर के विराट स्वरूप का ही विस्तार माने जाते हैं। इन चौदह लोकों को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में रखा जाता है: सात अधोलोक (नीचे के लोक या पाताल) और सात ऊर्ध्व लोक (ऊपर के लोक)। इन सात ऊर्ध्व लोकों के क्रम में भूर्लोक (पृथ्वी), भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक (ब्रह्मलोक) आते हैं। इस शृंखला में 'तपोलोक' नीचे से छठा और ऊपर से दूसरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण, दिव्य और परम पवित्र लोक है। तपोलोक का शाब्दिक और पारिभाषिक अर्थ है 'तपस्या का लोक' या 'तपस्वियों का संसार'। यह वह परम पावन आध्यात्मिक क्षेत्र है जहाँ शुद्ध चित्त वाले, ऊर्ध्वरेता, सिद्ध तपस्वी और 'वैराज' नामक अयोनिज देवगण निवास करते हैं। यह लोक भौतिक प्रपंचों, क्लेशों, और त्रिगुणमयी माया (सत्त्व, रज, तम) के बंधनों से पूर्णतः मुक्त एक विशुद्ध सात्त्विक और चिन्मय लोक है, जहाँ जन्म-मरण के लौकिक नियम लागू नहीं होते।
श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वितीय स्कन्ध के पंचम अध्याय में ब्रह्मांड की इस विशाल संरचना को भगवान के 'विराट स्वरूप' (विराट पुरुष) के अंगों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विराट पुरुष की यह धारणा एक ऐसा विशुद्ध शास्त्रीय सत्य है जो संपूर्ण चराचर जगत को परमेश्वर के एक अभिन्न और सजीव शरीर के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करता है। भागवत पुराण (2.5.36-39) के अनुसार, बड़े-बड़े दार्शनिक और महर्षि यह मानते हैं कि ब्रह्मांड में जितने भी लोक हैं, वे सभी परमेश्वर के विराट शरीर के विभिन्न ऊपरी तथा निचले अंगों का ही प्रदर्शन हैं। इस विराट शरीर के कटि भाग (कमर) से नीचे अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल—ये सातों अधोलोक स्थित हैं। मध्य लोकों में भूर्लोक (पृथ्वी), भुवर्लोक और स्वर्लोक आते हैं जो भगवान की नाभि तक के क्षेत्र में माने गए हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के द्वितीय स्कन्ध के पंचम अध्याय के उनतालीसवें श्लोक में स्पष्ट रूप से ऊर्ध्व लोकों का स्थानिक शरीर-विज्ञान वर्णित करते हुए कहा गया है कि विराट पुरुष के वक्षस्थल (छाती) के ऊपरी भाग से लेकर ग्रीवा (गर्दन) तक के स्थान में जनलोक और तपोलोक स्थित हैं, जबकि सबसे शीर्ष पर स्थित सत्यलोक (ब्रह्मा का धाम) उनके मस्तक पर सुशोभित है। यह प्रतीकात्मक एवं आध्यात्मिक वर्णन तपोलोक की सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता है। वक्षस्थल और ग्रीवा का यह क्षेत्र विशुद्धता का सूचक है, जो भौतिकता से पूर्ण निवृत्ति और विशुद्ध चेतना का केंद्र माना जाता है।
विभिन्न पुराणों में सूर्य से अन्य लोकों की दूरी और उनके विस्तार का अत्यंत सूक्ष्म, विस्तृत और गणितीय विवरण मिलता है। श्रीविष्णु पुराण के द्वितीय अंश के सप्तम अध्याय में महर्षि पराशर अपने शिष्य मैत्रेय को ब्रह्मांड के विस्तार का अत्यंत प्रामाणिक वर्णन प्रदान करते हैं। इसी प्रकार का विवरण श्रीमद्भागवत पुराण और ब्रह्मांड पुराण में भी प्राप्त होता है। इन शास्त्रों के अनुसार दूरियों का मापन 'योजन' नामक वैदिक इकाई में किया गया है। शास्त्रों में एक योजन का परिमाण अत्यंत विशाल माना गया है (प्रायः चार कोस या लगभग 13-16 किलोमीटर के तुल्य), और इसी इकाई के आधार पर ऊर्ध्व लोकों की दूरियों की सटीक गणना की गई है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, महर्षि पराशर और शुकदेव गोस्वामी द्वारा दिए गए ब्रह्मांडीय मापन के अनुसार, पृथ्वी (भूर्लोक) से सूर्यमण्डल की दूरी एक लाख योजन है। सूर्यमण्डल से एक लाख योजन ऊपर चंद्रमण्डल स्थित है। चंद्रमा से एक लाख योजन ऊपर संपूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित है। नक्षत्रमण्डल से दो लाख योजन ऊपर बुध ग्रह, बुध से दो लाख योजन ऊपर शुक्र, शुक्र से दो लाख योजन ऊपर मंगल, मंगल से दो लाख योजन ऊपर देवगुरु बृहस्पति, और बृहस्पति से दो लाख योजन ऊपर शनि ग्रह स्थित है। शनि मण्डल से एक लाख योजन की दूरी पर सप्तर्षिमण्डल है, और सप्तर्षियों से एक लाख योजन ऊपर समस्त ज्योतिश्चक्र की नाभि के रूप में ध्रुवमण्डल (ध्रुवलोक) स्थित है।
इस ध्रुवलोक को ऊर्ध्व लोकों का एक प्रमुख आधार बिंदु माना जाता है, जो सूर्य से कुल अड़तीस लाख (38,00,000) योजन ऊपर स्थित है। ध्रुवलोक से आगे की यात्रा पूर्णतः सिद्ध और दिव्य लोकों की यात्रा है। श्रीविष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, ध्रुवलोक से एक करोड़ (1,00,00,000) योजन ऊपर महर्लोक स्थित है, जहाँ कल्पान्त तक रहने वाले भृगु आदि महान सिद्धगण निवास करते हैं। महर्लोक से दो करोड़ (2,00,00,000) योजन ऊपर जनलोक स्थित है, जिसमें ब्रह्मा जी के प्रख्यात मानस पुत्र, निर्मल चित्त वाले सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार (सनकादि ऋषि) रहते हैं। जनलोक से भी ऊपर तपोलोक की सर्वोच्च और रहस्यमयी स्थिति है। श्रीविष्णु पुराण के द्वितीय अंश, सप्तम अध्याय के चौदहवें श्लोक (2.7.14) में महर्षि पराशर स्पष्ट रूप से उद्घोष करते हैं: "जनलोकाच्चतुर्गुणे तपोलोको महानृप।" अर्थात्, जनलोक से चौगुनी दूरी पर, जो कि आठ करोड़ (80,00,0000) योजन होती है, वहां तपोलोक स्थित है; और वहाँ वैराज नामक देवगणों का निवास है जिनका कभी दाह (भस्म) नहीं होता। श्रीमद्भागवत पुराण भी इसी गणितीय प्रमाण की शत-प्रतिशत पुष्टि करता है कि जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपोलोक स्थित है। तपोलोक से भी ऊपर ब्रह्मांड का सर्वोच्च लोक, सत्यलोक (जिसे ब्रह्मलोक भी कहा जाता है), सुशोभित है। तपोलोक से सत्यलोक की दूरी बारह करोड़ (12,00,00,000) योजन बताई गई है। इस सम्पूर्ण गणना के आधार पर सूर्य से सत्यलोक की कुल दूरी का जो महायोग बनता है, वह तेईस करोड़ अड़तीस लाख (23,38,00,000) योजन सिद्ध होता है। यह विस्तृत भौगोलिक वर्णन तपोलोक की ब्रह्मांडीय श्रेष्ठता और उसकी अकल्पनीय ऊँचाई को प्रमाणित करता है।
यद्यपि अधिकांश वैष्णव महापुराणों (जैसे विष्णु पुराण और भागवत पुराण) में यह दूरी उपर्युक्त प्रमाण के अनुसार ही मानी गई है, तथापि शिव पुराण और मार्कण्डेय पुराण के कुछ प्रसंगों में एक भिन्न मत भी दृष्टिगोचर होता है। शिव पुराण के वर्णन के अनुसार, तपोलोक जनलोक से आठ लाख (8,00,000) योजन की दूरी पर स्थित है और तपोलोक से सत्यलोक की दूरी अड़तालीस करोड़ (48,00,00,000) योजन बताई गई है। शिव पुराण यह भी स्पष्ट करता है कि तपोलोक में 'वैराज' नामक देवता निवास करते हैं, जिनका कोई स्थूल शरीर नहीं होता (वे अमूर्त होते हैं), और सत्यलोक में वे ब्रह्मचारी निवास करते हैं जो सच्चे धर्म और ज्ञान से युक्त हैं। शास्त्रों में दूरियों के इस भिन्न विवरण को विद्वानों द्वारा 'कल्प-भेद' (विभिन्न कल्पों में सृष्टि की संरचनात्मक भिन्नता) या 'ब्रह्मांड-भेद' (अनंत ब्रह्मांडों में अलग-अलग परिमाण) के रूप में समझा जाता है। सनातन दर्शन में अनंत ब्रह्मांडों की संकल्पना है और प्रत्येक कल्प में सृष्टि की संरचना में सूक्ष्म भिन्नताएं उत्पन्न होना शास्त्रीय रूप से मान्य है। फिर भी, सर्वाधिक मान्य, सर्वमान्य और प्रचलित दूरी विष्णु पुराण और भागवत पुराण की ही मानी जाती है, जो तपोलोक को जनलोक से आठ करोड़ योजन दूर स्थापित करती है।
तपोलोक कोई साधारण भोग-भूमि या स्वर्ग के समान ऐश्वर्य का स्थान नहीं है, अपितु यह विशुद्ध योगियों, निष्काम तपस्वियों और विशिष्ट देवगणों का नित्य निवास स्थान है। शास्त्रों में अत्यंत स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि तपोलोक में मुख्य रूप से 'वैराज' नामक देवगण निवास करते हैं। श्रीविष्णु पुराण और वायु पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि तपोलोक में वैराज नामक अयोनिज देवगणों का वास है जो जन्म-मरण और दाह (अग्नि) के प्रभाव से सर्वथा मुक्त हैं। इन देवगणों की उत्पत्ति किसी भौतिक गर्भ से नहीं हुई है, बल्कि ये ब्रह्मा जी के विराट स्वरूप (विराज या हिरण्यगर्भ) से सीधे प्रकट हुए हैं। वायु पुराण में इस बात की विस्तृत पुष्टि की गई है कि सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्मा जी ने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया, जिससे पुरुष और शतरूपा की उत्पत्ति हुई, और इसी 'विराज' (विराट) स्वरूप से उत्पन्न होने के कारण ही इन देवताओं को 'वैराज' कहा जाता है। ये वैराज देवगण ब्रह्मांड के आदिकाल में उत्पन्न हुए अत्यंत तेजोमय, सात्त्विक और पवित्र सत्ताएँ हैं, जो भौतिक सीमाओं से परे हैं।
स्कंद पुराण के अत्यंत गहन प्रसंगों में इन वैराज देवगणों और तपोलोक के निवासियों की विशेषताओं का अत्यंत विस्तृत और सूक्ष्म वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार, वैराज देवता किसी भी प्रकार की भौतिक 'प्यास' (तृष्णा) से पूर्णतः मुक्त होते हैं। यहाँ 'प्यास' का अर्थ केवल जल की शारीरिक प्यास नहीं है, बल्कि संसार के किसी भी विषय-भोग की लालसा, धन की कामना, पद की लालसा, या किसी भी प्रकार के ऐंद्रिक सुख की तृष्णा का पूर्ण अभाव है। ये देवगण पूर्ण रूप से निवृत्ति मार्ग पर स्थित हैं। स्कंद पुराण यह भी स्पष्ट करता है कि इन देवगणों का मन, उनकी समस्त चेतना और उनकी समस्त क्रियाएं भगवान वासुदेव (परमेश्वर) को पूर्णतः समर्पित होती हैं। ये निरंतर ब्रह्म-ध्यान में लीन रहते हैं। इनके अतिरिक्त तपोलोक में वे महान मुनि, सिद्ध और योगी भी निवास करते हैं जिन्होंने घोर तपस्या के द्वारा अपनी समस्त इंद्रियों को जीत लिया है (जितेंद्रिय) और अपने अखंड तप से भगवान नारायण (गोविंद) को प्रसन्न कर लिया है। ऐसे सिद्ध आत्माएँ इस लोक में आकर अपनी सभी लौकिक और अलौकिक इच्छाओं तथा महत्वाकांक्षाओं से मुक्त होकर अनंत काल तक शांत, विकाररहित और समाधिस्थ अवस्था में रहते हैं। वराह पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि जब भगवान नारायण ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने कल्प के आरंभ में जनलोक को वैराज देवों से और तपोलोक को उन देवताओं से भर दिया जो घोर तपस्या में लीन थे।
ब्रह्मांड पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन शास्त्रों में 'वैराज' प्रजापति का भी अत्यंत महत्वपूर्ण उल्लेख आता है, जो इसी वैराज कुल और तपोलोक की ऊर्जा से संबंधित हैं। इन पुराणों के अनुसार, वैराज प्रजापति की एक अत्यंत पवित्र और सुशीला कन्या थी जिसका नाम 'नद्वला' था। इस कन्या नद्वला का विवाह चाक्षुष मनु के साथ हुआ था, जिनसे दस अत्यंत तेजस्वी पुत्रों की उत्पत्ति हुई। इन दस पुत्रों के नाम उरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत, अतिरात्र, सुद्युम्न और अभिमन्यु थे। आगे चलकर उरु का विवाह आग्नेयी से हुआ, जिनसे अंग, सुमनस, स्वाति, क्रतु, अंगिरस और शिव नामक छह तेजस्वी पुत्र हुए। राजा अंग का विवाह सुनीथा से हुआ, जिनसे वेन नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई, और उसी वेन के शरीर-मंथन से परम प्रतापी राजा पृथु का जन्म हुआ। यह विस्तृत वंशावली और प्रसंग इस बात को सिद्ध करता है कि यद्यपि वैराज देवगण तपोलोक में निवास करते हैं और सांसारिक बंधनों से पूर्णतः मुक्त हैं, फिर भी कल्प के आरंभ में सृष्टि के विस्तार, वंशावली के निर्माण और लोक-मर्यादा के रक्षण हेतु परमेश्वर की इच्छा से वे प्रजापतियों के रूप में अवतीर्ण होकर अपना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान देते हैं। तपोलोक की सत्ता सृष्टि के आरंभ और विकास से अत्यंत गूढ़ रूप से जुड़ी हुई है।
तपोलोक के इन अधिवासियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका शरीर भौतिक पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित स्थूल शरीर नहीं होता। शिव पुराण के स्पष्ट उल्लेख के अनुसार तपोलोक में रहने वाले वैराज देवगणों का कोई स्थूल शरीर नहीं होता (वे अमूर्त या अशरीरी होते हैं), वे केवल चेतनामय प्रकाश-स्वरूप और ज्ञान-स्वरूप होते हैं। चूँकि इनका शरीर भौतिक या पाञ्चभौतिक नहीं होता, इसलिए इन्हें बुढ़ापा, रोग, थकान, शोक, या मृत्यु का लौकिक भय कभी नहीं सताता। ये निरंतर परमानंद और ब्रह्मानंद का रसपान करते हुए अपने आत्म-स्वरूप में स्थित रहते हैं। मार्कण्डेय पुराण और भागवत पुराण में 'ऋभु' नामक देवगणों का भी वर्णन आता है, जिन्हें तपस्या और अमरता के देव माना जाता है, और उनकी उपस्थिति भी तपोलोक के इसी पवित्र वातावरण से संबद्ध मानी जाती है। विष्णु पुराण के अनुसार, जिस प्रकार देवता और असुर भौतिक युद्धों में संलग्न रहते हैं, तपोलोक के निवासी ऐसे किसी भी द्वंद्व से परे केवल ईश्वरीय चिंतन में मग्न रहते हैं।
तपोलोक का वातावरण लौकिक जगत (पृथ्वी या स्वर्ग) की भांति भौतिक प्रकृति का नहीं है। यह पूर्णतया सात्त्विक, दिव्य, नीरव और चिन्मय है। तपोलोक में कोई भी भौतिक सूर्य, चंद्रमा या नक्षत्र प्रकाश नहीं देते, बल्कि वहां रहने वाले तपस्वियों और वैराज देवगणों के आत्म-तेज और उनकी तपस्या की ऊर्जा से ही संपूर्ण लोक देदीप्यमान रहता है। यह लोक अज्ञानता के किसी भी अंधकार से सर्वथा मुक्त है। यहाँ का प्रकाश आँखों को चुंधियाने वाला भौतिक प्रकाश नहीं है, अपितु आत्मा को शीतलता और ज्ञान प्रदान करने वाला दिव्य प्रकाश है। तपोलोक की संरचना के विषय में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विस्मयकारी तथ्य यह है कि यह लोक प्रलय के समय अग्नि के संहारक ताप से सर्वथा अप्रभावित रहता है। शास्त्रों में मुख्य रूप से दो प्रकार के प्रलय का विशेष वर्णन आता है: नैमित्तिक प्रलय (जो ब्रह्मा के दिन की समाप्ति और उनकी रात्रि के आरंभ के समय होता है) और प्राकृत प्रलय (जो ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर होता है)।
जब नैमित्तिक प्रलय का भयंकर समय आता है, तो पाताल लोक के सबसे नीचे स्थित भगवान संकर्षण (अनंत शेषनाग) के मुख से अत्यंत भयंकर संहारक अग्नि उत्पन्न होती है। यह प्रलयंकारी अग्नि भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को पूरी तरह भस्म कर देती है। इस अग्नि का प्रचंड ताप महर्लोक तक भी पहुँच जाता है। महर्लोक में निवास करने वाले भृगु आदि ऋषि उस असहनीय ताप से बचने के लिए महर्लोक को त्यागकर उससे ऊपर स्थित जनलोक में चले जाते हैं। परंतु, यह संहारक अग्नि और उसका भयंकर ताप जनलोक को पार करके तपोलोक तक कभी नहीं पहुँच पाता। श्रीविष्णु पुराण (2.7.14) का स्पष्ट कथन है कि वैराज देवगणों का "कभी दाह नहीं होता"। इसका सीधा अर्थ यह है कि कल्प के अंत में जब नीचे के तीनों लोकों का दाह (जलना) हो रहा होता है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न हो जाता है, तब भी तपोलोक के निवासी उस विनाशकारी अग्नि से पूर्णतः सुरक्षित और अक्षुण्ण रहते हैं। तपोलोक की संरचना ही ऐसी है कि वहाँ केवल 'तप' का ताप है, भौतिक अग्नि का ताप वहाँ प्रवेश नहीं कर सकता। वहाँ का वातावरण पूर्ण शांति, नीरवता और एकाग्रता से परिपूर्ण है। वहाँ न तो दिन-रात का काल-चक्र है, न ही ऋतुओं का परिवर्तन। वहाँ निवास करने वाले जीव केवल ध्यान और समाधि का आहार करते हैं। उनके लिए ईश्वर का सामीप्य ही उनका एकमात्र जीवन-स्रोत है।
शास्त्रों में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि कोई जीवात्मा मृत्यु के पश्चात तपोलोक जैसे अत्यंत उच्च और पवित्र लोक को कैसे प्राप्त कर सकती है? पुराणों के अनुसार, स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति सकाम कर्मों, यज्ञों, इष्टापूर्त कर्मों (कुआं बनवाना, तालाब खुदवाना, दान देना) और देवताओं की आराधना से होती है। परंतु महर्लोक, जनलोक और तपोलोक जैसे उच्च लोकों की प्राप्ति केवल भौतिक पुण्यों या सकाम कर्मकांडों से संभव नहीं है। इन लोकों में प्रवेश के लिए जीव को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य जैसे षड्रिपुओं का पूर्णतया नाश करना अनिवार्य है। मार्कण्डेय पुराण में मदालसा और अलर्क के संवाद के माध्यम से मानव जीवन के चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) का अत्यंत विषद वर्णन किया गया है। मदालसा बताती हैं कि सन्यास आश्रम में मनुष्य सब कुछ छोड़कर केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए परमात्मा में ध्यान लगाता है, और इन आश्रमों का सही पालन करने वाला परलोक में परम गति को प्राप्त होता है। तपोलोक की प्राप्ति ऐसे ही सन्यासियों और योगियों को होती है।
श्रीविष्णु पुराण के द्वितीय अंश के छठे और सातवें अध्याय में लोकों की प्राप्ति का वर्णन करते हुए महर्षि पराशर बताते हैं कि क्रियावान ब्राह्मणों के लिए प्राजापत्य लोक, संग्राम में न भागने वाले क्षत्रियों के लिए इंद्र लोक (स्वर्ग), स्वधर्म का पालन करने वाले वैश्यों के लिए मरुत लोक, और परिचर्या करने वाले शूद्रों के लिए गंधर्व लोक है। इसी क्रम में वे कहते हैं कि "अष्टाशीतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्", अर्थात् अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनियों का जो स्थान है, वही गुरु के निकट रहने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचारियों का स्थान है। वानप्रस्थियों का स्थान सप्तर्षिमण्डल है, संन्यासियों का स्थान ब्रह्मलोक है। जो योगी एकांत में रहते हैं, सदा ब्रह्म का ध्यान करते हैं और आत्मा के संतोष में लीन रहते हैं, उनके लिए विष्णु का परम पद है। विष्णु पुराण स्पष्ट करता है कि जो लोग केवल लौकिक यज्ञ करते हैं, वे स्वर्ग जाकर पुण्य क्षीण होने पर पुनः लौट आते हैं (गत्वा गत्वा निवर्तन्ते), परंतु जो ज्ञानी और योगी भगवान के 'द्वादशाक्षर मंत्र' (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का निरंतर चिंतन करते हैं, वे ऊर्ध्व लोकों को प्राप्त कर पुनः लौटकर नहीं आते (अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः)। ऐसे ही वासुदेव-परायण सिद्ध योगी तपोलोक को प्राप्त करते हैं।
गरुड़ पुराण में आत्मा की मृत्यु के उपरांत की यात्रा और कर्मों के फल का अत्यंत विस्तार से वर्णन है। जहाँ पापी आत्माएं यमदूतों द्वारा पाश में बांधकर यमलोक की यातनाएं भोगने के लिए ले जाई जाती हैं, तप्त बालू और अंधकारमय मार्ग से गुजरती हैं और विभिन्न नरकों (जैसे तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, असिपत्रवन आदि) में गिरती हैं; वहीं अत्यंत पुण्यात्माएं, निष्काम तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी यमलोक के मार्ग से सर्वथा मुक्त होकर सीधे ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के समय मनुष्य को मोह-माया त्यागकर श्रीहरि का ध्यान करना चाहिए। तपोलोक में जाने वाले जीव सामान्य कर्मकांडों के आश्रित नहीं होते, बल्कि वे वैराग्य और ज्ञान की अग्नि में अपने सभी संचित कर्मों को भस्म कर चुके होते हैं। तपोलोक में पहुँचने के पश्चात जीवात्मा को पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती (जब तक कि वह स्वेच्छा से या किसी विशेष ईश्वरीय विधान से अवतार न ले)। वे वहां ब्रह्मा की आयु समाप्त होने तक (प्राकृत प्रलय तक) रहते हैं और अंततः ब्रह्मा जी के साथ ही परब्रह्म परमात्मा में विलीन होकर आत्यंतिक मोक्ष (पूर्ण मुक्ति) को प्राप्त कर लेते हैं। आत्यन्तिक प्रलय ही वह अवस्था है जहाँ जीवात्मा सर्वोच्च ज्ञान के माध्यम से परम ब्रह्म (विष्णु) में विलीन हो जाती है।
सनातन शास्त्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जो कुछ भी इस बाह्य ब्रह्मांड में बताते हैं, उसे मानव शरीर रूपी सूक्ष्म ब्रह्मांड में भी पूर्ण रूप से स्थापित करते हैं। इस गूढ़ सिद्धांत को "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" (जो ब्रह्मांड में है, वही पिंड या शरीर में है) कहा जाता है। तपोलोक का वर्णन केवल बाह्य अंतरिक्ष के एक स्थान के रूप में ही नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक चेतना के एक चक्र और शारीरिक स्थान के रूप में भी पुराणों और योग शास्त्रों में किया गया है। गरुड़ पुराण के पंद्रहवें अध्याय में मानव शरीर के भीतर ही चौदह लोकों की स्थिति का एक अत्यंत गुह्य और रहस्यमयी वर्णन प्राप्त होता है। इस शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार, मनुष्य के पैरों के तलवों से लेकर कटि (कमर) तक के भाग में सातों पाताल स्थित हैं। कमर से ऊपर भूर्लोक, नाभि में भुवर्लोक, और हृदय में स्वर्लोक का वास है। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए, गरुड़ पुराण बताता है कि मनुष्य के मुख और गले के क्षेत्र में महर्लोक और जनलोक स्थित हैं, जबकि तपोलोक की स्थिति मनुष्य के ललाट पर है, और सत्यलोक सबसे ऊपर ब्रह्मरंध्र (सिर के शीर्ष) में स्थित है।
योगोपनिषदों (जैसे योगशिखा उपनिषद आदि) और तांत्रिक शास्त्रों में भी इस तादात्म्य का विस्तृत विश्लेषण मिलता है। इन शास्त्रों के अनुसार, तपोलोक मनुष्य के भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) स्थित 'आज्ञा चक्र' से गहराई से संबंधित है। आज्ञा चक्र को योगशास्त्र में 'तृतीय नेत्र' भी कहा जाता है। यह वह स्थान है जहाँ योगी ध्यान के समय अपनी संपूर्ण प्राण ऊर्जा और चित्त-वृत्ति को एकाग्र करता है। चूँकि तपोलोक तपस्या, ज्ञान, वैराग्य और विशुद्ध चेतना का लोक है, इसलिए शरीर में इसका स्थान आज्ञा चक्र या ललाट बताया गया है। जब कोई साधक गहरे ध्यान में अपनी चेतना को मूलाधार चक्र से उठाते हुए आज्ञा चक्र तक ले आता है, तो वह मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तपोलोक के स्तर की ऊर्जा और शुद्धता का अनुभव करने लगता है। इस अवस्था में साधक के भीतर की सभी भौतिक कामनाएं, अज्ञान और विकार समाप्त हो जाते हैं और वह तपोलोक में निवास करने वाले वैराज देवगणों के समान ही पूर्णतः अनासक्त, शांत और विकाररहित हो जाता है। यह शरीर और ब्रह्मांड का अद्भुत समन्वय दर्शाता है कि बाहरी तपोलोक तक पहुँचने की यात्रा वास्तव में मनुष्य के भीतर ही मूलाधार चक्र से उठकर आज्ञा चक्र तक पहुँचने की आंतरिक और अत्यंत दुष्कर योगिक यात्रा है।
विभिन्न अष्टादश पुराणों का अत्यंत गहराई से अध्ययन करने पर यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि यद्यपि इनके वर्णनों में कुछ भौगोलिक या मापन-भेद हो सकते हैं, परंतु तपोलोक की मूल आध्यात्मिक प्रकृति, उसकी सर्वोच्च पवित्रता और वहां के निवासियों के वैराग्य के विषय में सभी पुराण पूर्णतः एकमत हैं। श्रीविष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण मुख्य रूप से तपोलोक के ब्रह्मांडीय स्वरूप, सूर्य से उसकी गणितीय दूरियों (तेईस करोड़ अड़तीस लाख योजन तक का विस्तार) और नैमित्तिक प्रलय काल में उसकी अक्षुण्णता पर बल देते हैं। ये दोनों पुराण सृष्टि के गणितीय और भौतिक भूगोल को परमेश्वर की शक्तियों के रूप में स्पष्ट करते हैं। वहीं, वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण तपोलोक के ऐतिहासिक और वंशावली दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं। इनमें वैराज देवों की उत्पत्ति, उनके प्रजापति रूप, उनकी कन्या नद्वला, चाक्षुष मनु से उसके विवाह और सृष्टि के विस्तार में उनके परोक्ष योगदान का विशेष रूप से वर्णन है। यह सिद्ध करता है कि तपोलोक के निवासी पूर्णतः जड़ या निष्क्रिय नहीं हैं, बल्कि जब ब्रह्मांडीय व्यवस्था और धर्म की रक्षा की आवश्यकता होती है, तो वे सृष्टि के विस्तार में अपना अमोघ और दिव्य योगदान भी देते हैं।
स्कंद पुराण तपोलोक के योगिक और भक्तिपरक पक्ष को उजागर करता है। यह उन कठोर नियमों और योग्यताओं को पारिभाषित करता है जो इस लोक में प्रवेश के लिए अनिवार्य हैं, जैसे संपूर्ण इंद्रिय-निग्रह, निष्काम कर्म, और भगवान गोविंद की अनन्य आराधना। दूसरी ओर, वराह पुराण और मार्कण्डेय पुराण तपोलोक को उन महान तपस्वियों के शाश्वत विश्राम स्थल के रूप में देखते हैं जो कल्प के आरंभ में उत्पन्न हुए थे। अंततः, गरुड़ पुराण इस संपूर्ण ब्रह्मांडीय ज्ञान को मनुष्य के भौतिक शरीर में समेट कर योगियों के लिए एक प्रायोगिक और साधनापरक मार्ग प्रस्तुत करता है, जहाँ तपोलोक ललाट या आज्ञा चक्र का प्रतीक बन जाता है। इन सभी मतों को एक साथ सम्मिलित करने पर यह स्पष्ट होता है कि तपोलोक का वर्णन शास्त्रों में तीन अलग-अलग स्तरों पर किया गया है: आधिभौतिक (ब्रह्मांड में एक निश्चित दूरी पर स्थित एक वास्तविक लोक जो जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर है), आधिदैविक (वैराज नामक अयोनिज और दाह-मुक्त देवगणों का नित्य निवास स्थान), और आध्यात्मिक (मनुष्य के शरीर में आज्ञा चक्र और चेतना की अत्यंत उच्च, विकाररहित और शुद्ध अवस्था)।
उपर्युक्त समस्त शास्त्रीय प्रमाणों के गहन अनुशीलन के पश्चात यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि तपोलोक ब्रह्मांड की ऊर्ध्व संरचना में एक सर्वोच्च कोटि का आध्यात्मिक मुकाम है। भगवान के विराट स्वरूप में ग्रीवा और वक्षस्थल के मध्य स्थित यह लोक भौतिकता, ताप, संहार और अज्ञान के अंधकार से सर्वथा परे है। यह वह लोक है जो कल्पान्त की प्रलयंकारी अग्नि से भी नहीं जलता और न ही किसी सांसारिक तृष्णा के वशीभूत होता है। तपोलोक केवल मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाला कोई बाह्य स्थान मात्र नहीं है, अपितु यह उत्कृष्ट तपस्या, अखंड ब्रह्मचर्य, जितेंद्रियता और भगवान वासुदेव के प्रति अनन्य एवं निष्काम भक्ति का अंतिम प्रतिफल है। जो योगी अपने जीवनकाल में ही अपनी चेतना को सांसारिक वासनाओं से मुक्त कर आज्ञा चक्र तक ले आते हैं, वे जीते जी तपोलोक की शक्तियों और उसकी अनंत शांति का अनुभव कर लेते हैं। इस प्रकार तपोलोक आत्मा की उस परम शुद्ध और सात्त्विक अवस्था का प्रत्यक्ष लोक है, जहाँ से जीव केवल सत्यलोक (परब्रह्म) की ओर ही अग्रसर होता है और आवागमन के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाने की तैयारी करता है। चराचर जगत में भौतिक प्रपंचों से त्रस्त जीवात्मा के लिए तपोलोक एक ऐसा परम शांतिदायक और चिन्मय आश्रय है, जहाँ केवल परमेश्वर के ध्यान और अखंड तपस्या का ही अजेय साम्राज्य है। यह विशुद्ध शास्त्रीय विवेचन तपोलोक की महत्ता को सनातन ब्रह्मांड विज्ञान के एक अद्वितीय और परम पवित्र अध्याय के रूप में पूर्णतः स्थापित करता है।





